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कब लगेगा गौ हत्‍या पर प्रतिबंध

भारत में गौ हत्या को लेकर कई आंदोलन हुए हैं और कई आज भी जारी हैं, लेकिन किसी में भी कोई ख़ास कामयाबी हासिल नहीं हो सकी. इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि उन्हें जनांदोलन का रूप नहीं दिया गया. यह कहना क़तई ग़लत न होगा कि ज़्यादातर आंदोलन स़िर्फ अपनी सियासत चमकाने या चंदा उगाही तक सीमित रहे. अल कबीर स्लास्टर हाउस में रोज़ हज़ारों गाय काटी जाती हैं. कुछ साल पहले हिंदुत्ववादी संगठनों ने इसके ख़िलाफ़ मुहिम भी छेड़ी थी, लेकिन जैसे ही यह बात सामने आई कि इसका मालिक ग़ैर मुसलमान है तो अभियान को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया. जगज़ाहिर है, गौ हत्या से सबसे बड़ा फ़ायदा तस्करों एवं गाय के चमड़े का कारोबार करने वालों को होता है. इनके दबाव के कारण ही सरकार गौ हत्या पर पाबंदी लगाने से गुरेज़ करती है. वरना क्या वजह है कि जिस देश में गाय को माता के रूप में पूजा जाता हो, वहां सरकार गौ हत्या रोकने में नाकाम है.

हैरत की बात यह है कि गौ हत्या पर पाबंदी लगाने की मांग लंबे समय से चली आ रही है. इसके बावजूद अभी तक इस पर कोई विशेष अमल नहीं किया गया, जबकि मुस्लिम शासनकाल में गौ हत्या पर सख्त पाबंदी थी. क़ाबिले ग़ौर है कि भारत में मुस्लिम शासन के दौरान कहीं भी गौकशी को लेकर हिंदू और मुसलमानों में टकराव देखने को नहीं मिलता.

ग़ौरतलब है कि देश में बड़े पैमाने पर गौकशी होती है. यह सब गौ मांस और उसके अवशेषों के लिए किया जाता है, जिससे भारी मुनाफ़ा होता है. मांस के लिए गायों को तस्करी के ज़रिए पड़ोसी देशों में भेजा जाता है. इस सबकी वजह से सवा अरब से ज़्यादा की आबादी वाले इस देश में दुधारू पशुओं की तादाद महज़ 16 करोड़ है. केंद्र सरकार के डिपार्टमेंट ऑफ़ एनिमल हसबेंडरी के मुताबिक़, 1951 में 40 करोड़ की आबादी पर 15 करोड़ 53 लाख पशु थे. इसी तरह 1962 में 93 करोड़ की आबादी पर 20 करोड़ 45 लाख, 1977 में 19 करोड़ 47 लाख, 2003 में 18 करोड़ 51 लाख 80 हज़ार पशु बचे और 2009 में यह तादाद घटकर महज़ 16 करोड़ रह गई. पशुधन विभाग के मुताबिक़, उत्तर प्रदेश में 314 वधशालाएं हैं. इनकी वजह से हर साल लाखों पशु कम हो रहे हैं. केरल में 2002 में एक लाख 11 हज़ार 665 दुधारू पशु थे, जो 2003 में घटकर 64 हज़ार 618 रह गए. राजधानी दिल्ली में 19.13 फ़ीसदी दुधारू पशु कम हुए हैं, जबकि गायों की दर 38.63 फ़ीसदी घटी है. यहां महज़ छह हज़ार 539 गाय हैं, जबकि दो लाख तीन हज़ार भैंसें हैं. मिज़ोरम में 34 हज़ार 988 गाय एवं सांड हैं, जो पिछले साल के मुक़ाबले 1.60 फ़ीसदी कम हैं. तमिलनाडु में 55 लाख 93 हज़ार 485 भैंसें और 16 लाख 58 हज़ार 415 गाय हैं.

