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मोंगरा बांध का पानी किसके लिए?

छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव ज़िले का अंबागढ़ चौकी ब्लॉक. पारा 46 डिग्री को छू रहा था. चिलचिलाती धूप में छह लोगों की टोली पांगरी नामक छोटे से सुदूर आदिवासी गांव से मोंगरा बांध से जुड़े सवाल लेकर सात दिन के पैदल स़फर पर रवाना हुई. प्रचार के लिए किसी ढोल-नगाड़े के बग़ैर और बेहद अनौपचारिक अंदाज़ में. यह सफ़र मोंगरा गांव पहुंच कर ख़त्म हुआ. लगभग हर गांव से औसतन पांच लोग अगले गांव तक हमस़फर बने. टोली ने कुल 13 गांवों में दस्तक दी और इस दौरान वह एक से बढ़कर एक त्रासद विसंगतियों और भीषण समस्याओं से दो-चार हुई. इस बीच यह ख़बर भी सुनने को मिली कि सरकार शिवनाथ नदी के इस बांध की लंबाई में 17 किलोमीटर और ऊंचाई में पांच फुट का इज़ाफा किए जाने के मूड में है. याद रहे कि शिवनाथ देश की पहली नदी है, जिसे ख़रीदा-बेचा जा चुका है. बीते अप्रैल माह के दूसरे पखवाड़े में किया गया यह पैदल सफ़र जुरमिल मोर्चा एवं छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा मज़दूर कार्यकर्ता समिति का साझा क़दम था और जिसका आयोजन भूख और विस्थापन विरोधी आंदोलन के नाम से किया गया. झंडे, बैनर और इलाक़े में उलझे संगठन इससे सीख ले सकते हैं.

मोंगरा बांध बने पांच साल हो रहे हैं, लेकिन मुआवज़े का मसला अभी तक नहीं सुलट सका है. केवल मोंगरा गांव के सौ से अधिक परिवारों की ज़मीन बांध में डूबी. इनमें 32 परिवार मुआवज़े के लिए न जाने कब से यहां-वहां चक्कर काट रहे हैं. यह क़िस्सा हरेक गांव का है. वैसे, जिन्हें मुआवज़ा मिला भी तो उनमें से ज़्यादातर को आधा-अधूरा ही और वह भी बाज़ार दर से कम पर. मुआवज़ा देने-दिलाने का बाज़ार भी ख़ूब गर्म हुआ. जैसे-तैसे हाथ आई मुआवज़े की राशि कहां फुर्र हो गई, इसका पता ही नहीं चला.

शेर अर्ज़ है, कल इक महल देखा तो देर तक सोचा/ इक मकां बनाने में कितने घर लुटे होंगे. विकास की चकाचौंध इसी महल का नाम है. इस महल की बुलंदी इसलिए है कि उसके चारों ओर अंधियारे का राज है. यह अंधियारा ग़रीबी और अभाव का है, बेकारी और लाचारी का है, अन्याय और अत्याचार का है, शिक़ायत और सुनवाई के लगातार बंद होते दरवाज़ों का है. अंधियारा छंटने का नाम नहीं ले रहा, हर कहीं पसरता-गहराता जा रहा है और सरकारें हैं कि महलों की चाकरी और चौकीदारी में मगन हैं. उन्हें उस विकास की चिंता है, जो खाए-पिए-अघाए लोगों के हित में है और जिसका रास्ता ज़्यादातर लोगों और कुदरत की ऐसी-तैसी से होकर गुज़रता है. इसके तमाम उदाहरण बिखरे पड़े हैं. मोंगरा बांध भी उन्हीं में एक है. इससे प्रभावित गांवों की पदयात्रा ने पांच सवाल सामने रखे-सरकार की पुनर्वास नीति क्या है और कहां है, सही मुआवज़ा कैसे और कब तय होगा, बांध का पानी किसके लिए है, सिंचाई के लिए क्यों नहीं है और विकास का मतलब आख़िर क्या होता है. पदयात्रा का कुल संदेश यही था कि अगर बांध की संभावना है तो उसे रोकने का उपाय किया जाना चाहिए. मोंगरा बांध 14 गांवों की खेतिहर ज़मीन का बड़ा हिस्सा गटक चुका है. इनसे जुड़े कई टोले तो तीन तरफ़ से पानी से घिर गए हैं और वहां शौच तक के लिए जगह की किल्लत हो गई है. बांध में डूबने के लिए पोसार गांव खाली हो चुका है. इस सूची में कुल 56 गांव शामिल किए जाने हैं.

