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एमपी बिरला अस्पताल : अवैध ब्लड ट्रांसफ्यूजन की जांच शुरू

एमपी बिरला अस्पताल : अवैध ब्लड ट्रांसफ्यूजन की जांच शुरू

मध्य प्रदेश विधानसभा में पूछे गए एक प्रश्न ने सतना के एमपी बिरला अस्पताल में हड़कंप मचा दिया है. इस अस्पताल के पास ब्लड बैंक की अनुमति नहीं है, जबकि यह अब तक हज़ारों मरीज़ों को स्वयं खून चढ़ाने का काम कर चुका है. पिछले आठ वर्षों से चल रहे इस गोरखधंधे से कई मरीज़ों की जान संकट में पड़ चुकी है. राज्य विधानसभा में चौधरी राकेश सिंह चतुर्वेदी ने एक प्रश्न के तहत इस अस्पताल द्वारा अपने मरीज़ों को खून चढ़ाए जाने की प्रक्रिया पर संदेह व्यक्त किया था. एमपी बिरला अस्पताल को सतना में अत्याधुनिक सुविधाओं से युक्त एवं नवीनतम टेक्नोलॉजी का एक प्रमुख केंद्र माना जाता है. ज़िले के सभी गंभीर मामले इस अस्पताल को विश्वास के साथ भेजे जाते हैं.

उल्लेखनीय है कि एमपी बिरला अस्पताल के सिविल सर्जन प्रमोद पाठक के अवकाश पर जाने के बाद डॉ. एसबी सिंह ने कुछ समय के लिए कार्यभार संभाला.

विधायक ने जानकारी चाही थी कि बिरला अस्पताल द्वारा तीन वर्षों में किस-किस मरीज़ को कितनी मात्रा में किस ग्रुप का खून चढ़ाया गया? उक्त खून ज़िला अस्पताल स्थित ब्लड बैंक से कब लिया गया? उन्होंने निजी अस्पतालों, जिनके पास स्वयं का ब्लड बैंक लाइसेंस नहीं है और जो न तो ब्लड निकाल सकते हैं और न ही उसे भर्ती किए गए मरीज़ों को चढ़ा सकते हैं, के बारे में भी प्रश्न किए थे. विधायक ने अस्पताल के चेरिटेबल ट्रस्ट की प्रकृति पर भी संदेह करते हुए पूछा कि किसी मरीज़ का इलाज यह अस्पताल चेरिटी में क्यों नहीं कर रहा है? विधायक ने स्वास्थ्य मंत्री से मांग की कि बिरला अस्पताल सतना द्वारा आठ वर्षों में अवैध कार्य करने के कारण सैकड़ों मरीज़ों की जान गई है, इसलिए उस पर आपराधिक मामला दर्ज़ कर उच्चस्तरीय जांच कराई जाए.

उल्लेखनीय है कि एमपी बिरला अस्पताल के सिविल सर्जन प्रमोद पाठक के अवकाश पर जाने के बाद डॉ. एसबी सिंह ने कुछ समय के लिए कार्यभार संभाला. उन्होंने अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए एक पत्र ज़िले के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी को भेजा, जिसमें एमपी बिरला अस्पताल द्वारा अवैध रूप से ब्लड ट्रांसफ्यूजन करने की बात कही गई और यह भी लिखा गया कि इससे रोगी कल्याण समिति को भारी आर्थिक क्षति होती है. मुख्य चिकित्सा अधिकारी ने एक कमेटी का गठन किया और मामला ठंडे बस्ते में चला गया. विधानसभा में मामला गूंजने के बाद मार्च माह में उपरोक्त टीम ने अपना मौन तोड़ते हुए बिरला अस्पताल के समस्त दस्तावेज़ों को अपने क़ब्ज़े में ले लिया और मामले की विधिवत जांच शुरू कर दी. सवाल तो यह है कि छह माह पूर्व नवंबर में ज़िला स्वास्थ्य अधिकारी द्वारा गठित जांच दल ने अपने काम में इतनी देर क्यों की? इससे सतना के मरीज़ों को कितना नुकसान झेलना पड़ा और बिरला समूह द्वारा चलाए जा रहे अस्पताल की इस ग़ैरक़ानूनी हरकत को नियंत्रित करने में ज़िला प्रशासन क्यों अक्षम रहा?

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