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भारतीय व्‍यवस्‍था का काला सच

नीरा राडिया के टेप भारतीय व्यवस्था के उस पहलू को उजागर करते हैं, जो सत्ता सूत्र और भ्रष्ट तत्वों के बीच की साठगांठ पर आधारित है और देश के कॉरपोरेट एवं राजनीतिक तंत्र के बीच गोंद का काम करता है. जैसा कि स्कूल जाने वाला कोई सुकुमार बच्चा अच्छी तरह जानता है कि चीर-फाड़ का काम बड़ा ही मुश्किल होता है. कुछ बच्चे इससे बचने के लिए हरसंभव उपाय करते हैं तो कुछ बच्चे घबरा जाते हैं या डर जाते हैं. किसी जैविक तंत्र की अंदरूनी संरचना को बर्दाश्त करने की ताक़त हर किसी के पास नहीं होती. कुछ दिन पहले अलग-अलग लोगों के बीच टेलीफोन पर हुई बातचीत के 104 ब्योरों के चाकू ने भारतीय व्यवस्था के उस हिस्से को नंगा कर दिया, जो भ्रष्टाचार के दलदल में पूरी तरह धंसा हुआ है. इससे जो बात खुलकर सामने आई, वह इतनी अरुचिकर है कि ब्रेकिंग और एक्सक्लूसिव ख़बरों के पीछे पड़े रहने वाले कई प्रमुख अख़बारों और टेलीविज़न न्यूज़ चैनलों ने अपनी निगाहें दूसरी ओर मोड़ लीं. उनकी यह चुप्पी हालांकि समझ से परे नहीं है, लेकिन निराशाजनक है और माफी के काबिल भी नहीं है. आख़िर नीरा राडिया की फोन बातचीत के ये टेप तब सामने आए हैं, जबकि इसके ठीक पहले 2-जी स्पेक्ट्रम के लाइसेंस आवंटन पर सीएजी की रिपोर्ट आई है और इसमें यह स्पष्ट रूप से बताया गया है कि तत्कालीन संचार मंत्री ए राजा ने कुछ निजी कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिए राष्ट्रीय हितों की क़ीमत पर नियम-क़ानूनों की धज्जियां उड़ाईं. राजा की कारगुजारियों से लाभांवित होने वालों में अनिल अंबानी और रतन टाटा भी शामिल थे. एक टेप में एक अज्ञात शख्स राडिया से, जिनके क्लाइंट्‌स में टाटा और मुकेश अंबानी शामिल हैं, पूछता है कि मुकेश अंबानी ग्रुप राजा का समर्थन क्यों कर रहा है, जबकि स्पेक्ट्रम आवंटन से सबसे ज़्यादा फायदा अनिल अंबानी को हो रहा है. इस पर राडिया जवाब देती हैं कि यह मामला बड़ा पेचीदा है, क्योंकि रतन टाटा भी उसके क्लाइंट हैं और उन्हें भी फायदा हो रहा है.

दूरसंचार के अलावा राडिया के ये टेप अंबानी बंधुओं के बीच गैस विवाद पर भी रोशनी डालते हैं. इस विवाद में मुकेश अंबानी ने गैस एक राष्ट्रीय संसाधन है के तर्क का मीडिया की मदद से बड़ी दक्षता से इस्तेमाल किया था. दूसरी ओर सांसदों के साथ अपने व्यक्तिगत संबंधों की मदद से उन्होंने कृष्णा गोदावरी बेसिन में अपनी कंपनी के लिए टैक्स में छूट के लिए हरसंभव कोशिश भी की थी. ऐसा करते व़क्त तेल के राष्ट्रीय संसाधन होने का तर्क वह बड़ी सफाई से भूल गए थे. एनडीटीवी और इंडियन एक्सप्रेस, दो ऐसे मीडिया घराने जो टेप कांड से बचने की कोशिश करते रहे हैं, को दिए गए एक इंटरव्यू में रतन टाटा ने इन टेपों को धुएं का ऐसा गुबार बताया, जिसका असली मक़सद सच्चाई पर पर्दा डालना है. लेकिन टाटा के इस बयान में रत्ती भर सच्चाई नहीं है, वह झूठ बोल रहे हैं. हमें यह पता नहीं कि इन टेपों को किसने लीक किया. प्रवर्तन निदेशालय और आयकर अधिकारियों ने राडिया पर निगाह रखने के लिए 5000 से भी ज़्यादा बातचीत रिकॉर्ड कराई थीं, उनमें से इन टेपों का चुनाव किसने किया, हमें यह भी पता नहीं. लेकिन इन टेपों से जो कहानी उभर कर सामने आती है, भले ही वह कॉरपोरेट लॉबिंग के कुछ खास पहलुओं को ही उजागर क्यों न कर रही हो, उसके तथ्यों की न तो हम अनदेखी करने का जोखिम ले सकते हैं, न ही उसे झुठला सकते हैं. फिक्शन फिल्म द मैट्रिक्स में मॉर्फस नियो से कहता है, तुम यहां इसलिए हो, क्योंकि तुम जानते हो कि इस दुनिया में कुछ गड़बड़ है. द मैट्रिक्स की अहमियत के बारे में वह कहता है कि इसका वजूद ही इसीलिए है कि लोगों की आंखों पर पर्दा डालकर उन्हें इस सच्चाई से दूर रखा जाए कि वे गुलाम हैं. वह नियो को दो तरह की गोलियों का विकल्प देता है, नीली और लाल गोलियां. नीली गोलियां लो और कहानी वहीं ख़त्म हो जाती है. तुम अपने बिछावन से उठो और जो चाहो, उस पर भरोसा कर लो. लाल गोली लो और फिर मैं तुम्हें दिखाता हूं कि इस गड़बड़झाले की जड़ें कितनी गहरी हैं.

