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सार-संक्षेप : रीवा में फिर बसेगा स़फेद बाघ

सार-संक्षेप : रीवा में फिर बसेगा स़फेद बाघ

दुनिया में स़फेद बाघ, रीवा की ही देन है, लेकिन मध्य प्रदेश के वन्यप्राणी संरक्षण और वन प्रबंधन कार्यक्रमों की खामियों के कारण अब सफेद बाघ अपनी जन्मभूमि में ही अस्तित्वहीन हो चुका हैं, लेकिन चार दशक बाद अब एक बार फिर सफेद बाघ को रीवा में बसाने के लिए भारत सरकार और राज्य सरकार तैयारी कर रही हैं. केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण की एक बैठक में पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने गोविंदगढ़ किले के निकट मांद संरक्षण क्षेत्र में एक चिड़ियाघर, एक बचाव केंद्र तथा विलुप्त हो रहे सफेद बाघों के प्रजनन केंद्र को शुरू करने के लिए राज्य सरकार के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी. इतिहास में उल्लेख मिलता है कि सफेद बाघ मध्य भारत में भी पाए जाते थे. 1951 में रीवा के महाराज ने सफेद बाघ के एक शावक को देखा था और इसका नाम मोहन रखा था. इसे गोविंदगढ़ किले में 1970 में इसकी मौत होने तक रखा गया. वहां मोहन से जन्मे अन्य शावकों को देश के विभिन्न चिड़ियाघरों में भेजा गया, लेकिन मध्य प्रदेश के पास एक भी सफेद बाघ नहीं बचा. मुख्य वन्यजीव संरक्षक एचएस पाबला ने मुताबिक सफेद बाघ सबसे पहले रीवा के जंगलों में देखे गए थे और यही कारण है कि स्थानीय लोग इस वन्यप्राणी से भावनात्मक रूप से जुड़े हुए हैं. सफेद बाघ हर चिड़ियाघर में आकर्षण का केंद्र होते हैं, इसलिए हमारी 100 हेक्टेयर से भी बड़े क्षेत्र में एक चिड़ियाघर, बचाव केंद्र तथा सफेद बाघ प्रजनन केंद्र स्थापित करने की योजना है. पाबला कहते हैं कि केंद्र से हरी झंडी मिलने के बाद अब हम चिड़ियाघर तथा प्रजनन केंद्र की स्थापना करने के लिए उच्चतम न्यायालय में जाएंगे.

