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फकीर की याद में तकदीर की तलाश

पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह को गुजरे दो बरस हो गए. उनकी पुण्यतिथि चुपके  से गुजर गई. कोई बड़ा आयोजन नहीं हुआ. पिछड़े वर्ग के हिमायती बनने वाले तमाम संगठनों को भी उनकी याद नहीं आई. पिछड़ों की राजनीति के दम पर मुख्यमंत्री बनने वाले नेता भी उन्हें भूल गए. उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में एक कार्यक्रम हुआ, जो पूरी तरह ग़ैर राजनीतिक था. इस आयोजन के ज़रिए कुछ सवाल उठे, जो आज के दौर में भी मौजूद हैं. मसलन विश्वनाथ प्रताप सिंह ने मंडल आयोग की स़िफारिशें जिस मक़सद से लागू कीं, क्या वह पूरा हो सका, पिछड़े वर्ग में राजनीतिक चेतना आई, उनका आर्थिक स्तर कितना सुधर सका? सामाजिक और शैक्षिक स्तर पर पिछड़े कितने अगड़े हुए? अकलियतों के विकास के लिए वीपी सिंह ने जो प्रयास किए, वे आज के  संदर्भ में कितने सफल दिखाई देते हैं? इन सवालों के घेरे में पिछड़े और अल्पसंख्यकों, खास तौर पर मुस्लिम समाज के वे तमाम नेता आते हैं, जिन्होंने खुद को इनका रहनुमा घोषित कर रखा है. भ्रष्टाचार के  खिला़फ वीपी सिंह ने ही पहली बार आवाज़ बुलंद की, लेकिन आज प्रधानमंत्री कार्यालय तक सवालों के घेरे में है. कॉमनवेल्थ गेम्स में हुए भ्रष्टाचार से देश शर्मसार है, वहीं बैंकों से लोन दिलाने में घपलेबाज़ी को मामूली बात कहकर पल्ला झाड़ने की कोशिशें हो रही हैं.

उर्दू-अरबी-फारसी विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर अनीस अंसारी ने देश की सियासत में पिछड़ों के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण की आवाज़ बुलंद की. उनका कहना था कि जिस तरह दलितों के लिए विधानसभा और लोकसभा की सीटों में आरक्षण का प्रावधान है, ठीक उसी तरह पिछड़ों को भी उनकी आबादी के हिसाब से सीटें दी जाएं. अनीस अंसारी राजनीतिज्ञ नहीं हैं, वह प्रदेश के वरिष्ठ नौकरशाह भी रहे हैं.अंसारी सा़फ कहते हैं कि संविधान में पहले यह कहीं नहीं लिखा था कि हिंदुओं में जो दलित या पिछड़े हैं, केवल उन्हें ही आरक्षण का लाभ मिले.

जननायक विश्वनाथ प्रताप सिंह मेमोरियल सोसाइटी की तऱफ से लखनऊ के अंबेडकर महासभा परिसर में 27 नवंबर को आयोजित स्मृति सभा में प्रमुख वक्ताओं ने अपने जो विचार रखे, यह उसका लब्बोलुबाव है. पूर्व प्रधानमंत्री को श्रद्धांजलि देने के लिए आयोजित इस ग़ैर सरकारी कार्यक्रम में खास तौर पर चौथी दुनिया के प्रधान संपादक संतोष भारतीय दिल्ली से लखनऊ आए. इसके अलावा उर्दू-अरबी-फारसी विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर अनीस अंसारी और वीपी सिंह के अंतरंग रहे राजनीतिज्ञएवं समाजसेवी अशोक सिंह मुख्य वक्ताओं में शामिल थे.

संतोष भारतीय वीपी सिंह के  कार्यकाल में फर्रुखाबाद से चुनाव जीतकर संसद पहुंचे थे. भारतीय ने वीपी सिंह के सिद्धांतों और प्रतिबद्धताओं का उल्लेख किया और कहा कि उनका पूरा जीवन हाशिए पर रहने वाले लोगों के  लिए संघर्ष करने की गाथा है. शायद देश में पहली बार संतोष भारतीय ने ही वीपी सिंह की किडनी फेल होने की अंतर्कथा उजागर की. संतोष भारतीय ने कहा कि बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद मुंबई में दंगा फैलने पर धार्मिक उन्माद से दुखी वीपी सिंह आमरण अनशन पर बैठ गए, हफ्ते भर उन्होंने पानी तक नहीं पिया और जब सरकार ने उन्हें जबरन गिरफ़्तार कर लिया और अस्पताल में भर्ती कराया, तब तक उनकी किडनी फेल हो चुकी थी. हर दूसरे दिन डायलिसिस पर रहने की पीड़ा झेलने के बावजूद वीपी सिंह किसानों, ग़रीबों और अल्पसंख्यकों के लिए लगातार संघर्ष करते रहे. इसके बाद का जीवन उन्होंने का़फी कष्ट सहकर व्यतीत किया, लेकिन ग़रीबों की लड़ाई वह मौत के दो दिन पहले तक लड़ते रहे. यहां तक कि उनकी मौत भी किसानों की पीड़ा अभिव्यक्त करते हुए ही हुई. वीपी सिंह के  नज़रिए से देखें तो बिहार चुनाव उम्मीद की एक किरण है. बिहार में वीपी सिंह का सपना पूरा होता नज़र आता है. इसके  नतीजे बताते हैं कि विकास, इज़्ज़त और आर्थिक समृद्धि में हिस्सेदारी की चाहत नीचे तक पहुंचने लगी है. अब ज़रूरत बस मुल्क के  खामोश तबके  तक उसके  हितों की बात पहुंचाने भर की है.