मोंगरा बांध बने पांच साल हो रहे हैं, लेकिन मुआवज़े का मसला अभी तक नहीं सुलट सका है. केवल मोंगरा गांव के सौ से अधिक परिवारों की ज़मीन बांध में डूबी. इनमें 32 परिवार मुआवज़े के लिए न जाने कब से यहां-वहां चक्कर काट रहे हैं. यह क़िस्सा हरेक गांव का है. वैसे, जिन्हें मुआवज़ा मिला भी तो उनमें से ज़्यादातर को आधा-अधूरा ही और वह भी बाज़ार दर से कम पर. मुआवज़ा देने-दिलाने का बाज़ार भी ख़ूब गर्म हुआ. जैसे-तैसे हाथ आई मुआवज़े की राशि कहां फुर्र हो गई, इसका पता ही नहीं चला. मुआवज़ा तय करने का मानक नदारद था. मुआवज़ा कितना मिलेगा, यह सर्वेक्षण करने वालों और संबंधित अधिकारियों की मर्ज़ी पर निर्भर था. ज़ाहिर है कि उनकी कृपा रसूखदारों पर ही बरसी. उन परिवारों की सूची बहुत लंबी है, जिनकी धनहा ज़मीन सरकारी दस्तावेज़ों में भर्री और असिंचित ज़मीन दर्ज कर दी गई. धनहा माने धान की फ़सल के लिए बेहतर और भर्री माने बमुश्किल कोदों-कुटकी उगाने लायक़.

छह साल पहले तहसील कार्यालय के बाहर लगभग एक माह का धरना हुआ था. यह मोंगरा बांध विरोधी आंदोलन का आख़िरी पड़ाव था. इसमें खड़खड़ी गांव की रेंगीला बाई भी शामिल हुई थीं. वह कहती हैं कि उस धरने से बड़ा दबाव बना और मुआवज़ा दोगुने से भी अधिक बढ़ गया. वरना तो सरकार प्रति एकड़ 16 हज़ार रुपये ही देने जा रही थी. बिना लड़े कहीं कुछ हासिल होता है क्या? हालांकि यह समझ इधर फीकी पड़ी है और यह अकारण नहीं है. बांध के सवाल पर वोट के सौदागरों ने राजनीति की दुकान चमकाई और जुझारू ताक़तों ने बीच भंवर में संघर्ष से अपने हाथ खींच लिए. रही-सही कसर बिचौलियों ने पूरी कर दी. जानकार बताते हैं कि मोंगरा बांध बनाने का ख्याल आज़ादी से पहले आया था, लेकिन उसे ज़मीन पर उतारने का साहस नहीं किया जा सका. आज़ादी के बाद 1967 में इसका प्रस्ताव पेश हुआ, तो भी हालात कुछ ऐसे रहे कि दो दशक तक यह ठंडे बस्ते में पड़ा रहा. 1989 में इसने तेज़ी पकड़ी, जब बांध के लिए गांव चिन्हित किए जाने लगे. इसने इलाक़े की राजनीति में उबाल पैदा कर दिया और जिसने अगले एक दशक तक बांध की योजना को स्थगित रखा. आख़िरकार छत्तीसगढ़ नया राज्य बना, कांग्रेस ने उसकी बागडोर संभाली और अजीत जोगी उसके पहले मुख्यमंत्री बने. तब तक राजनीतिक समीकरण बदल चुके थे. मतलब यह कि मोंगरा बांध का प्रस्ताव स्वीकृत होने में कोई परेशानी नहीं हुई, तो भी जोगी सरकार इससे आगे नहीं जा सकी. आगे जाने का काम पूर्ण बहुमत से बनी डॉ. रमन सिंह की दूसरी सरकार ने किया. योजना कांग्रेसी सरकार ने बनाई और उसे भाजपा सरकार ने साकार कर दिया. इसे रिले रेस का भी नाम दिया जा सकता है. दोबारा सत्ता में लौटी रमन सरकार द्वारा मोंगरा बांध के बारे में प्रचार किया गया था कि उसका पानी सिंचाई के काम आएगा और इलाक़े में ख़ुशहाली की फ़सल झूमेगी. इस प्रचार की पोल खोलती कुछ लोगों की सक्रियता रंग लाई और बांध के ख़िला़फ लोग एकजुट होने लगे. सरकार को इसका अंदाज़ा था और उससे निपटने की तैयारी भी. प्रतिरोध के स्वर उबाल खाते कि लोगों को पटाने-बांटने के हथकंडे उसे ठंडा कर देने में कामयाब हो गए. मैदान में उतरे संगठनों की आपसी खींचतान ने भी इसमें मदद पहुंचाई. इस तरह बांध विरोधी पक्ष कमज़ोर होकर टूट गया और बांध का निर्माण शुरू हो गया. इससे प्रभावित होने जा रहे लोग ही बांध बनाने में ठेके के मज़दूर हो गए. पुरुष 50 रुपये और महिलाएं 40 रुपये प्रतिदिन की मज़दूरी पर.