नीरा राडिया की फोन बातचीत के ये टेप तब सामने आए हैं, जबकि इसके ठीक पहले 2-जी स्पेक्ट्रम के लाइसेंस आवंटन पर सीएजी की रिपोर्ट आई है और इसमें यह स्पष्ट रूप से बताया गया है कि तत्कालीन संचार मंत्री ए राजा ने कुछ निजी कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिए राष्ट्रीय हितों की क़ीमत पर नियम-क़ानूनों की धज्जियां उड़ाईं. राजा की कारगुजारियों से लाभांवित होने वालों में अनिल अंबानी और रतन टाटा भी शामिल थे.

पिछले दिनों आउटलुक और ओपन पत्रिकाओं द्वारा नीरा राडिया के जो टेप इंटरनेट पर डाले गए हैं, वे हमारे जमाने की लाल गोलियां हैं. ये भारतीय राज्य के वायरस, सोर्स कोड, नेटवर्क और गंदगी के मैट्रिक्स के बारे में बताती हैं. व्यवस्था सुचारू रूप से चलती रहे, इसके लिए ज़रूरी है कि इसके विभिन्न केंद्रों के बीच सूचना, जिसे हम ख़बर का नाम भी दे सकते हैं, का आदान-प्रदान होता रहे. व्यवस्था के विभिन्न अंगों के बीच समस्याओं को सुलझाने का माध्यम भी ख़बर ही होती है. यदि आप इस रिकॉर्डिंग को सुनते हैं तो आपको पता चल जाएगा कि भारतीय व्यवस्था की सच्चाई क्या है. कोई आश्चर्य नहीं, यदि हम में से अधिकांश लोग नीली गोली का विकल्प चुनना चाहेंगे, क्योंकि यदि आपने लाल गोली चुनी तो आप इस गड़बड़झाले की तहों में जाने के लिए मजबूर होंगे और यह भी सच्चाई है कि इस गड़बड़झाले की जड़ें काफी गहरी हैं. इसका इससे बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है कि इन टेपों में एन के सिंह, जो सांसद हैं और जिनसे हम उन लोगों का पक्ष रखने की उम्मीद रखते हैं जिन्होंने उन्हें चुना है, को मुकेश अंबानी के लिए उनके स्वार्थ वाले कॉरपोरेट क्षेत्र में एकाधिकार की वकालत करते हुए सुनते हैं. एक टेप में एन के सिंह राडिया को बताते हैं कि वह अंबानी को टैक्स में छूट के लिए वित्त मंत्री के पास पैरवी कर रहे हैं. वित्त मंत्री ने गैस उत्पादन में इस कर छूट की घोषणा 2009 में की थी और सिंह चाहते थे कि इस घोषणा को पिछली तारीख़ से ही लागू कर दिया जाए, ताकि अंबानी को इसका फायदा हो सके. राडिया उन्हें बताती हैं कि टैक्स में छूट से रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड को होने वाले 81,000 करोड़ रुपये के मुना़फे वाली ख़बर को उन्होंने दबा दिया है, क्योंकि इस पर हंगामा हो सकता था, लेकिन सिंह इससे ज़्यादा संसद में वित्त विधेयक पर होने वाली बहस को लेकर फिक्रमंद थे.

