Chauthi Duniya

Now Reading:
समान शिक्षा प्रणाली ही चाहिए

केंद्र सरकार जनता को गुमराह करने के लिए धन की कमी का हवाला देकर कारपोरेट एवं ग़ैर सरकारी संगठनों की लॉबी से सांठगांठ करने में जुटी हुई है. इससे भविष्य में ग़रीब एवं अमीर के बीच की खाई गहराने के संकेत स्पष्ट नज़र आ रहे हैं. यदि इसी तरह चलता रहा तो आने वाले समय में यह सामाजिक विषमता विद्रोह का रूप धारण कर सकती है.

शिक्षा को कारोबार से अधिक प्रत्येक व्यक्ति के अधिकार के तौर पर देखा जाना चाहिए. मानव होने के कारण गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पर ग़रीब छात्र का भी उतना ही अधिकार है, जितना कि किसी धनाढ्‌य परिवार के छात्र का है. शिक्षा व्यक्ति का मूल अधिकार ही नहीं, बल्कि उसका मानवाधिकार भी है. क्या स़िर्फ धन के अभाव के चलते किसी ग़रीब विद्यार्थी को शिक्षा पाने के अधिकार से वंचित कर देना सही होगा?

यह चिंता की बात है कि भारतीय गणतंत्र के 63वें साल में भी हमारे कर्णधारों ने देश के लिए समतामूलक शिक्षा का कोई ढांचा खड़ा नहीं किया है. अगर यही हालत रही तो आने वाले समय में इसके लिए एक लंबे संघर्ष की ज़रूरत पड़ सकती है. देश में पूर्व-प्राथमिक स्तर (नर्सरी, के.जी.) से लेकर उच्च तकनीकी शिक्षा तक सार्वजनिक शिक्षा प्रणाली को स्थापित किए जाने की ज़रूरत है, पर इस दिशा में सरकार की ओर से कोई गंभीर पहल अब तक नहीं हुई है. फिलहाल ऐसा कुछ होता हुआ दिख भी नहीं रहा है.

लेकिन इसके ठीक विपरीत वर्तमान केंद्र सरकार शिक्षा के प्रति अपनी संवैधानिक जवाबदेही से पल्ला झाड़कर शिक्षा को वैश्विक बाज़ार में मुना़फाखोरी के लिए बिकाऊ माल बनाने की नीति अपनाने में जुटी हुई है. यही नहीं, केंद्र सरकार जनता को गुमराह करने के लिए धन की कमी का हवाला देकर कारपोरेट एवं ग़ैर सरकारी संगठनों की लॉबी से सांठगंाठ करने में जुटी हुई है. वास्तव में यह मसला धन की कमी का नहीं, बल्कि सरकार की जनविरोधी नीति का है, जिससे भविष्य में ग़रीब एवं अमीर के बीच की खाई गहराने के संकेत स्पष्ट नज़र आ रहे हैं.

शिक्षा को कारोबार से अधिक प्रत्येक व्यक्ति के अधिकार के तौर पर देखा जाना चाहिए. मानव होने के कारण गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पर ग़रीब छात्र का भी उतना ही अधिकार है, जितना कि किसी धनाढ्‌य परिवार के छात्र का है. शिक्षा व्यक्ति का मूल अधिकार ही नहीं, बल्कि उसका मानवाधिकार भी है. क्या स़िर्फ धन के अभाव के चलते किसी ग़रीब विद्यार्थी को शिक्षा पाने के अधिकार से वंचित कर देना सही होगा? कतई नहीं. लेकिन, इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि आज़ादी से लेकर आज तक भारत की जनता इंतज़ार कर रही है कि पूर्ण रूप से सार्वजनिक धन पर टिकी हुई समान शिक्षा प्रणाली की स्थापना की जाए, ताकि प्राथमिक विद्यालय से लेकर महाविद्यालय स्तर तक समतामूलक गुणवत्ता की शिक्षा मुफ्त मिल सके.

