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दौर-ए-दास्तान: कैसे बड़े अखबार ने किया था ‘आपातकाल’ का समर्थन
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दौर-ए-दास्तान: कैसे बड़े अखबार ने किया था ‘आपातकाल’ का समर्थन

‘दिनमान’ हिंदी पत्रकारिता के इतिहास का पहला अध्याय है, जिसने एक पूरी पीढ़ी को राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय विषयों के साथ विज्ञान, समाजशास्त्र, साहित्य तथा संस्कृति से परिचित कराया। ‘दिनमान’ ने शब्दों की शुद्धता और उनके सही उपयोग का ज्ञान भी पहली बार पाठकों के सामने रखा। हम सब सोवियत रूस की राजधानी ‘मास्को’ का उच्चारण करते थे, आज भी करते हैं, लेकिन दिनमान ने ‘मस्कवा’ लिखा।

‘दिनमान’ के पहले संपादक सुप्रसिद्ध साहित्यकार सच्चिदानंद हीरानंद वात्सायन ‘अज्ञेय’ थे। उनका इतना ज्यादा प्रभाव हिंदी पर था कि कई लोगों ने अपना नाम वात्सायन कर लिया था, जिनमें हिंदी के एक बहुत मेधावी छात्र थे जो बाद में ‘नवभारत टाइम्स’ के ‘सांध्य टाइम्स’ के संपादक भी बने। अज्ञेय जी ने ‘दिनमान’ को देश की पहली ऐसी गंभीर और सार्थक पत्रिका बना दिया, जिसने इंदिरा गांधी के समय की राजनीति का तथा घटनाओं के हर पहलू का परिचय हिंदी के पाठकों को कराया। चंद्रशेखर के धारदार व्यक्तित्व से हिंदी जगत को तथा उनके व्यक्तित्व के विद्रोही तत्व का परिचय हिंदी पाठकों के पास ‘दिनमान’ के द्वारा ही पहुंचा। राज्यसभा में प्रसिद्ध और उस समय देश के सबसे बड़े उद्योगपति के खिलाफ चंद्रशेखर का चलाया हुआ अभियान हिंदी के पाठकों के पास सबसे पहले ‘दिनमान’ द्वारा ही पहुंचा।

अब तक जानकारी और उसके तेवर अंग्रेजी अखबारों के द्वारा ही पहुंचते थे, लेकिन ‘दिनमान’ ने विशुद्ध हिंदी का एक ऐसा तथ्यात्मक रस देश के सामने रखा, जिसने समस्त उत्तर भारत के सामने ज्ञान का नया दरवाजा खोल दिया। ‘दिनमान’ में उन दिनों रघुवीर सहाय, श्रीकांत वर्मा, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, महेश्वर दयालु गंगवार, जवाहर लाल कॉल, त्रिलोक दीप, नरेश कौशिक जैसे उप संपादक थे।  आज नरेश कौशिक ‘बीबीसी लंदन’ से जुड़े हैं और उन्होंने ‘बीबीसी’ की पत्रकारिता पर एक अमिट छाप छोड़ी है।

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अज्ञेय जी जब ‘नवभारत टाइम्स’ के संपादक बने, तब ‘दिनमान’ के संपादक रघुवीर सहाय बने।। रघुवीर सहाय हिंदी के बहुत बेहतरीन  कवि थे। उन्हीं दिनों गुजरात से शुरू हुआ छात्रों का आंदोलन बिहार पहुंचा और छात्रों ने अपने आंदोलन का नेतृत्व जयप्रकाश नारायण को सौंप दिया। ‘दिनमान’ ने छात्रों के इस आंदोलन की भरपूर रिपोर्टिंग की और उसे देश के सामने सही परिप्रेक्ष्य मैं रखा। इसमें ओम प्रकाश दीपक का बहुत योगदान था। दरअसल, दिनमान के सभी संपादकीय सहयोगी डॉक्टर राम मनोहर लोहिया से बहुत प्रभावित थे और वे उन्हें देश के लिए सबसे प्रासंगिक मानते थे।

समाजवादी विचारधारा के मानने वालों के लिए ‘दिनमान’ हर सप्ताह नई जानकारी और नए तर्क लेकर आता था। उन दिनों हिंदी जगत ‘दिनमान’ के द्वारा दी जानकारी और उसके द्वारा उठाए गए सवालों के इर्द-गिर्द बहस में हर सप्ताह उलझा रहता था। अंग्रेजी पत्रकारिता के सामने हिंदी की यह पहली चुनौती थी, जिसके पहले अगुआ अज्ञेय जी थे। किशन पटनायक लोकसभा के सदस्य चुनकर आए थे और उन्हें सारे देश में समाजवादी विचारधारा के सबसे नौजवान भाष्यकार के रूप में ‘दिनमान’ ने ही प्रस्तुत किया था। श्रीकांत वर्मा उस दौरान प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के काफी नजदीक थे और उन्होंने कांग्रेस को इंडिकेट सिंडिकेट के झगड़े में प्रसिद्ध नारा ‘जात पर ना पात पर, इंदिरा जी की बात पर,मोहर लगेगी हाथ पर’ दिया था।

