सुरक्षा परिषद खुद असुरक्षित है

भारत संयुक्त राष्ट्र के संस्थापक सदस्यों में महत्वपूर्ण स्थान रखता है. यह 7 बार संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का अस्थायी

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इंडियन एक्सप्रेस की पत्रकारिता – 1

भारतीय सेना की एक यूनिट है टेक्निकल सर्विस डिवीजन (टीडीएस), जो दूसरे देशों में कोवर्ट ऑपरेशन करती है. यह भारत की ऐसी अकेली यूनिट है, जिसके पास खुफिया तरीके से ऑपरेशन करने की क्षमता है. इसे रक्षा मंत्री की सहमति से बनाया गया था, क्योंकि रॉ और आईबी जैसे संगठनों की क्षमता कम हो गई थी. यह इतनी महत्वपूर्ण यूनिट है कि यहां क्या काम होता है, इसका दफ्तर कहां है, कौन-कौन लोग इसमें काम करते हैं आदि सारी जानकारियां गुप्त हैं, टॉप सीक्रेट हैं, लेकिन 16 अगस्त, 2012 को शाम छह बजे एक सफेद रंग की क्वॉलिस गाड़ी टेक्निकल सर्विस डिवीजन के दफ्तर के पास आकर रुकती है, जिससे दो व्यक्ति उतरते हैं. एक व्यक्ति क्वॉलिस के पास खड़े होकर इंतज़ार करने लगता है और दूसरा व्यक्ति यूनिट के अंदर घुस जाता है.

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टीम अन्‍ना ने दिया सबूत हर एक रक्षा सौदे के पीछे दलाल है

हथियारों के दलाल ऐसे लोग हैं, जो होते तो हैं, लेकिन दिखते नहीं. अभी कुछ समय पहले ही एक अंग्रेजी पत्रिका ने इसी विषय पर एक विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित की थी, जिसमें हथियार दलालों के नाम तो नहीं बताए गए थे, लेकिन इशारों-इशारों में ही बहुत कुछ कहानी कहने की कोशिश की गई थी. इस रिपोर्ट से इतना तो साफ हो गया था कि भारतीय हथियार दलालों के न स़िर्फ हौसले बुलंद हैं, बल्कि उनके रिश्ते भी बहुत ऊपर तक है.

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यह सिद्धांत की लड़ाई है

मैं जन्म तिथि मामले में सुप्रीम कोर्ट इसलिए गया, क्योंकि यह सिद्धांत की बात थी. मैंने सुप्रीम कोर्ट में भी यही कहा कि मुझे अपना कार्यकाल नहीं बढ़ाना है. इसमें सुप्रीम कोर्ट ने एक तरह से कोई फैसला नहीं दिया. उन्होंने इसके ऊपर यह कहा कि हमारे पास जो समस्या आई है, उसे हम इस तरीक़े से ले रहे हैं कि जो इनकी आयु है, जो रिकॉर्ड के अंदर है, उसमें हमें कोई दिक्क़त नहीं है और इस पर अटॉर्नी जनरल साहब और सरकार ने जो आदेश दिया है, वह उन्होंने वापस ले लिया है, इसलिए कोई समस्या नहीं बनती.

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इंडिया अगेंस्‍ट करप्‍शनः अन्‍ना चर्चा समूह, सवाल देश की सुरक्षा का है, फिर भी चुप रहेंगे? अन्‍ना हजारे ने प्रधानमंत्री से मांगा जवाब…

आदरणीय डॉ. मनमोहन सिंह जी,

पिछले कुछ महीनों की घटनाओं ने भारत की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर देश की जनता को का़फी चिंतित किया है. लेकिन अधिक चिंता का विषय यह है कि क्या इतनी चिंताजनक घटनाएं हो जाने के बावजूद कुछ सुधार होगा? अभी तक की भारत सरकार की कार्रवाई से ऐसा लगता नहीं कि कुछ सुधरेगा.

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सेना के लिए ये एक अद्भुत अवसर है

भारतीय सेना देश का गौरव है. गौरव इसलिए है, क्योंकि देश का जवान मौत को चुनता है. सेना में जाने की एक ही क़ीमत है. जब भी युद्ध हो या देश में कहीं भी अशांति हो, सेना का जवान वहां हथियार लिए हुए मुस्तैद रहे. इस प्रोफेशन की यही एक मात्र शर्त है. इसका सीधा मतलब अपनी ख़ुशी से मौत को चुनना है. हमारे देश का वह जवान जो ख़ुशी-ख़ुशी देश की रक्षा के लिए, देश में अमन-चैन के लिए मौत को चुनता है. लेकिन जब वह नौकरी से रिटायर होता है, तो सेना और समाज उसे भटकने के लिए छोड़ देता है.