हैरत की बात यह है कि गौ हत्या पर पाबंदी लगाने की मांग लंबे समय से चली आ रही है. इसके बावजूद अभी तक इस पर कोई विशेष अमल नहीं किया गया, जबकि मुस्लिम शासनकाल में गौ हत्या पर सख्त पाबंदी थी. क़ाबिले ग़ौर है कि भारत में मुस्लिम शासन के दौरान कहीं भी गौकशी को लेकर हिंदू और मुसलमानों में टकराव देखने को नहीं मिलता. अपने शासनकाल के आख़िरी साल में जब मुगल बादशाह बाबर बीमार हो गया तो उसके प्रधान ख़ली़फा निज़ामुद्दीन के हुक्म पर सिपहसालार मीर बाक़ी ने अवाम को परेशान करना शुरू कर दिया. जब इसकी ख़बर बाबर तक पहुंची तो उन्होंने क़ाबुल में रह रहे अपने बेटे हुमायूं को एक पत्र लिखा. बाबरनामे में दर्ज इस पत्र के मुताबिक़, बाबर ने अपने बेटे हुमायूं को नसीहत करते हुए लिखा-हमारी बीमारी के दौरान मंत्रियों ने शासन व्यवस्था बिगाड़ दी है, जिसे बयान नहीं किया जा सकता. हमारे चेहरे पर कालिख पोत दी गई है, जिसे पत्र में नहीं लिखा जा सकता. तुम यहां आओगे और अल्लाह को मंजूर होगा, तब रूबरू होकर कुछ बता पाऊंगा. अगर हमारी मुलाक़ात अल्लाह को मंजूर न हुई तो कुछ तजुर्बे लिख देता हूं, जो हमें शासन व्यवस्था की बदहाली से हासिल हुए हैं, जो तुम्हारे काम आएंगे.

1.      तुम्हारी ज़िंदगी में धार्मिक भेदभाव के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए. तुम्हें निष्पक्ष होकर इंसाफ़ करना चाहिए. जनता के सभी वर्गों की धार्मिक भावना का हमेशा ख्याल रखना चाहिए.

2.      तुम्हें गौ हत्या से दूर रहना चाहिए. ऐसा करने से तुम हिंदुस्तान की जनता में प्रिय रहोगे. इस देश के लोग तुम्हारे आभारी रहेंगे और तुम्हारे साथ उनका रिश्ता भी मज़बूत हो जाएगा.

3.      तुम किसी समुदाय के धार्मिक स्थल को न गिराना. हमेशा इंसाफ़ करना, जिससे बादशाह और प्रजा का संबंध बेहतर बना रहे और देश में भी चैन-अमन क़ायम रहे.

हदीसों में भी गाय के दूध को फ़ायदेमंद और मांस को नुक़सानदेह बताया गया है-

1.      उम्मुल मोमिनीन (हजरत मुहम्मद साहब की पत्नी) फरमाती हैं कि नबी-ए-करीम हज़रत मुहम्मद सल फ़रमाते हैं कि गाय का दूध व घी फ़ायदेमंद है और गोश्त बीमारी पैदा करता है.

2.      नबी-ए-करीम हज़रत मुहम्मद सल. फ़रमाते हैं कि गाय का दूध फ़ायदेमंद है, घी इलाज है और गोश्त से बीमारी बढ़ती है.

(इमाम तिबरानी व हयातुल हैवान)

3.      नबी-ए-करीम हजरत मुहम्मद सल. फ़रमाते हैं कि तुम गाय के दूध और घी का सेवन किया करो और गोश्त से बचो, क्योंकि इसका दूध और घी फ़ायदेमंद है और इसके गोश्त से बीमारी पैदा होती है.

(इबने मसूद रज़ी व हयातुल हैवान)

4.      नबी-ए-करीम हज़रत मुहम्मद सल. फ़रमाते हैं कि अल्लाह ने दुनिया में जो भी बीमारियां उतारी हैं, उनमें से हर एक का इलाज भी दिया है. जो इससे अंजान है वह अंजान ही रहेगा. जो जानता है, वह जानता ही रहेगा. गाय के घी से ज़्यादा स्वास्थ्यवर्द्धक कोई चीज़ नहीं है.

