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समय की मांग हैं न्यायिक सुधार

samay ki mang hai nyayaikसुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों ने ख़ुद की संपत्ति को सार्वजनिक करने की घोषणा को सर्वसम्मति से अपनाया. उन्होंने दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा कि भारत के मुख्य न्यायाधीश एक सरकारी अधिकारी हैं और उनका कार्यालय सूचना अधिकार अधिनयम के दायरे में आता है. सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों द्वारा उनके समक्ष दिए गए संपत्ति के ब्यौरों को सार्वजनिक किया जा सकता है. उच्च न्यायालयों के जजों द्वारा संपत्ति की घोषण करने के मसले पर से परदा उठ गया है. आशा है कि इससे न्यायपालिका के कामकाज में थोड़ी पारदर्शिता तो आएगी. यह उन लोगों की जीत है, जिन्हें न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर विश्वास नहीं है. इतना ही नहीं, वे ये भी महसूस करते हैं कि न्यायपालिका में और अधिक पारदर्शिता और जवाबदेही लाने की जरूरत है. इस संबंध में दिल्ली हाई कोर्ट के न्यायाधीश माननीय रवींद्र भट्ट का फैसला प्रशंसनीय है. इससे उच्च न्यायपालिका के कामकाज में पारदर्शिता आएगी.

सरकार,विशेष रूप से क़ानून मंत्रालय को, इन दो नतीजों से काफी उत्साहित होना चाहिए और तुरंत व्यापक क़ानून बनाने के लिए क़दम उठाना चाहिए. इससे न्यायपालिका के कामकाज में पारदर्शीता और जवाबदेही आएगी. दुर्भाग्य से आज शायद ही न्यायपालिका के कामकाज में कोई पारदर्शिता और जवाबदेही है. जो कुछ है भी, वह नगण्य ही है. किस आधार पर सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों और हाई कोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्ति होती है, यह किसी को पता नहीं है. वैसे हमलोग इस मामले को मुख्य न्यायाधीश और न्यायाधीशों के खंडपीठ की राय और विवेक पर छोड़ देते हैं. न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर आम जनता चकित हैं. अगर कोई योग्यता के आधार पर नियुक्त होता है, तब उच्च न्यायालय के एक वरिष्ठतम न्यायाधीश को सुप्रीम कोर्ट में तरक्की नहीं दी जाती है. सबसे अहम बात कि इसकी व्याख्या भी नहीं दी जाती है. अगर योग्यता और वरिष्ठता ही सुप्रीम कोर्ट में नियुक्ति के लिए एक सही मापदंड है तो उच्च न्यायालय के वरिष्ठ न्यायाधीशों को तरक्की नहीं देने से निश्चित रूप से लोगों के मन संदेह उत्पन्न होता है. 

इस पृष्ठभूमि के ख़िला़फ विधि आयोग ने अपनी 230वीं रिपोर्ट में न्यायपालिका में सुधार के विषय पर क़ानून मंत्रालय को कुछ सलाहें दी हैं:- रिपोर्ट में सभी मुदों, जो न्यायपालिका के कामकाज में सुधार लाने के प्रासांगिक है, जैसे जजों की नियुक्ति, सेवानिवृत होने की उम्र, खंडपीठों की संख्या में वृद्घि, काम के दिन, काम की प्रकृति, जल्दी न्याय, न्याय, ईमानदारी, सदाचार और नैतिकता और प्रशासन आदि विषय के बारे में विस्तार से बताया गया है. ये सभी भ्रष्टाचार के मुख्य विषय हैं.