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फैक्टरी एक्ट

भारत में भी इस सदी की शुरुआत में, अंग्रेजों की पहल से फैक्टरी एक्ट्‌स बने और लागू हुए. इन क़ानूनों की कृपा से यह हुआ कि निश्चित उम्र से कम उम्र के बालकों से कोई काम कतई नहीं लिया जा सकता था. स्त्रियों को कुछ निश्चित काम ही करने हैं. गर्भवती स्त्री को या बच्चे की मां के लिए निर्धारित खुराक का प्रबंध अनिवार्य है. हर मज़दूर के काम करने के घंटे निश्चित कर दिए गए थे. कारखाना या फैक्टरी के चालू रहने का समय निर्धारित हो गया था. कारखाने या फैक्टरी में कोई भी मशीन या हथियार ऐसे हों, जिनसे मज़दूरों को चोट आने का ख़तरा हो तो उन्हें अच्छी तरह बचाव के साधन के साथ रखना अनिवार्य कर दिया गया.

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श्यामल के हौसले को सलाम

दुनिया में इतिहास रचने वालों की कोई कमी नहीं है. कुछ लोग अपना नाम चमकाने के लिए इतिहास रचते हैं तो कुछ लोग निस्वार्थ रूप से अपना कार्य करते हैं और उन्हें पता भी नहीं चलता कि उन्होंने इतिहास रच दिया. बिहार के गया ज़िले के दशरथ मांझी एक ऐसे ही इतिहास रचयिता रहे हैं, जिन्होंने अपनी पत्नी के इलाज में बाधक बने पहाड़ को काटकर सड़क निर्माण किया था.

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कांग्रेस सरकार इज़राइल की दोस्त है

इज़राइल के अ़खबारों में भारत-इज़राइल दोस्ती की कहानियां धड़ल्ले से छप रही हैं. दोनों देशों को एक नेचुरल फ्रेंड बताया जा रहा है. साथ में यह भी बताया जा रहा है कि किस तरह अमेरिका की यहूदी लॉबी ने अमेरिका, और भारत को एकजुट किया. यही यहूदी लॉबी भारत-अमेरिका न्यूक्लियर डील और इज़राइल से हथियार खरीदने की डील के पीछे है.

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26/11 के तीन साल : आतंकी हमले से हमने कितना सबक़ लिया

काफी अर्से से महाराष्ट्र के समुद्री किनारे की सुरक्षा को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है. हथियारों एवं बारूद की तस्करी और आतंकवादियों की घुसपैठ समुद्री किनारे से होती है, जिसे रोकना तो दूर, उल्टे इस मुद्दे पर नौसेना, तटरक्षक दल, पुलिस और गुप्तचर विभाग एक-दूसरे पर ज़िम्मेदारी थोपने में मग्न रहते हैं.

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सदर अस्पताल का बुरा हाल

देवघर सदर अस्पताल झारखंड का एकमात्र आईएसओ प्रमाणित अस्पताल है. सदर अस्पताल में मरीज़ों को बेहतर सुविधा उपलब्ध कराने के नाम पर प्रति महीने लाखों का खर्च स्वास्थ्य विभाग की ओर से किया जाता है, लेकिन स्थिति बद से बदतर ही होती जा रही है.

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नेताओं के हथियार से नक्‍सली कर रहे प्रहार

बिहार-झारखंड में नक्सली संगठनों की बढ़ी सक्रियता और बेलगाम हरकतों ने जहां सुरक्षा तंत्र को पूरी तरह से हलकान कर रखा है, वहीं आम-अवाम भी उनकी गतिविधियों से पस्त दिख रहा है. बस्तियों-जंगलों में गोलियों की बौछार कर या फिर सड़कों पर बारूदी सुरंगों का विस्फोट कर दहशत फैलाने वाले नक्सलियों ने आम जनता और सरकारी मशीनरी को आतंकित करने का एक नया तरीका ईजाद किया है.

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अपराधियों की बल्‍ले-बल्‍ले

बिहार में विधानसभा चुनाव में अब कुछ ही महीने शेष हैं. बम और हथियार बनाने के साथ-साथ चुनावी अपराध करने वाले तत्व अपने-अपने तौर-तरीके दुरुस्त करने में लग गए हैं. ऐसा हो भी क्यों नहीं, सभी के अपने-अपने रेट हैं और अपराध करने का तरीका भी अलग-अलग है.

