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एड्स से भी खतरनाक रहस्‍यमय बीमारी

एक ऐसी बीमारी जो एड्‌स से कम खतरनाक नहीं है. क्योंकि इस बीमारी से ग्रस्त व्यक्ति जिंदा रहते हुए भी कुछ करने लायक नहीं बचता है. इसकी गिरफ्त में आए लोग पहले शरीरिक तौर पर और फिर मानसिक तौर पर विकलांग हो जाते हैं. यह बीमारी वहां के डॉक्टरों के लिए भी किसी चुनौती से कम नहीं है. यह मामला है मधुबनी ज़िला के बेनीपट्टी प्रखंड के अंधेरी ग्राम का.

बिहार में एक अजीबोग़रीब बीमारी का मामला सामने आया है. बच्चा स्वस्थ पैदा होता है, लेकिन कुछ महीने बाद उसके हाथ खराब हो जाते हैं और कुछ समय बाद उसे लकवा मार जाता है. फिर उसके पूरे शरीर पर फोड़े होने लगते हैं. बच्चा तो जिंदा रहता है, लेकिन ज़िंदगी ऐसी जो मौत से भी बदतर हो जाती है.

यह व्यथा है मधुबनी ज़िला के अंतर्गत बेनीपट्टी प्रखंड के अंधेरी ग्राम के एक परिवार की. अपने चार बच्चों को अपनी आंखों के सामने एक-एक कर विकलांग होते देख मां किरण देवी ख़ुद को असहाय महसूस करती है. उसका पति मिथिलेश मजदूरी कर किसी तरह दो वक्त की रोटी का इंतजाम कर पाते हैं. इलाज के लिए पैसा जुटाने में वो ख़ुद को असक्षम और नि:सहाय महसूस करते हैं. सबसे बड़ा बेटा चंद्र कुमार झा महज़ ग्यारह वर्ष की उम्र से ही आंशिक रूप से विकलांग होने लगा. अब चंद्र इक्कीस वर्ष का हो गया है, लेकिन शारीरिक रूप से पूरी तरह विकलांग हो चुका है. शारीरिक और मानसिक रूप से विकलांग चंद्र आज स़िर्फ पानी पीकर जी रहा है. शरीर पर बड़े-बड़े घाव निकल आए हैं. छोटी बहन अर्चना 19 एवं आशा 17 वर्ष की है. ये दोनों बहनें तो किसी तरह भोजन तो कर पाती हैं, लेकिन विकलांगता उन पर इस कदर हावी है कि ये दोनों चलने में भी असमर्थ हो चुकी हैं. सबसे छोटी बेटी इंद्रा कुमारी 13 साल की है. वह भी अब चलने-फिरने में भी परेशानी महसूस कर रही हैं. अब सवाल उठता है कि आ़िखर वह कौन सी बीमारी है, जो बढ़ती उम्र के साथ इस परिवार की खुशियों को निगलती जा रही है. इस सवाल का जवाब आम लोगों के लिए रहस्य और चिकित्सकों के लिए चुनौती बन गई है.

स्थानीय प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र से लेकर दरभंगा चिकित्सा अस्पताल तक का दरवाज़ा खटखटा चुकी किरण देवी डाक्टरों की दलील से ना़खुश हैं. उन्हें अब तक यह समझ में नहीं आया कि क्यों ग्यारह वर्ष की एक निश्चित उम्र पूरा करते ही उनके स्वस्थ्य बच्चे विकलांग होने लगते है. पिता मिथिलेश झा अपनी ग़रीबी के सामने विवश हैं. उन्हें सरकारी सहायता मिलने की आशा है, लेकिन अब तक उसे सहायता नहीं मिली है. बीपीएल परिवारों की सूची में दर्ज़ इस परिवार को किसी भी तरह की सरकारी सहायता न मिलने का भी मलाल है. ऐसे में सवाल यह भी उठता है कि इस बीमारी से निपटने के लिए अब तक विशेष कार्य की योजना तैयार क्यों नहीं की गई? आखिर क्यों चिकित्सा पदाधिकारी अपना पल्ला झाड़ते नज़र आते हैं? इस संबंध में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, बेनीपट्टी के चिकित्सा पदाधिकारी डॉ. आर के सिंह दावा करते हैं कि इस बीमारी का नाम ऑस्टियोपोरोसिस है,  जो कि संतुलित आहार की कमी तथा वंशानुगत प्रभाव के कारण होता है. वहीं मधुबनी ज़िला के सिविल सर्जन डा. एम. शब्बीर अहमद का कहना है कि यह बीमारी लाइलाज नहीं है. इस तरह की बीमारी विटामिन डी और कैल्शियम की कमी से होती है. पीड़ित परिवार को सही चिकित्सा सुविधा उपलब्ध नहीं होने के कारण ऐसी स्थिति उत्पन्न हुई है. इस संबंध में प्रमंडलीय स्वास्थ्य सेवा के दरभंगा क्षेत्र के उप निदेशक डॉ. रामेश्वर साफी ने हर संभव चिकित्सा मुहैया कराए जाने की बात कही है. उन्होंने विशेष टीम गठित करने का निर्देश जारी करते हुए भौगोलिक परिवेश की जांच का भी आदेश दिया है.

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