Now Reading:
डूबे तो किस्‍सा खत्‍म, बचे तो गम ही गमः बाढ़ में डूब गए प्रशासन के वादे

डूबे तो किस्‍सा खत्‍म, बचे तो गम ही गमः बाढ़ में डूब गए प्रशासन के वादे

कोसी नदी के घटते-बढ़ते जलस्तर ने तटबंध के अंदर निर्वासित ग्रामीणों को अभी से तबाह करना शुरू कर दिया है, लेकिन प्रशासन एवं जल संसाधन विभाग का रवैया इस क़दर ढीला है कि जैसे उन्होंने ठान ली है कि जब तक नदी के विकराल रूप धरने और लोगों के डूब मरने की नौबत नहीं आती है, तब तक वे बचाव, राहत एवं सुरक्षा कार्य शुरू नहीं करेंगें. कोसी नदी के पूर्वी तटबंध के अंदर बाढ़ के इस शुरुआती मौसम में ही सहरसा एवं सुपौल ज़िले के कई गांवों के लोग त्राहिमाम की स्थिति में जीवन गुज़ार रहे हैं. इन लोगों के समक्ष अभी से ही रहने और आवागमन की समस्या उत्पन्न हो चुकी है, परंतु प्रशासन अभी तक इनकी सुध लेने के लिए संबंधित लोगों को भेजना उचित नहीं समझ रहा है. आमतौर पर बाढ़ का समय 15 जून से शुरू हो जाता है. इसके साथ ही जल संसाधन विभाग एवं प्रशासन सुरक्षा की तैयारी में जुट जाता है, लेकिन इस बार ऐसा नहीं हो रहा है. जल संसाधन विभाग जहां तटबंध आदि के बहाने लूट की योजना बनाने में जुटा है, वहीं प्रशासन के लोग राहत सामग्री और कोष डकारने का इंतजाम करने में जुटे दिख रहे हैं.

उत्तर बिहार के लोगों की ज़िंदगी बाढ़ से डूबते-बचते हर साल रिन्युअल होती है. डूबे तो किस्सा खत्म, बच निकले तो अगली बाढ़ तक का जीवनदान. घर, अरमान, कमाई के साथ-साथ अपनों से बिछुड़ने की आशंका. मानो हर वर्ष डूबना उनकी नियति बन गई है.

सुपौल ज़िले के प्रखंड किशनपुर की पंचायत बौराहा का भेलवा टोला मानसून के पहले ही नदी की भेंट चढ़ गया. इस गांव के दर्जनों घर कोसी लील गई है. कोसी की कटान में अपना घर गवां चुकी आनंदी देवी, बूचो शर्मा एवं गणेश शर्मा आदि का कहना है कि हमें हर साल यह पीड़ा सहनी पड़ती है. घर कटने के बाद किसी प्रकार की सरकारी सहायता नहीं मिलती. सहायता के अभाव में तटबंध के अंदर रहने वाले लोगों की स्थिति दिनोंदिन बदतर होती जा रही है. इसी पंचायत के झखराही, डेंगा, सनपतहा, औरही एवं लछमिनिया आदि टोलों के लोग भी परेशानी से जूझ रहे हैं. सरायगढ़ प्रखंड के ढोली, बलसरवा, बनैनियां एवं सुजाननी आदि गांवों में कटान का खतरा मंडरा रहा है. बलसरवा निवासी दिलीप पासवान का कहना है कि कटान के खतरे को देखते हुए लोग अपने ज़रूरी सामानों के साथ ऊंचे स्थानों पर शरण लेने लगे हैं. नदी में जल वृद्धि और शादी-ब्याह के मौसम की वजह से यातायात की समस्या पैदा हो गई है. सरकारी नावों का परिचालन भी शुरू नहीं हो सका है.