आपातकाल में अधिकांश अखबारों की तरह ‘दिनमान’ भी आपातकाल का समर्थक हो गया था। मैं आपातकाल में सुप्रसिद्ध कवि भवानी प्रसाद मिश्र से मिलने दिल्ली पहुंचा।। उन्होंने मुझे कहा कि क्या तुम टाइम्स हाउस से जब रघुवीर सहाय सीढ़ियों से उतरने लगें तो उन्हें धक्का नहीं दे सकते? आगे बोले रघुवीर सहाय को आपातकाल का समर्थन करने की सजा मिलनी चाहिए। सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ‘दिनमान’ की आपातकाल समर्थक नीति से बेहद दुखी रहते थे। रघुवीर सहाय आपातकाल समाप्त होने के बाद हुए 77 के आम चुनाव मैं इतने ज्यादा आत्म प्रभावित थे कि उन्होंने लिख दिया था कि इंदिरा जी प्रचंड बहुमत से चुनाव जीत गईं, जबकि इंदिरा जी अपनी पार्टी समेत खुद भी चुनाव हार गई थी।

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उन दिनों अंग्रेजी के प्रसिद्ध साप्ताहिक ‘न्यूज़ वीक’ का सिक्का चलता था।। ‘दिनमान’ ने हिंदी में उससे ज्यादा सारगर्भित जानकारी देकर हिंदी को बहुत समृद्ध किया। ‘दिनमान’ ने हिंदी के पक्ष में देश में जबरदस्त माहौल बनाया था। ‘दिनमान’ में हिंदी को नए लेखक और पत्रकार दिए। बिहार आंदोलन की फील्ड रिपोर्ट जुगनू शारदेय से कराकर एक नई परंपरा से परिचित कराया।

सन 77 में आपातकाल के बाद ‘रविवार’ नाम का एक और हिंदी साप्ताहिक कोलकाता से प्रकाशित हुआ, जिसके संपादक सुरेंद्र प्रताप (एसपी) सिंह थे। सुरेंद्र प्रताप सिंह मुंबई से निकलने वाले प्रसिद्ध साप्ताहिक ‘धर्मयुग’ मैं उप संपादक थे। वे एमजे अकबर की सलाह पर कोलकाता आए और ‘रविवार’ का संपादन संभाला। ‘दिनमान’ में और ‘रविवार’ में विषय को लेकर एक नई स्पर्धा शुरू हुई। ‘दिनमान’ उन दिनों रोटरी पर छपता था, जबकि रविवार ‘ऑफसेट’ पर छपता था। पाठकों के पास ‘दिनमान’ अगले हफ्ते पहुंच जाता था, जबकि रविवार ऑफसेट की वजह से तीसरे हफ्ते पहुंचता था। विषय से जुड़ी जानकारी ‘दिनमान’ के द्वारा हिंदी के पाठकों के पास पहले पहुंचती थी, लेकिन पाठकों को ‘रविवार’ का इंतजार रहता था क्योंकि ‘रविवार’ ने अपनी रिपोर्ट को अलग तरह से पाठकों के सामने लाना शुरू किया था। इसमें घटना, घटना के पीछे एक कारण, उनका राजनीतिक सामाजिक और आर्थिक कोण तथा घटना के पीछे के ताकतवर व्यक्ति या संस्था का खुलासा होता था। ‘दिनमान’ और ‘रविवार’ ने हिंदी में पत्रकारिता के उन आयामों को छुआ, जिन्हें अंग्रेजी पत्रकारिता शायद आज तक नहीं छू पाई। यह मेरी गलतफहमी हो सकती है, लेकिन जब तक इसे कोई साबित नहीं करता तब तक मैं यह गलतफहमी बनाए रखना चाहता हूं।

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अफसोस की बात है कि किसी भी हिंदी के प्रकाशन संस्थान ने ‘दिनमान’ के सभी अंकों और ‘रविवार’ के सभी अंक पुस्तक के रूप में नहीं छापे। अगर यह छपते तो हिंदी के यह बेस्टसेलर होते। एक ऐसा दस्तावेज होता जो आज पत्रकारिता क्या है, इस बहस में रास्ता दिखाने का काम करता। यह भी साबित करता कि हिंदी का संपादक कैसा होना चाहिए और हिंदी के पत्रकारों में क्या गुण होने चाहिए। वे संपादक और पत्रकार चाहे प्रिंट से जुड़े हो या फिर टेलिविजन से। पत्रकार बनाने के संस्थान भी दिनमान और रविवार के उस योगदान से परिचित नहीं है, यह और अफसोस की बात है। मुझे तो डर है कि आज पत्रकारिता का सिरमौर बनने की चाहत लिए नए पत्रकार ‘दिनमान’ और ‘रविवार’ का नाम भी जानते हैं या नहीं। यह वैसा ही है जैसे कोई आज के विद्यार्थियों से पूछे कि भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, अशफाक उल्ला खान, राम प्रसाद बिस्मिल कौन थे, तब उत्तर में वह सिर्फ आपका चेहरा आश्चर्य से देखता रहे और सोचे कि ‘दिनमान’ और ‘रविवार’ मोहनजोदड़ो या हड़प्पा की खुदाई से निकले कोई ग्रंथ हैं क्या।

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