मजदूरों का सप्लायर क्यों बन गया उत्तर प्रदेश!

  शिवाजी राय भारत में पुर्तगाली, फ्रांसीसी और अंग्रेजों ने जिन व्यापार केंद्रों को स्थापित किया था, आज भी लगभग

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रिपोर्ट में हुआ खुलासा: दिल्ली और मुंबई में जॉब करने के अलग-अलग है फायदें

देश की राजधानी दिल्ली में नौकरी करने वाले लोगों के लिए खुशखबरी है. मंगलवार को वर्ल्ड बैंक ने एक रिपोर्ट

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षडयंत्र के साये में भाजपा

भारतीय जनता पार्टी की राजनीति को समझे बिना आने वाले समय में क्या होगा, इसका अंदाज़ा नहीं लगाया जा सकता. भारतीय जनता पार्टी संसद में प्रमुख विपक्षी पार्टी है और कई राज्यों में उसकी सरकारें हैं. इसके बावजूद भारतीय जनता पार्टी, जो 2014 के चुनाव में दिल्ली की गद्दी पर दांव लगाने वाली है, इस समय सबसे ज़्यादा परेशान दिखाई दे रही है. यशवंत सिन्हा, गुरुमूर्ति, अरुण जेटली, नरेंद्र मोदी एवं लालकृष्ण आडवाणी के साथ सुरेश सोनी ऐसे नाम हैं, जो केवल नाम नहीं हैं, बल्कि ये भारतीय जनता पार्टी में चल रहे अवरोधों, गतिरोधों, अंतर्विरोधों और भारतीय जनता पार्टी पर क़ब्ज़ा करने की कोशिश करने वाली तोपों के नाम हैं.

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यूपीए सरकार का नया कारनामा : किसान कर्ज माफी घोटाला

आने वाले दिनों में यूपीए सरकार की फिर से किरकिरी होने वाली है. 52,000 करोड़ रुपये का नया घोटाला सामने आया है. इस घोटाले में ग़रीब किसानों के नाम पर पैसों की बंदरबांट हुई है. किसाऩों के ऋण मा़फ करने वाली स्कीम में गड़बड़ी पाई गई है. इस स्कीम का फायदा उन लोगों ने उठाया, जो पात्र नहीं थे. इस स्कीम से ग़रीब किसानों को फायदा नहीं मिला. आश्चर्य इस बात का है कि इस स्कीम का सबसे ज़्यादा फायदा उन राज्यों को हुआ, जहां कांग्रेस को 2009 के लोकसभा चुनाव में ज़्यादा सीटें मिली. इस स्कीम में सबसे ज़्यादा खर्च उन राज्यों में हुआ, जहां कांग्रेस या यूपीए की सरकार है.

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एक अफसर का खुलासाः ऐसे लूटा जाता है जनता का पैसा

महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एवं शरद पवार के भतीजे अजीत पवार ने अपने पद से इस्ती़फा दे दिया है. हालांकि उनके इस्ती़फे के बाद राज्य में सियासी भूचाल पैदा हो गया है. अजीत पवार पर आरोप है कि जल संसाधन मंत्री के रूप में उन्होंने लगभग 38 सिंचाई परियोजनाओं को अवैध तरीक़े से म़ंजूरी दी और उसके बजट को मनमाने ढंग से बढ़ाया. इस बीच सीएजी ने महाराष्ट्र में सिंचाई घोटाले की जांच शुरू कर दी है.

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यह जनता की जीत थी

संजय सिंह अन्ना के सहयोगी हैं और इंडिया अगेंस्ट करप्शन के अहम कार्यकर्ता भी. 26 अगस्त को जब दिल्ली की सड़कों पर पुलिस से इंडिया अगेंस्ट करप्शन के कार्यकर्ताओं और आम जनता की भिड़ंत हुई, तब उसके कई दिनों बाद पुलिस ने अरविंद केजरीवाल समेत उनके कई सहयोगियों के खिला़फ मामले दर्ज किए. गंभीर आरोपों के तहत एफआईआर दर्ज की जाती है.