सहरसा ज़िले के नवहट्टा प्रखंड क्षेत्र की असई पंचायत के महादलित टोला बरियाही मुसहरी के उपेंद्र सादा, दुलारचंद, चंदेश्वरी, गणेशी, सुखनी देवी, जगदेव, विद्या, मधिया देवी, बौकू, दिनेश, लक्ष्मण एवं श्रीलाल सादा के परिवार का़फी सहमे हुए हैं. पिछले साल श्याम, कारी, विजय, सैनी, बेचन, बद्री, भगवान, उपेंद्र, शीतो, चंदरराम, भूषणराम, लालदेव राम, उमेश राम, रंजीत राम, बालेश्वर राम, दिलीप राम एवं मुसनी देवी के घरों को नदी की तेज़ धारा बहा ले गई. इन परिवारों को आज तक घर नहीं दिया जा सका है. सहरसा ज़िले के नवहट्टा, महिषी, सिमरी बख्तियारपुर, बनमा इटहरी, सलखुआ एवं सोनवर्षाराज आदि इलाक़े हरसाल बाढ़ का प्रकोप झेलते हैं. कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि शायद प्रशासन और सरकार को लोगों के डूबने-मरने का इंतजार है.

बचाव के नाम पर बंदरबांट

तटबंध की मरम्मत की डेडलाइन खत्म हो चुकी है. जो भी काम हुआ, उस पर ग्रामीण खानापूर्ति का आरोप लगा रहे हैं. जहां काम नहीं हुआ है, वहां तटबंध खुला ही छोड़ दिया गया है. मिट्टी का काम ठीक से न होने से तटबंध जर्जर है और लोग खौ़फजदा. प्रशासनिक स्तर पर रोज़-रोज़ आपदा प्रबंधन की बैठक हो रही है. चौकीदारों एवं होमगाडर्‌‌स को तटबंध पर तैनात किया गया है. अनुमंडल एवं ज़िला मुख्यालय में कंट्रोलरूम बनाए गए हैं, जिनमें 24 घंटे कर्मचारियों एवं पदाधिकारियों की तैनाती की गई है. लाखों-करोड़ों खर्च हो गए हैं इस व्यवस्था पर, लेकिन तटबंध की समुचित मरम्मत के लिए फंड का रोना रोया जा रहा है. ये बाढ़ रोकने के उपाय हैं या बाढ़ मंगाने की तैयारी, समझ से परे है. बाढ़ आती है तो आश्वासनों की झड़ी लगा दी जाती है. एक आशा की किरण जगती है कि शायद अगले वर्ष बाढ़ से निजात मिल जाएगी, लेकिन सरकारी व्यवस्था ऐसी है कि बाढ़ से निजात दिलाने का आश्वासन स़िर्फ एक घोषणा बनकर काग़ज़ों एवं फाइलों में सिमट कर रह जाता है. आश्वासनों एवं घोषणाओं की वास्तविकता कुछ और ही होती है. लगता है, लाखों की इस आबादी की किस्मत में अच्छे दिन देखना नहीं लिखा है.

जल संसाधन विभाग के सहायक अभियंता रामचंद्र प्रसाद कहते हैं कि तटबंध कमज़ोर है और पूरे तटबंध को पांच फीट ऊंचा करने का प्रस्ताव भेजा गया है. कनीय अभियंता सीताराम अग्रवाल का कहना है कि सुदृढ़ीकरण का कार्य ज़रूरी है, इसलिए सरकार को प्रस्ताव पर जल्द अमल करना चाहिए.

बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में शुमार उत्तर बिहार एवं मिथिलांचल की हृदयस्थली कहलाने वाला समस्तीपुर ज़िला बाढ़ के लिए हाई रिस्क जोन के नाम से जाना जाता है. चारों तऱफ से नदियों से घिरा यह ज़िला हर वर्ष बाढ़ के प्रकोप से घिर जाता है. बूढ़ी गंडक, करेह, कमला, बलान, कोसी एवं बागमती नदी के कहर की आशंका से आषाढ़, सावन एवं भादों माह में ज़िले के अधिकांश प्रखंडों की आबादी डरी-सहमी रहती है. इन नदियों के तटबंध टूटने से दरभंगा, समस्तीपुर, खगड़िया एवं बेगूसराय ज़िले की लाखों आबादी तबाह हो जाती है. इसके बावजूद बिहार सरकार के संबंधित विभाग द्वारा तटबंधों का समुचित ध्यान नहीं रखा जाता है. कटाव निरोधक कार्य के नाम पर लूटखसोट का सिलसिला लगभग तीन महीने तक जारी रहता है. बूढ़ी गंडक नदी, जो समस्तीपुर एवं बेगूसराय ज़िले पर कहर बरपाती है, का बायां तटबंध रोसड़ा राजेंद्र आश्रम, रहुआ एवं मसीना कोठी के समीप अत्यंत जर्जर है. इन स्थानों पर प्रत्येक वर्ष करोड़ों की लागत से निरोधात्मक कार्य संपन्न कराए जाते हैं. बाढ़ निरोधात्मक कार्य और तटबंध मरम्मत में विभागीय अभियंता, ठेकेदारों एवं बिचौलियों द्वारा लूटखसोट के अलावा कुछ और नहीं होता. जब नदी लबालब होती है तो कटाव निरोधात्मक कार्य के नाम पर भी पैसों का बंदरबांट होता है. इसी तरह करेह नदी पर हायाघाट से लेकर कराचीन तक 75 किमी तक दर्जन भर स्थानों पर तटबंध का कटाव नदी के सीध में रहने के कारण होता है. इन स्थानों पर प्रतिवर्ष कार्य कराए जाते हैं, जिन पर करोड़ों रुपये का खर्च होता है.वर्ष 2010-11 में हायाघाट-कराचीन तटबंध के 2.5 किमी पर पोराम के समीप 36 लाख रुपये की राशि खर्च कर मिट्टी का काम हुआ. इसी प्रकार 20.7 किमी पर महेशवारा के समीप 56 लाख रुपये खर्च कर ईंट क्रेजिंग, 22.8 किमी पर पुरनदाही के समीप 15.5 लाख रुपये, 24.90 किमी पर भटौरा के निकट 70 लाख रुपये, 28.4 किमी पर गंगौली के समीप 1.5 लाख रुपये से बोरा पीचिंग, 31 किमी पर परवना-तेलिनियागाछी के समीप 86 लाख रुपये, 35 किमी पर महोदवा के समीप 39 लाख रुपये, 36.48 किमी पर शंकरपुर के समीप 12 लाख रुपये, 40.8 किमी पर विशनपुर के समीप 3 लाख रुपये, 43.68 किमी पर कोलहट्टा के समीप 67 लाख रुपये एवं 52 किमी पर काले गांव के समीप 18.5 लाख रुपये के कार्य कराए गए हैं. इसके दूसरे तटबंध सिरसिया-सिरनियां पर भी कुछ इसी अंदाज़ में कार्य हुए हैं. नदी यदि लबालब हुई तो तटबंध का टूटना तय है. इस तटबंध पर मिट्टी का कार्य न होने को खतरनाक मानते हुए जल संसाधन विभाग के सहायक अभियंता रामचंद्र प्रसाद कहते हैं कि तटबंध कमज़ोर है और पूरे तटबंध को पांच फीट ऊंचा करने का प्रस्ताव भेजा गया है. कनीय अभियंता सीताराम अग्रवाल का कहना है कि सुदृढ़ीकरण का कार्य ज़रूरी है, इसलिए सरकार को प्रस्ताव पर जल्द अमल करना चाहिए. इस तटबंध पर प्रतिवर्ष 5 करोड़ रुपये व्यय किए जाते हैं, लेकिन बाढ़ की आशंका क्षेत्रीय लोगों को हमेशा सताती रहती है. इसके अलावा कमला, बलान एवं कोसी नदी का आंशिक प्रकोप ज़िले पर रहता है. सिंघिया, बिथान एवं हसनपुर प्रखंड इससे प्रभावित रहते हैं. इसी प्रकार बागमती नदी का हथौड़ी-त्रिमुहानी तटबंध, जो चार स्थानों पर 2007 से खुला हुआ है. यह ठाहर में 250 मीटर, हथौड़ी में 150 मीटर, मुरादपुर में 200 मीटर एवं गरेड़िया टोल में 100 मीटर खुला हुआ है.

– संजीव कुमार सिंह

1 comment

  • ssony-bipin

    कुछ तो लिखा करो ठीक से, आकरा सही दिया करो.पाठक सब जानती है.तुम्हारा सुभचिन्तक

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Input your search keywords and press Enter.