मज़दूरी में यह लिंग भेद भी बहस का मुद्दा नहीं बन सका. प्रसंगवश, बताते चलें कि बांध विरोधी लहर में महिलाओं की हिस्सेदारी आधे से अधिक थी, लेकिन अगुवाई में लगभग शून्य. यह दस्तूर है कि महिलाएं घरेलू ज़िम्मेदारी उठाती हैं और खेती में भी हाथ बंटाती हैं. पदयात्रा के दौरान ऐसी कई महिला किसानों से भेंट हुई, जिन्हें नहीं पता कि उनके परिवार की कितनी ज़मीन डूबने में गई, उसका कितना मुआवज़ा मिला, कहां ख़र्च हुआ या कितनी ज़मीन अभी पास में है. पदयात्रा के दौरान ग्राम सुराज अभियान भी जारी था. यह रमन सिंह सरकार का तीन साल से चल रहा सालाना कार्यक्रम है, जिसके तहत सरकारी अमला गांव-गांव जाता है. मुख्यमंत्री से लेकर सत्तापक्ष के विधायक-सांसद भी इसमें जुट जाते हैं. कहने को तो यह सरकार से ग़रीब-गुरबों की दूरी घटाने का अभियान है, लेकिन दरअसल यह नेकनीयती का लबादा ओढ़ कर दुखियारों को भरमाने का नाटक है. तयशुदा तारीख़ पर संबंधित अधिकारी-कर्मचारी गांव पहुंचते हैं. उन्हें गांव में ही रात बिताने का आदेश है, लेकिन ऐसे असुविधाजनक आदेशों की कौन परवाह करता है. उनकी भूमिका प्रचारक, उपदेशक और डाकिए की होती है. वे सुनते कम, सुनाते ज़्यादा हैं. सरकारी कार्यक्रमों की जानकारियां बांटते हैं. सफ़ाई बरतने, पीने के लिए सा़फ पानी का इस्तेमाल करने और खेती के उन्नत तरीके आज़माने जैसी सीख देते हैं. निजी या सामूहिक हित के आवेदन स्वीकार करते हैं. आमतौर पर इन आवेदनों का तत्काल निपटारा नहीं हो पाता और उन्हें उचित कार्रवाई के लिए आगे बढ़ा दिया जाता है. आवेदन साल भर धूल खाते हैं और ज़्यादातर यही होता है कि अगले साल आकर ग्राम सुराज अभियान उन आवेदनों का नवीनीकरण कर देता है. बताते चलें कि राज्य के अख़बारों ने इस अभियान के लिए जगह की कमी नहीं होने दी. थोड़ी-बहुत चुटकी ली और कुल मिलाकर शाबाशी दे दी. अभियान के तहत मुख्यमंत्री ने भारी सुरक्षा के बीच दंतेवाड़ा के उस डोरनापाल में अपनी चौपाल लगाई, जहां सुरक्षाबलों की छतरी के नीचे सलवाजुड़ूम का दबदबा है और जिसके आगे माओवादियों के सीधे नियंत्रण का इलाक़ा शुरू होता है.

