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नौका दुर्घटनाएं कब रुकेंगी

सात नदियों से घिरे खगड़िया ज़िले में लगातार नौका दुर्घटनाएं हो रही है, अभी तक न जाने कितनों की मांग उजड़ चुकी है तो किसी की गोद सूनी हो चुकी है. किसी के माथे से मां का साया छिन गया तो किसी ने अपने बाप को खो दिया है, लेकिन प्रशासनिक महकमे के लोगों की नींद तक नहीं खुल रही है. हां! यह ज़रूर है कि नौका दुर्घटना के बाद सरकारी अमले घटना स्थल पर पहुचते हैं और सरकारी मुआवजों की बात कहकर मातमपुर्सी कर जाते हैं. घटना पर विराम लगाने के लिए पहले भी माथापच्ची करने से परहेज़ करते थे, आज भी कुछ नहीं करते. नतीजतन सरकारी नियमों की धज्जियां उडाक़र नाविक और नाव मालिक लोगों की ज़िंदगी से खिलवाड़ करते जा रहे हैं.

नौका दुर्घटना भी लगातार होती रही हैं, लेकिन अब भी क्या प्रशासनिक अमले नियमों का हवाला ही देते रहेंगे या किसी की मांग और गोद सूनी होने के बाद मातमपुर्सी करने के बजाए कुछ भी नहीं कर सकेंगे, इस सवाल का जवाब पाने के लिए लोग बेताब हैं. लगातार हो रही नौका दुर्घटनाओं के बाद भी सरकारी अमलों की कानों पर आ़खिर जूं तक क्यों नहीं रेंग रही है.