प्रख्यात शिक्षाविद प्रो. अनिल सद्गोपाल का कहना है कि संसद में पेश बच्चों को अनिवार्य शिक्षा विधेयक-2009 दरअसल शिक्षा के अधिकार को छीनने वाला विधेयक है. कुछ समय पूर्व यह बात उन्होंने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल के जनसंचार विभाग द्वारा शिक्षा का अधिकार और भारत के भविष्य विषय पर आयोजित व्याख्यान कार्यक्रम को संबोधित करते हुए भी कही थी. प्रो. सद्गोपाल ने विधेयक की तमाम ख़ामियों की तऱफ इशारा किया. उन्होंने कहा कि एक समान प्राथमिक शिक्षा की गारंटी से ही देश को बचाया जा सकता है. उन्होंने कहा कि इस ग़ैर संवैधानिक, बालविरोधी और निजीकरण-बाज़ारीकरण के समर्थक विधेयक से एक बार फिर प्राथमिक शिक्षा गर्त में चली जाएगी. उन्होंने आगे बताया कि यह सरकारी स्कूलों की शिक्षा व्यवस्था को ध्वस्त करने और निजी स्कूलों को बढ़ावा देने की साजिश है. विवि के इलेक्ट्रॉनिक मीडिया विभाग के अध्यक्ष डा. श्रीकांत सिंह कहते हैं कि दोहरी शिक्षा प्रणाली के चलते देश में इंडिया और भारत के बीच का विभाजन बहुत सा़फ दिखने लगा है. इसके चलते समाज में अनेक समस्याएं पैदा हो रही हैं. शायद यही कारण है कि देश के अलग-अलग हिस्सों में समान शिक्षा प्रणाली को लेकर आवाज़ें उठने लगी हैं.

कई दूसरे शिक्षाविद् मानते हैं कि प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च एवं तकनीकी शिक्षा के स्तर में गिरावट है. वे शिक्षा अधिकार अधिनियम, 2009 के निहितार्थों को लेकर भी चिंतित हैं. शिक्षा अधिकार अधिनियम, 2009 के अंतर्गत सरकार की ओर से छह साल से 14 साल तक के बच्चों को नि:शुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा देने की बात का हवाला दिया जा रहा है, जबकि तमाम बुद्धिजीवियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं एवं शिक्षाविदों की राय सरकारी उद्घोषणा से बिल्कुल जुदा है. शिक्षा अधिकार मंच के संयुक्त सचिव शाहिद उल हुसैनी स्वयं शिक्षा अधिकार अधिनियम, 2009 को तथाकथित अधिनियम बताते हैं. जानकारों का मानना है कि यह अधिनियम वास्तव में पहली कक्षा से आठवीं कक्षा तक पहले से ही दी जा रही नि:शुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा को बाधित करने की साजिश है, जिससे इन सरकारी विद्यालयों की अवधारणा को समाप्त करके उच्च वर्ग का प्रतिनिधित्व करने वाले विद्यालयों जैसे-केंद्रीय विद्यालय, नवोदय विद्यालय, 11वीं योजना के समय के 6000 मॉडल स्कूलों समेत राज्य एवं केंद्र शासित प्रदेशों के उच्च वर्गीय स्कूलों को  प्रोत्साहित किया जा सके. और शिक्षा में निजीकरण का डंका ऐसे में जोर-शोर से बजने लगेगा, जिससे शिक्षा के व्यापारीकरण को फलने-फूलने का भरपूर अवसर भी मिलेगा.

असल में यह कारपोरेट जगत के हाथों एक बिकाऊ सरकार की शातिर चाल है, जिससे जनता को झुनझुना थमाकर उन्हें शिक्षा जैसे मौलिक अधिकार से दूर किए जाने की बिसात बिछाई जा रही है. इस क़ानून को 1990 के वर्ल्ड बैंक के डिस्ट्रिक्ट प्राइमरी एजुकेशन प्रोग्राम (डीपीईपी) और पिछले दशक से चल रहे सर्वशिक्षा अभियान जैसे बहुस्तरीय शिक्षा कार्यक्रमों को यथावत्‌ बनाए रखने का प्रयास माना जा रहा है. वास्तव में देखा जाए तो इस अधिनियम को सरकार की उन्हीं नीतियों को लागू करने की कवायद के तौर पर देखा जा रहा है, जिसमें प्राइवेट-पब्लिक पार्टनरशिप, स्कूल वाउचर, कारपोरेट घरानों और धार्मिक एवं गैर सरकारी संगठनों द्वारा स्कूलों को गोद लेने जैसी बातें प्रमुख हैं. इस तरह के क़दमों से पिछले दरवाजे से कारपोरेट हाउसों को धन मुहैया कराने की सरकारी प्रतिबद्धता को समझने की ज़रूरत है.