(अब्दुल्लाबि मसूद हयातुल हैवान)

क़ुरआन में कई आयतें ऐसी हैं, जिनमें दूध और ऊन देने वाले पशुओं का ज़िक्र किया गया है.

भारत में गौ हत्या को बढ़ावा देने में अंग्रेज़ों ने अहम भूमिका निभाई. जब 1700 ई. में अंग्रेज़ भारत आए थे, उस वक़्त यहां गाय और सुअर का वध नहीं किया जाता था. हिंदू गाय को पूजनीय मानते थे और मुसलमान सुअर का नाम तक लेना पसंद नहीं करते थे, लेकिन अंग्रेजों को इन दोनों ही पशुओं के मांस की ज़रूरत थी. इसके अलावा वे भारत पर क़ब्ज़ा करना चाहते थे. उन्होंने मुसलमानों को भड़काया कि क़ुरआन में कहीं भी नहीं लिखा है कि गाय की क़ुर्बानी हराम है. इसलिए उन्हें गाय की क़ुर्बानी करनी चाहिए. उन्होंने मुसलमानों को लालच भी दिया और कुछ लोग उनके झांसे में आ गए. इसी तरह उन्होंने दलित हिंदुओं को सुअर के मांस की बिक्री कर मोटी रकम कमाने का झांसा दिया. ग़ौरतलब है कि यूरोप दो हज़ार बरसों से गाय के मांस का प्रमुख उपभोक्ता रहा है. भारत में अपने आगमन के साथ ही अंग्रेज़ों ने यहां गौ हत्या शुरू करा दी. 18वीं सदी के आख़िर तक बड़े पैमाने पर गौ हत्या होने लगी. अंग्रेज़ों की बंगाल, मद्रास और बंबई प्रेसीडेंसी सेना के रसद विभागों ने देश भर में कसाईखाने बनवाए. जैसे-जैसे यहां अंग्रेज़ी सेना और अधिकारियों की तादाद बढ़ने लगी, वैसे-वैसे गौ हत्या में भी बढ़ोत्तरी होती गई.

गौ हत्या और सुअर हत्या की आड़ में अंग्रेज़ों को हिंदू और मुसलमानों में फूट डालने का भी मौक़ा मिल गया. इस दौरान हिंदू संगठनों ने गौ हत्या के ख़िला़फ मुहिम छेड़ दी. आख़िरकार महारानी विक्टोरिया ने वायसराय लैंस डाउन को पत्र लिखा. महारानी ने कहा, हालांकि मुसलमानों द्वारा की जा रही गौ हत्या आंदोलन का कारण बनी है, लेकिन हक़ीक़त में यह हमारे ख़िलाफ़ है, क्योंकि मुसलमानों से कहीं ज़्यादा गौ वध हम कराते हैं. इसके ज़रिए ही हमारे सैनिकों को गौ मांस मुहैया हो पाता है. आख़िरी मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र ने भी 28 जुलाई, 1857 को बकरीद के मौक़े पर गाय की क़ुर्बानी न करने का फ़रमान जारी किया था. साथ ही चेतावनी दी थी कि जो भी गौ वध करने या कराने का दोषी पाया जाएगा, उसे मौत की सज़ा दी जाएगी. इसके बाद 1892 में देश के विभिन्न हिस्सों से सरकार को हस्ताक्षरयुक्त पत्र भेजकर गौ वध पर रोक लगाने की मांग की जाने लगी. इन पत्रों पर हिंदुओं के साथ मुसलमानों के भी हस्ताक्षर होते थे. इस समय भी देशव्यापी अभियान चलाया जा रहा है, जिसमें केंद्र सरकार से गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने और भारतीय गौवंश की रक्षा के लिए कठोर क़ानून बनाए जाने की मांग की जा रही है.

