प्रधानमंत्री ने कहा: देश में नौकरियों की नहीं, विपक्ष के पास आंकड़ों की कमी

देश में नौकरियों की कमी को लेकर विपक्ष द्वारा उठाए जा रहे सवालों को प्रधानमंत्री मोदी ने पूरी तरह से

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यूपी: शिक्षा बदहाली के खिलाफ एक जन-अभियान

उत्तर प्रदेश में शिक्षा और रोज़गार की बदहाल स्थिति को देखते हुए नौजवान भारत सभा, दिशा छात्र संगठन और जागरूक

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मोदी जी आखिर क्यों चपरासी बनने के लिए बेताब हैं देश की डिग्रीधारक युवा आबादी

देश की सरकार युवाओं के लिए रोज़गार पैदा करने को लेकर बड़े-बड़े वादे कर रही है लेकिन सर्कार को भी

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मजदूरों का सप्लायर क्यों बन गया उत्तर प्रदेश!

  शिवाजी राय भारत में पुर्तगाली, फ्रांसीसी और अंग्रेजों ने जिन व्यापार केंद्रों को स्थापित किया था, आज भी लगभग

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हाल-ए-रोज़गार दफ्तर, बेरोज़गारी से भी बदतर

ऐसा नहीं है कि भारत में बेरोजगारी की समस्या नई है, लेकिन वर्तमान में इसने विकराल रूप धारण कर लिया

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मोदी सरकार ने भी स्वीकार किया, अभी तक तो नहीं आए अच्छे दिन

नई दिल्ली। अच्छे दिनों का वादा करके सत्ता में आई मोदी सरकार को 3 साल से ज्यादा का वक्त बीत

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बेरोजगारों के आएंगे अच्छे दिन, तुरंत भरें ये फार्म

नई दिल्ली (ब्यूरो, चौथी दुनिया)। अगर आप बेरोजगार हैं और नौकरी तलाश में लगे हुए हैं तो आपके लिए एक

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चुनावी आस में भटक रहे राजनीतिक बेरोज़गार

बेरोज़गारी एक ऐसा शब्द है जिसके स्मरण मात्र से ही न जाने कितनी बातें हर किसी के मन में उठने

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अंधराष्ट्रवाद से बढ़ रहा है लोकतंत्र के लिए ख़तरा

चाहे कोई भी विषय हो, देश का एक छोटा लेकिन ख़तरनाक तबक़ा फेसबुक का सहारा लेकर नफ़रत फैलाने का काम

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सभी पार्टियों में अम्बेडकर को अपना दिखाने की रेस : हित नहीं, वोट हथियाने की होड़

कांग्रेस से लेकर भारतीय जनता पार्टी और बहुजन समाज पार्टी से लेकर समाजवादी पार्टी तक सब में दलितवाद की होड़

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यह संसद संविधान विरोधी है

सरकार को आम जनता की कोई चिंता नहीं है. संविधान के मुताबिक़, भारत एक लोक कल्याणकारी राज्य है. इसका साफ़ मतलब है कि भारत का प्रजातंत्र और प्रजातांत्रिक ढंग से चुनी हुई सरकार आम आदमी के जीवन की रक्षा और उसकी बेहतरी के लिए वचनबद्ध है. लेकिन सरकार ने इस लोक कल्याणकारी चरित्र को ही बदल दिया है. सरकार बाज़ार के सामने समर्पण कर चुकी है, लेकिन संसद में किसी ने सवाल तक नहीं उठाया.

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जनरल वी के सिंह और अन्‍ना हजारे की चुनौतियां

भारत में लोकतंत्र की इतनी दुर्दशा आज़ादी के बाद कभी नहीं हुई थी. संसदीय लोकतंत्र में राजनीतिक दलों का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है, लेकिन विडंबना यह है कि आज संसदीय लोकतंत्र को चलाने वाले सारे दलों का चरित्र लगभग एक जैसा हो गया है. चाहे कांग्रेस हो या भारतीय जनता पार्टी या अन्य राजनीतिक दल, जिनका प्रतिनिधित्व संसद में है या फिर वे सभी, जो किसी न किसी राज्य में सरकार में हैं, सभी का व्यवहार सरकारी दल जैसा हो गया है.

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संसद ने सर्वोच्च होने का अधिकार खो दिया है

भारत की संसद की परिकल्पना लोकतंत्र की समस्याओं और लोकतंत्र की चुनौतियों के साथ लोकतंत्र को और ज़्यादा असरदार बनाने के लिए की गई थी. दूसरे शब्दों में संसद विश्व के लिए भारतीय लोकतंत्र का चेहरा है. जिस तरह शरीर में किसी भी तरह की तकली़फ के निशान मानव के चेहरे पर आ जाते हैं, उसी तरह भारतीय लोकतंत्र की अच्छाई या बुराई के निशान संसद की स्थिति को देखकर आसानी से लगाए जा सकते हैं.