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एक बम दिल्‍ली खत्‍म

भारत के चारों ओर न्यूक्लियर हथियारों का जमावड़ा हो रहा है. पाकिस्तान और चीन के पास हिंदुस्तान से ज़्यादा एटम बम हैं. कुछ रिपोर्ट यह भी बताती हैं कि बर्मा और बांग्लादेश भी परमाणु बम बनाने की कगार पर पहुंच चुके हैं. इन सबसे ज़्यादा ख़तरा आतंकवादियों से है, जिनके पास रेडिएशन फैलाने वाले बमों को बनाने की क्षमता है.

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मुंगेर की अर्थव्यवस्था का आधार-अवैध हथियार

चाहे दक्षिण के तमिलनाडु या कर्नाटक में हथियारों का जखीरा पकड़ा जाए अथवा मुंबई, जम्मू-कश्मीर और पश्चिम बंगाल में हथियारों की बरामदगी हो, मुंगेर का नाम ज़रूर आता है. देसी कट्टे, बंदूक एवं राइफल से लेकर अत्याधुनिक पिस्टल, कारबाइन और एके-47 तक मुंगेर में बनाई जा रही हैं.

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अमेरिका की दोहरी नीति में पिसता पाकिस्‍तान

अपने रणनीतिक और सामरिक हितों की सुरक्षा के नाम पर अमेरिका दूसरे देशों के आंतरिक मामलों में दख़ल देता रहता है. उत्तरी से लेकर दक्षिणी ध्रुव तक दुनिया में कहीं भी कुछ हो तो किसी न किसी तरह वह अमेरिका के लिए चिंता का विषय बन जाता है. पाकिस्तान इससे अछूता नहीं है.

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साइबर आतंकवाद का बढ़ता खतरा

साइबर आतंकवाद को परिभाषित करते हुए कई लोग इसकी बड़ी संकीर्ण व्याख्या करते हैं. अक्सर इसे आतंकी संगठनों की ऐसी कार्रवाइयों के साथ जोड़ा जाता है, जिनमें ख़तरा और दहशत पैदा करने के इरादे से सूचना तंत्र को दुष्प्रभावित करने की कोशिश की जाती है.

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पुस्‍तक अंशः मुन्‍नी मोबाइल- 19

नन्हीं सूफी रोज़-रोज़ की तकरार को अपनी आंख से गुज़रते देखती. आनंद का तेज़ गुस्सा देख वह सहमी सी रहती. एक बार कुछ ऐसी ख़ास घटना हो गई, जिससे दरार और बढ़ गई और शिवानी ने अपना सामान बांध मायके जाने का निश्चय कर लिया. आनंद भारती ने कभी किसी को मनाना सीखा ही नहीं था.

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आंखों देखा नक्‍सलवाद

विदेशी हथियारों से लैस नक्सलवादी समूहों के पास सरकार से अधिक मज़बूत सूचनातंत्र है. गहराई तक जानें तो, इन नक्सलवादी समूहों के पास पैसा, हथियार, योजना सभी कुछ उम्मीदों से कहीं ज़्यादा है. लेकिन, ये समूह जन विश्वास और जन आस्था धीरे-धीरे खोते जा रहे हैं. उड़ीसा, आंध्र प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे राज्य के मध्य पड़ने वाले कुछ ऐसे भूभाग हैं जहां से नक्सलवादियों को लगातार गुज़रना पड़ता है.

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…ताकि आतंकवादी हमले न होने पाएं

पाक़िस्तान में आतंकवाद का एक और उत्पात. लाहौर छावनी में दो धमाके और रिहायशी इलाक़ों में छिटपुट विस्फोट. इन धमाकों ने चंद लम्हों में ही दर्ज़नों मासूमों को मौत के मुंह में धकेल दिया. इसके कुछ देर बाद ही मिन्गोरा में भी धमाका हुआ और फिर से कुछ मासूम ज़िंदगियां मौत के मुंह में समा गईं.

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क्या पाकिस्तान बदलाव के लिए तैयार है?

अमेरिकी विदेश मंत्रालय में तीन सौ से ज़्यादा विदेशी पाकिस्तानियों के साथ खड़े मेरे जेहन में कुछ ऐसे ही ख्याल आ रहे थे. अमेरिका-पाकिस्तान के बीच हुई रणनीतिक बैठक के दौरान एक समारोह में सारे लोग एकत्र हुए थे. पाकिस्तानी दूतावास के कर्मचारी बातचीत के माहौल से खासे उत्साहित थे.

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नक्‍सल क्रांति का एक जनक हताशा से हार गया

हताशा ने न जाने कितनी जानें ली हैं, पर अभी हाल में इसने एक ऐसे नेता को अपना शिकार बनाया है, जिसने आज से 43 साल पहले हथियारों के बल पर उस व्यवस्था को बदलने का सपना देखा था, जो किसानों व मज़दूरों का शोषण करती है, उनका हक़ मारती है. इस हताशा के ताजा शिकार हैं, कानू सान्याल.

