Now Reading:
आदिवासी महिलाओं ने बदली गांव की तस्‍वीर

आदिवासी महिलाओं ने बदली गांव की तस्‍वीर

आदिवासी समुदाय के हौसले को तो हमेशा ही सराहा जाता रहा है. एक बार फिर से उन्होंने कुछ ऐसा कर दिखाया है, जो काबिले तारी़फ है. हम बात कर रहे हैं मिर्जापुर ज़िले की आदिवासी महिलाओं की. जी हां मिर्जापुर ज़िले के लालगंज क्षेत्र की आदिवासी महिलाओं ने अपनी मेहनत और लगन से इस गांव की तस्वीर बदल दी है. वर्षों से पानी की समस्या से जुझ रहीं यहां कि महिलाओं ने यहां तीन किलोमीटर लंबी नहर खोदकर गांव-घर और खेतों तक पानी पहुंचा दिया है.

जिस पानी को लाने के लिए गांव वालों ने रात दिन एक कर दिया उसके बर्बाद होने से गांव वालों को बेहद दुख हुआ. लेकिन इस समस्या का भी जल्द ही उन्होंने कारगर हल निकाल लिया. पहले  तो पानी को उन्होंने सूखे पड़े सभी कुओं में डाला. इसके बाद सारे बावड़ियों में पानी डाला गया. तालाबों में पानी भर जाने से जानवरों को भी पीने का पानी मिलने लगा. अब कृषि कार्य भी कोई मुश्किल नहीं था, अब ये लोग कृषि पर पर्याप्त ध्यान देने लगे. जिससे उनके खेतों में ही नहीं बल्कि जीवन में भी ख़ुशहाली लौट आई.