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Who will Defeat ANNA & BABA

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रेखा गूंगी गुड़िया नहीं हैं

कुछ लोगों का व्यक्तित्व आग की तरह होता है. वे जहां जाते हैं या तो लोगों को तपिश का अनुभव कराते हैं या झुलसा देते हैं और जिन्हें झुलसा नहीं पाते, उन्हें जला देते हैं. रेखा एक आग का नाम है और रेखा का संपूर्ण व्यक्तित्व ऐसा ही व्यक्तित्व है. रेखा राज्यसभा की मनोनीत सदस्य हैं.

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खुदरा बाज़ार में विदेशी निवेश : यह एक छलावा है

भारतीय राजनीति में शर्मनाक कीर्तिमान स्थापित हो रहे हैं. क्या हमने अमेरिका को भारत की आंतरिक राजनीति में हस्तक्षेप करने की छूट दे दी है. अगर नहीं, तो देश की विपक्षी पार्टियां और मीडिया ने यह बात क्यों नहीं उठाई कि अमेरिका की विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने ममता बनर्जी से खुदरा बाज़ार में विदेशी पूंजी निवेश जैसे विवादित मामले पर क्यों बात की?

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बापू की वस्तुओं की नीलामी पर तीखी प्रतिक्रियाः कांग्रेस गांधी की गुनहगार है

मोहनदास करम चंद गांधी यानी महात्मा गांधी के निधन को 65 वर्षों से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन आज भी वह पूरी दुनिया के लिए उतने ही प्रासंगिक नज़र आते हैं, जितने वह जीते जी हुआ करते थे. गांधी जी की समकालीन कई महान हस्तियां इतिहास के पन्नों तक सिमट कर रह गई हैं, लेकिन गांधी दर्शन आज भी जीने की कला बना हुआ है. कुछ मामलों में तो लगता है कि आज उनकी प्रासंगिकता ज़्यादा बढ़ गई है.

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जनता को अपनी ज़िम्मेदारी समझनी चाहिए

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में महंगाई, बेरोज़गारी, शिक्षा एवं स्वास्थ्य व्यवस्था की बदहाली और भ्रष्टाचार आदि मुद्दे सा़फ दिखाई देते हैं, लेकिन इन्हीं के साथ एक और महत्वपूर्ण मुद्दा दिखाई देता है, वह है अपराध. अपराध प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष, लेकिन प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष अपराध से भी ज़्यादा महत्वपूर्ण है राजनीति का अपराधीकरण या अपराधियों का राजनीति में बेख़ौ़फ प्रवेश.

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वक्त की नज़ाकत को समझने की ज़रूरत

2 अक्टूबर बीत गया. पहली बार देश में 2 अक्टूबर सरकारी फाइलों और सरकारी समारोहों से बाहर निकल करके लोगों के बीच में रहा. लोगों ने गांधी टोपी लगाकर महात्मा गांधी को याद किया. न केवल महात्मा गांधी को याद किया, बल्कि उनके विचारों के ऊपर चर्चाएं कीं, सेमिनार किए. 2 अक्टूबर बीतने के बाद ऐसा लग रहा है कि इस देश में बहुत सालों के बाद गांधी का नाम गांधीवादियों द्वारा नहीं, बल्कि गांधी के विचारों की ताक़त के आधार पर लोगों के मन में घर कर रहा है.

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पश्मिच बंगालः ममता युवाओं में आस जगाएंगी

गर्द के ग़ुबार में आग की तस्वीरें धुंधली दिखती हैं, पर वह आग अगर किसी इंसान की देह में लगी हो तो किसी भी दर्शक की संवेदनाओं के कोमल तंतु को झुलसाने के लिए का़फी हैं. बंगाल में इस समय चुनावी गर्द का कोहरा है और प्रसून दत्ता जैसे बेरोज़गार युवक द्वारा आत्मदाह की कोशिश, वह भी बंगाल की उम्मीद ममता बनर्जी के घर के सामने, एक राष्ट्रीय मुद्दा बनती है.

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दलित उद्यमिता का संकल्‍प

सांगली से लगभग 40 किलोमीटर की दूरी पर कावधे महान्का ताल्लुका में देवानंद लोंधे का हिंगन गांव है. वह लंबे समय तक अपने गांव से बाहर रहे. कई वर्षों तक देश से भी बाहर रहे. अच्छी नौकरी थी, लेकिन उसके बावजूद दिल में तड़प हमेशा अपने गांव लौटने की बनी रही.

