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सनातन दर्शन का बौद्ध धर्म पर प्रभाव

सनातन दर्शन का बौद्ध धर्म पर प्रभाव

म पहले भी बता चुके हैं कि सनातन धर्म सदा अपने ही अंदर सुधार करता रहता है. यह भी सच है कि इसके अंदर जितने आंदोलन हुए, सुधार के जितने भी प्रयास हुए, उन पर भी सनातन धर्म का प्रभाव रहा ही है. यही बात बौद्ध और जैन धर्म के साथ भी लागू होती है. इन दोनों मतों की गणना भी नास्तिक दर्शन में की जाती है, जबकि यह सत्य से परे है. आख़िर सनातन धर्म की तरह ही बौद्ध दर्शन का भी तो यही विश्वास है कि मानव का यही जीवन आख़िरी पड़ाव नहीं है. वहां भी ईश्वर और अवतार की अवधारणा तो है ही. जैन धर्म में भी महावीर के पहले 23 तीर्थंकर हो चुके थे. वर्द्धमान महावीर आख़िरी तीर्थंकर थे. अगर सही मायनों में नास्तिकता की कसौटी पर कसा जाए, तो सिवाय चार्वाक के किसी भी दर्शन को नास्तिक नहीं माना जा सकता. हां, विभाजन का स्तर सगुण और निर्गुण के आधार पर तो किया जा सकता है, किंतु किसी भी तरह इन्हें नास्तिक की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता है. दरअसल, इस ग़लत़फहमी के पीछे वजह यही है कि नास्तिक का अर्थ वेदों की निंदा करने वाले से लगाया जाता है. अब बौद्ध और जैन, दोनों ही धर्म चूंकि वेदों के ख़िला़फ थे, इसलिए उनको भी नास्तिक शाखाओं में गिन लिया गया.

दरअसल, बौद्ध और जैन धर्म का उत्थान सनातन धर्म में पुरोहितों के बढ़ते वर्चस्व और कर्मकांड की प्रधानता के विरोध में था. ब्राह्मणों ने दरअसल धर्म के मूल तत्व को ग़ायब कर उसकी जगह केवल यज्ञों और कर्मकांड को ही प्रधानता दे दी. यज्ञों में हिंसा ही प्रधान हो गई. यही वजह रही कि बौद्ध धर्म ने अहिंसा पर इतना ज़ोर दिया. ब्राह्मणों के विरोध का ही नतीजा रहा कि वर्ण व्यवस्था में पहले पायदान पर क्षत्रिय आ गए. कई बौद्ध ग्रंथों में इस तरह की बात कही गई है कि क्षत्रिय का स्थान वर्ण-व्यवस्था में सबसे ऊंचा है (इस पर चर्चा विस्तार से अगले अंक में). जातकों में तो यह भी वर्णन है कि जब बुद्ध का अवतार होने वाला था, तो देवगणों ने उनसे पूछा था कि वह किस वर्ण में जन्म लेंगे. पहले बुद्ध का अवतार ब्राह्मणी के गर्भ से होने वाला था, लेकिन ब्राह्मणों को हीन मानकर ही फिर बुद्ध का जन्म क्षत्राणी माता के गर्भ से कराया गया. क्या यह अचरज की बात नहीं कि सनातन धर्म के दशावतारों (वैसे कुल अवतार तो चौबीस माने गए हैं) में केवल दो ही ब्राह्मण हैं. परशुराम और वामन का ही जन्म ब्राह्मण कुल में हुआ था, बाक़ी सभी अवतार भी क्षत्रिय ही हैं. यह सोचने की बात तो है ही.

मूल तौर पर बौद्ध और जैन धर्म का एक ही लक्ष्य था. वह था सनातन धर्म में आई विकृतियों को हटाना और ब्राह्मणों की सत्ता को उखाड़ फेंकना. इसीलिए ब्राह्मणों के ख़िला़फ कठोरतम शब्दों का प्रयोग किया गया. मज्झिमनिकाय में कहा गया है- वेदपाठ करता हुआ ब्राह्मणों का समूह दरअसल कुत्तों का समूह है, जिसमें हरेक पिछला कुत्ता अगले की पूंछ मुंह में दबाए और आसमान की तऱफ मुंह कर के ऊं, ऊं का उच्चारण कर रहा है. बौद्धों और ब्राह्मणों के परस्पर विरोध और विद्रोह जैसे व्यापक विषय पर विस्तार से चर्चा अगले अंकों में.

1 comment

  • chauthiduniya

    You are working well job in Indian Soicity

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