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देश को विजेता का इंतजार है

अगस्त का महीना भारतीय राजनीति के लिए महत्वपूर्ण रहा. सरकार, विपक्ष, अन्ना हजारे और बाबा रामदेव इस महीने के मुख्य पात्र थे. एक पांचवां पात्र भी था, जिसका ज़िक्र हम बाद में करेंगे. इन चार पात्रों ने अपनी भूमिका ब़खूबी निभाई. सरकार और विपक्ष ने अपनी पीठ ठोंकी, दूसरी ओर अन्ना और रामदेव ने अपने आंदोलन को सफल कहा. हक़ीक़त यह है कि ये चारों ही न हारे हैं, न जीते हैं, बल्कि एक अंधेरी भूलभुलैया में घुस गए हैं.

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अन्‍ना की हार या जीत

अन्ना हजारे ने जैसे ही अनशन समाप्त करने की घोषणा की, वैसे ही लगा कि बहुत सारे लोगों की एक अतृप्त इच्छा पूरी नहीं हुई. इसकी वजह से मीडिया के एक बहुत बड़े हिस्से और राजनीतिक दलों में एक भूचाल सा आ गया. मीडिया में कहा जाने लगा, एक आंदोलन की मौत. सोलह महीने का आंदोलन, जो राजनीति में बदल गया. हम क्रांति चाहते थे, राजनीति नहीं जैसी बातें देश के सामने मज़बूती के साथ लाई जाने लगीं.

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आडवाणी जी, कार्यकर्ता आपकी राह देख रहे हैं

आडवाणी जी को धन्यवाद देना चाहिए कि आखिर उनकी समझ में आ गया कि देश की जनता उनकी पार्टी से खुश नहीं है. उन्हें शायद यह भी समझ में आ गया कि भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ता भी अपने नेतृत्व से खुश नहीं हैं. इस नेतृत्व की परिभाषा क्या है?

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भाजपा विपक्ष नहीं है

यह इस देश का दुर्भाग्य है कि भारतीय जनता पार्टी देश की मुख्य विपक्षी पार्टी है. आपसी फूट, अविश्वास, षड्‌यंत्र, अनुशासनहीनता, ऊर्जाहीनता, बिखराव और कार्यकर्ताओं में घनघोर निराशा के बीच उत्तर प्रदेश जैसे महत्वपूर्ण राज्य में हार का सामना और अलग-अलग राज्यों के पार्टी संगठन में विद्रोह, वर्तमान में भारतीय जनता पार्टी की यही फितरत बन गई है.

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पाठशाला में कोटा कितना कारगर होगा

देश में छह वर्ष से चौदह साल की आयु के हर बच्चे को अनिवार्य और निःशुल्क शिक्षा का अधिकार देने वाले क़ानून राइट टू एजुकेशन को उच्चतम न्यायालय ने अपनी मंज़ूरी दे दी है. न्यायादेश के मुताबिक़, अब देश के सरकारी स्कूल और निजी स्कूलों में शिक्षा का अधिकार क़ानून लागू हो गया है.

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आरटीआई का इस्तेमाल ऐसे करें

हमारे पास पाठकों के ऐसे कई पत्र आए, जिनमें बताया गया कि आरटीआई के इस्तेमाल के बाद किस तरह उन्हें परेशान किया गया या झूठे मुक़दमे में फंसाकर उनका मानसिक और आर्थिक शोषण किया गया. यह एक गंभीर मामला है और आरटीआई क़ानून के अस्तित्व में आने के तुरंत बाद से ही इस तरह की घटनाएं सामने आती रही हैं.

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कांग्रेस को सबक़ लेनी चाहिए

कांग्रेस को सीख लेनी चाहिए, लेकिन कांग्रेस सीख लेगी, इसमें संदेह है. क्योंकि उत्तर प्रदेश में इतनी करारी हार के बाद भी उत्तराखंड में कांग्रेस ने राजनीतिक अपरिपक्वता का परिचय दिया. उत्तराखंड की राजनीति में हरीश रावत महत्वपूर्ण नाम है. वहां कांग्रेस को ज़िंदा रखने में हरीश रावत का बहुत बड़ा योगदान रहा है. पूर्व में विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को बहुमत मिला, लेकिन जब मुख्यमंत्री बनाने का व़क्तआया तो नारायण दत्त तिवारी को मुख्यमंत्री बना दिया गया.

