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शीतकालीन चार धाम यात्राः सनातन धर्म के साथ खिलवाड़
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शीतकालीन चार धाम यात्राः सनातन धर्म के साथ खिलवाड़

उत्तराखंड सरकार द्वारा अपनी आय में वृद्धि के लिए शीतकालीन चार धाम यात्रा को हरी झंडी दिखाने के बाद राज्य के धर्माचार्य इसे धर्म विरोधी क़दम बताते हुए इसका व्यापक विरोध कर रहे हैं. देवभूमि हिमालय में आदिकाल से चार धाम यात्रा की परंपरा चली आ रही है, जिसका संचालन प्राचीन मान्यताओं के आधार पर वैदिक रीति-रिवाज से होता चला आ रहा है. ऐसी यात्राओं का विशेष धार्मिक महत्व होता है. चार धाम यात्रा राज्य में छह माह तक ही चलती है, इसमें श्रद्धालु गंगोत्री, यमुनोत्री, बद्रीनाथ एवं केदार नाथ की यात्रा करते हैं. हिमालयी राज्य होने के कारण उक्त सभी धाम शीतकाल में ब़र्फबारी के शिकार हो जाते हैं. मान्यता यह है कि भगवान बद्री नारायण की पूजा छह माह तक मनुष्यों द्वारा और छह माह तक देवताओं द्वारा की जाती है. इसी मान्यता के कारण आज भी जनता उत्तराखंड को देवभूमि के रूप में जानती एवं मानती है. शीतकालीन यात्रा शुरू होने के बाद अब तीर्थयात्री पांडुकेश्वर, ऊखीमठ, मुखवा एवं खरसाली में पूजा करेंगे.

सरकार का स्वरूप धर्मनिरपेक्ष होता है, उसे उसी तरह का आचरण करना चाहिए. उन्होंने निशंक सरकार को अर्द्धकुंभ के समय नारायण दत्त तिवारी द्वारा यात्रा आरंभ करने के निर्णय की याद दिलाते हुए कहा कि उस समय जनता के विरोध के चलते तिवारी को अपना निर्णय वापस लेना पड़ा था. राज्य के संस्कृत विश्वविद्यालय के प्रथम कुलपति रह चुके जयराम संस्थाओं के अध्यक्ष ब्रह्मस्वरूप ब्रह्मचारी का मानना है कि विनाश काले विपरीत बुद्धि. निशंक सरकार का फैसला धर्म-संस्कृति के साथ खिलवाड़ है.

सूबे की निशंक सरकार संस्कृत को द्वितीय राजभाषा के रूप मान्यता प्रदान करके ख़ुद को भारतीय संस्कृति का स्वयंभू पहरेदार समझने-मानने लगी है. इसी के चलते वह कई ऐसे फैसले ले रही है, जिन्हें राज्य को समृद्धि दिलाने की दृष्टि से भले ही महत्वपूर्ण माना जा सकता है, लेकिन धार्मिक दृष्टि से उचित नहीं माना जा रहा है. इसीलिए शीतकालीन चार धाम यात्रा के निर्णय का जनता और धर्माचार्यों द्वारा व्यापक विरोध किया जा रहा है. लोग इसे सरकार का मनमाना फैसला मान रहे हैं. उनका मानना है कि सरकार का यह क़दम पूरी तरह से धर्म के साथ-साथ देवभूमि की संस्कृति का भी विरोधी है. फैसला लेने से पहले सरकार ने धर्माचार्यों, शंकराचार्य, विद्वत समाज और जनसामान्य से भी कोई राय-मशविरा नहीं किया, जबकि आज भी भगवान बद्रीनाथ और केदारनाथ धाम को गर्मियों में खोलने की तिथियों का फैसला राज्य सरकार नहीं, टिहरी के पूर्व राजघराने के प्रांगण में शिवरात्रि एवं वसंत पंचमी के दिन विद्वत समाज द्वारा लिया जाता है.