अख़बारों ने इसे प्रमुखता से जगह दी. उन्होंने यह छानबीन करने की ज़हमत नहीं उठाई कि मुख्यमंत्री को सौंपे गए आवेदनों में विस्थापन से जुड़ा एक भी मामला क्यों नहीं जुड़ सका या क्या आवेदन के लिए लक्ष्मण रेखाएं पहले से खींच दी गई थीं. वैसे, अगर नया रायपुर की योजना का फुल पेज विज्ञापन हासिल करना है तो उसका दाम चुकाता विस्थापन का दर्द भला कैसे बयां हो सकता है. पदयात्रा की अगुवा भान साहू ग़रीब विधवा हैं. कुल आठवीं तक पढ़ी हैं, लेकिन समाज और ज़िंदगी के अनुभवों से गढ़ी हैं. धाराप्रवाह बोलती और बेबाक राय रखती हैं. पदयात्रा के दौरान उन्होंने अख़बारों की भी ख़ूब ख़बर ली. इसी कड़ी में उन्होंने वैकल्पिक मीडिया के बतौर सीजी नेट स्वर से ग़रीबों का परिचय कराया. यह संदेशों के आदान-प्रदान का फोन आधारित नेटवर्क है, जो गोंडी, कुड़ुक, सादरी एवं छत्तीसगढ़ी जैसी पीछे छूट रही भाषाएं बोलने-समझने वालों के बीच तेज़ी से लोकप्रिय हो रहा है. वंचितों-उपेक्षितों के इस अनूठे मंच में भागीदारी की सुविधा को नि:शुल्क किए जाने की कोशिशें जारी हैं.

मोंगरा बांध का बोर्ड बताता है कि इसका पानी सिंचाई के लिए है, लेकिन बांध से सटी प्यास से बेहाल धरती इस खुले झूठ की गवाही देती है. नाकाफी ही सही, लेकिन पिछले साल ज़रूर आसपास के कुछेक गांवों को बांध का पानी नसीब हुआ था. इस साल जनवरी में मोंगरा से चिरचारीकला तक यानी बांध के क़रीब बसे 25 गांवों में मुनादी हुई कि किसान रबी की बुआई की तैयारी करें, सिंचाई के लिए उन्हें बांध का पानी मिलेगा. बावजूद इसके बांध का पानी खेतों तक नहीं पहुंच सका और किसानों की उम्मीदों पर पानी फिर गया. प्रदेश के तमाम इलाक़ों की तरह अंबागढ़ चौकी ब्लॉक भी पिछले दो सालों से अकाल की मार झेल रहा है. अधिसंख्य आबादी के सामने पहले से खड़ा ज़िंदा रहने का संकट और घना हो गया है. कई घरों के दरवाज़ों पर महीनों से जड़े ताले काम की तलाश में हुए पलायन की तेज़ रफ़्तार की निशानदेही करते हैं. बेशक, छत्तीसगढ़ के लिए पलायन कोई नई बात नहीं. खेती के कामकाज से छुट्टी पाने के बाद ख़ासकर नौजवानों का एक हिस्सा शहरों का रुख़ करता रहा है. इस ग़रीब इलाक़े में पलायन अतिरिक्त कमाई करने और लगे हाथ शहर की रंगीनियों का लुत्फ़ उठाने का भी ज़रिया रहा है, लेकिन आज यह ज़िंदा रहने की मजबूरी में तब्दील हो गया है. मोंगरा बांध से प्रभावित केवल खड़खड़ी गांव से ही इसका बख़ूबी अंदाज़ा लगाया जा सकता है. यहां कोई पौने तीन सौ घर हैं और पिछले साल इसके सवा सौ से अधिक बाशिंदों ने पलायन का रास्ता पकड़ा.