गाय की रक्षा के लिए अपनी जान देने में भारतीय मुसलमान किसी से पीछे नहीं हैं. उत्तर प्रदेश के सहारनपुर ज़िले के गांव नंगला झंडा निवासी डॉ. राशिद अली ने गौ तस्करों के ख़िलाफ़ मुहिम छेड़ रखी थी, जिसके चलते 20 अक्टूबर, 2003 को उन पर जानलेवा हमला किया गया और उनकी मौत हो गई. उन्होंने 1998 में गौ रक्षा का संकल्प लिया था और तभी से डॉक्टरी का पेशा छोड़कर वह अपनी मुहिम में जुट गए थे. गौ वध को रोकने के लिए विभिन्न मुस्लिम संगठन भी सामने आए हैं. दारूल उलूम देवबंद ने एक फ़तवा जारी करके मुसलमानों से गौ वध न करने की अपील की है. दारूल उलूम देवबंद के फतवा विभाग के अध्यक्ष मुती हबीबुर्रहमान का कहना है कि भारत में गाय को माता के रूप में पूजा जाता है. इसलिए मुसलमानों को उनकी धार्मिक भावनाओं का सम्मान करते हुए गौ वध से ख़ुद को दूर रखना चाहिए. उन्होंने कहा कि शरीयत किसी देश के क़ानून को तोड़ने का समर्थन नहीं करती. क़ाबिले ग़ौर है कि इस फ़तवे की पाकिस्तान में कड़ी आलोचना की गई थी. इसके बाद भारत में भी इस फ़तवे को लेकर ख़ामोशी अख्तियार कर ली गई.

गाय भारतीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था का एक अहम हिस्सा है. यहां गाय की पूजा की जाती है. यह भारतीय संस्कृति से जुड़ी है. महात्मा गांधी कहते थे कि अगर निस्वार्थ भाव से सेवा का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण कहीं देखने को मिलता है तो वह गौ माता है. गाय का ज़िक्र करते हुए वह लिखते हैं, गौ माता जन्म देने वाली माता से श्रेष्ठ है. हमारी माता हमें दो वर्ष दुग्धपान कराती है और यह आशा करती है कि हम बड़े होकर उसकी सेवा करेंगे. गाय हमसे चारे और दाने के अलावा किसी और चीज़ की आशा नहीं करती. हमारी मां प्राय: रूग्ण हो जाती है और हमसे सेवा की अपेक्षा करती है. गौ माता शायद ही कभी बीमार पड़ती है. वह हमारी सेवा आजीवन ही नहीं करती, अपितु मृत्यु के बाद भी करती है. अपनी मां की मृत्यु होने पर हमें उसका दाह संस्कार करने पर भी धनराशि व्यय करनी पड़ती है. गौ माता मर जाने पर भी उतनी ही उपयोगी सिद्ध होती है, जितनी अपने जीवनकाल में थी. हम उसके शरीर के हर अंग-मांस, अस्थियां, आंतों, सींग और चर्म का इस्तेमाल कर सकते हैं. यह बात जन्म देने वाली मां की निंदा के विचार से नहीं कह रहा हूं, बल्कि यह दिखाने के लिए कह रहा हूं कि मैं गाय की पूजा क्यों करता हूं.

ग़ौरतलब है कि उत्तराखंड देश का ऐसा पहला राज्य है, जहां सरकार ने गौ हत्या एक्ट में संशोधन कर सज़ा को दस साल करने का प्रावधान किया है. पिछले साल पंजाब में गौ सेवा बोर्ड ने गौ हत्या रोकने के लिए दस साल की सज़ा का प्रस्ताव बनाकर मुख्यमंत्री के पास भेजा था, जिसे विधानसभा से मंज़ूरी मिलने के बाद राष्ट्रपति को भेजा जा चुका है. इसके अलावा गौ सेवा बोर्ड के प्रस्ताव में राजाओं द्वारा गौधन की सेवा के लिए दान दी गई ज़मीनों को भू-माफ़ियाओं के क़ब्ज़े से छुड़ाने, सुप्रीमकोर्ट एवं हाईकोर्ट के गौधन संबंधी आदेश लागू करना भी शामिल है. जम्मू-कश्मीर सरकार ने भी गौ हत्या और गौ तस्करी रोकने के लिए कड़े क़दम उठाए थे. दरअसल भारत में गौ वध रोकने के लिए ईमानदारी से प्रयास किए जाने की ज़रूरत है. मुसलमान तो गाय का गोश्त खाना छोड़ देंगे, लेकिन गाय के चमड़े का कारोबार करने वाले क्या इससे हो रही मोटी कमाई छोड़ने के लिए तैयार हैं. इस बात में कोई दो राय नहीं कि गौ हत्या से सबसे ज़्यादा फ़ायदा ग़ैर मुसलमानों को है और उन्हीं के दबाव में सरकार गौ हत्या पर पाबंदी नहीं लगाना चाहती.

