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शीला दीक्षित, श्‍लाका और छीछालेदार

हिंदी के वरिष्ठ और बेहद प्रतिष्ठित लेखक कृष्ण बलदेव वैद के अपमान का संगीन इल्ज़ाम झेल रही दिल्ली की हिंदी अकादमी ने आख़िरकार अपना पुरस्कार वितरण समारोह आयोजित कर ही लिया, लेकिन इस बार के समारोह में भव्यता और लोगों की सहभागिता नदारद थी. राजधानी के किसी बड़े ऑडिटोरियम में आयोजित होने वाला अकादमी का यह सालाना समारोह इस बार दिल्ली सचिवालय के एक कमरे में आयोजित हुआ. सब कुछ बेहद सरकारी और गुपचुप तरीक़े से किया गया. हिंदी अकादमी की यह परंपरा रही है कि वह किसी भी कार्यक्रम के लिए दिल्ली के लेखकों-पत्रकारों को आमंत्रित करती है. अकादमी की अपनी एक मेलिंग लिस्ट है, जिन्हें हर कार्यक्रम में आमंत्रित किया जाता है, लेकिन इस बार ऐसा कुछ नहीं हुआ. यहां तक कि अकादमी की गवर्निंग बॉडी के सदस्यों तक को स़िर्फ कार्ड भेजकर रस्म अदायगी कर ली गई. नतीजा यह हुआ कि जन कार्यक्रम होने के बजाय यह आयोजन सरकारी कार्यक्रम में तब्दील होकर रह गया. वरिष्ठ साहित्यकार एवं हंस के संपादक ने बेहद सटीक टिप्पणी की और कहा कि अगर अकादमी को पुरस्कार वितरण की रस्म अदायगी ही करनी थी तो वह लेखकों को कुरियर से चेक और स्मृति चिन्ह भेज देती. समारोह में मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने हिंदी अकादमी की स्वायत्तता को लेकर बड़ा लंबा-चौड़ा भाषण दिया, लेकिन अकादमी की स्वायत्तता का जिस तरह से गला घोंटा गया, उसके लिए शीला दीक्षित ही ज़िम्मेदार हैं. दरअसल हिंदी अकादमी अब पूरी तरह से सरकार का भोंपू बनकर रह गई है. हिंदी के प्रचार-प्रसार की आड़ में सरकार के मंत्रियों एवं विधायकों को ख़ुश करने और जनता के बीच उनकी छवि बनाने का काम होता है. इसके अलावा बड़े और रसूखदार लोगों की साहित्यिक लिप्सा को भी दिल्ली की हिंदी अकादमी संतुष्ट करती है. इसका एक उदाहरण आपको देते चलें. इसी पुरस्कार वितरण समारोह में हिंदी अकादमी की पत्रिका इंद्रप्रस्थ भारती के एक अंक का लोकार्पण भी किया गया. इस अंक में एक बड़े बिल्डर को ख़ुश करने के लिए उनकी कविता अंत समय में हिंदी के एक वरिष्ठ कवि की कविता को हटाकर प्रमुखता से छाप दी गई. इस खेल का अंदाज़ तो पाठक स्वयं लगा सकते हैं कि बिल्डर की कविता को अंत समय में क्यों शामिल किया गया. अगर कविता उतनी ही अच्छी थी तो क्या अगले अंक का इंतज़ार नहीं किया जा सकता था. अकादमी में जिस तरह के खेल चल रहे हैं, उन्हें देखते हुए यह कहने में मुझे तनिक भी संकोच नहीं कि ये सरकार की छवि को बिगाड़ने का काम ज़्यादा कर रहे हैं, बनाने का कम.

हिंदी के लेखक सरकारी लाभ का चाहे जितना विरोध करें, लेकिन वे इसका लोभ संवरण नहीं कर पाते हैं. छोटे-मोटे फायदे के लिए बड़े सिद्धांतों को तिलांजलि देने में इन्हें व़क्त नहीं लगता. वैद जी का अपमान पूरे साहित्य जगत का अपमान है और हिंदी समाज को पूरी ताक़त के साथ इसका विरोध करना चाहिए था. अफसोस की बात है कि हिंदी के लेखक पुरजोर तरीक़े से शीला दीक्षित सरकार का विरोध नहीं कर सके और सरकार ने अपनी मनमानी कर ली.