पूरा गांव सीमेंट कारखाने को लीज़ पर

मध्य प्रदेश के औद्योगिक विकास के लिए राज्य सरकार जनहित की हर प्रकार से कुर्बानी दे रही है. एसीसी सीमेन्ट कारखाने के लिए राज्य सरकार ने कटनी ज़िले के विजयराघवगढ़ विकासखण्ड के आदिवासी बहुल ग्राम मेहगांव को पूरी तरह लीज़ पर दे दिया है. अब कारखाने के प्रबंधक इस गांव में सदियों से बसे आदिवासियों को उजाड़ने में लगे हुए हैं. गांव वालों को उजाड़कर कारखाने के लिए ज़मीन खाली कराने के उद्देश्य से एसीसी के प्रबंधक अब दबंगों का सहारा लेकर भोले-भाले गांव वालों को डरा धमकाकर अपना घरबार छोड़ने के लिए मजबूर कर रहे हैं. कई ग़रीब कमजोरों ने तो डर के कारण गांव में बने अपने झोपड़े खुद ही गिराने शुरू कर दिए हैं. आश्चर्य की बात तो यह है कि पुलिस और प्रशासन के कर्मचारी भी औद्योगीकरण के लिए एसीसी प्रबंधकों का खुला साथ देते हुए गांव वालों पर धौंस जमा रहे हैं और इन्हें जल्द से जल्द गांव से भाग जाने के लिए मजबूर कर रहे हैं. एसीसी द्वारा महगांव की जमीन लीज पर लेकर वहां बसे परिवारों को बेघर तो कर दिया गया, लेकिन इन्हें शासन द्वारा निर्धारित मुआवजा नहीं दिया गया. मिले आधे अधूरे मुआवजे पर दलालों ने सेंध लगानी प्रारंभ कर दी जिससे गरीबों के हाथ मामूली राशि आई. इसे लेकर कुछ सड़क किनारे रहने लगे तो कुछ ने नया अमेहटा में आसरा ले लिया, लेकिन विस्थापितों को पुर्नस्थापित करने की दिशा में न तो एसीसी प्रबंधन और न ही प्रशासन ने कोई प्रयास किए जिससे लुटे पिटे विस्थापित आज भी मदद की उम्मीद लिए बैठे हैं.महगांव की वर्तमान महिला उपसरंपच विमला बाई केवट का आरोप है कि महगांव में एसीसी द्वारा जो खदान प्रांरभ की गई हैं इसमें विस्फोट के बाद इड़ने वाले पत्थर इनके मकान पर आकर गिरते हैं. आए दिन खदान से घर तक उड़कर आने वाले पत्थरों के संबंध में कई शिकायतें किए जाने के बावजूद एसीसी प्रबंधन ने कोई ध्यान नहीं दिया है इससे उपसरपंच का पूरा परिवार दहशत के साए में जी रहे हैं. एसीसी कैमोर सीमेंट वर्क्स को पूरा महगांव लीज पर दिए जाने के संबंध में यह सवाल खड़ा होने लगा है कि आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र की जमीन किस नियम के आधार पर दी गई है. इसकी जानकारी तहसील प्रशासन से लेकर जिला प्रशासन तक को नहीं है, क्योंकि दोनों जगह से एक ही जबाव दिया जाता है कि महगांव की जमीन भोपाल प्रशासन द्वारा लीज पर दी गई है. अब सवाल उठता है कि जब आदिवासी जमीन को सामान्य में परिवर्तित करने का अधिकार कलेक्टरों के पास है तो भोपाल में किस आधार पर पूरा गांव लीज पर दे दिया गया.