इससे पहले यशपाल कमेटी की रिपोर्ट को भी विरोधाभासों भरी नज़रों से देखा जा रहा था, जिसमें उच्च एवं तकनीकीशिक्षा के निजीकरण एवं व्यापारीकरण की तरफ झुकाव की बात सामने आई थी. लेकिन इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि सरकार एक ओर जहां विदेशी संस्थानों एवं कारपोरेट हाउसों के हाथों में शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण विषय को सौंपने जा रही है, वहीं दूसरी ओर पहले से ही देश में मौजूद 18,000 कॉलेजों एवं क़रीब 400 विश्वविद्यालयों के स्तर में सुधार की कोई ठोस योजना सरकार की पोटली में नहीं है. ऐसे में सरकार की स्थिति एक व्यवसायी से अधिक कुछ नहीं जान पड़ती, जिसे स़िर्फ अपना मुनाफा नज़र आता है. इसके अतिरिक्त उच्च शिक्षा की नियामक संस्थाओं जैसे-यूजीसी, एआईसीटीई, एनसीटीई, एमसीआई इत्यादि के स्थान पर एकमात्र नियामक संस्था राष्ट्रीय उच्च शिक्षा एवं शोध आयोग (एनसीएचईआर) के गठन की सिफारिश की गई है, जो सीधे तौर पर वित्त मंत्रालय के प्रति जवाबदेह होगी. यह क़दम एक तरह से मानव संसाधन विकास मंत्रालय को शक्तिहीन करने जैसा होगा. इसमें कोई दो राय नहीं कि इस तरह की कवायदें विदेशी संस्थानों एवं प्रत्यक्ष विदेशी निवेश समेत शिक्षा के कारपोरेटीकरण का मार्ग तैयार करने की कड़ी का ही हिस्सा हैं.

हालांकि इन सबके बीच अगले साल 2011 से देश भर में विज्ञान और गणित में एक समान पाठ्यक्रम लागू करने पर सहमति बन गई है. यह एक अच्छी बात कही जा सकती है, क्योंकि ऐसा होने पर विभिन्न वर्ग एवं भौगोलिक समुदाय के विद्यार्थियों को समान प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ेगा. इसी तरह, यह भी ध्यान रखना होगा कि समान शिक्षा प्रणाली भी समय की मांग है और सरकार को इस ओर पर्याप्त ध्यान देने की ज़रूरत है, न कि इससे मुंह मोड़ने की.

सभी प्रकार की सार्वजनिक-निजी साझेदारी (पी.पी.पी.) पर पाबंदी लगाई जाए जिसमें आयकर माफ़ी, मुफ़्त या रियायती दरों पर दी गई ज़मीनें एवं अन्य सभी परोक्ष रियायतें, वाउचर स्कूल, सरकारी स्कूलों और उनके परिसरों की बिक्री, लीज़ या किराये पर चढ़ाना, सरकारी स्कूलों और स्कीमों की कारपोरेट घरानों व एन.जी.ओ. को आउटसोर्सिंग, फीस लेने वाले निजी स्कूलों तक मध्याह्न भोजन स्कीम का विस्तार करना आदि भी शामिल है.

सैम पित्रोदा के ज्ञान आयोग एवं उच्च शिक्षा पर यशपाल समिति की रिपोर्टों को खारिज किया जाए, क्योंकि ये दोनों देश के मौजूदा कॉलेजों व विश्वविद्यालयों को बेहतर बनाने का एजेंडा पेश करने की जगह उच्च व तकनीकी शिक्षा को बिकाऊ माल बनाने, सार्वजनिक-निजी साझेदारी (पी.पी.पी.) और विदेशी विश्वविद्यालयों को देश में स्थापित करने वाली नवउदारवादी नीति पर आधारित हैं.

विदेशी शिक्षा प्रदाता विधेयक और निजी विश्वविद्यालय विधेयक को संसद में पेश करने के सभी प्रस्तावों को तुरंत खारिज किया जाए.

सन्‌ 1986 से साल-दर-साल शिक्षा में किए जाने वाले पूंजी निवेश की कमी के चलते निवेश की जो चौड़ी खाई बन गई है, उसको पहले पर्याप्त धनराशि देकर पाटा जाए और उसके बाद शिक्षा व्यवस्था में निरंतर गुणवत्ता बढ़ाने के लिए यथोचित धनराशि मुहैया की जाए. लेकिन इस धनराशि को पी.पी.पी. के  जरिए कारपोरेट घरानों व एनजीओ को पहुंचाकर सरकारी खजाना लुटवाने पर पाबंदी रहे.

विश्व व्यापार संगठन एवं गैट्‌स (जनरल एग्रीमेंट ऑन ट्रेड एंड सर्विसेज़) के पटल पर उच्च एवं प्रोफेशनल शिक्षा की पेशकश को तुरंत वापस लिया जाए अन्यथा वह अपरिवर्तनीय प्रतिबद्धता बन जाएगी और फिर विदेशी संस्थानों को भारतीय संस्थानों के समकक्ष सभी सुविधाएं देना हमारी जबरन बाध्यता हो जाएगी.

(लेखक इंडिया फाउंउेशन फॉर रूरल डेवलपमेंट एंड स्टडीज से संबंद्ध हैं)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Input your search keywords and press Enter.