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अल्लाह शब्द पर किसी का एकाधिकार नहीं

अल्लाह शब्द पर किसी का एकाधिकार नहीं

मलेशिया एक बार फिर से ग़लत कारण से अंतरराष्ट्रीय ख़बर की सुर्ख़ियों में है. पिछले दो सप्ताह के दौरान असामाजिक तत्वों ने पूजा के दस स्थलों को अपना निशाना बनाया है. इन स्थलों में ईसाइयों के गिरिजाघर और सिखों के गुरुद्वारे शामिल हैं. बहरहाल इस हमले में वहां कोई हताहत नहीं हुआ और संपत्तियों को जो नुक़सान पहुंचा उसकी क्षतिपूर्ति की जा सकती है. लेकिन यह बात भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक क्षति के लिए नहीं कही जा सकती है. सरकारी अधिकारियों की ओर से कई विरोधाभासी बयानों के बाद हिंसा के वास्तविक कारणों का खुलासा अब भी नहीं हो पाया है. मलेशिया की छवि एक शांत राष्ट्र की रही है जहां जातीय और धार्मिक विविधता रही है. इन हमलों के बाद मलेशिया की यह छवि दांव पर है.  सांप्रदायिक और धार्मिक मसलों से निपटने के मामले में मलेशिया का रिकॉर्ड का़फी ख़राब रहा है. मुस्लिम देशों में अल्पसंख्यकों के साथ जो बुरा व्यवहार होता है, वह प्राय: उससे भी ख़राब होता है जिसका आरोप पश्चिमी देशों पर मुस्लिम समुदाय के लोग लगाते रहे हैं. मैंने मुस्लिम देशों में ऐसे नेतृत्व की आवश्यकता पर ध्यान देने की मांग की है जो हमारे न्याय, निष्पक्षता और विविधता की मांग में संतुलन और विश्वसनीयता को प्रदर्शित करे. ये ऐसे मूल्य हैं जो इस्लामिक परंपराओं से जुड़ी हैं. 12वीं शताब्दी के विधिवेत्ता अल-शातिबी ने भी इन मूल्यों को शरीया के ऊंचे उद्देश्यों के रूप में समझाया है. हम लोगों ने देखा है कि अपेक्षाकृत उदारवादी और प्रगतिशील माने जाने वाले पश्चिमी देशों में जब कोई पक्षपातपूर्ण क़ानून पास होता है तो इसका विरोध पूरी दुनिया के मुसलमान करते हैं. अभी जैसा कि जर्मनी में बुर्का या स्वीटजरलैंड में मीनारों को लेकर हुआ. लेकिन मलेशिया लगातार अपने यहां के अल्पसंख्यक समुदाय के लिए एक सुरक्षित वातावरण तैयार करने में असफल रहा है. हाल की आगजनी की घटनाएं और हमले इस बात का संकेत है कि अल्पसंख्यक समुदाय के साथ मलेशिया के रुख़ में गड़बड़ी कहां है. हमले की इस घटना को उस विवाद के चलते बढ़ावा मिला जिसमें मलेशिया के ईसाई समुदाय के लोगों ने अल्लाह शब्द का इस्तेमाल किया था. मलेशिया में इस समुदाय की जनसंख्या लगभग 20 लाख यानी 10 फीसदी है. 2007 में गृह मंत्रालय ने एक कैथोलिक न्यूजपेपर, हेराल्ड पर अल्लाह शब्द के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगा दिया था. बाद में, मलय भाषा में अनुदित, बाइबल की 15 हज़ार कॉपियां ज़ब्त कर ली गई थीं, जिसमें गॉड शब्द का अनुवाद अल्लाह किया गया था.

दुनिया के कुछ मुसलमान इस तरह के दावे कर सकते हैं कि अल्लाह शब्द पर उनका एकाधिकार है. यह स्वीकारा जा चुका है कि अल्लाह शब्द इस्लाम पूर्व अरब जगत में इस्तेमाल में था. अरब जगत के और प्रचलित भाषाओं में भी ईश्वर या गॉड के लिए अल्लाह शब्द का इस्तेमाल किया जाता था.

31 दिसंबर, 2009 को क्वालालंपुर उच्च न्यायालय के एक आदेश से उक्त प्रतिबंध को नामंजूर कर दिया गया. इस प्रतिबंध को नामंजूर करने के पीछे न्यायालय का तर्क यह था कि मलेशिया का संविधान धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देता है. तभी से मलेशिया की स्थिति तनावपूर्ण हो गई थी और इस तनाव को बढ़ाने के पीछे बहुत हद तक कुछ ग़ैर-ज़िम्मेवार नेताओं, मुख्यधारा की मीडिया और कुछ मुट्‌ठी भर ग़ैर सरकारी संगठनों (सत्ताधारी दल से जुड़े) का भी हाथ रहा हैं. उदाहरण के तौर पर, देश के सबसे बड़े दैनिक अख़बार, उटुसन मलेशिया (यूएमएनओ से संबद्ध) ने मुस्लिम जनभावनाओं को भड़काने का काम किया है. अख़बार ने ग़ैर-मुस्लिमों को इस बात के लिए ज़िम्मेदार बताया है कि इन्होंने अल्लाह शब्द का अनादर किया है और ये लोग धर्म परिवर्तन के ज़रिए इस मुस्लिम बहुल देश में अपनी जनसंख्या बढ़ाने की साजिश कर रहे हैं. मैंने पहले भी इस तरह के आक्रमक दुष्प्रचार का इस्तेमाल होते देखा है, जब

नेताओं ने लोगों को भयभीत कर उनका समर्थन हासिल करने की कोशिश की. इस तरह के हथकंडे शर्मनाक घटनाओं, जैसे न्यायालय के विवादित निर्णय या सैन्य ख़रीदारी में अनियमितता या रॉयल मलेशियन एयर फोर्स से दो जेट इंजन की चोरी, से ध्यान हटाने में का़फी मददगार साबित होते हैं. यह स्थिति तब से और ख़राब हुई है जब से सत्ताधारी दल ने गत वर्ष संसद में अपना दो तिहाई बहुमत खोया है. यूएमएनओ अब हताश है और जन समर्थन पाने के लिए संघर्ष कर रही है.