दरअसल इस पूरे विवाद को समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे जाना होगा. वर्ष 2008-09 के लिए अकादमी की कार्यकारिणी ने हिंदी के वरिष्ठ एवं प्रतिष्ठित लेखक कृष्ण बलदेव वैद को श्लाका सम्मान देने की संस्तुति की थी. उसके बाद अकादमी की अध्यक्ष की हैसियत से दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने तत्कालीन कार्यकारिणी के फैसले पर मुहर लगा दी थी, लेकिन बाद के दिनों में हिंदी अकादमी में प्रशासनिक अराजकता की वजह से उस वर्ष के सम्मान नहीं दिए जा सके. अब जब अकादमी ने वर्ष 2009-10 के पुरस्कारों के साथ 2008-09 के पुरस्कारों का ऐलान किया तो 2008-09 के श्लाका सम्मान के लिए किसी का नाम घोषित नहीं किया गया. सूची से कृष्ण बलदेव वैद का नाम ग़ायब था. बताया जा रहा है कि एक अनाम से कांग्रेसी नेता ने अकादमी की अध्यक्ष एवं दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को पत्र लिखकर कृष्ण बलदेव वैद को श्लाका सम्मान न देने का अनुरोध किया था. कांग्रेसी नेता का आरोप है कि वैद के उपन्यास नसरीन में कई जगह अश्लील शब्दों और स्थितियों का चित्रण किया गया है. कांग्रेसी नेता की आपत्ति को तरजीह देते हुए शीला दीक्षित की अध्यक्षता वाली कमेटी ने वैद जी का नाम रोक दिया.

कृष्ण बलदेव वैद को श्लाका सम्मान न दिए जाने पर हिंदी साहित्य में विरोध के स्वर उठने लगे थे. हिंदी के आलोचक पुरुषोत्तम अग्रवाल की चिट्ठी के बाद 2009-10 के श्लाका कवि केदारनाथ सिंह ने भी पुरस्कार लेने से इंकार कर दिया. केदार जी के इस क़दम के बाद तो जैसे पुरस्कार ठुकराने वालों की लाइन लग गई. कवि-पत्रकार विमल कुमार, कवि पंकज सिंह, कवयित्री एवं स्वर्गीय निर्मल वर्मा की पत्नी गगन गिल एवं रेखा जैन ने भी हिंदी अकादमी द्वारा घोषित पुरस्कार लेने से मना कर दिया है. हैरानी की बात यह है कि पहले सार्वजनिक तौर पर विरोध जताने के बाद भी गगन न केवल समारोह में पहुंचीं, बल्कि उन्होंने मंच पर शीला दीक्षित के हाथों पुरस्कार भी ग्रहण किया. तमाम हिंदी दैनिकों ने गगन गिल की तस्वीर को प्रमुखता से छापा. गगन गिल का वहां पहुंचना हैरानी की बात थी, क्योंकि उन्हें अशोक वाजपेयी खेमे का माना जाता है और वैद जी भी उसी के स्कूल ऑफ राइटर्स हैं. गगन के अलावा असगर वजाहत भी पुरस्कार लेने पहुंचे. असगर वजाहत ने शुरू से ही अपना स्टैंड साफ रखा था, इस वजह से उनकी मौजूदगी को लेकर किसी को हैरानी नहीं हुई.

इस पुरस्कार वितरण समारोह के आयोजन से कुछ बेहद अहम और बड़े सवाल हिंदी साहित्य और साहित्यकारों के सामने खड़े हो गए हैं. हिंदी लेखकों का ढुलमुल चरित्र एक बार फिर से उजागर हुआ है. अकादमी के कर्ताधर्ताओं को यह मालूम है कि हिंदी के लेखकों का विरोध फौरी होता है और वे ज़्यादा समय तक अपने स्टैंड पर कायम नहीं रह सकते हैं. इस बात को ज़्यादा दिन नहीं बीते हैं, जब अशोक चक्रधर को हिंदी अकादमी का उपाध्यक्ष बनाने पर कई वरिष्ठ लेखकों ने घोर आपत्ति जताई थी, अशोक चक्रधर को मसखरा और मंचीय कवि कहकर खिल्ली उड़ाई थी, लेकिन चंद दिनों बाद वही साहित्यकार अशोक चक्रधर के सानिध्य में मंचासीन नज़र आने लगे थे. चाहे वह राजेंद्र यादव हों या फिर नामवर सिंह या फिर कोई और वरिष्ठ लेखक. वजह यह भी थी कि अशोक चक्रधर सत्ता प्रतिष्ठान के  क़रीब हैं, हिंदी अकादमी के उपाध्यक्ष के अलावा वह केंद्रीय हिंदी संस्थान के भी कर्ताधर्ता हैं. हिंदी के लेखक सरकारी लाभ का चाहे जितना विरोध करें, लेकिन वे इसका लोभ संवरण नहीं कर पाते हैं. छोटे-मोटे फायदे के लिए बड़े सिद्धांतों को तिलांजलि देने में इन्हें व़क्त नहीं लगता. वैद जी का अपमान पूरे साहित्य जगत का अपमान है और हिंदी समाज को पूरी ताक़त के साथ इसका विरोध करना चाहिए था. अफसोस की बात है कि हिंदी के लेखक पुरजोर तरीक़े से शीला दीक्षित सरकार का विरोध नहीं कर सके और सरकार ने अपनी मनमानी कर ली, लेकिन इससे दिल्ली सरकार की जमकर किरकिरी हुई. आज नहीं तो कल, शीला दीक्षित को इस बात का एहसास होगा, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होगी.

(लेखक आईबीएन-7 से जुड़े हैं)

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