राज्य सरकार द्वारा शीतकालीन चार धाम यात्रा शुरू करने के फैसले को लोग धर्मघाती मानते हैं. उनका कहना है कि यह दुनिया भर में फैले करोड़ों सनातनधर्मियों के साथ घोर अन्याय है. उनका तर्क है कि बद्रीनाथ धाम को मोक्ष धाम की मान्यता हासिल है, जहां पहुंच कर तीर्थ यात्रियों की मोक्ष की कामना पूरी होती है. कपाली एवं तप्तकुंड में स्नान और पंच बद्री-पंच केदार सहित विभिन्न देवालयों के दर्शन से उनके पितरों का उद्धार हो जाता है. शीतकालीन यात्रा में नारायण की पूजा पांडुकेश्वर में संपन्न होगी. बद्रीनाथ धाम के कई वेदपाठियों का कहना है कि सरकार ने जनता के साथ ठगी का यह नया तरीक़ा निकाला है, जिसे धर्मसम्मत नहीं कहा जा सकता. इस यात्रा को शुरू करने के पूर्व निशंक सरकार ने ख़ूब ढोल-नगाड़े पीटे. जब यात्रा जोशीमठ पहुंची तो उसे भारी विरोध झेलना पड़ा. पूरी यात्रा को कड़ी सुरक्षा के मध्य गुज़रना पड़ा. सरकार के तमाम प्रयासों को नकारते हुए जोशीमठ नगरपालिका के अध्यक्ष ॠषि प्रसाद शती ने स्थानीय लोगों के साथ अपना विरोध दर्ज कराया.

विद्वत समाज का कहना है कि सरकार चाहे तो वह इसे पर्यटक यात्रा कहकर चला सकती है, चार धाम यात्रा के नाम से नहीं. चार धाम के नाम पर यात्रा का संचालन दुनिया भर के हिंदुओं के साथ छल होगा, जिसे किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. ज्योतिष पीठ के पीठाधीश्वर स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती इस तरह की यात्रा को सरकारी फरेब मानते हैं. उन्होंने कहा कि शीतकालीन यात्रा शुरू करने से पूर्व सरकार ने धर्मगुरुओं एवं शंकराचार्यों को उनकी राय जानने के लिए आमंत्रित तक नहीं किया. इस यात्रा को शंकराचार्यों का समर्थन नहीं प्राप्त है. राज्य सरकार जिस तरह गंगा के साथ छल कर रही है, उसी तरह वह धन कमाने के लिए नर-नारायण दोनों के साथ छल करने जा रही है, यह महापाप है और सनातन धर्म विरोधी भी.

पूर्व गृह राज्यमंत्री एवं संत चिन्मयानंद सरस्वती शीतकालीन चार धाम यात्रा के संचालन, समय निर्धारण-परिवर्तन को धर्म विरोधी और संविधान के विपरीत बताते हैं. वह कहते हैं कि सरकार को धर्माचार्यों एवं पुरोहितों के अधिकार अपने हाथ में लेने से बाज आना चाहिए. सरकार का स्वरूप धर्मनिरपेक्ष होता है, उसे उसी तरह का आचरण करना चाहिए. उन्होंने निशंक सरकार को अर्द्धकुंभ के समय नारायण दत्त तिवारी द्वारा यात्रा आरंभ करने के निर्णय की याद दिलाते हुए कहा कि उस समय जनता के विरोध के चलते तिवारी को अपना निर्णय वापस लेना पड़ा था. राज्य के संस्कृत विश्वविद्यालय के प्रथम कुलपति रह चुके जयराम संस्थाओं के अध्यक्ष ब्रह्मस्वरूप ब्रह्मचारी का मानना है कि विनाश काले विपरीत बुद्धि. निशंक सरकार का फैसला धर्म-संस्कृति के साथ खिलवाड़ है. सरकार को प्रदेश एवं देश की संस्कृति से खिलवाड़ करने की छूट नहीं दी जा सकती. बद्रिकाश्रम पीठ के प्रख्यात संत श्रीधरानंद ब्रह्मचारी ने यात्रा को धर्म विरोधी बताया और कहा कि इससे धर्म के सत्य तत्व की हानि होगी. इस यात्रा में भाग लेकर यात्री अपने को ठगा महसूस करेगा. जोशीमठ की जनता ने भी सड़क पर उतर कर यात्रा का विरोध किया और अफसरों का घेराव करके सरकार विरोधी नारे लगाए.

