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व्यवसायिक कदाचार निरोधी क़ानून की ज़रूरत

कुछ दिनों पहले की बात है, जब एक न्यूज़ चैनल पर एक रोचक, लेकिन हैरान करने वाली ख़बर देखने को मिली. लखनऊ में रहने वाली अलंकृत बारहवीं कक्षा की परीक्षा में शरीक हुई थी. बचपन से ही पढ़ाई में आगे रहने वाली अलंकृत दसवीं की बोर्ड परीक्षा में अपने स्कूल की टॉपर रही थी और एक बार फिर ऐसे ही रिज़ल्ट की उम्मीद कर रही थी, लेकिन परीक्षाफल आने के बाद उसकी निराशा का कोई ठिकाना नहीं रहा, क्योंकि उसके नाम के आगे अनुत्तीर्ण लिखा था. फिर भी अब तक इस ख़बर में ऐसा कुछ नहीं था, जो हैरान करने वाला हो, क्योंकि रिज़ल्ट का अच्छा या बुरा होना कई चीज़ों पर निर्भर करता है और इसमें छात्र के पिछले इतिहास से कोई ख़ास फर्क़ नहीं पड़ता. लेकिन न्यूज़ चैनल ने इसके आगे जो दिखाया, वह वास्तव में चौंकाने वाला था. अलंकृत ने हर विषय में नब्बे प्रतिशत से ज़्यादा अंक हासिल किए थे, सिवाय भौतिकशास्त्र के. भौतिकशास्त्र में ही उसे असफल घोषित किया गया था. सोचने वाली बात तो यह है कि अन्य सभी विषयों में इतने अच्छे अंक प्राप्त करने वाली छात्रा को किसी एक विषय में सौ में केवल तैंतीस अंक कैसे मिल सकते हैं. यह बात इतनी आसानी से हज़म नहीं होती. पहली नज़र में ही ऐसा लगता है कि कुछ न कुछ गड़बड़ तो ज़रूर है.

चैनल की रिपोर्ट के मुताबिक़, अपनी बेटी के करियर को लेकर चिंतित माता-पिता जब दफ्तरों के चक्कर काट रहे थे तो हर जगह उन्हें रटारटाया जवाब ही सुनने को मिल रहा था. आप अगले सप्ताह आएं, पंद्रह दिनों के बाद पता करें, फिर कभी आएं, कल फिर से आएं. ऐसे जवाब सुनते-सुनते एक लंबा समय गुज़र गया और अलंकृत को एक पूरे शैक्षिक सत्र का नुक़सान झेलने को मजबूर होना पड़ा, लेकिन इसकी फिक्र किसे है.

देश भर में बारहवीं की परीक्षाएं आयोजित करने वाली सीबीएसई (सेंट्रल बोर्ड ऑफ सेकेंडरी एजुकेशन) में छात्रों के लिए स्क्रूटनी का प्रावधान है, जिसके अंतर्गत छात्र अपने अंकों की रिकाउंटिंग अर्थात दोबारा गणना के लिए आवेदन कर सकते हैं. अलंकृत के माता-पिता ने इसी का सहारा लिया. रिकाउंटिंग में उत्तर पुस्तिका की दोबारा जांच नहीं होती, बल्कि प्राप्त अंकों को केवल दोबारा जोड़ा जाता है. आश्चर्यजनक तथ्य तो यह है कि रिकाउंटिंग के बाद अलंकृत को उत्तीर्ण घोषित कर दिया गया, लेकिन संशोधित रिज़ल्ट हाथ में आने तक इतनी देर हो चुकी थी कि सभी शिक्षण संस्थानों में नामांकन की प्रक्रिया ख़त्म हो चुकी थी और अलंकृत को कहीं दाख़िला नहीं मिल पाया. बिना किसी ग़लती के ही उसका एक साल ख़राब हो गया. ख़बर के अंत में न्यूज़ चैनल के रिपोर्टर ने एक बड़ा ही तार्किक सवाल उठाया कि अलंकृत की इस हालत के लिए कौन ज़िम्मेदार है? लेकिन इसका जवाब देने वाला कोई नहीं था. रिपोर्टर के मुताबिक़, सीबीएसई के शीर्ष अधिकारी इसका जवाब देने से कन्नी काटते रहे और कहानी यहीं ख़त्म हो गई.

लेकिन क्या वास्तव में कहानी यहीं ख़त्म हो जाती है? नहीं, क्योंकि इस वाकये से हमारे देश में मौजूद व्यवस्था पर कई मौजूं सवाल खड़े होते हैं. पहला सवाल तो अधिकारियों के रूखे व्यवहार और निष्ठुर रवैये को लेकर ही पैदा होता है. चैनल की रिपोर्ट के मुताबिक़, अपनी बेटी के करियर को लेकर चिंतित माता-पिता जब दफ्तरों के चक्कर काट रहे थे तो हर जगह उन्हें रटारटाया जवाब ही सुनने को मिल रहा था. आप अगले सप्ताह आएं, पंद्रह दिनों के बाद पता करें, फिर कभी आएं, कल फिर से आएं. ऐसे जवाब सुनते-सुनते एक लंबा समय गुज़र गया और अलंकृत को एक पूरे शैक्षिक सत्र का नुक़सान झेलने को मजबूर होना पड़ा, लेकिन इसकी फिक्र किसे है.

दूसरा सवाल अधिकारियों का अपनी ज़िम्मेदारियों के प्रति लापरवाह रवैये का है. कोई लोक सेवक अपने दायित्वों को लेकर भला इतना लापरवाह कैसे हो सकता है. यदि हम इस ग़ैर ज़िम्मेदार व्यवहार की अनदेखी भी करें तो हमारी व्यवस्था में इसके प्रतिकार के लिए क्या उपाय है. सच्चाई तो यह है कि ऐसा कोई उपचार मौजूद नहीं है. ग़लती सुधार के लिए कोई उपाय नहीं है. इस तरह का अमानवीय व्यवहार करने और अपनी ज़िम्मेदारियों को हल्के में लेने वाले अधिकारियों को दंडित करने का कोई प्रावधान नहीं है. इस देश में डॉक्टर ऑपरेशन के दौरान मरीज के शरीर में औजार या तौलिया जैसी चीजें तक छोड़ देते हैं और उनका कुछ नहीं बिगड़ता. हालांकि हमारे संविधान में जीवन के हर क्षेत्र में श्रेष्ठता हासिल करने की व्यक्तिगत या सामूहिक कोशिश को मूल कर्तव्यों की श्रेणी में जगह दी गई है (अनुच्छेद 51ए-जे), लेकिन यह केवल बातों तक ही सीमित है. ऐसी हालत में विशिष्टता हासिल करने की बात तो दूर, उसके बारे में सोचना भी निरर्थक है. हम सामान्य या औसत श्रेणी में ही बने रहना चाहते हैं, तभी ऐसी व्यवस्था को बर्दाश्त करते हैं, लेकिन अब वह समय आ चुका है, जब स्थिति में सुधार की कोशिश की जाए. देश में तत्काल कदाचार निरोधी क़ानून को लागू करने की सख्त ज़रूरत है, जिसके अंतर्गत अपने दायित्वों का सही ढंग से निपटारा न करने वाले अधिकारियों को ज़िम्मेदार ठहराया जा सके और अपने व्यवहार से आम लोगों को नुक़सान पहुंचाने वाले सरकारी बाबुओं पर क़ानून का शिकंजा कसा जा सके.

(लेखक मशहूर शिक्षाविद्‌ एवं इस्लामिक बैंकिंग के विशेषज्ञ हैं)

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