उर्दू-अरबी-फारसी विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर अनीस अंसारी ने देश की सियासत में पिछड़ों के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण की आवाज़ बुलंद की. उनका कहना था कि जिस तरह दलितों के लिए विधानसभा और लोकसभा की सीटों में आरक्षण का प्रावधान है, ठीक उसी तरह पिछड़ों को भी उनकी आबादी के हिसाब से सीटें दी जाएं. अनीस अंसारी राजनीतिज्ञ नहीं हैं, वह प्रदेश के वरिष्ठ नौकरशाह भी रहे हैं.

अंसारी सा़फ कहते हैं कि संविधान में पहले यह कहीं नहीं लिखा था कि हिंदुओं में जो दलित या पिछड़े हैं, केवल उन्हें ही आरक्षण का लाभ मिले. यह व्यवस्था राजनीतिक लाभ और मुसलमानों को पीछे धकेलने के इरादे से बाद में की गई, जो मजहब के  नाम पर ग़रीब तबके को बांटने की साजिश है. उन्होंने पिछड़ों के लिए सियासी आरक्षण के साथ ही मुसलमानों और ईसाइयों में दलितों को भी आरक्षण का लाभ देने की वकालत की. वीपी सिंह की राजनीतिक यात्रा में उनके  साथ रहे वरिष्ठ राजनीतिज्ञ एवं राजद के उत्तर प्रदेश अध्यक्ष अशोक कुमार सिंह ने कहा कि विश्वनाथ प्रताप सिंह को पिछड़ों के आरक्षण के दायरे में संकुचित करके देखने की नहीं, बल्कि जातिविहीन, सांप्रदायिकताविहीन समाज के  उनके प्रयासों को व्यापक सिद्धांतों के दायरे में रखकर समझने की ज़रूरत है. वीपी सिंह के  विशाल व्यक्तित्व को पिछड़ों के दायरे में रखना छोटापन होगा. वह हमेशा जातिविहीन समाज का सपना देखते थे, लिहाज़ा हमें जातिवादी प्रलोभनों के बजाय वृहत्तर मानसिकता से काम करना चाहिए, यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी. कई अन्य वक्ताओं ने अपने संस्मरणों में कहा कि वीपी सिंह ने ही चुनाव से लेकर सियासत तक में व्याप्त भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाया. पिछड़े वर्ग की तमाम जातियों के लिए मंडल आयोग की स़िफारिशें लागू कराकर उन्हें सरकारी नौकरियों, शैक्षिक संस्थानों में अवसर उपलब्ध कराए. वीपी सिंह के इन क़दमों से देश में पिछड़ों-दलितों की राजनीति का दौर शुरू हुआ. इसके बलबूते ही उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव, कल्याण सिंह और मायावती को मुख्यमंत्री बनने का मौक़ा मिला तो बिहार की राजनीति में लालू यादव, नीतीश कुमार, शरद यादव चमके. फिर भी सरकारी नौकरियों में हज़ारों की संख्या में आरक्षित पद रिक्त हैं.

उत्तर प्रदेश की बात करें तो यहां की मौजूदा मुख्यमंत्री मायावती ने ज़रूर अभियान चलाकर इन पदों को भरने की कोशिश की, लेकिन उनका यह प्रयास एक जाति विशेष तक ही सिमट कर रह गया. यही हाल मुलायम सिंह का रहा. उनके समय में भी यादवों को ही पिछड़ा माना गया तो कल्याण सिंह के  जमाने में लोधी और कुर्मी. इस दौड़ में अति पिछड़े गुम हो गए, जिन्हें केवल वोट लेने के लिए ही पिछड़ों में गिना जाता रहा है. वीपी सिंह ने अति पिछड़े समाज के विकास की जिस परिकल्पना के  साथ मंडल आयोग और सामाजिक न्याय का ताना-बाना बुना था, वह पिछड़ों के अगड़ों ने हाईजैक कर लिया. इस हक़ीक़त को भांपकर ही बिहार में नीतीश कुमार ने अति पिछड़ी जातियों के लिए अलग से आरक्षण की व्यवस्था की, इसका मीठा फल भी उन्हें बिहार विधानसभा चुनाव में मिला. जननायक वीपी सिंह मेमोरियल सोसाइटी के अध्यक्ष अब्दुल नसीर नासिर ने यह मसला भी उठाया कि वीपी सिंह अगर स्वास्थ्यगत कारणों से सक्रिय राजनीति से अलग न होते तो शायद दलितों की तरह पिछड़ों के लिए संसद और विधानसभाओं में सीटों के आरक्षण का लाभ मिल जाता. महिला आरक्षण के मसले पर संसद ठप्प कर देने वाली यादव तिकड़ी मुलायम, लालू और शरद ने पिछड़ों के  लिए इस सियासी आरक्षण की मांग को पूरा कराने की ईमानदार कोशिश कभी नहीं की. बात स़िर्फ सियासी आरक्षण या भ्रष्टाचार के मसले तक ही सीमित नहीं रही, वीपी सिंह के व्यक्तित्व के तमाम अनछुए पहलुओं पर भी विस्तार से चर्चा हुई.

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