दूसरी तरफ़ सरकारी फ़ाइलों में गांव का मौसम गुलाबी है. ग़रीबों की संख्या लगातार घटती जा रही है. 2015 तक पूरी दुनिया में आधी ग़रीबी घटा देने का लक्ष्य है और इसे हासिल करने के लिए अमीर देशों की ओर से ग़रीब देशों में अनुदानों की बरसात है. तो भी, ग़रीब का आटा और गीला होता जा रहा है. इसलिए कि इस मेहरबानी का शुक्रिया अदा करती सरकारी नीतियां, कार्यक्रम एवं उसकी प्रक्रियाएं ग़रीबी के समंदर को और अधिक चौड़ा व गहरा कर देने की भूमिका अदा कर रही हैं. लेकिन आंकड़ों में ख़ुशहाली की तस्वीर ज़रूर खींची जा सकती है. इस सिलसिले में खड़खड़ी गांव की रमित बाई का ज़िक्र काफी होगा. वह कोई 40 साल की हैं. 12 साल पहले पति की मौत के साथ ही घर संभालने की ज़िम्मेदारी उनके कंधों पर आ गिरी. दो कोठरियों का उनका छोटा सा घर है. एक में खाना पकता है और दूसरी में बेटा-बहू अपनी बच्ची समेत रहते हैं. रात काटने के लिए उन्हें अपनी बेटी के साथ दूसरे घरों की शरण लेनी होती है. जवान बेटी के हाथ पीले करने की चिंता सताती रहती है, लेकिन क्या करें? उनके हाथ तो खाली हैं. बंटवारे में मिली कुल एक एकड़ ज़मीन भूख के सवाल को हल नहीं कर पाती. बाज़ार से चावल ख़रीदना होता है-सबसे सस्ता खंडवा चावल, कम से कम 16 रुपये किलो में. इसलिए कि भले ही उनके परिवार के नाम जॉबकार्ड है, लेकिन राशन का पीला कार्ड नहीं. राहत की बात बस इतनी है कि दो साल पहले उन्हें आंगनवाड़ी सहायिका का काम मिल गया और इस तरह एक हज़ार रुपये मासिक आय का बंदोबस्त भी हो गया. यह राहत गांव के अस्नूराम दुधनांगे की दौड़भाग से संभव हुई, जो कभी मोंगरा बांध के ख़िला़फ लोगों को जुटाने वालों में शामिल थे. यह साथ और संयोग आख़िर कितनों को नसीब हो पाता है?

मोंगरा बांध के दाऊरंजन सिंह कुंजाम 70 साल के बुज़ुर्ग हैं, लेकिन फुर्ती और आशावादिता के मामले में उतने ही युवा हैं. गरज कर बोले, बहुत अंधेर हो रही है. बांध पानी से लबालब है और खेत सूखे पड़े हैं. बांध का पानी भिलाई इस्पात उद्योग को बेचा जा रहा है, राजनांदगांव के नगर निगम से उसका सौदा किया जा रहा है. इसे रोकना होगा, वरना यह इलाक़ा और अधिक ग़रीबी के दलदल में धंस जाएगा. अंधी-बहरी सरकार को आख़िर कब समझ आएगी और कैसे? सरकार तभी चेतेगी, जब लोग अपने हित-अधिकारों की सुध लेंगे और उठ खड़े होंगे. मोंगरा बांध की लंबाई और ऊंचाई बढ़ाए जाने की ताज़ा ख़बर ने थके-हारे लोगों में एक बार फिर गर्मी भरने की शुरुआत कर दी है. ताक़त के नशे में सरकारें अक्सर मनमानी पर उतारू रहती हैं और भूल जाती हैं कि संकट का सैलाब सिर पर चढ़ने लगे तो सब्र का बांध टूट जाता है.

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