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मुंगेर का अभेद्य किला ढहने लगा

अंग जनपद की ऐतिहासिक धरोहर मुंगेर किला अनेक उत्थान-पतन का साक्षी है. यह किला आज सरकारी उपेक्षा के कारण ढहने के कगार पर है. जिस किले पर कभी नौबत बजती थी, वहीं अब सन्नाटा पसरा है. इसकी दीवारें ढहनी शुरू हो गई हैं, लेकिन इसकी फिक्र न तो पुरातत्व विभाग को है और न ही राज्य सरकार को. ग़ौरतलब है कि वर्ष 1934 में आए भूकंप में मीर कासिम का किला ढह गया था, लेकिन उस समय के लोग अपने इतिहास को बचाने के प्रति इतने जागरूक थे कि चंदा इकट्ठा कर जैसे हो सका, वैसा ही किला बना दिया. हालांकि नया किला पुराने किले जैसा भव्य नहीं बन पाया, लेकिन यह मुंगेर आने वाले प्रत्येक व्यक्ति को अपनी ओर आकर्षित करता है.

मुंगेर इतिहास का धनी माना जाता है. मीर कासिम द्वारा बनाया गया यह किला लाल देश के बेहतरीन किलों में शुमार था. लेकिन आज उसका वजूद खतरे में है. इसे संजोने के प्रति किसी का ध्यान नहीं गया. यहां तक क्षेत्रीय सांसद और विधायक ने भी किले को ठीक करने की तरफ ध्यान नहीं दिया.

अ़फसोस यह है कि इसे बचाने की दिशा में कोई पहल नहीं की जाती. यदि यही आलम रहा तो वह दिन दूर नहीं, जब मुंगेर के इतिहास की मूक साक्षी इस ऐतिहासिक धरोहर का वजूद ही मिट जाएगा. किले के कण-कण में शौर्य, त्याग और बलिदान की दास्तान द़फन है. आज़ादी के छह दशक बाद भी इसकी सुरक्षा, रखरखाव और आसपास के क्षेत्र का सौंदर्यीकरण नहीं किया गया. सच तो यह है कि इसे सजाने-संवारने में जितनी महत्वपूर्ण भूमिका राजा-महाराजाओं की रही, उसके ठीक विपरीत रहा सरकार का रवैया. लिहाज़ा आज यह किला रंग-रोगन तक के लिए तरस रहा है. इसकी दीवारें कई जगहों से क्षतिग्रस्त होकर ढह रही हैं. किले का इतिहास तक़रीबन बारह-तेरह सौ वर्ष पुराना है. अ़फसोसजनक पहलू तो यह है कि इसे आज तक राष्ट्रीय स्मारक घोषित नहीं किया गया.

