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राष्‍ट्रीय पक्षी मोर संकट में

प्रशासन के उपेक्षापूर्ण रवैये के चलते छत्तीसगढ़ में राष्ट्रीय पक्षी मोर पर संकट मंडराने लगा है. मोर को क़ैद करके उसे शोभा की वस्तु बना लेने का चलन इन दिनों राज्य में गति पकड़ रहा है. वन विभाग कामला इस ओर ध्यान देने के लिए तैयार नहीं है. परिणाम यह है कि मोर इन दिनों संकट में हैं. बिलासपुर ज़िले के ग्राम मलहार के एक मंदिर परिसर में दो मोर वर्षों से एक बाड़े में बंद हैं और दर्शनार्थियों के लिए आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं. इन्हें वही खिलाया जाता है, जो मंदिर में प्रसाद के रूप में चढ़ता है. इन मोरों की देखरेख के लिए किसी तरह की कोई व्यवस्था नहीं है. मंदिरों में आने वाले दर्शनार्थी मोरों के साथ खिलवाड़ भी करते हैं और अचानक ही कुछ खाने के लिए भी दे देते हैं. खाने के लिए दी जाने वाली सामग्री स्तरीय है या नहीं, इसकी जांच की चिंता किसी को नहीं है. वन विभाग ने इन मोरों की मुक्ति के लिए कभी कोई क़दम नहीं उठाया.

छत्तीसगढ़ में मोरों की उपस्थिति अधिकांशत: आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों में है. आदिवासी लोग प्रकृति से सीधा संपर्क होने के कारण मोरों के साथ किसी भी तरह की छेड़छाड़ नहीं करते हैं. राज्य के वन्य प्राणी मुख्य वन संरक्षक आर के टामटा के अनुसार, मोरों को बंधक बनाकर रखना अपराध की श्रेणी में आता है.

सत्य नारायण बाबा धाम, रायगढ़ पहाड़ मंदिर की पीछे रहने वाले एक शिक्षक और गोमरड़ा गांव में ग्रामीणों द्वारा अवैध रूप से राष्ट्रीय पक्षी को बंधक बनाने का प्रकरण सार्वजनिक चर्चा का विषय है, पर छत्तीसगढ़ शासन को इस संदर्भ में अब तक कोई जानकारी नहीं है. सत्य नारायण बाबा के मंदिर कोसमनारा की दूरी ज़िला मुख्यालय से दो किलोमीटर है. यहां पर तीन मोरनियों और एक मोर को छोटे से पिंजरे में बंद करके रखा गया है. प्रदेश के कई अधिकारी इस आश्रम में दुआएं मांगने के लिए आते हैं. मोरों को देखते भी हैं, पर उनकी मुक्ति का मार्ग नहीं खोज पाते. तंग कमरों में बंद होने के कारण पक्षियों की आयु पर भी फर्क़ पड़ता है. इन पक्षियों को पालतू बनाकर यदि बाद में जंगल में छोड़ा जाए तो उनकी जान जाने का खतरा 80 प्रतिशत तक बढ़ जाता है, ऐसा पशु विशेषज्ञों का कहना है. छत्तीसगढ़ में 11 अभयारण्य हैं, जिनमें से चार में मोर का अस्तित्व अभी भी है. इसके अलावा अमरकंटक, राजस्थान, पेनरा और बालाघाट के जंगलों में भी मोर पाए जाते हैं.

छत्तीसगढ़ में मोरों की उपस्थिति अधिकांशत: आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों में है. आदिवासी लोग प्रकृति से सीधा संपर्क होने के कारण मोरों के साथ किसी भी तरह की छेड़छाड़ नहीं करते हैं. राज्य के वन्य प्राणी मुख्य वन संरक्षक आर के टामटा के अनुसार, मोरों को बंधक बनाकर रखना अपराध की श्रेणी में आता है. डीएफओ आशुतोष मिश्रा ने बताया कि मोरों को बंधक बनाए जाने की सूचना उन्हें मीडिया के माध्यम से मिली है. इस तरह के जीवों को रखने के लिए अभी तक कोई विशेष व्यवस्था नहीं है. अत: वैकल्पिक स्थान की खोज की जा रही है.

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