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मक़बूल पर फिदा क्यों हों?
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जब मैंने मक़बूल फिदा हुसैन के भारत छोड़ने और क़तर की नागरिकता स्वीकार करने पर सेक्युलरवादियों के दोहरे चरित्र को उजागर करता हुआ लेख चौथी दुनिया में लिखा तो मेरे विवेक और मेरी समझ, मेरी विचारधारा, मेरी शिक्षा, मेरी पारिवारिक पृष्ठभूमि को लेकर लोगों ने सवाल उठाने शुरू कर दिए. मुझे कालिदास का कुमारसंभव पढ़ने  और खजुराहो की प्रसिद्ध मूर्तियां देखने-समझने के अलावा प्राचीन भारतीय मूर्तिकला के बारे में अपना ज्ञान बढ़ाने का उपदेश दिया गया. मुझे इस बात पर घेरने की कोशिश की गई कि मेरी बातें भगवा ब्रिगेड या संघियों से क्यों मिलती-जुलती हैं. जिन लोगों ने मुझे इस तरह की सलाह दी, मुझे नहीं मालूम कि उनकी समझ कितनी बेहतर है और उन्होंने कालिदास को कितना पढ़ा है. उन्होंने कितनी बार खजुराहो की मूर्तियां देखी हैं, लेकिन उन्हें मैं यह बता दूं कि हुसैन ने अपनी जीवनी और अपनी एक पेंटिंग दस्तख़त करके मुझे भी दी है, जो मेरे लिए अमूल्य धरोहर है. हुसैन की पेंटिंग को समझने का दावा करने वाले उनके तथाकथित समर्थकों में अभिव्यक्ति की आज़ादी को लेकर घोर चिंता है और उन्हें लगता है कि हुसैन के भारत छोड़ कर चले जाने से संविधान द्वारा प्रदत्त इस अधिकार पर हमला हुआ है. उन्हें यह सोचने-समझने की भी ज़रूरत है कि जब भी कोई अपने आपको अभिव्यक्त करने के लिए ज़्यादा स्वतंत्रता की अपेक्षा करता है तो स्वत: उससे ज़्यादा उत्तरदायित्वपूर्ण व्यवहार भी अपेक्षित हो जाता है. भारत माता की नंगी तस्वीर बनाने पर हुसैन के ख़िला़फ दायर याचिका को दिल्ली हाईकोर्ट के जस्टिस संजय किशन कौल ने ख़ारिज कर दिया, साथ ही अपने फैसले में कला और उसकी समझ को लेकर कुछ तीखी टिप्पणियां भी कीं. लेकिन हुसैन द्वारा उन्नीस सौ सत्तर में बनाई गईं सरस्वती और दुर्गा की नंगी तस्वीरों के एक दूसरे मामले में वर्ष 2004 में दिल्ली हाईकोर्ट के जस्टिस जे डी कपूर का भी एक फैसला आया था. उन्होंने आठ अप्रैल 2004 के अपने फैसले में लिखा, इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि देश के  करोड़ों हिंदुओं की इन देवियों में अटूट श्रद्धा है. एक ज्ञान की देवी हैं तो दूसरी शक्ति की. इन देवियों की नंगी तस्वीर पेंट करना करोड़ों लोगों की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना तो है ही, साथ ही उनके धर्म और आस्था का भी अपमान है.

इस तरह के कृत्य जानबूझ कर धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने या फिर अपमानित करने के  दायरे में ही आते हैं, क्योंकि ये देवी-देवता करोड़ों लोगों के आराध्य हैं. एक बार फिर मैं यह कहता हूं कि ये देवी-देवता एक मिथक हो सकते हैं, लेकिन जब भी इस तरह से नग्न रूप में उनको चित्रित किया जाता है तो लोगों की धार्मिक भावनाएं आहत होती हैं.

शब्द, पेंटिंग, रेखाचित्र और भाषण के माध्यम से अभिव्यक्ति की आज़ादी को संविधान में मौलिक अधिकार का दर्जा हासिल है, जो हर नागरिक के लिए अमूल्य है. कोई भी कलाकार या पेंटर मानवीय संवेदना और मनोभाव को कई तरीक़ों से अभिव्यक्त कर सकता है. इन मनोभावों और आइडियाज़ की अभिव्यक्तिको किसी सीमा में नहीं बांधा जा सकता है. लेकिन कोई भी इस बात को भुला नहीं सकता कि जितनी ज़्यादा स्वतंत्रता होगी, उतनी ही ज़्यादा ज़िम्मेदारी भी होती है. अगर किसी को अभिव्यक्ति का असीमित अधिकार मिला है तो उससे यह अपेक्षा की जाती है कि इस अधिकार का उपयोग वह अच्छे काम के लिए करे, न कि किसी धर्म या धार्मिक प्रतीकों या देवी-देवताओं के  ख़िला़फ विद्वेषपूर्ण भावना के साथ उन्हें अपमानित करने के लिए. हो सकता है कि  उक्त धार्मिक प्रतीक या देवी-देवता एक मिथक हों, लेकिन इन्हें श्रद्धाभाव से देखा जाता है और समय के साथ ये लोगों के दैनिक-धार्मिक क्रियाकलापों से इस कदर जुड़ गए हैं कि उनके ख़िला़फ अगर कुछ छपता है, चित्रित किया जाता है या फिर टिप्पणी की जाती है तो इससे धार्मिक भावनाएं आहत होती ही हैं. किसी भी धर्म के देवी-देवताओं की आपत्तिजनक या नीचा दिखाने वाली तस्वीरें या पेंटिंग समाज में रोष और एक-दूसरे के प्रति ऩफरत पैदा करती हैं.