दुनिया के कुछ मुसलमान इस तरह के दावे कर सकते हैं कि अल्लाह शब्द पर उनका एकाधिकार है. यह स्वीकारा जा चुका है कि अल्लाह शब्द इस्लाम पूर्व अरब जगत में इस्तेमाल में था. अरब जगत के और प्रचलित भाषाओं में भी भगवान के लिए अल्लाह शब्द का इस्तेमाल किया जाता था. अरामैक में इसे इलाहा और हिब्रू में इलोहिम के नाम से जानते थे. ऐतिहासिक पांडुलिपियों से भी यह साबित हुआ है कि अरब भाषा बोलने वाले मुस्लिम, ईसाई और यहूदी सामूहिक रूप से ईश्वर की प्रार्थना करते थे और ब्रह्ममांड के रचयिता और पालक भगवान के लिए 1400 साल तक अल्लाह शब्द का इस्तेमाल करते रहे.

दक्षिण-पूर्व एशिया में इस्लाम का इतिहास अपने विविध और विस्तृत परंपरा और मुस्लिम तथा ग़ैर-मुस्लिमों के बीच सौहार्दपूर्ण रिश्तों के लिए लोकप्रिय रहा है. यही वजह है कि मलेशिया से बाहर के मुस्लिम विद्वान इस अल्लाह विवाद को बेतुका मान रहे हैं और यह नहीं समझ पा रहे हैं कि आख़िर इतना विरोध और क्यों उपद्रव मचा हुआ है. पश्चिमी देशों में रहने वाले अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय ने, ख़ास कर 9/11 की घटना के बाद, बड़ी मेहनत से लोगों को यह समझाने की कोशिश की है कि मुस्लिम, ईसाई और यहूदी एकसमान धार्मिक पृष्ठभूमि (उनकी जड़ें अब्राहम या इब्राहिम से जुड़ी हुई हैं) को साझा करते हैं और इसलिए एक समान ईश्वर को पूजते है. इस मुद्दे पर स्थानीय समुदाय की संवेदनशीलता भड़क गई. वर्तमान स्थिति से बातचीत और वचनबद्धता के ज़रिए क़ायदे से निपटना होगा, बजाए इसके कि लोगों के बीच असुरक्षा का भाव पैदा किए जाएं. मुस्लिम समुदाय को इस बात के लिए उत्साहित करना चाहिए कि वे ईसाई समुदाय से बातचीत करे और उन्हें अपनी चिंताओं से अवगत कराए. स्पेन के मुस्लिम समुदाय इसका एक बेहतरीन उदाहरण हैं और मलेशियाई मुसलमानों को इसका अनुसरण करना चाहिए. कॉमन वर्ड, एक वैश्विक प्रयास है जिसे 2007 में शुरू किया गया था. इसने विश्व के 130 प्रमुख मुस्लिम विद्वानों का ध्यान अपनी तऱफ खींचा है. इस प्रयास ने मुसलमानों और ईसाइयों के बीच भाईचारा बनाने और शांति तथा समृद्धि से जीवन जीने का रास्ता ढू़ढ निकालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. प्रधानमंत्री नजीब रजाक के शपथ लेने के समय से ही मलेशिया की अंतरराष्ट्रीय ख्याति को धक्का पहुंच रहा है. राष्ट्रीय एकता को बढ़ाने के बजाय नजीब के शासन में मुस्लिम युवाओं द्वारा महिलाओं पर शराब पीने के आरोप में कोड़े बरसाए जा रहे हैं, मंदिर बनाने के ख़िला़फ लोग सड़कों पर गाय की कटी सिर के साथ प्रदर्शन कर रहे हैं. योगाभ्यास करने वाले मुसलमानों या इस्लाम स्वीकार कर चुके लोग यदि अपनी पुरानी आस्थाओं की ओर लौटते हैं तो उनके साथ ख़राब व्यवहार होता है. आख़िर नजीब इस देश को कहां लेकर जाना चाहते हैं? मलेशिया भ्रष्टाचार की सूची में आगे ही बढ़ता जा रहा है. हमारा पर्यटन उद्योग दिन प्रति दिन ख़राब होता जा रहा है.

यह सब कुछ ऐसे मलेशियाई लोगों के लिए बहुत मायने रखता है, जिनकी प्रतियोगिता तेज़ी से हो रहे सामाजिक और राजनीतिक धु्रवीकरण वाले वर्तमान दौर से है. आम मलेशियाई कुछ लोगों के हितों की बलि नहीं चढ़ सकते. बहरहाल, ऐसी राजनीति पुरानी हो गई है और अब यह सा़फ हो गया है कि जो लोग ऐसा कर रहे हैं वह सिर्फ सत्ता पर एकाधिकार बनाने के लिए कर रहे हैं. अधिसंख्यक मलेशियाई जनता इस तरह की सोच को नकारती है. वे महसूस करते हैं कि हम आज जिन चुनौतियों – जैसे मंदी, शिक्षा का गिरता स्तर और बढ़ती आपराधिक घटनाएं- का सामना कर रहे हैं, उससे हमें ख़ुद ही पार पाना होगा. साथ ही साथ निष्पक्षता और सभी के लिए न्याय के सिद्धांत को भी धरातल पर उतारना है.

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