इसमें सबसे महत्वपूर्ण सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्ति का विषय है. उनकी नियुक्ति इस तरह होनी चाहिए, ताकि लोगों के मन में कोई संदेह न उत्पन्न हो. विधि आयोग की रिपोर्ट के अनुसार उच्च न्यायालय के  न्यायाधीश का पद हमारे संविधान में काफी महत्वपूर्ण है और उस पद पर बैठने वाला न स़िर्फ निष्पक्ष और स्वतंत्र, बल्कि बुद्घिमान और परिश्रमी भी माना जाता है. इसके लिए सामान्य पात्रता या मापदंड यह होना चाहिए कि कोई व्यक्ति जिन्होंने दस साल तक प्रैक्टिस या न्यायिक क्षेत्र में सेवा की है, उनको ही इसके लायक़ समझा जाए. आमतौर पर एक व्यक्ति, जिन्होंने राज्य उच्च न्यायालय में प्रैक्टिस की है, उन्हें ही राज्य के उच्च न्यायालय में न्यायाधीश के तौर पर नियुक्त किया जाता है.

अक्सर हमें अंकल जज के बारे शिकायतें सुनने को मिलती है. यह तथ्य (जिसे अंकल जज कहा जाता है) वास्तव में न्यायिक ़फैसला देने की पूरी प्रक्रिया के लिए निर्णायक है. इसको (अंकल जज) ख़त्म करने के लिए इस सलाह पर विचार करना चाहिए कि किसी व्यक्ति को उसी कोर्ट का न्यायाधीश नहीं बनाना चाहिए, जहां उसने प्रैक्टिस की हो.

सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्ति के मामले में विधि आयोग ने अपनी रिपोर्ट में वर्तमान नियुक्ति व्यवस्था की समीक्षा करने की सिफारिश की है, जो भारतीय संविधान में निहित मूल व्यवस्था से भटक गया है.

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 124(2) और 217(1) न्यायाधीशों की नियुक्ति से संबंधित है. जिसके तहत कार्यपालिका और न्यायपालिका दोनों ही उनकी नियुक्ति के लिए सहमति देते हैं. 1993 में सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्‌स ऑन रिकॉर्ड एसोसिएशन बनाम भारतीय संघ के मामले में यह नाजुक संतुलन न्यायपलिका के पक्ष में जाते दिखा और राष्ट्रपति के संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट की राय (विशेष संदर्भ 1998 न.1) भी इसी की ताक़ीद करती दिखी.

पूरे मामले पर ग़ौर करने और उसकी शक्ति में संतुलन बहाल करने का यही समय है. विधि आयोग ने अपनी 214वीं रिपोर्ट(2008) में इसी तरह की सिफारिश की थी. यहां तक कि पूर्व मुख्य न्यायाधीश जे एस वर्मा, जिन्होंने खंडपीठ की अध्यक्षता की, एक अंग्रेजी पत्रिका के लेख में कहा कि इस पर पुनर्विचार करने की ज़रूरत है. उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया में मूल रूप से कार्यपालिका और न्यायपालिक दोनों संयुक्त रूप से भाग लेते हैं, हालांकि दोनों अलग क्षेत्र है. एक क्षेत्र में उम्मीदवार की क़ानूनी कौशल, जिसमें उसकी उपयुक्तता को देखी जाती है, तो वहीं दूसरे क्षेत्र में उनकी पूर्ववती है. भारत के मुख्य न्यायाधीश और उसके सहयोगियों या हाई कोर्ट के संबंध में, हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और उसके सहयोगियों, उसके क़ानूनी कौशल को जांचने-परखने के लिए उपयुक्त हैं. उनकी आवाज प्रभावी होनी चाहिए. जहां तक पूर्व पद का संबंध है, तो कार्यपालिका को न्यायपालिका की अपेक्षा उम्मीदवार के पूर्व पद के बारे में बेहतर पता होता है. इसलिए मेरा फैसला यह कहता है कि क़ानूनी कौशल के क्षेत्र में न्यायपालिका की राय प्रमुख होनी चाहिए और पूर्व पद के क्षेत्र में कार्यपालिका की राय प्रमुख होनी चाहिए. इस तरह से दोनों को संयुक्त रूप से योग्य उम्मीदवार का चयन करना चाहिए.