यह किला न केवल मुंगेर, बल्कि बिहार की एक धरोहर है. विश्व प्रसिद्ध मुंगेर शहर में क़दम रखते ही सर्वप्रथम लोगों की नज़र लाल रंग से रंगी चाहरदीवारी पर प़डती है. गंगा तट पर स्थित सामरिक दृष्टिकोण से बना यह किला अनेक बादशाहों, शासकों और साम्राज्यों के उत्थान-पतन का गवाह है. यह किला मीर कासिम के किले के नाम से जाना जाता है. इसका निर्माण किसने और कब कराया, यह खोज का विषय है. लेकिन, समय-समय पर जिन राजाओं ने किले की मरम्मत कराई, उनके नाम इतिहास के पन्नों में अंकित होते गए. वैसे इतिहासकार इस किले को महाभारतकालीन जरासंध से जो़डते हैं. कहा जाता है कि जरासंध ने अपने साम्राज्य के पूर्वी सीमांतर स्थित मुंगेर में इस किले का निर्माण कराया था. जरासंध ने यह किला राजा कर्ण को उपहार में दिया था, जिसका जिक्र महाभारत के सभा पर्व के दिग्विजय प्रकरण में है. इसमें मुंगेर के किले की चर्चा की गई है. इससे जाहिर होता है कि मुंगेर के इस किले का निर्माण उस समय हो चुका होगा, क्योंकि लोग किले को सिद्ध शक्तिपीठ चंडी स्थान से भी जो़डते हैं. यह किला कर्ण की दानवीरता का भी साक्षी है. किंवदंती है कि कर्ण सिद्ध शक्तिपीठ चंडी स्थान में पूजा-अर्चना कर किले के अंदर स्थित ऊंचे टीले से नित्य सवा मन सोना दान करते थे. इस टीले को लोग आज भी कर्णचौड़ा कहते हैं, जहां अब विश्व का प्रथम योग विश्वविद्यालय है. महाभारत के इस नायक कर्ण को राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने रश्मिरथी के माध्यम से अमरता प्रदान की. महाभारत काल के दो हज़ार वर्षां में इस किले की चर्चा इसलिए नहीं मिलती है, क्योंकि नंदवंश, शिशुनाग वंश और मौर्य वंश के मगध राजाओं के काल में इस किले का नाम कई बार बदला गया. कालांतर में सम्राट कनिष्क से हर्षवर्द्धन के शासनकाल तक मुंगेर के किले पर कुषाण साम्राज्य और इसके बाद ढाई सौ वर्षां तक पालवंशीय राजाओं का क़ब्ज़ा था. कुतुब खां से शेरशाह तक और शेरशाह से अकबर तक के शासकों ने इस किले का उपयोग जंगी छावनी के रूप में किया. वर्ष 1657 में जब शाहजहां की बीमारी के कारण गद्दी के लिए उसके पुत्रों के बीच जंग हुई तो उस समय भी मुंगेर का नाम उभर कर सामने आया. शाहजहां का दूसरा पुत्र शाहसुजा बंगाल का शासक था, उसकी राजधानी राजमहल में थी. पिता की मौत की खबर के बाद उसने दिल्ली की गद्दी हासिल करने के लिए बगावत कर दी, लेकिन तब तक औरंगजेब दिल्ली की गद्दी पर क़ाबिज़ हो चुका था. औरंगजेब से ल़डने के लिए उसने मुंगेर में तैयारी शुरू कर दी और सामरिक दृष्टिकोण से इसे इस कदर मज़बूत किया कि दुश्मन इसके अंदर प्रवेश न कर सके. इसके अंतर्गत तीन ओर से खाई खुदवाई गई और घेरा कराया गया. बावजूद इसके उसे अपने मक़सद में कामयाबी हासिल नहीं हुई और मुंगेर के किले पर औरंगजेब का क़ब्ज़ा हो गया. मुगल शासक के पतन के बाद मुंगेर के किले पर बंगाल के नवाबों का अधिकार हो गया. ध्वंस के कगार पर पहुंचा यह किला तब आभामंडित हो गया, जब 1761 में बंगाल और बिहार के नवाब मीर कासिम ने मुंगेर को अपनी राजधानी बनाया. उसने इस किले की मरम्मत कराई और अपने सेनापति गुर्गिन खां को सैन्य शक्ति के पुनर्गठन का निर्देश दिया. किले के अंदर आग्नेयास्त्र निर्माण के लिए कारखाने खोले गए, जिसकी परंपरा आज भी इस ज़िले में है. कुछ ही समय बाद ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपनी ज़डें जमाने की कोशिश की तो मीर कासिम ने इसकी मुखाल़फत की. परिणाम यह हुआ कि अंग्रेजों से ल़डाई छ़िड गई और विदेशी बादशाहत को रोकने में उसकी अहम भूमिका रही. मीर कासिम के चले जाने पर अंगे्रजी सेना मुंगेर आने लगी और अंतत: मुंगेर किले पर अंग्रेजों का क़ब्ज़ा हो गया.

मुंगेर का किला मीर कासिम के दो मासूम बच्चों की शहादत का भी गवाह है, जिन्होंने अंग्रेजों से ल़डते हुए अपनी जान दे दी. यह देश का पहला किला है, जिसके अंदर आबादी बसती है. किले के अंदर सरकारी विभागों के कार्यालय, सिविल कोर्ट के साथ-साथ विश्व प्रसिद्ध योग विश्वविद्यालय है. यह किला समृद्ध अतीत का साक्षी है, लेकिन वर्तमान में सरकारी उपेक्षा का दंश झेल रहा है. यूं तो इस किले के जीर्णोद्धार के लिए ज़िला प्रशासन को 3 करो़ड 8 लाख रुपये उपलब्ध कराए गए हैं, लेकिन जीर्णोद्धार का कार्य अब तक प्रारंभ नहीं हो पाया. जीर्णोद्धार में किले की दीवारों के साथ ही कष्टहरणी घाट एवं कृष्ण वाटिका को भी नया रूप देने का प्रस्ताव है.

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