अगर यह मान लिया जाए कि इस तरह की तस्वीरें कला का एक नमूना भर हैं, तब भी इस बात को नहीं भुलाया जा सकता कि इस तरह के कृत्य जानबूझ कर धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने या फिर अपमानित करने के  दायरे में ही आते हैं, क्योंकि ये देवी-देवता करोड़ों लोगों के आराध्य हैं. एक बार फिर मैं यह कहता हूं कि ये देवी-देवता एक मिथक हो सकते हैं, लेकिन जब भी इस तरह से नग्न रूप में उनको चित्रित किया जाता है तो लोगों की धार्मिक भावनाएं आहत होती हैं.

अभिव्यक्ति की आज़ादी के  नाम पर किसी व्यक्ति को किसी भी वर्ग या समाज की धार्मिक भावनाओं से खिलवाड़ की इजाज़त नहीं दी जा सकती है. यह बात याचिकाकर्ता (हुसैन) को समझनी चाहिए कि वह एक अलग धर्म से संबंधित हैं.

अगर याचिकाकर्ता को लोगों की धार्मिक भावनाओं की गहराई का एहसास नहीं है तो वह अपने धर्म या फिर किसी और धर्म पर हाथ आज़माकर देखें तो उन्हें पता चल जाएगा कि धार्मिक भावनाओं की जड़ें कितनी गहरी होती हैं. इस तरह के काम दो अलग-अलग धर्मों को मानने वालों के बीच वैमनस्य की खाई को और गहरा करते हैं. साथ ही सामाजिक सद्‌भाव और आपसी भाईचारे के बीच बाधा बनकर खड़े हो जाते हैं. याचिकाकर्ता ने महाभारत की पात्र द्रौपदी, जिन्हें हिंदू धर्म को मानने वाले लोग इज़्ज़त की नज़रों से देखते हैं, को भी पूरी तरह से निर्वस्त्र चित्रित किया है, जबकि चीरहरण के व़क्त भी द्रौपदी निर्वस्त्र नहीं हो पाई थीं. इस पेंटिंग में जिस तरह से द्रौपदी का चित्रण हुआ है, वह सा़फ तौर से हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने और ऩफरत पैदा करने वाला है. अपने बारह पन्नों के फैसले में विद्वान न्यायाधीश ने और भी कई बातें कहीं और अंत में शिक़ायतकर्ताओं की याचिका ख़ारिज कर दी. धार्मिक भावनाओं को भड़काने, दो समुदायों के बीच ऩफरत फैलाने आदि के  संबंध में जो धाराएं (153 ए और 295 ए) लगाई जाती हैं, उनमें राज्य या केंद्र सरकार की पूर्वानुमति आवश्यक होती है, जो इस मामले में नहीं थी. आप को शायद याद होगा कि जब यह मुक़दमा चल रहा था तो केंद्र में भाजपा की सरकार थी. यह तो हुई अदालत और न्यायाधीश की बात. आपको एक और उदाहरण देते चलें, जिससे हुसैन की महानता (?) और उनके पूर्वाग्रह से परदा हटता है. हुसैन ने एक बार महात्मा गांधी, कार्ल मार्क्स, अलबर्ट आइंस्टीन और हिटलर की पेंटिंग बनाई थी, जिसमें हिटलर को उन्होंने नंगा दिखाया था. जब उनसे इसके बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि किसी को अपमानित करने का यह उनका अपना तरीक़ा है. उनकी इस टिप्पणी के बाद मुझे नहीं लगता है कि कुछ और कहने की ज़रूरत है. मार्क्स के अंधभक्तों, धर्म निरपेक्षता और अभिव्यक्ति की आज़ादी के ख़तरे पर विलाप करना बंद करो. अपनी आंखों पर चढ़ा लाल चश्मा उतारो, तभी तर्कसंगत बातें भी होंगी और विमर्श भी.

(जस्टिस कपूर के जजमेंट के चुनिंदा अंशों के अनुवाद में हो सकता है कि कोर्ट की भाषा में कोई त्रुटि रह गई हो, लेकिन भाव वही हैं )

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