3 comments

  • firdauskhan

    आपने बहुत अच्छा लिखा है. आपका लेख पढकर ख़ुशी हुई.
    आपका लेख हिन्दू और मुसलमानों मैं मोहब्बत बढ़ाने के लिए बहुत अहमियत रखता है.
    खुदा आपको सलामती और कामयाबी अता फरमाए. आमीन

    आपका दोस्त
    मोहम्मद फैजान अल्वी

  • firdauskhan

    फिरदौस,

    आलेख पढ़ा…IMPRESSED ! Frankly…
    इस विषय पर इतना हेल्धी आलेख पहली बार पढ़ रहा हूँ.
    references जो दिए गए है वह विषय को मज़बूती प्रदान करते हैं., जो तुम्हारी सूझ-बूझ के बाइस हैं. अभिव्यक्ति तुम्हारी बहुत साफ़ है, पारदर्शी है…तार्किकता गहन व rich…
    भाषा तर्कसंगत कसी हुई…कइयों को हिंदी में पढ़ता हूँ, तुमने भी ठेठ भीतर तक मुताहस्सर किया है, हिलाया है to the maximum extent. फिरदौस खान के हस्ताक्षर
    की गरिमा है और बनी रहेगी. तुम अपनी बात रखती भी हो और औरों के खयालातों को तरजीह भी देती हो..

    तुम्हारी ज़हिनियत से खुश हूँ,
    तारीफ़ जायज़ थी, जो की …कोई mercy नहीं.

    GG Shaikh

  • firdauskhan

    फिरदौस बहन, भारत में गौहत्या जारी रहने का कारण मुस्लमान नहीं बल्कि कांग्रेस की तुष्टिकरण नीति है. आज़ादी के आन्दोलन तक हिन्दू और मुस्लमान एक रहे हैं लेकिन जैसे जैसे आन्दोलन अपने मुकाम तक पहुचने लगा लोगो पर यह लालच भी सवार होने लगा कि आज़ादी के बाद देश पर राज कौन करेगा ? नेहरु और जिन्ना ने अपनी निजी महत्वाकांक्षा को अपने अपने समुदाय की जनभावना का नाम दे दिया. जाते जाते अँगरेज़ राज करने का एक सफलता सूत्र दे गए, “फूट डालो और राज करो”. इसी के तहत कांग्रेस ने अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक की ऐसी राजनीती खेली कि दोनों समुदाय एक दूसरे से असुरक्षित महसूस करने लगे. राज करने के इसी सफल सूत्र से और भी अनेक अनेक विभाजन किये गए और जिन पर अनेक छोटे-बड़े दलों कि राजनीती आराम से चल रही है, जैसे – आर्य-द्रविण, अगड़े-पिछड़े, सवर्ण-दलित, शहरी- आदिवासी, उत्तरभारतीय- मराठी, जाट-गुर्जर-मीणा, कन्नड़-मराठी, आंध्र-तेलंगन, विदर्भ-पश्चिम महाराष्ट्र, असामी-बिहारी, आदि-आदि.
    बहरहाल कांग्रेस गौहत्या कि मुद्दे को ऐसे इस्तेमाल करती है जैसे गौवध प्रतिबन्ध से मुसलमानों कि धार्मिक भावनाएं बुरी तरह आहत हो जाएँगी. मेरा विश्वास है यदि दोनों समुदाय आपस में बिना राजनीतिकों के स्थानीय स्टार पर ही संवाद शुरू कर दें तो इस समस्या का अंत हो जायेगा. जिस प्रकार लोग जागरूक हो रहें हैं, मेरा विश्वास है वह दिन जल्दी ही आने वाला है.

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