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कुटुंबक्‍कमः एक गांव, जो विकास का मॉडल है

वर्ष 1857 के आंदोलन को अंग्रेजों ने किसी तरह दबा तो दिया, लेकिन यह बात उनकी समझ से बाहर थी कि आख़िर यह सब हुआ कैसे. यह आंदोलन कैसे हुआ, कैसे इतना फैला और किसी को इसकी भनक तक नहीं लगी. ये सारी बातें समझने के लिए अंग्रेजों ने एक आयोग बनाया, जिसकी अध्यक्षता सर ए ओ ह्यूम को सौंपी गई.

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कोहरे में लिपटी परदेसियों की उम्‍मीद

वतन से दूर, बीवी बच्चों से अलग, मां बहनों की नज़रों से ओझल एक परदेसी के लिए अपनी मिट्टी पर त्यौहार मनाने की ख़ुशी कुछ और ही होती है. वह भी ऐसे समय पर जब लोकतंत्र का महान पर्व यानी चुनाव साथ-साथ हो. नवंबर का महीना आख़िरी पड़ाव पर है.

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रोजगार की तलाश में पलायन जारी

ग्रामीणों को 100 दिन रोज़गार उपलब्ध कराने के दावों और वादों के साथ चलाई जा रही महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना को लागू हुए चार वर्ष हो गए हैं, किंतु पलायन रुकने का नाम नहीं ले रहा है. ग्रामीणों को रोज़गार उपलब्ध कराने के लिए केंद्र और राज्य सरकार की ओर से पैसा तो मिल रहा है, बावजूद इसके छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचलों से रोज़गार की तलाश में लोगों का पलायन जारी है.

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ना जइयो परदेस

संजय साव की उम्र 32 साल है. वह बिहार के गोपालगंज का रहने वाला है. गांव में रहकर वह इतना नहीं कमा पाता कि अपने परिवार के भोजन और अन्य ज़रूरतों को पूरा कर सके. दिक्कतों को झेलते-झेलते परेशान होकर वह कमाने के लिए बाहर जाने का फैसला करता है, ताकि अपने घर कुछ पैसा भेज सके और बच्चों को कम से कम दो व़क्त की रोटी नसीब हो.

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दिल्‍ली की प्रवासी आबादी जाएं तो जाएं कहां!

फैक्ट्रियों में मज़दूरी करके, सड़कों पर रिक्शा-ऑटो एवं छोटी-मोटी दुकान चलाकर किसी तरह अपनी ज़िंदगी गुजार रहे इन लोगों का भविष्य वैसे ही अनिश्चितता के भंवर में उलझा हुआ है, रही-सही कसर महंगाई ने पूरी कर दी है. दिल्ली के बारे में कहा जाता है कि यहां हर आय वर्ग के लोगों के लिए रहने की संभावना मौजूद है, लेकिन अब यह मिथक टूटता जा रहा है.

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बीजेपी के अस्तित्‍व पर संकट

मुसीबतें हर आम इंसान और समाज पर आती हैं. हम लड़ते भी हैं. इस लड़ाई में अगर कोई हमदर्द न मिले तो लोग असहाय और बेसहारा महसूस करने लगते हैं. ऐसा लगने लगता है कि सब कुछ ख़त्म हो रहा है. इससे भी ख़तरनाक स्थिति तब पैदा होती है जब कोई ख़ुदगर्ज हमदर्द बनने का नाटक करता है.

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रोटी के नाम पर धोखा

गरीबों का पेट भर सकने वाले राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा बिल में तमाम विसंगतियां हैं, जो भारत की ग़रीब जनता के हित में नहीं है. महिला बाल विकास मंत्रालय, मानव संसाधन विकास मंत्रालय, स्वास्थ्य एवं कल्याण मंत्रालय और कृषि एवं खाद्य मंत्रालय भूख और ग़रीबी के उन्मूलन के लिए कुल 25 योजनाएं चला रहे हैं, लेकिन हक़ीक़त में इन योजनाओं का नतीजा कहीं देखने को नहीं मिल रहा है.

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नेपालः राजशाही वापसी की राह पर

नेपाल उबल रहा है. राजनीतिक दलों एवं सरकार की हठधर्मिता के चलते जनता का मोहभंग हो रहा है और देश में अकेली पड़ी राजशाही को अपने लिए नई संभावनाएं दिखने लगी हैं. नए संविधान के गठन की समय सीमा नज़दीक आती जा रही है, लेकिन संविधान का कोई नामोनिशान भी अब तक नज़र नहीं आ रहा.

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