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दलित चिंतन को मिटाने की मुहिम

मध्यकाल के रचनाकारों में कबीर का अध्ययन और मूल्यांकन सबसे जटिल और चुनौती भरा रहा है. साहित्य के इतिहासकारों और आलोचकों के अलावा दूसरे विषयों के विद्वानों ने भी कबीर के अध्ययन में रुचि ली है. कबीर का एक विमर्श लोक में भी बराबर चलता रहा है. वहां भी लंबी परंपरा है.

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खून बहाने का जुनून

नक्सलियों के सिर पर रोज खून बहाने का जुनून सवार होता है, तो पुलिस के जवानों पर नक्सलवाद के नासूर को खत्म करने का. इसी चक्कर में शायद ही कोई ऐसा दिन गुजरता हो, जब निरीह जनता के खून से यहां की धरती लाल न होती हो. कहीं नक्सली मारे जा रहे हैं तो कहीं सुरक्षाबल के जवान शहीद हो रहे हैं. हालात यह हैं कि कुछ इलाक़ों में नक्सलियों को लेवी देने के बाद ही विकास के काम का पहला पत्थर लग पाता है. दोनों राज्यों के कई इलाक़ों में रेलगाड़ियों का परिचालन नक्सलियों की मर्ज़ी पर निर्भर है

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जो बोलेगा, सो झेलेगा

हिंदी के मशहूर लेखक एवं नाटककार मुद्राराक्षस बेहद गुस्से में थे. आक्रामक मुद्रा और तीखे स्वरों में लगभग चीखते हुए उन्होंने सवाल किया कि यह देश किसका है, किसके लिए है. हत्यारे, लुटेरे, बलात्कारी, दलाल, तस्कर खुलेआम घूम रहे हैं. मुसलमानों का क़त्लेआम कराने वाला आदमी गुजरात का मुख्यमंत्री है. बाल ठाकरे मुसलमानों की हत्या किए जाने की लगातार अपील करता है और केंद्रीय मंत्री बेशर्म होकर उसके दरवाज़े मत्था टेकने पहुंच जाता है. लेकिन जो इस देश और देश की जनता को बचाने के लिए जुटते हैं, उन्हें देशद्रोही की कतार में खड़ा कर दिया जाता है.

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अमेरिका और चीन एक-दूसरे की ज़रूरत हैं

हाल में अमेरिका और चीन के संबंधों में का़फी उथल-पुथल देखने को मिली. इसके बावजूद दोनों देशों के पास एक-दूसरे को सहयोग करने की बेहद ठोस वजह है. यह घटनाक्रम पिछले दो दशकों में विकसित हुआ है. इस बात को दोनों मुल्क स्वीकार करते नज़र आ रहे हैं. ओबामा प्रशासन द्वारा ताइवान को हथियार बेचने के फैसले पर चीन ने उग्र प्रतिक्रिया व्यक्त की, लेकिन उसकी अधिकांश प्रतिक्रिया सांकेतिक ही रही है.

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सच की जुबान पर सरकार का पहरा

केंद्र सरकार की इस बेताला धुन पर कई राज्य सरकारें जुगलबंदी कर रही हैं कि माओवादी अमन और तऱक्क़ी के जानी दुश्मन हैं, देश और समाज के लिए सबसे बड़ा ख़तरा हैं. यह न्याय और अधिकार की आवाज़ को कुचल देने का आसान हथियार है. विकास के नाम पर ग़रीब-वंचित आदिवासियों का सब कुछ हड़प लेने की सरकारी मंशा के ख़िला़फ जो खड़ा हो, माओवादी का ठप्पा लगाकर उस पर लाठी-गोली बरसा दो या फिर उसे जेल पहुंचा दो.

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हथियार तस्करी में बच्चों का इस्तेमाल

यह जानकर आपके माथे पर निश्चित तौर बल पड़ जाएंगे कि जिस उम्र में बच्चों को सलीके से चलना और बोलना नहीं आता, उस उम्र के बच्चों से बड़े पैमाने पर हथियारों की तस्करी कराई जा रही है. तस्करों ने बच्चों को बाकादा इस धंधे में सुरक्षित मोहरा बना लिया है. वे बच्चों को पेट भरने लायक पैसा देकर खुद मालामाल हो रहे हैं. उन मासूमों को यह भी पता नहीं होता कि वे जो कर रहे हैं, उसका अंजा’ क होगा. लेकिन उन्हें इतना ज़रूर पता है कि इस का’ के बदले में मिलने वाले पैसों से उन्हें और उनके घरवालों को भरपेट भोजन मिल सकता है.

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