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मालिक बड़ा या श्रमिक बड़ा

हर धंधे में एक श्रमिक का औसत कार्यभार निर्धारित होना आवश्यक है. मालिक लोग तो, मान लीजिए, ऐसे एक मज़दूर को चुन लेते हैं, जो बहुत ज़्यादा मेहनत करता है या निपुण है, जो सबसे ज़्यादा काम करता है, और उसी को पैमाना बनाकर वे चाहते हैं कि हर श्रमिक का कार्यभार उतना ही हो.

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पीड़ित श्रमिक वर्ग

मध्यम वर्ग के संबंध में तो कह चुके. अब लीजिए ग़रीब वर्ग को, जो भूखे हैं, मज़दूर हैं, श्रमिक हैं, भीड़ हैं, चाहे जो कह लीजिए. दुनिया में किसी देश का हो, किसी जाति का हो, स्त्री हो या पुरुष, ऐसा व्यक्ति जिसके पास निज की कोई ज़मीन-जायदाद न हो, न जिसकी कोई पूंजी हो, जिसे अपने जीवन निर्वाह के लिए दूसरों के यहां नौकरी करनी पड़े, काम का मूल्य या भाड़ा लेकर काम करना पड़े, इन सबको सभ्य भाषा में श्रमिक वर्ग कहते हैं.

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कंपनियों का अवतरण

ये मध्यम वर्ग के लोग जो शुरू-शुरू में छुटभैय्या, कारिंदों या मंत्रियों के रूप में सामने आए थे, धीरे-धीरे स्वयं व्यापार करने लगे. एक तऱफ पूंजीपतियों की पूंजी थी, दूसरी तऱफ मज़दूर की मेहनत थी. दोनों का उपयोग करते हुए या दोनों का ही शोषण करके इस वर्ग ने अपना अधिपत्य सारे व्यापार और उद्योग पर जमा लिया.

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बिहारः आरटीआई कार्यकर्ता सुरक्षित नहीं

सूचना के अधिकार के सिपाही रामविलास सिंह अपनी जान की सुरक्षा की गुहार लगाते रहे, पर लखीसराय सहित बिहार का सारा पुलिस अमला आराम से सोता रहा. राज्य मानवाधिकार आयोग में भी उनकी फरियाद अनसुनी रह गई. अपराधी उन्हें जान से मारने की धमकी दे रहे थे और प्रशासन ने आंखें मूंद लेने में भलाई समझी.

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दिल्‍ली का बाबूः सूचना आयोग के बाबू

आरटीआई कार्यकर्ताओं को हमेशा इस बात की शिकायत रहती है कि अधिकारियों को ही सूचना आयुक्त क्यों बनाया जाता रहा है. 2005 में केंद्रीय सूचना आयोग का गठन किया गया, लेकिन उस समय से देखा जाए तो कई सूचना आयुक्त यहां तक कि मुख्य सूचना आयुक्त भी सिविल सेवा के अधिकारी रहे हैं.

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दावों और वायदों का कारोबार

एक राजनीतिक अनुमान के हिसाब से मध्यावधि चुनाव भी दूर नहीं है, इसलिए भारतीय जनता पार्टी ने यात्राओं की योजनाएं इस तरह बनाईं कि वह उत्तर प्रदेश में भी सक्रिय हो सके और देश भर में कार्यकर्ताओं के बीच एक संदेश जा सके, पर भाजपा इसमें कितनी सफल हुई है, इसका आकलन तो उसे ही करना होगा.

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बीडी मजदूर : जीवन में खुशहाली कब आएगी

किसी भी देश की आर्थिक उन्नति उसके औद्योगिक विकास पर निर्भर करती है. अगर वह किसी विकासशील देश की बात हो तो वहां के लघु उद्योग ही उसके आर्थिक विकास की रीढ़ होते हैं. भारत भी एक विकासशील देश है. ज़ाहिर है, भारत के विकास की कहानी के पीछे भी इन्हीं उद्योगों का योगदान है, लेकिन अब भारत धीरे-धीरे विकासशील देशों की कतार में का़फी आगे आ चुका है.