यहां तक कि क़ानून और न्याय के लिए बनी संसदीय समिति का मानना है कि जजों की नियुक्ति से संबंधित मौजूदा प्रणाली में सुधार की ज़रूरत है ताकि इसे और पारदर्शी बनाया जा सके. संसदीय समिति का सुझाव है कि इसके लिए कॉलेजियम प्रणाली क़ारगर साबित होगी. इसके अलावा एक उच्च समिति के गठन की भी बात कही गई है, जिसके सदस्यों में न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका के सदस्य शामिल रहेंगे.

दिन-ब-दिन बढ़ते जा रहे लंबित पड़े मामलों से निपटने के लिए लॉ कमीशन ने न्यायपालिका में खाली पड़े पदों को भरने, नई बेंचों के गठन, काम की अवधि में बढ़ोतरी की सलाह दी है. साथ ही, बेहतर माहौल (वर्क-कल्चर) और निश्चित अवधि के भीतर सुनवाई की भी बात कही है. हाल ही में, दिल्ली उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश के मुताबिक़ यदि न्यायाधीशों की मौजूदा संख्या के हिसाब से ही मामलों की सुनवाई की जाए तो इसे निपटाने में लगभग 464 साल लग जाएंगे. यह चिंता की बात है. इसके अलावा, सबसे अहम यह भी है कि जब तक ज़्यादा ज़रूरी न हो वकीलों को अगली सुनवाई की तारीख़ नहीं मांगनी चाहिए. अगली सुनवाई के लिए तारीख़ देने की प्रक्रिया की निगरानी सिविल कोड के आदेश 17 के तहत होनी चाहिए. न्यायधीशों को मुक़दमे का फैसला एक निश्चित अवधि के अंदर करना चाहिए. इस मामले में अनिल राय बनाम बिहार सरकार के संदर्भ में उच्चतम न्यायालय के निर्देशों का पालन दीवानी और फौज़दारी दोनों मुक़दमों में किया जाना चाहिए. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 में मामलों के जल्दी निपटारे की बात कही गई है. इसके तहत आपराधिक मुक़दमों की सुनवाई में देरी को व्यक्ति के जीने और स्वतंत्रता के अधिकार का हनन माना गया है. पूरी न्यायिक प्रणाली को व्यवस्थित करने की तत्काल ज़रूरत है और इसके लिए नए तौर-तरीक़े अपनाने की भी आवश्यकता है जिससे मामलों की सुनवाई जल्द हो सके. ऐसा नहीं होने पर न्यायिक व्यवस्था के ख़त्म होने की संभावना बढ़ जाएगी. न्यायाधीशों के अलावा वकीलों को भी इस प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभाने की ज़रूरत है ताकि वे लोगों की अपेक्षाओं पर खड़े उतर सकें.

1990 में क्यूबा के हवाना में अपराधों की रोकथाम और मुक़दमों की सुनवाई के लिए आठवां यूनाइटेड नेशन्स कांग्रेस आयोजित किया गया. वहीं से अनुच्छेद 14 को लिया गया, जिसमें वकीलों की भूमिका का ज़िक्र किया गया है.

वकील न्याय को बढ़ावा देने के लिए और अपने मुवक्किलों के अधिकारों की रक्षा करेंगे. अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय क़ानूनों के मुताबिक़ मानवीय अधिकारों की रक्षा के लिए  स्वतंत्र और नैतिकता पूर्वक काम करेंगे.

न्यायपालिका में व्याप्त भ्रष्टाचार से और बेहतर तरीक़े से निपटने की ज़रूरत है. भारत के मुख्य न्यायधीश ने यह स्वीकार किया है कि न्यायपालिका में नैतिकता का स्तर गिरा है. उनके मुताबिक़, जब वह न्यायिक प्रणाली की बात करते हैं तो इसका मतलब केवल जजों से ही नहीं होता, वकील भी इस दायरे में आ जाते हैं. पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायलय, ग़ाज़ियाबाद के न्यायाधीशों…..

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