यमुनोत्री

पुराणों में यमुनोत्री का विशेष महत्व है. यह 3235 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है. चार धाम की यात्रा में सर्वप्रथम यमुनोत्री के ही दर्शन किए जाते हैं. यमुनोत्री में एक ओर यमुना जी की धारा और दूसरी ओर उष्ण जल के बहुत से स्रोत हैं. यहां का मुख्य मंदिर यमुना देवी को समर्पित है. वर्तमान मंदिर जयपुर की महारानी गुलेरिया ने 19वीं सदी में बनवाया था. एक बार विनाशकारी भूकंप से विध्वंस होने के बाद इसका पुनर्निर्माण 1919 में टिहरी नरेश महाराजा प्रताप शाह ने कराया. यमुनोत्री मंदिर में यमुना जी के साथ गंगा, यमराज एवं कृष्ण की प्रतिमाएं स्थापित हैं. यमुनोत्री दर्शन के लिए सड़क के रास्ते अंतिम पड़ाव हनुमान चट्टी से 13 किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है.

गंगोत्री

3140 मीटर की ऊंचाई पर हिमालय की गोद में बसा गंगोत्री हिंदुओं का पवित्र तीर्थ है. ऐसा माना गया है कि जिस शिला पर बैठकर राजा भागीरथ ने तपस्या की थी, उसी पर यह मंदिर बनाया गया था. उस प्राचीन मंदिर के स्थान पर आज भव्य मंदिर खड़ा है, जिसका निर्माण जयपुर के राजाओं द्वारा कराया गया था. यहां पतित पावनी गंगा की धारा का प्रवाह उत्तर दिशा की ओर मुड़ने के कारण इस स्थान का नाम गंगोत्री पड़ा.

केदारनाथ

बारह ज्योतिर्लिंगों में श्रेष्ठ केदार लिंग-केदार नाथ में साक्षात शिव निवास करते हैं. केदार उन अनगढ़ शिलाओं और शिखरों को भी कहते हैं, जिनमें भगवान शिव का निवास माना जाता है. संस्कृत में केदार शब्द का प्रयोग सेम या दलदली भूमि अथवा धन की रोपाई वाले खेत के लिए होता है. संभवतः केदार तीर्थ के कारण पड़ोस की भूमि केदार भूमि या केदार खंड कहलाई. संपूर्ण पापों का नाश करने वाली मोक्षदायिनी केदार भूमि के वर्णन से धर्मशास्त्र भरे पड़े हैं. शिव पुराण, पद्म पुराण, कर्म पुराण, स्कंद पुराण, वाराह पुराण, सौर पुराण, वामन पुराण, ब्रह्म वैवर्त पुराण एवं लिंग पुराण आदि में केदार तीर्थ को मनुष्य के संपूर्ण पापों का नाशक और मोक्षदायक बताया गया है.

बद्रीनाथ

बद्रीनाथ धाम को भारत के चार पवित्र धामों में सबसे प्राचीन बताया गया है. शास्त्रों में सतयुग, द्वापर, त्रेता और कलयुग आदि चार युगों की जो महिमा कही गई है, उसके अनुसार उत्तर में सतयुग का बद्रीनाथ, दक्षिण में त्रेता का रामेश्वरम, पश्चिम में द्वापर की द्वारिका और पश्चिम में कलयुग का पावन धाम जगन्नाथ धाम है. उत्तर में हिमालय में गंध्मादन पर्वत पर स्थित पावन तीर्थ बद्रीनाथ को विभिन्न युगों में मुक्तिप्रदा एवं बद्री विशाल आदि नामों से जाना गया. मंदिर निर्माण के संदर्भ में एक पौराणिक उल्लेख यह भी है कि ब्रह्मा आदि देवताओं ने सर्वप्रथम भगवान विश्वकर्मा से इस मंदिर का निर्माण कराया था. बाद में राजा पुरुरवा ने इसका पुनर्निर्माण कराया.

5 comments

  • rajkumarsharma

    Thanks for the share!
    Nancy.R

  • rajkumarsharma

    बाबा ramdav को र स स अपना ambasdar बना ना चाहती है

  • rajkumarsharma

    २०!१ नेताजी स्ट्रीट नअर साईं मंदिर तिलक रोड देहरादून

  • rajkumarsharma

    राज मीडिया सेण्टर
    २०\१ neta जी मोहला निएर साईं मंदिर तिलक रोड देहरा दून u k

  • rajkumarsharma

    आपके लेख बहुत सारगर्भित हैं मैं आपके लेख अपने पत्रों मैं chhpta रहा हूँ किस पते पर अपनी मागज़ीने भेजूं?- – – हलंत हिंदी magazine

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