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पेपर मिल चालू नहीं हो सकी
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शासन और विकास को अमलीजामा पहनाने की कवायद करने वाली राज्य की नीतीश सरकार भी बैजनाथपुर पेपर मिल की चिमनी से धुआं उगलवाने में नाकाम साबित हो रही है. हालांकि खगड़िया के वर्तमान सांसद एवं सूबे के तत्कालीन उद्योग मंत्री दिनेश चंद्र यादव ने सहरसा में पिछले साल 17 फरवरी को उद्योग मेले में पूरे भरोसे से कहा था कि बैजनाथपुर पेपर मिल को चालू कराना मेरे सामने सबसे बड़ी चुनौती थी और लग रहा था कि पेपर मिल चालू न होने से मेरे ऊपर से लोगों का विश्वास उठ जाएगा, लेकिन पेपर मिल चालू करने की सारी प्रक्रिया पूरी कर ली गई है और आप सबके समक्ष मौजूद मोहन खंडेलवाल से स़िर्फ हैंडओवर एवं टेकओवर की प्रक्रिया बाकी रह गई है. बताया जाता है कि उद्योग मेले के बाद मोहन खंडेलवाल द्वारा बैंक को दो करोड़ रुपये की राशि चुकता कर दी गई है, लेकिन सरकार द्वारा बैंक को जिस बकाया राशि का भुगतान होना था, वह अब तक नहीं हुई, जो सरकार दो करोड़ रुपये की रक़म अदा नहीं कर सकती, वह राज्य के बंद पड़े कारखानों को किस तरह चालू करा सकेगी?

उद्योग मेले के बाद मोहन खंडेलवाल द्वारा बैंक को दो करोड़ रुपये की राशि चुकता कर दी गई है, लेकिन सरकार द्वारा बैंक को जिस बकाया राशि का भुगतान होना था, वह अब तक नहीं हुई. जो सरकार दो करोड़ रुपये की रक़म अदा नहीं कर सकती, वह राज्य के बंद पड़े कारखानों को किस तरह चालू करा सकेगी?

स्थानीय सूत्रों का कहना है कि उद्योगपति खंडेलवाल भी तीन-चार बार पेपर मिल का गुपचुप तरीक़े से निरीक्षण कर चुके हैं. शायद अब उनका भी दिल इस पेपर मिल को चालू करने से टूट चुका है. हालांकि प्रवासी भारतीय मिश्र बंधु परिवार नवहट्टा हेमकांत मिश्र, राजेश्वर मिश्र एवं सतीश मिश्र की भी नज़र इस पेपर मिल पर थी, लेकिन सरकार की लुंजपुंज व्यवस्था इन प्रवासी भारतीयों को आकर्षित नहीं कर सकी.

ग़ौरतलब है कि बैजनाथपुर पेपर मिल की स्थापना प्रक्रिया वर्ष 1982-83 में शुरू हुई. मगर, वर्ष 1997 से अब तक मिल को चालू करने के लिए तकनीकी और प्रशासनिक कार्य पूरा नहीं किया गया. इस मिल पर अब तक 16 करोड़ रुपये खर्च हुए हैं, जिसमें 8 करोड़ बिहार राज्य औद्योगिक विकास निगम एवं 8 करोड़ बैंक द्वारा व्यय की राशि शामिल है. अब तक तक़रीबन 10 करोड़ रुपये से भी अधिक की राशि ब्याज के रूप में बकाया बताई जा रही है. पेपर मिल की संपत्ति की देखरेख पटना की लक्ष्मी सिक्योरिटी कंपनी को सौंपी गई है, लेकिन उक्त सिक्योरिटी कंपनी ने मिल की संपत्ति की सुरक्षा भी बस खानापूर्ति के रूप में की. सुरक्षा व्यवस्था पुख्ता न रहने की वजह से लोहा, एल्युमिनियम, तांबा, पीतल समेत कई प्रकार के क़ीमती उपकरण एवं फर्नीचर गायब कर दिए गए. जबकि सुरक्षा व्यवस्था पर भी सरकार को लाखों रुपये सालाना खर्च करने पड़ रहे हैं. अगर पेपर मिल की स्थिति पर गौर किया जाए तो यह अब विपक्ष की राजनीति में अपनी भूमिका अदा करने वाले दलों के लिए स़िर्फ आंदोलन का मुद्दा बनकर रह गई है.

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