वैसे हक़ीक़त यह है कि प्रशासनिक अमलों को यह पता ही नहीं है कि ज़िले की सात नदियों के अलग-अलग तटों पर कितनी नावों का परिचालन होता है, कितने घाटों से अवैध नाव का परिचालन हो रहा है और कितने घाटों पर सरकारी नियमानुसार नावों का परिचालन होता है. अभी तक सैकड़ों लोगों को विभिन्न नदियां लील चुकी हैं. किसी के शव मिले तो किसी के शव जलचरों ने चबा लिए. बावजूद इसके प्रशासनिक अमलों ने नौका परिचालन से संबंधित बनाए गए नियमों का पालन करने की दिशा में कोई महत्वपूर्ण क़दम नहीं उठाया है. बात अलग है कि प्रभारी परिवहन पदाधिकारी अनुज कुमार दावे के साथ कहते हैं कि नियमों की अनदेखी करने वाले नपेंगे. उन्होंने नियमों की जानकारी देते हुए स्पष्ट कहा कि नाव पर अगर कोई व्यक्ति खड़ा दिखा तो नाव परिचालन में नियमानुसार खोट है. नाव के मध्य इलाक़े में यात्रियों के बैठने के लिए बेंच की व्यवस्था होनी चाहिए. एक यात्री के बैठने के लिए कम से कम 18-24 जगह की व्यवस्था की जानी चाहिए. नाव के चारों ओर लदान क्षमता के संदर्भ में स्पष्ट लिखा होना चाहिए, इतना ही नहीं सूर्यास्त के बाद नाव का परिचालन तो होना ही नहीं चाहिए, नाव के पट्टेदारों को सदैव एक अतिरिक्त नाव और दो गोताखोर रखना चाहिए. हालांकि, परिवहन पदाधिकारी कभी-कभी यह भूल जाते हैं कि मोटरचालित नाव के साथ-साथ अन्य नाव की समय-समय पर न केवल जांच होनी चाहिए बल्कि अगर नाव परिचालन के योग्य नहीं है तो उसे जब्त किए जाने के साथ नाविक के विरूद्व क़ानूनी कार्रवाई भी होनी चाहिए. इस तरह के क़ानून की बारीकियों पर नज़र नहीं डालने के कारण ही अभी तक खगड़िया ज़िले से होकर प्रवाहित होने वाली सात नदियां सैकड़ों लोगों को लील चुकी हैं. ग़ैर सरकारी आंकड़े तो का़फी कुछ कह जाते हैं, लेकिन अगर सरकारी आंकड़ों पर ही ग़ौर करें तो बीते वर्ष 2008 में परबत्ता थाना अंतर्गत दुधैला में घटित नौका दुर्घटना में 24 लोगों की मौत हुई थी, जबकि इसी वर्ष गोगरी थाना अंतर्गत बौरना में छह लोग नौका दुर्घटना के शिकार हुए. इसी तरह 2009 में केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान के गृह प्रखंड अलौली अंतर्गत फुलतौड़ा में बागमती नदी लगभग सौ लोगों को नौका दुर्घटना में लील गई. बात अलग है कि प्रशासनिक तौर पर महज 64 लोगों के ही डूबने की पुष्टि की गई. इस वर्ष 2011 में गोगरी थाना अंतर्गत सहरौन में घटित नौका दुर्घटना में तीन लोगों के मारे जाने की खबर आ रही है है. खबर लिखे जाने तक शवों की बरामदगी नहीं हो सकी थी, शवों की खोज जारी थी. यह तो सरकारी आंकड़ों की बात है. अगर ग़ैर सरकारी आंकड़ों पर ग़ौर करें तो लगभग एक सप्ताह में लगातार एक की मौत नौका दुर्घटना में हो रही है. प्रसिद्व समाजसेवी नागेन्द्र सिंह त्यागी स्पष्ट रूप से कहते हैं कि जब तक जर्जर नाव पर क्षमता से अधिक सवारी होती रहेगी तब तक इस ज़िले में कभी भी नौका दुर्घटना पर विराम लगा पाना संभव नहीं है. त्यागी के मुताबिक़ प्रशासनिक अमलों को न केवल यह पता करना होगा कि ज़िले होकर प्रवाहित होने वाली सात नदियों के कितने घाट पर नाव का परिचालन होता है बल्कि कितने घाटों पर अवैध रूप से नाव का परिचालन होता है और कितने पर वैध रूप से, अगर परिचालन होता है तो नाव मालिक और नाविक सरकारी नियमों का कितना पालन कर रहे हैं. उधर सरकारी घाटों के संदर्भ में जानकारी देते हुए प्रभारी परिवहन पदाधिकारी अनुज कुमार ने कहा कि ज़िला परिषद के द्वारा खगड़िया प्रखंड के पांच, अलौली प्रखंड के बारह तथा चौथम प्रखंड के बारह सहित कुल 33 सरकारी घाटों पर नाव परिचालन की व्यवस्था है. जबकि जानकारों के मुताबिक़ सौ से अधिक घाटों पर क़ायदे क़ानून को ताक पर रखकर बाहुबलियों के द्वारा नाव का परिचालन अपने ढंग से कराया जा रहा है. वैसे अनुज के मुताबिक़ सभी प्रखंड विकास पदाधिकारी एवं अंचलाधिकारियों को नौका परिचालन से संबंधित आवश्यक दिशा-निर्देश दिए गए हैं. अगर सरकारी नियमों का पट्टेदार पालन नहीं करते हैं तो न केवल उनका लाईसेंस रद्द किया जाएगा बल्कि उनके विरूद्व क़ानूनी कार्रवाई भी जाएगी. इतना ही नहीं बंगाल फेरी एक्ट 1885 के तहत उनके विरूद्व प्राथमिकी भी दर्ज की जाएगी. बहरहाल, इस तरह की बातें तो सभी प्रशासनिक अमले कहते आए हैं और नौका दुर्घटना भी लगातार होती रही हैं, लेकिन अब भी क्या प्रशासनिक अमले नियमों का हवाला ही देते रहेंगे या किसी की मांग और गोद सूनी होने के बाद मातमपुर्सी करने के बजाए कुछ भी नहीं कर सकेंगे, इस सवाल का जवाब पाने के लिए लोग बेताब हैं. लगातार हो रही नौका दुर्घटनाओं के बाद भी सरकारी अमलों की कानों पर आ़खिर जूं तक क्यों नहीं रेंग रही है. यह सुलगता सवाल अब भी लोगों के दिलों में कौंध रहा है.

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