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किसान आंदोलन चौथी दुनिया और सुप्रीम कोर्ट

वर्तमान हालात में जन सरोकारों से जुड़ी पत्रकारिता का स्वरूप क्या हो सकता है? इसकी एक मिसाल चौथी दुनिया की उन रिपोर्टों में देखने को मिलती है, जो देश भर में चल रही जल, जंगल और ज़मीन की लड़ाई से संबंधित हैं. दरअसल, पिछले दो सालों के दौरान लिखी गईं उक्त रिपोट्‌र्स आने वाले समय में समस्याओं की चेतावनी दे रही थीं.

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जो जितने का पात्र है, उतना उसे क्यों न मिले

दूसरी योजना है कि हर एक को उतना मिले, जितने का वह पात्र है. बहुत से व्यक्ति, ख़ासकर जो आराम से हैं, कहते हैं और समझते हैं कि यही ठीक है. जो जितने का पात्र है, उतना उनको मिलता है, मिला हुआ है.

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सच के सिपाही को धमकी

सवाल पूछना जनता का अधिकार है और यह अधिकार संविधान देता है, लेकिन सवाल पूछना कभी-कभी कितना तकलीफदेह हो सकता है, यह पिछले साल हुईं आरटीआई कार्यकर्ताओं की हत्याओं से साफ पता चलता है. कार्यकर्ताओं की हत्या, परेशान करने और धमकी देने के मामले तो लगभग हर महीने सामने आते रहते हैं.

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बजट 2011 इसमें गरीबों के लिए कुछ भी नहीं है

प्रणब मुखर्जी के बजट में दबे-कुचलों, ग़रीबों, अल्पसंख्यकों, मज़दूरों, महिलाओं, बच्चों और किसानों के लिए धेले भर की जगह नहीं दिखाई पड़ती. बहुत पहले ही देश में बजट का स्वरूप बदल गया था. आज स्थिति यह है कि बजट सरकार की आमदनी और खर्च का ब्योरा नहीं, बल्कि जनता को आंकड़ों में उलझा कर बेवक़ूफ़ बनाने की एक सोची समझी साज़िश बनकर रह गया है.

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श्रमिकों के लिए केवल तीन प्रतिशत कल्‍याण राशि उपलब्‍ध

श्रमिकों के कल्याण के लिए उपलब्ध फंड का उपयोग नहीं किया जा रहा है. जो राशि इनके कल्याण के लिए आती है वह किसी और की जेब में जा रही है और यह सब इसलिए क्योंकि राज्य सरकार ने उसके लिए ज़रूरी राज्य सलाहकार समिति का गठन नहीं किया है. छत्तीसगढ़ सरकार के अलावा स्वयं केंद्र की सरकार श्रमिकों के कल्याण के लिए चलाए जाने वाली योजनाओं केवल औपचारिकता बनाकर रखना चाहती है.

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वार्ड पार्षद मस्त, गयावासी पस्त

कहा जाता है कि रोम जल रहा था और वहां का शासक नीरो अपनी धुन की बंसी बजाने में मस्त था. कुछ ऐसा हो रहा है गया शहर में. एक ओर शहरवासी इस गर्मी में बिजली पानी के संकट से जूझ रहे हैं, वहीं दूसरी ओर गया नगर निगम के वार्ड पार्षद और वहां के पदाधिकारी एक दूसरे से अहं की लड़ाई ल़ड रहे हैं.

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नक्‍सल क्रांति का एक जनक हताशा से हार गया

हताशा ने न जाने कितनी जानें ली हैं, पर अभी हाल में इसने एक ऐसे नेता को अपना शिकार बनाया है, जिसने आज से 43 साल पहले हथियारों के बल पर उस व्यवस्था को बदलने का सपना देखा था, जो किसानों व मज़दूरों का शोषण करती है, उनका हक़ मारती है. इस हताशा के ताजा शिकार हैं, कानू सान्याल.

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नौकरशाहों की लोकतंत्र में आस्था नहीं

देश के आला अफसरों की लोकतांत्रिक व्यवस्था में कोई आस्था नहीं है. नौकरशाह मनमाने ढंग से प्रशासन चलाना चाहते हैं और चला भी रहे हैं. संवैधानिक बाध्यता के कारण विधानसभा एवं मंत्री परिषद आदि संस्थाओं की कार्यवाही में वे औपचारिकता ही पूरी करते हैं.

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