विदेशी पर्यटकों का नहीं भाया भोपाल

शैल-शिखरों और प्राकृतिक झील, तालाबों की सुरम्य नगरी भोपाल विदेशी पर्यटकों को आकर्षित नहीं कर पा रही है. पर्यटन की सभी संभावनाओं से भरपूर भोपाल देश के पर्यटन नक्शे में आज भी उपेक्षित है, क्योंकि राज्य का पर्यटन उद्योग अविकसित और पिछड़ा हुआ है. भारत सरकार के पर्यटन विभाग और निजी पर्यटन उद्योग के प्रयासों से मध्य प्रदेश के खजुराहो, सांची, मांडू, कांहाकिसली, बांधवगढ़, भेड़ाघाट आदि पर्यटन केंद्रो में तो विदेशी पर्यटक आते हैं, लेकिन भोपाल बहुत कम संख्या में ही रुकते हैं. कई विदेशी पर्यटक तो इंदौर, मुम्बई और दिल्ली के लिए विमान सेवा का लाभ लेने हेतु भोपाल आते हैं, लेकिन वे हवाई अड्‌डे से ही लौट जाते हैं. सांची भोपाल से 40 किलोमीटर दूर हैं. यहां प्रति वर्ष बौद्ध तीर्थ यात्री जापान, श्रीलंका, नेपाल और दूसरे बौद्ध देशों से बड़ी संख्या में आते हैं, लेकिन वह भी भोपाल में नहीं रुकते हैं. भोपाल के पास प्रागैतिहासिक शैल चित्रों की गुफाओं वाला भीमबैठका क्षेत्र है, लेकिन वहां भी विदेशी पर्यटकों की संख्या ज्यादा नहीं रहती है. भोपाल और भीमबैठका आने वाले पर्यटकों की संख्या 2006 में 390, 2007 में 750, 2008 में 1492 और 2009 में 1489 रही. इसी तरह भोपाल से सांची जाने वालों की संख्या 2006 में 18929, 2007 में 24032, 2008 में 12333 और 2009 में 5407 रही. जबकि खजुराहो आने वाले विदेशी पर्यटकों की संख्या हर साल 80 से 90 हजार रहती है. मध्य प्रदेश सरकार ने भोपाल को एक बेहतर पर्यटन के बनाने के भरपूर प्रयास तो किए हैं, लेकिन इनकी मार्केटिंग भली प्रकार न होने से इन केंद्रों की ओर विदेशी पर्यटकों को आकर्षित नहीं किया जा सका है. भोपाल में मानव संग्रहालय, राज्य संग्रहालय, आंचलिक विज्ञान केंद्र, वन विहार, वोट क्लब, भारत भवन, मछली घर, बिरला मंदिर, ताजुल मस्जिद, बड़ा बाग, ताजमहल, इस्लाम नगर, हलाली डेम, गिन्नौरगढ़ और नजदीक ही भोजपुर और सुरम्य वन्यक्षेत्र देलावाड़ी आदि दर्शनीय स्थल हैं, लेकिन यहां आने वाले ज्यादातर स्थानीय और देशी पर्यटक ही होते हैं, विदेशी पर्यटक कभी कभार ही इन पर्यटन स्थलों पर दिखाई देते हैं. मध्य प्रदेश पर्यटन निगम भी दुखी हैं कि ज्यादा संख्या में विदेशी पर्यटक भोपाल क्यों नहीं आते हैं. जबकि देश के अन्य राज्यों की राजधानियों में विदेशी पर्यटकों की भीड़ बनी रहती हैं. जयपुर, लखनऊ, बैंगलोर, चैन्नई, त्रिवेंद्रम्‌, हैदराबाद, मुम्बई, कोलकाता, दिल्ली, अहमदाबाद, चंडीगढ़, शिमला और देहरादून में विदेशी पर्यटकों की अच्छी खासी भीड़ रहती है, जिससे स्थानीय पर्यटन उद्योग को आमदनी होती है. पर्यटन निगम का कहना है कि निगम द्वारा भोपाल समेत इसके आसपास स्थित पर्यटन स्थलों पर पर्यटकों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए काम किया जा रहा है, लेकिन भोपाल से सीधी एयर कनेक्टिविटी न होने और सड़क माध्यम सशक्त न होने के कारण पर्यटकों का आना कम हुआ है. साथ में इनका कहना है कि भोपाल में मौजूद ट्रेवल एजेंट भी पर्यटकों को पर्यटन स्थलों पर ले जाने में कोताही बरतते हैं जिससे विदेशी पर्यटक भोपाल आकर भी पर्यटन स्थलों पर नहीं पहुंच पाते. दूसरी ओर पर्यटकों से सीधे जुड़े होटल जहांनुमा के जनरल मैनेजर कमल भारती का कहना हैं कि भोपाल के आसपास सांची में ही बुद्धिस्ट लोगों का आना-जाना रहता है. बाकी तो अन्य जगहों से पर्यटकों का आना न के बराबर ही है, जबकि भोपाल के आसपास बहुत कुछ देखने को है, लेकिन वह दूसरे पर्यटन स्थलों पर जाना पसंद करते हैं.