जंगलों में बेकार बह रहे पानी की धारा का रूख़ बदलने से यहां न केवल पेयजल की समस्या से निजात मिली है बल्कि इला़के का जल स्तर भी बढ़ा है. भू जलस्तर ऊपर बढ़ने से बंजर पड़ी ज़मीनों में जान लौट आई है और इससे खेतों में फसलें लहलहाने लगी है. यहां कि महिलाओं के जी-तो़ड मेहनत से यह संभव हुआ है. लालगंज ब्लॉक मिर्जापुर ज़िला मुख्यालय 30 किलोमीटर की दूरी पर विंध्याचल की तलहटी में बसा है. यहां पर सालों भर जलस्तर सामान्य से नीचे ही रहता है. सूखा प्रभावित क्षेत्र होने की वजह से हर साल यहां गर्मी के मौसम में लोगों का जीना मुश्किल हो जाता है. लोग पानी के बूंद के लिए भी तरस जाते हैं. वर्षों से पानी की समस्या से जूझ रहें आदिवासियों ने इस समस्या का हल ढूंढ निकाला. मंजिल कठिन थी पर बुलंद हौसले ने उन्हें कामयाबी दिलाई. यहां कि महिलाओं ने पहाड़ की तलहटी से निकल रहे पानी की धारा को गांव तक पहुंचाने में सफलता पाई. तीन किलोमीटर लंबी नहर खोदकर जंगल में बेकार बह रहे पानी की धारा का रूख़ गांव की ओर मोड़ दिया. नहर के ज़रिए खेतों और गांव को पानी मिलने से पानी की समस्या का समाधान हो गया. यहां अब रोज़ाना की ज़रूरतों के साथ ही खेती के लिए भी पानी की कोई कमी नहीं है. यहां पानी के आ जाने से लोगों का जीवन ख़ुशहाल हो गया है. पहले यहां के लोग मेहनत मज़दूरी करके जीवन यापन करते थे, वहीं अब अपनी फसल उगाने लगे हैं. इस इलाक़े में हरियाली और ख़ुशहाली लौटाने का श्रेय यहां की मेहनतकश महिलाओं को जाता है. जिन्होंने पिछले तीन साल से जीतो़ड मेहनत कर सफलता प्राप्त की. इन महिलाओं को लोग सम्मान भरी निगाहों से देखते हैं. बंजर पड़ी ज़मीनों को देखकर हमेशा उनके अंदर इन ज़मीनों में फसल उगाने की इच्छा होती थी. पर प्रश्न यह था कि कैसे? पानी की समस्या से अधिकतर यहां की महिलाओं को ही दो-चार होना प़डता था. ऐसे में इस समस्या का समाधान भी यहां कि महिलाओं ने ही निकाला. महिलाओं ने पुरुषों का इसके प्रति रवैय्या प्रतिकूल होने की वजह से ख़ुद आगे आई. महिलाएं पहाड़ की तलहटी से निकलने वाली पानी को देखती तो सोचती कि कैसे यह पानी उनके काम आ सकता है. फिर उन्होंने सोचा क्यों न इस पानी का रुख़ गांव की तऱफ मोड़ दिया जाए. हालांकि यह एक चुनौती भरा काम था, पर उन्होंने इस चुनौती को स्वीकार किया. कहते हैं एकता में बल होता है. इसे सच कर दिखाया महिलाओं ने. पहले तो गांव की महिलाओं ने एक संगठन बनाया. नहर खोदने वाली महिलाओं की इस संगठन का राजकली नाम की एक महिला ने नेतृत्व किया. बैठक कर सभी महिलाओं ने गांव की समस्या और उसके समाधान के बारे में आम राय बनाई. योजना के अनुसार मेहनत मज़दूरी के बाद जो भी व़क्त मिलता था महिलाएं नहर खुदाई के काम में लग जाती थी. यह कार्य एक दिन में संभव नहीं था, पर कहते है कि परिश्रम का फल मीठा होता, उन्हें भी उनके जी-तो़ड मेहनत का फल मिला. पहा़ड की खुदाई के दौरान किसी भी सदस्य पर दबाव नहीं होता था. चट्टान और पत्थर तोड़कर नहर निकालने का यह सिलसिला निरंतर तीन वर्षों तक चलता रहा. फिर वह दिन आ ही गया जब जलधारा जंगल छोड़कर गांव की ओर बहने लगी. लोगों के सपने सच हुए गांव में नहर के प्रवेश करते हीं लोगों का उत्साह काफी ब़ढ गया. पहले यहां के मर्द महिलाओं के काम में हाथ नहीं बंटाते थे, वहीं महिलाओं के जज़्बे को देखकर उनमें काफी परिवर्तन आया. उन्होंने महिलाओं के कार्यों में हाथ बंटाना शुरू कर दिया. मर्दों का साथ मिलने से महिलाएं भी काफी उत्साहित हुईं परिणाम यह हुआ कि नहर के खुदाई का काम जल्द ही पूरा हो गया. महिलाओं के इस कोशिश से गांव और खेतों तक पानी पहुंच तो गया लेकिन योजनाबद्ध तरीक़े से कार्यों के न होने से पानी बेकार जाने लगा. जिस पानी को लाने के लिए गांव वालों ने रात दिन एक कर दिया उसके बर्बाद होने से गांव वालों को बेहद दुख हुआ. लेकिन इस समस्या का भी जल्द ही उन्होंने कारगर हल निकाल लिया. पहले  तो पानी को उन्होंने सूखे पड़े सभी कुओं में डाला. इसके बाद सारे बावड़ियों में पानी डाला गया. तालाबों में पानी भर जाने से जानवरों को भी पीने का पानी मिलने लगा. अब कृषि कार्य भी कोई मुश्किल नहीं था, अब ये लोग कृषि पर पर्याप्त ध्यान देने लगे. जिससे उनके खेतों में ही नहीं बल्कि जीवन में भी ख़ुशहाली लौट आई. इंसान ही नहीं जानवरों के जीवन में भी बहार आ गई. अब जानवरों को भी पानी और चारे की कोई समस्या नहीं रही. ज़मीन में नमी आ जाने से घास उगने लगी. इससे मवेशियों को भरपेट चारा भी मिलने लगा. इससे यहां पशुपालन भी आरंभ हो गया. खेतों में सिंचाई के लिए उन्होंने नया तरीक़ा अपनाया. लोग विवेकानुसार सिंचाई के लिए आवश्यकतानुसार फाटक खोलते थे और सिंचाई होते ही फाटक को बंद कर दिया जाता था. इस तरह जल की बर्बादी पर भी काबू पा लिया गया इन महिलाओं के प्रयासों के बदौलत ही तीन किलोमीटर लंबी नहर की खुदाई के बाद गांव तक पानी पहुंचा. महिलाओं की इस कामयाबी से ख़ुश होकर ज़िला प्रशासन ने भी भरपूर मदद का आश्वासन दिया.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Input your search keywords and press Enter.