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नंदनगढ़ बौद्ध स्‍तूपः क्‍या यह बुद्ध की उपेक्षा है?

नंदनगढ़ बौद्ध स्‍तूपः क्‍या यह बुद्ध की उपेक्षा है?

चंपारण के लौरिया स्थित नंदनगढ़ बौद्ध स्तूप राष्ट्रीय मानचित्र से अभी भी दूर है. बीते इतिहास को साक्षी भाव में खड़ा होकर बताने वाले इस नंदन गढ़ की देख-रेख को लेकर सरकार बिल्कुल भी चिंतित नहीं है. यही वजह है कि राष्ट्र की महत्वपूर्ण सांस्कृतिक पुरातन धरोहर होने के बावजूद राष्ट्रीय मानचित्र से कटा छटा और उपेक्षित पड़ा है.

यहां के राजनीतिज्ञों की तरफ से भी कोई क़दम नहीं उठाए गए. यही वजह है कि आज तक इसे राष्ट्रीय पर्यटन के क्षितिज पर नहीं जोड़ा जा सका है. पर्यटन विभाग के अनुसार पश्चिम चंपारण के पर्यटन विकास के लिए 306.96 करोड़ रुपए की चार योजनाएं सरकार द्वारा स्वीकृत हुई हैं. ज़िला पदाधिकारी कार्यालय सूत्रों का कहना है कि पर्यटन विकास की इन योजनाओं में नंदनगढ़ बौद्ध स्तूप को भी शामिल किया गया है.

नंदनगढ़ जहां मगध राज्य के नंद वंश के राजाओं का विश्राम स्थल था, वहीं चाणक्य के लिए अर्थशास्त्र की रचना के लिए एकांतवास भी था. अपने शासनकाल के दौरान अशोक बौद्ध धर्म प्रचार के लिए जब कपिलवस्तु, लुम्बिनी की यात्रा पर थे तब यहीं ठहरे थे. बाद में उन्होंने इसी स्थान को बौद्ध स्तूप के तौर पर निर्मित करवाया. इस निर्माण का एक और कारण था. भगवान बुद्ध जब बुद्धत्व की प्राप्ति के दौरान कुशीनगर जा रहे थे, तब उनका पड़ाव इसी गढ़ पर हुआ था. इसलिए सम्राट अशोक ने इस स्थान को भगवान बुद्ध का पवित्र स्थल मानकर बौद्ध स्तूप का निर्माण कर दिया. नंदन गढ़ आज भी मगध के नंद वंश की कहानी बताता है साथ ही बुद्ध के अवतार को स्तूप में विराजमान होकर उनके भगवान होने का प्रमाण देता है.

भारत के पर्यटन के हिसाब से भी यह स्थान अद्वितीय है. बिहार और केंद्र सरकार अगर ध्यान दे तो राष्ट्रीय पर्यटन मानचित्र पर इस जगह का महत्व और बढ़ सकता है. वहीं बिहार और भारत सरकार को पर्यटन क्षेत्र में आर्थिकतौर पर फायदा पहुंचेगा.

नंदनगढ़ के विषय में लोगों का मानना है कि मगध के राजा अजातशत्रु ने वैशाली से जीता था. यहां धनानंद वंश का शासन भी रहा था. नंद वंश के राजा अपने साम्राज्य निरीक्षण और आखेट के लिए अक्सर यहां पर रुकते थे. इसलिए उसका नाम नंदनग़ढ पड़ गया. 321 ईसापूर्व चंद्रगुप्त मौर्य शासनकाल में चाणक्य भी अक्सर यहीं अपना समय गुजारा करते थे. कहा जाता है कि उन्होंने यहीं पर अर्थशास्त्र की रचना की थी. यह भी कहा जाता है कि चाणक्य तंत्र विद्या के विषय में भी निपुण थे और नंदनगढ़ और चानकीगढ़ पर रात्रि में दीपक जलाकर तांत्रिक साधना किया करते थे. नंदन गढ़ से महज पच्चीस किलोमीटर की दूरी पर चानकीगढ़ चाणक्य की कहानी को दोहरा रहा है. यह स्थान नंदन गढ़ से मिलता जुलता है. इन्हीं दोनों स्थानों पर चाणक्य समय बिताते थे. ईसा पूर्व 273 में अशोक ने गद्दी संभाली. कलिंग युद्व के बाद वह धर्म यात्रा पर निकल पड़ा. रूमिनदेई अभिलेख और दिव्यावदान से ज्ञात होता है कि अशोक ने धर्म प्रसार के लिए धर्म यात्राएं की थीं. इस यात्रा में लुम्बिनी, कुशीनगर, कपिलवस्तु, श्रावस्ती, सारनाथ और बोधगया आदि स्थान शामिल थे. इसकी पुष्टि इतिहासकार विंसेंट स्मिथ भी करते हैं. अनुश्रुतियों से स्पष्ट होता है कि अशोक ने पहले आठ स्तूपों में बुद्ध के भस्मावशेषों को संग्रहित किया था. बाद में भस्मावशेषों को वितरित करके अन्य स्तूपों में रखा. इसी क्रम में वह कुशीनगर और कपिलवस्तु की यात्रा के  दौरान अशोक को जब ज्ञात हुआ कि नंदन गढ़ स्थल पर भगवान बुद्ध ठहर चुके हैं, तो इस जगह को पवित्र मानते हुए इसने  इस स्थल को बौद्ध स्तूप में निर्माण करा दिया. यह स्तूप 24.38 मीटर उंचा है. आकार में बहुकोणीय है तथा पांच वेदिकाओं में निर्मित है. जिस पर तीन परिक्रमा पथ हैं. मुख्य स्थान से इसकी लंबाई 31.69 मीटर है. सन 1880 में अंगे्रजी साम्राज्य में सर ऐलेक्जेंडर कनिंघम ने खुदाई करके इसका पता लगाया था. सन 1935 और 1936 में एन मजूमदार ने इसकी क्रमबद्व खुदाई करवाई, जो 1941 तक जारी रही.आज़ादी के साठ साल गुज़रने के बाद भी बिहार सरकार और केंद्र सरकार ने इसके महत्व को नहीं समझा. इसलिए किसी भी सरकार ने कोई ठोस कदम नहीं उठाए. यही वजह है कि  नंदनगढ़ बौद्ध स्तूप अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए जूझ रहा है. पर्यटन उद्योग पर सरकार हर साल का़फी पैसा खर्च करती है.

यहां के राजनीतिज्ञों की तरफ से भी कोई क़दम नहीं उठाए गए. यही वजह है कि आज तक इसे राष्ट्रीय पर्यटन के क्षितिज पर नहीं जोड़ा जा सका है. पर्यटन विभाग के अनुसार पश्चिम चंपारण के पर्यटन विकास के लिए 306.96 करोड़ रुपए की चार योजनाएं सरकार द्वारा स्वीकृत हुई हैं. ज़िला पदाधिकारी कार्यालय सूत्रों का कहना है कि पर्यटन विकास की इन योजनाओं में नंदनगढ़ बौद्ध स्तूप को भी शामिल किया गया है. लेकिन इसका वास्तविकता में विकास कब होगा, यह अभी भी पहेली बना हुआ है.

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