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क्रांतिकारियों का पहला धमाका

22 जून, 1897 को रैंड को मौत के घाट उतार कर भारत की आज़ादी की लड़ाई में प्रथम क्रांतिकारी धमाका करने वाले वीर दामोदर पंत चाफेकर का जन्म 24 जून, 1869 को पुणे के ग्राम चिंचवड़ में प्रसिद्ध कीर्तनकार हरिपंत चाफेकर के ज्येष्ठ पुत्र के रूप में हुआ था. उनके दो छोटे भाई क्रमशः बालकृष्ण चाफेकर एवं वासुदेव चाफेकर थे. बचपन से ही सैनिक बनने की इच्छा दामोदर पंत के मन में थी, विरासत में कीर्तनकार का यश-ज्ञान मिला ही था. महर्षि पटवर्धन एवं लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक उनके आदर्श थे. तिलक जी की प्रेरणा से उन्होंने युवकों का एक संगठन व्यायाम मंडल तैयार किया. ब्रितानिया हुकूमत के प्रति उनके मन में बाल्यकाल से ही तिरस्कार का भाव था. दामोदर पंत ने ही बंबई में रानी विक्टोरिया के पुतले पर तारकोल पोत कर, गले में जूतों की माला पहना कर अपना रोष प्रकट किया था. 1894 से चाफेकर बंधुओं ने पूना में प्रति वर्ष शिवाजी एवं गणपति समारोह का आयोजन प्रारंभ कर दिया था. इन समारोहों में चाफेकर बंधु शिवा जी श्लोक एवं गणपति श्लोक का पाठ करते थे. शिवा जी श्लोक के अनुसार, भांड की तरह शिवा जी की कहानी दोहराने मात्र से स्वाधीनता प्राप्त नहीं की जा सकती. आवश्यकता इस बात की है कि शिवाजी और बाजी की तरह तेज़ी के साथ काम किए जाएं. आज हर भले आदमी को तलवार और ढाल पकड़नी चाहिए, यह जानते हुए कि हमें राष्ट्रीय संग्राम में जीवन का जोखिम उठाना होगा. हम धरती पर उन दुश्मनों का ख़ून बहा देंगे, जो हमारे धर्म का विनाश कर रहे हैं. हम तो मारकर मर जाएंगे, लेकिन तुम औरतों की तरह स़िर्फ कहानियां सुनते रहोगे. गणपति श्लोक में धर्म और गाय की रक्षा के लिए कहा गया, अ़फसोस कि तुम गुलामी की ज़िंदगी पर शर्मिंदा नहीं. हो जाओ. आत्महत्या कर लो. उफ! ये अंग्रेज़ कसाइयों की तरह गाय और बछड़ों को मार रहे हैं, उन्हें इस संकट से मुक्त कराओ. मरो, लेकिन अंग्रेजों को मारकर. नपुंसक होकर धरती पर बोझ न बनो. इस देश को हिंदुस्तान कहा जाता है, अंग्रेज़ भला किस तरह यहां राज कर सकते हैं.

ब्रितानिया हुकूमत ने पहले तो प्लेग फैलने की परवाह नहीं की, बाद में प्लेग के निवारण के नाम पर अधिकारियों को विशेष अधिकार सौंप दिए. पुणे में डब्ल्यू सी रैंड ने जनता पर ज़ुल्म ढाना शुरू कर दिया. प्लेग निवारण के नाम पर घर से पुरुषों की बेदख़ली, स्त्रियों से बलात्कार और घर के सामानों की चोरी जैसे काम गोरे सिपाहियों ने जमकर किए. जनता के लिए रैंड प्लेग से भी भयावह हो गया.

1896 में महाराष्ट्र में प्लेग फैला. इस रोग की भयावहता से भारतीय जनमानस अंजान था. ब्रितानिया हुकूमत ने पहले तो प्लेग फैलने की परवाह नहीं की, बाद में प्लेग के निवारण के नाम पर अधिकारियों को विशेष अधिकार सौंप दिए. पुणे में डब्ल्यू सी रैंड ने जनता पर ज़ुल्म ढाना शुरू कर दिया. प्लेग निवारण के नाम पर घर से पुरुषों की बेदख़ली, स्त्रियों से बलात्कार और घर के सामानों की चोरी जैसे काम गोरे सिपाहियों ने जमकर किए. जनता के लिए रैंड प्लेग से भी भयावह हो गया. इसी बीच तिलक का बयान आया कि एक विदेशी व्यक्ति के हाथों किए जा रहे इतने ज़ुल्मों को सहन करने वाला यह शहर जीवित मनुष्यों का शहर न होकर अचेतन पत्थरों या मुर्दों का शहर होना चाहिए. रैंडशाही की चपेट में आए भारतीयों के बहते आंसुओं, कलांत चेहरों और तिलक के बयान की हृदय भेदी ललकार ने चाफेकर बंधुओं को विचलित कर दिया. दामोदर पंत चाफेकर ने मध्य रात्रि में रैंड की गाड़ी पर चढ़कर उसे गोली मार दी. उसके पीछे गाड़ी में आर्यस्ट आ रहा था, बालकृष्ण चाफेकर ने उसकी गाड़ी पर चढ़कर उसे भी मौत के घाट उतार दिया. इस तरह चाफेकर बंधुओं ने जनइच्छा को अपने पौरुष एवं साहस से पूरा करके भय और आतंक की बदौलत शासन कर रहे अंग्रेज़ों के दिलोदिमाग में ख़ौ़फ भर दिया. ब्रितानिया हुकूमत उनके पीछे पड़ गई. गणेश शंकर द्रविड़ नामक भेदिए ने बीस हज़ार रुपये और नौकरी के लालच में दामोदर पंत को पकड़वा दिया. बिना गवाह के ही सेशन कोर्ट ने 3 फरवरी, 1898 को दामोदर पंत चाफेकर को फांसी की सज़ा दे दी. येरवड़ा की जेल में 18 अप्रैल, 1898 को प्रातःकाल दामोदर पंत चाफेकर को फांसी पर लटका दिया गया. दामोदर पंत चाफेकर ने स्पष्ट रूप से लिखा था कि क्या किसी भी इतिहास प्रसिद्ध व्य्क्ति ने कभी नेशनल कांफ्रेस कर या भाषण देकर दुनिया को संगठित करने की कोशिश की है? इसका उत्तर अवश्य ही नहीं में मिलेगा. सख्त अ़फसोस की बात है कि वर्तमान समय के हमारे शिक्षित लोगों में यह समझने की भी अक्ल नहीं कि किसी भी देश की भलाई तभी होती है, जब करोड़ों गुणवान लोग अपनी ज़िंदगी की परवाह न करके युद्ध क्षेत्र में मौत का सामना करते हैं. अन्याय के ख़िला़फ हरसंभव तरीक़े से प्रतिकार करने की शिक्षा हमें अपने इस महान योद्धा से मिलती है. चाफेकर बंधुओं द्वारा रैंड की हत्या रूपी किया गया पहला धमाका अंग्रेजों के प्रति उनकी गहरी ऩफरत का नतीजा था, जो अपने दमन और निरंकुशता की कार्रवाइयों के कारण पूरी जनता की घृणा के पात्र बन गए थे.

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