उन्हें इस बात का डर था कि यदि विपक्षी दलों के सांसद एक खास कंपनी को सुविधा उपलब्ध कराने के मामले पर ज़्यादा शोरगुल करते हैं तो वित्त मंत्री शायद कुछ न कर पाएं और कर में छूट के फैसले को पिछली तारीख़ से लागू करने की संभावना ही ख़त्म हो जाएगी. सिंह भाजपा नेता अरुण शौरी पर अनिल अंबानी का पक्ष लेने का आरोप लगाते हैं और यह भी बताते हैं कि उन्होंने वेंकैया नायडू से कहकर शौरी की जगह दूसरे नेता को इस मामले पर संसद में पार्टी का मुख्य वक्ता बनवा दिया है. बिहार से जदयू के टिकट पर संसद पहुंचे सिंह राडिया से पूछते हैं कि मुकेश अंबानी वेंकैया नायडू को कितना जानते हैं. राडिया बताती हैं कि आरआईएल के एक वरिष्ठ अधिकारी पी एम एस प्रसाद नायडू को अच्छी तरह जानते हैं. इस पर सिंह कहते हैं कि मैं आज ही प्रसाद को वेंकैया से मिलाने का प्रबंध करता हूं, क्योंकि पार्टी के पहले वक्ता के रूप में यदि वेंकैया नायडू पार्टी का स्टैंड ले लेते हैं तो शौरी चाहकर भी उससे ज़्यादा अलग नहीं बोल सकते. हमारी पहली चिंता यही है कि हमें संसद में होने वाली बहस को सुनियोजित करना होगा, क्योंकि यदि ऐसा नहीं हुआ और कर में राहत दिलाने में हम कामयाब नहीं होते हैं तो यह एक बड़ा झटका होगा. हम यह नहीं जानते कि एन के सिंह की इच्छा के अनुरूप पी एम एस प्रसाद वेंकैया नायडू से मिले या नहीं, लेकिन दो दिनों बाद उन्होंने संसद में जो भाषण दिया, वह कुछ इस प्रकार था, बंगाल की खाड़ी भारत का नया उत्तरी सागर बन चुकी है. सरकार के विभागों को इस मुद्दे पर झगड़ना नहीं चाहिए कि खनिज तेल प्राकृतिक गैस है या नहीं. तेल खदानों की खुदाई या आधारभूत संरचना के क्षेत्र में राहत का जो भी मामला है, वह देश की ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ा है. नायडू के इस भाषण में पेट्रोलियम मंत्रालय द्वारा वित्त मंत्रालय को लिखी गई उस चिट्ठी की बू आती है, जिसमें प्राकृतिक गैस के लिए भी खनिज तेल की तरह कर में छूट की मांग की गई थी. पेट्रोलियम मंत्रालय प्राकृतिक गैस को केवल न्यू एक्सप्लोरिंग लाइसेंसिंग राउंड-3 के प्रावधानों के तहत ही कर में छूट से संतुष्ट नहीं था, क्योंकि रिलायंस इंडस्ट्रीज का केजी बेसिन इसके दायरे में नहीं आता था, लेकिन राजस्व सचिव ने पेट्रोलियम मंत्रालय की इस मांग को मानने से इंकार कर दिया था.

कुछ रिकॉर्डिंग्स में हम पत्रकारों और संपादकों, जिनका असल काम ख़बर देना और बेबाक विश्लेषण करना है, को कॉरपोरेट घरानों की आपसी लड़ाई में सिपाही और संदेशवाहक बनने की पेशकश करते हुए देखते हैं. इन टेपों में हम रंजन भट्टाचार्य को भी देखते हैं, जिनकी एकमात्र राजनीतिक पहचान भाजपा के एक बड़े नेता से पारिवारिक रिश्ता है. रंजन कांग्रेस नेताओं, खासकर गुलाम नबी आज़ाद से अपनी नजदीकियों की चर्चा करते हुए नजर आते हैं तो यह दावा भी करते हैं कि वह जब चाहें, एसजी बॉस को संदेश भेज सकते हैं. यहां एसजी बॉस से मतलब कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से है. मुकेश अंबानी की चर्चा करते हुए रंजन कहते हैं कि मुकेश के लिए कांग्रेस अपनी दुकान की तरह है. यह हो सकता है कि रंजन अपनी पहचान और प्रभाव के बारे में झूठ बोल रहे हों, लेकिन राडिया को छोटा-मोटा ठग मानने की ग़लती हम नहीं कर सकते. देश के सबसे बड़े उद्योगपतियों में शुमार किए जाने वाले रतन टाटा आज भले ही देश में छद्म पूंजीवाद के बारे में भारी-भरकम बयान दे रहे हों, भारत के टुकड़ों में बंट जाने के ख़तरे के प्रति आगाह कर रहे हों, लेकिन इन टेपों में उनकी असलियत भी उजागर हो जाती है. वह अपनी पीआर एजेंट नीरा राडिया के माध्यम से ए राजा को संचार मंत्री बनाए जाने के लिए लॉबिंग करते नज़र आते हैं.

