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मुंगेर की अर्थव्यवस्था का आधार-अवैध हथियार

मुंगेर की अर्थव्यवस्था का आधार-अवैध हथियार

चाहे दक्षिण के तमिलनाडु या कर्नाटक में हथियारों का जखीरा पकड़ा जाए अथवा मुंबई, जम्मू-कश्मीर और पश्चिम बंगाल में हथियारों की बरामदगी हो, मुंगेर का नाम ज़रूर आता है. देसी कट्टे, बंदूक एवं राइफल से लेकर अत्याधुनिक पिस्टल, कारबाइन और एके-47 तक मुंगेर में बनाई जा रही हैं. मेड इन इंग्लैंड, मेड इन अमेरिका, मेड इन जापान अंकित इन अत्याधुनिक हथियारों की क्वॉलिटी ऐसी होती है कि असली और नकली में कोई फर्क नज़र नहीं आता. लिहाज़ा मुंगेर निर्मित हथियारों की मांग दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है. यही वजह है कि अवैध हथियार मुंगेर की अर्थव्यवस्था की रीढ़ बन चुके हैं. एक अनुमान के मुताबिक़, यहां प्रतिदिन अवैध हथियारों का कारोबार लगभग 22 से 25 लाख रुपये का होता है. मुंगेर मुख्यालय से दस किलोमीटर की परिधि में बड़े पैमाने पर अवैध अग्नेयास्त्रों का निर्माण किया जाता है. मुफस्सिल थाना क्षेत्र का बरधै, चुरंबा, बाकरपुर, सुदुरखाना आदि ऐसे गांव हैं, जहां की आधी आबादी अवैध हथियारों के निर्माण एवं तस्करी में लगी है. मुंगेर शहर के बिंदवारा, शर्मा टोली, मकसुसपुर, बारा, मनिया चौराहा, कासिम बाजार, पुरानीगंज, चुआबाग, शादीपुर एवं दलहट्टा आदि मुहल्लों में सैकड़ों की संख्या में अवैध मिनी गन फैक्ट्रियां चल रही हैं. इन फैक्ट्रियों में हथियार निर्माण से लेकर इसकी तस्करी तक के काम में लगभग आठ हज़ार लोग लगे हुए हैं, जिनमें बच्चे, बूढ़े और महिलाएं तक शामिल हैं.

मुंगेर की पहचान जहां देश और दुनिया में योग नगरी के रूप में है, वहीं दूसरी ओर अवैध हथियार भी इसकी पहचान बनते जा रहे हैं. यहां हथियार निर्माण का इतिहास का़फी पुराना है, लेकिन आज यह अवैध और जोखिम भरा काम रोज़गार के बेहतर विकल्प के रूप में सामने आ रहा है.

यूं तो मुंगेर में हथियार निर्माण का इतिहास काफी पुराना है और यहां के हुनरमंद कारीगरों की क्षमता भी अद्‌भुत है. आजादी के पूर्व से ही मुंगेर में बंदूक निर्माण का कारोबार चलता आ रहा है. पहले यहां के हुनरबंद कारीगर अपने घरों में बंदूक निर्माण कर उसे सरकारी अधिकारी के पास जमा करते थे. उसके बाद आयुध कारखाने में उसकी जांच होती थी और तब उसकी बिक्री होती थी. लेकिन आज़ादी के बाद इस व्यवस्था को एक नया रूप दिया गया. किला परिसर में बंदूक कारखाने की स्थापना कर बंदूक निर्माण की प्रक्रिया शुरू की गई, जो आज तक सरकारी देखरेख में चल रही है. जब हुनरमंद कारीगरों को काम नहीं मिला और उनके समक्ष रोज़ी-रोटी की समस्या उत्पन्न हुई तो अवैध हथियारों का कारोबार सबसे बड़ा विकल्प बनकर सामने आया. कम लागत में अधिक आमदनी वाले इस रोजगार से लोग जुड़ते गए. धीरे-धीरे यह कारोबार इतने व्यापक स्तर पर फैल गया कि आज इससे प्रति वर्ष करोड़ों रुपये की कमाई की जा रही है. गंगा का दियारा क्षेत्र इस कारोबार को फलने-फूलने में काफी मददगार साबित हुआ, जहां आसानी से हथियारों का निर्माण किया जाता है.

यूं तो मुंगेर में हथियार निर्माण का इतिहास का़फी पुराना है और यहां के हुनरमंद कारीगरों की क्षमता भी अद्‌भुत है. आज़ादी के पूर्व से ही मुंगेर में बंदूक निर्माण का कारोबार चलता आ रहा है. पहले यहां के हुनरबंद कारीगर अपने घरों में बंदूक निर्माण कर उसे सरकारी अधिकारी के पास जमा करते थे. उसके बाद आयुध कारखाने में उसकी जांच होती थी और तब उसकी बिक्री होती थी. लेकिन आज़ादी के बाद इस व्यवस्था को एक नया रूप दिया गया.

कारीगर अपने हुनर का इस्तेमाल कर बेहतरीन हथियार बनाते हैं और सफेदपोश लोग उनकी मार्केटिंग करते हैं. यहां निर्मित हथियारों को गंतव्य तक पहुंचाने के लिए महिलाओं और बच्चों को लगाया गया है. जिस हथियार की लागत दो हज़ार रुपये होती है, उसे मुंगेर में पांच हज़ार रुपये में बेचा जाता है. महानगरों में पहुंचते ही इन हथियारों की क़ीमत पांच-छह गुना बढ़ जाती है. अवैध हथियार निर्माण से लेकर उसकी मार्केटिंग तक के लिए एक बड़ा नेटवर्क है. इस अवैध कारोबार में सबका हिस्सा तय है. पुलिस को भी उसका हिस्सा मिल जाता है.

बेरोज़गारी की समस्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है और युवाओं को रोजगार नहीं मिल रहा. ऐसे में यह कारोबार उन्हें अपनी ओर आकर्षित कर रहा है. कम समय में अधिक पैसे कमाने की ललक भी युवाओं को इस ओर खींच रही है. मुंगेर में देश के विभिन्न हिस्सों से हथियार के व्यापारी यहां पहुंचते हैं. वे यहां से कई तरह के हथियार खरीद कर ले जाते हैं. यही कारण है कि जहां कहीं भी हथियार पकड़े जाते हैं, मुंगेर का नाम एक बार ज़रूर आता है. नक्सली संगठनों के पास मौजूद अधिकांश हथियार मुंगेर निर्मित हैं. यहां अवैध हथियार निर्माण के काम ने कुटीर उद्योग का रूप धारण कर लिया है. मुंगेर के एक पूर्व पुलिस अधीक्षक ने राज्य सरकार के गृह विभाग को एक प्रस्ताव दिया था कि यहां बड़े पैमाने पर अवैध हथियारों का निर्माण होता है, जो तकनीकी दृष्टि से उत्तम होते हैं. यदि सरकार यहां हथियार निर्माण की वैध व्यवस्था करे तो उसे कम लागत में अच्छे हथियार मिल सकते हैं और हथियारों के अवैध कारोबार को खत्म किया जा सकता है, लेकिन उस प्रस्ताव पर आज तक कोई पहल नहीं की गई. मुंगेर में आज़ादी के बाद अब तक कोई उद्योग-धंधे की स्थापना नहीं की गई, जिसके चलते यहां के युवा रोज़गार के लिए दर-दर भटकते हैं. इसलिए अवैध हथियारों का निर्माण उन्हें एक बेहतर विकल्प लगता है, भले ही यह काम अवैध और जोखिम भरा है.

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