दो दशक बाद अवैध क़ब्ज़े हटे

मध्य प्रदेश का प्रशासन भूमाफिया और शहरी भूमि पर अवैध क़ब्ज़ा करने वालों के सामने लाचार और बेबस है. इसका यही उदाहरण पर्याप्त है कि राज्य के मुख्यमंत्री के सरकारी निवास श्यामला हिल्स के पास वन विहार मार्ग पर एक दर्जन से अधिक अवैध मकानों को हटाने में सरकार को पूरे बीस साल लग गए.  मुख्यमंत्री निवास के पास से बीस साल बाद अवैध कब्जा हटाने के बाद जिला प्रशासन ने बाकायदा प्रेस विज्ञप्ति जारी कर अपनी इस कार्यवाही की सूचना जनता को दी और अपने हाथों अपनी पीठ ठोककर वाहवाही लूटी.  भोपाल में मनोरम श्यामला पहाड़ी पर बड़ी झील के पास मुख्यमंत्री निवास है और नीचे वन विहार, मानव संग्रहालय जैसे दर्शनीय स्थल भी झील किनारे ही है. लेकिन झील किनारे बने वोट क्लब के पास कीमती जमीन पर वर्षों से लोगों ने अवैध क़ब्ज़े कर रखे थे. कई लोगों ने तो बाक़ायदा पक्के मकान बना लिए थे और इनमें व्यवसायिक गतिविधियां भी चल रही थीं, लेकिन जिला प्रशासन और भोपाल नगर निगम ने इन अवैध कब्जो को हटाने में कोई रुचि नहीं ली. हाल ही अवैध कब्जा हटाने और भूमाफिया के हौसले पस्त करने के लिए जिला प्रशासन और नगर निगम ने कार्यवाही शुरू की है. इस कार्यवाही में अवैध कब्जाधारियों को समझा बुझाकर और इन्हें अन्यत्र पुनर्वास देकर हटाया जा रहा है. वोट क्लब से हटाए गए एक दर्जन परिवारों को पीपलनेर में गंदी बस्ती उन्मूलन विभाग द्वारा बनाए गए मकानों में बसाया गया है, लेकिन इसके बाद भी उन्होंने अपना अवैध कब्जा नहीं छोड़ा, तब भोपाल नगर के नजूल विभाग के तहसीलदार ने उन्हें अवैध कब्जा हटाने के लिए नोटिस दिया और अदालत से प्रत्येक कब्जाधारी पर पांच-पांच सौ रुपए का जुर्माना भी लगाया गया. नजूल विभाग के अनुसार अवैध कब्जे की यह भूमि राज्य के वन विभाग की है और इस पर निर्माण नहीं किया जा सकता है. जिन अवैध कब्जाधारियों को हटाया गया है, इनके नाम हैं- फय्याज कुरैशी, रूकसाना बी, डॉ. शफात उल्ला खां, उबेज खान, इश्रतजहां, सैयद शेफ अली, इरफान, समीना, कुंजीलाल, सईदा शेख अलीम और अम्मू खां. इन्हें पीपलनेर में बसाया गया है. लेकिन अभी भी राजधानी में राज्यमंत्रालय, विधानसभा के आसपास बड़ी मात्रा में अवैध कब्जे हैं, जिन्हें हटाने में प्रशासन को पसीना आ रहा हैं. विधायक विश्राम गृह परिसर में तो विधानसभा के छोटे कर्मचारियों ने ही अवैध कब्जे कर रखे हैं और झुग्गियां किराये पर दे रखी हैं. इतना ही नहीं, अवैध कब्जों वाले क्षेत्र में सुअर पालन, गाय पालन जैसे नगर सीमा में प्रतिबंधित धंधे भी चल रहे हैं.

मुख्यमंत्री कन्यादान योजना में 90 प्रतिशत वर-वधू फर्ज़ी

आम जनता में अपनी छवि बनाने के लिए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान जगह-जगह मुख्यमंत्री कन्यादान योजना के तहत सरकारी विवाह समारोह आयोजित कराने में पूरी रुचि लेते हैं, लेकिन वे इस तथ्य को नजरअंदाज़ कर देते हैं कि नौकरशाह इन्हें प्रसन्न करने के लिए अलग-अलग क्षेत्रों में अधिक से अधिक विवाह संपन्न कराने के लिए कई फर्ज़ी वर-वधू जमा कर लेते हैं और सरकारी अनुदान की बंदरबाट करते हैं. बड़वा हके ग्राम बागोद में प्रस्तावित 201 जोड़ों के सामूहिक विवाह के फर्ज़ीवाड़े की जब जिला प्रशासन ने जांच कराई, तो 90 प्रतिशत वर-वधू फर्ज़ी पाए गए. बाबा साहेब अंबेडकर बलाई समाज समिति के तत्वावधान में आयोजित मुख्यमंत्री कन्यादान योजना के सामूहिक विवाह के प्रशासन ने जांच के बाद रोक दिया था. बावजूद इसके चार जोड़ों ने मौके पर पहुंचकर शुभ मुहूर्त में अपने खर्च पर विवाह संपन्न कराए. आयोजन स्थगित होने के बाद प्रशासन ने विगत दिवस बागोद में 29 जोड़ों का विवाह संपन्न कराया. दस हज़ार रुपए प्रति जोड़े के हिसाब से लगभग तीन लाख रुपए आयोजन पर खर्च किए गए. पूर्व में 201 जोड़ों के लिए 20 लाख 10 हज़ार रुपए की राशि खर्च किया जाना प्रस्तावित था. इस प्रकार राज एक्सप्रेस की पहल पर शासन को 17 लाख 10 हज़ार रुपए की चपत लगने से बच गई.

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