दूरसंचार के अलावा राडिया के ये टेप अंबानी बंधुओं के बीच गैस विवाद पर भी रोशनी डालते हैं. इस विवाद में मुकेश अंबानी ने गैस एक राष्ट्रीय संसाधन है के तर्क का मीडिया की मदद से बड़ी दक्षता से इस्तेमाल किया था. दूसरी ओर सांसदों के साथ अपने व्यक्तिगत संबंधों की मदद से उन्होंने कृष्णा गोदावरी बेसिन में अपनी कंपनी के लिए टैक्स में छूट के लिए हरसंभव कोशिश भी की थी. ऐसा करते व़क्त तेल के राष्ट्रीय संसाधन होने का तर्क वह बड़ी सफाई से भूल गए थे.

मनमोहन सिंह सरकार द्वारा साल 2008 और 2009 में स्पेक्ट्रम आवंटन यदि स्वतंत्र भारत के सबसे बड़े घोटालों में से एक है, तो मई 2009 में जब यूपीए दोबारा सत्ता में लौटा था और रतन टाटा, सुनील मित्तल और मुकेश अंबानी जैसे बड़े उद्योगपति जिस तरह अपनी पसंद के संचार मंत्री के लिए लॉबिंग कर रहे थे, वह इस पूरे घटनाक्रम का एक महत्वपूर्ण पहलू है. लेकिन राडिया के साथ घालमेल में शामिल रहे किसी भी पत्रकार ने इस ख़बर के बारे में कुछ नहीं बताया. द्रमुक के नेताओं के बीच आपसी सिर फुटौव्वल या द्रमुक और कांग्रेस के बीच की खींचतान से भी ज़्यादा बड़ी ख़बर कैबिनेट के गठन में बड़े औद्योगिक घरानों की भूमिका थी और इसे मीडिया में सुर्ख़ियां मिलनी चाहिए थी. राडिया सुनील मित्तल और एटी एंड टी कंपनी के बारे में बताती हैं कि वे टाइम्स नाउ न्यूज़ चैनल की मदद से ऐसी ख़बरें प्रचारित करा रहे थे कि संचार मंत्री बनने की होड़ में दयानिधि मारन सबसे आगे हैं और ए राजा को अपनी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व का समर्थन हासिल नहीं है. वहीं ख़ुद राडिया बरखा दत्त और शंकर अय्यर जैसे बड़े पत्रकारों की मदद से एनडीटीवी और हेडलाइंस टुडे जैसे चैनलों पर इसके विपरीत ख़बरें प्रचारित कराने की रणनीति पर काम कर रही थीं, ताकि संचार मंत्रालय ए राजा को मिल सके. द्रविड़ मुनेत्र कड़गम के अंदर चल रही उठापटक के बारे में जानने के लिए राडिया को एक सूत्र के रूप में इस्तेमाल करने से ज़्यादा ज़रूरत इस बात की थी कि एक ऐसे मंत्री, जिसकी छवि उस समय भी संदेह से परे नहीं थी, को कैबिनेट में स्थान दिलाने के लिए उनकी और उनके क्लाइंट्‌स की भूमिका का खुलासा किया जाए. लेकिन दिल्ली तो सत्ता के मठाधीशों का केंद्र स्थल है और सत्ता का नशा ही कुछ ऐसा होता है कि उसके साथ नज़दीकियां आपके सोचने-समझने की क्षमता को शिथिल कर देती हैं. भारतीय पत्रकारों को आज सबसे बड़ी ज़रूरत दूरियां बढ़ाने की है राजनीतिज्ञों एवं उद्योगपतियों से. लाल गोली को निगलने का फैसला कभी भी क्यों न लिया जाए, लेकिन कभी नहीं से तो देर ही भली.

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