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विश्व के प्रमुख तानाशाह

अचानक से एक और तानाशाह के बारे में बातें होने लगी हैं. तानाशाही उस तरह की सरकार को कहते हैं जहां संपूर्ण सत्ता एक ही व्यक्ति के हाथ में होती है. वहां क़ानून का राज नहीं, शासक के हिसाब से सरकार चलती है. उसी के इशारे पर जज फैसला सुनाते हैं, पुलिस लाठी चलाती है. ऐसे देशों में प्रेस तो होता है, लेकिन छपता वही है जो तानाशाह को पसंद होता है. दुनिया भर में क़रीब 55 ऐसे देश हैं जहां तानाशाही है. इसी के  खिला़फ पश्चिम एशिया में लोग सड़कों पर हैं. उत्तरी अफ्रीका और अरब देशों के लोग आंदोलन कर रहे हैं. पहले ट्‌यूनीशिया के बेन अली गए, फिर होस्नी मुबारक का नंबर आ गया. अब सवाल है कि अगला नंबर दुनिया के किस देश के तानाशाह का आने वाला है. हम दुनिया के ऐसे दस तानाशाहों के बारे में बता रहे हैं जिनकी गद्दी खतरे में है.

अली अब्दुल्लाह सालेह

दक्षिण यमन में अलगाववादी आंदोलन का आगाज़ पहले ही हो चुका है. दक्षिण और उत्तर यमन के दोनों क्षेत्रों में जाति को लेकर गहरी खाई बना दी गई है. राष्ट्रपति सालेह की ज़िद और ख़राब नीतियों से त्रस्त जनता उनसे इस्ती़फे की मांग कर रही है. हालांकि उन्होंने आंदोलन को स्थिर बनाने के लिए 2013 में अपना पद छोड़ने की घोषणा करते हुए विपक्ष को राष्ट्रीय सरकार के गठन की पेशकश की, लेकिन विपक्ष ने इसे ठुकरा दिया. यमन के विभाजन से पहले 1977 में उत्तर यमन की सेना में लेफ्टिनेंट कर्नल रहे सालेह यमन के प्रथम राष्ट्रपति इब्राहिम अल हम्दी की हत्या के बाद 1982 में जनरल पीपुल्स कांग्रेस पार्टी के मुख्य सचिव बने और फिर 1983 में उत्तर यमन के राष्ट्रपति. सोवियत संघ के पतन के बाद दक्षिण यमन के कमज़ोर पड़ने पर उसे 1990 में उत्तर यमन से जोड़ा गया और इस संधि के बाद भी सालेह राष्ट्र प्रमुख बने रहे. इसके बाद यमन में बहुदलीय व्यवस्था की शुरुआत हुई और प्रत्येक तीन साल में संसदीय चुनाव कराने का फैसला लिया गया. 1993 के चुनाव में जनरल पीपुल्स पार्टी की जीत के साथ सालेह फिर राष्ट्र प्रमुख बने. 1999 में वह पूर्व राष्ट्रपति नजीब कहतन के बेटे एवं अपनी ही पार्टी के नेता अल शाबी को हराकर पुन: राष्ट्रपति बने. सालेह ने अपने शासन के 24 साल पूरे होने के बावजूद 2006 में हुए चुनाव में धांधली करते हुए राष्ट्रपति पद हथिया लिया. इनके शासनकाल में देश को ग़रीबी, बेरोज़गारी, सांप्रदायिक तनाव, भ्रष्टाचार, मानवाधिकारों का हनन और शोषण जैसी तमाम समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है.

होस्नी मुबारक

मिस्र के राष्ट्रपति अनवर सदात की एक सैनिक परेड के दौरान कुछ इस्लामिक कट्टरपंथियों ने गोली मारकर हत्या कर दी थी. इसके बाद उप राष्ट्रपति होस्नी मुबारक को राष्ट्रपति की गद्दी पर बैठा दिया गया. नवंबर 1981 में जनमत के आधार पर उन्हें राष्ट्रपति चुन लिया गया. इसके बाद 1987, 1993, 1999 और 2005 तक हर बार वह राष्ट्रपति पद पर क़ाबिज़ रहे. ग़रीबी और दमन से नाराज़ हज़ारों लोगों ने 25 जनवरी, 2011 से मिस्र सरकार के ख़िला़फ प्रदर्शन शुरू कर दिया, जिसे रोकने के लिए होस्नी मुबारक ने पुलिस और टैंक भेजे. पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच हुई मुठभेड़ में काहिरा, सुएज़ और एलेक्सेंड्रिया में 24 लोग मारे गए और 1000 से भी ज़्यादा घायल हुए. फरवरी के पहले हफ्ते में काहिरा के तहरीर स्न्वायर पर लाखों लोग इकट्ठा हुए और उन्होंने मुबारक से देश छोड़ने के लिए कहा. मुबारक ने पहले कहा कि वह मिस्र नहीं छोड़ेंगे और इसकी वजह उन्होंने यह बताई कि जनता ग़रीबी एवं बेरोज़गारी से मुक्ति और लोकतांत्रिक सुधार संभवत: नहीं चाहती. उन्होंने कहा कि वह प्रगति की राह पर चलते रहेंगे, लेकिन 11 फरवरी, 2011 को मुबारक ने जनता के आगे घुटने टेक दिए और इस्ती़फा दे दिया.

अलेक्जेंडर लुकाशंको

अलेक्जेंडर लुकाशंको ने 1994 में बेलारूस के राष्ट्रपति का पद संभाला था और वह अब तक अपनी गद्दी पर क़ायम हैं. लुकाशंको ने 1975 से 1977 तक फ्रंटियर ट्रूप्स में बॉर्डर गार्ड के तौर पर और फिर सोवियत आर्मी में 1980 से 82 तक काम किया. 1977-1978 में लुकाशंको ने मोगीलेव में कॉमसोमोल यानी कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ सोवियत यूनियन की युवा शाखा बनाई, साथ ही कृषि फार्म के निदेशक के रूप में काम किया. 1990 में वह बेलारूस की सुप्रीम काउंसिल में अकेले ऐसे डिप्टी बने, जिन्होंने कॉमनवेल्थ ऑफ इंडिपेडेंट स्टेट्‌स बनाया. लुकाशंको ने 1993 में बेलारूसी संसद की एंटी करप्शन कमेटी के चेयरमैन के रूप में स्पीकर स्टैनीस्लाव के साथ 70 सरकारी अधिकारियों को दोषी बताते हुए सबसे इस्ती़फा दिलवाया. 1994 में नए बेलारूसी संविधान के निर्माण के साथ हुए राष्ट्रपति चुनाव में लुकाशंको जीत गए. राष्ट्रपति बनने के बाद सुप्रीम सोवियत के नियम-क़ानूनों को छिन्न-भिन्न करते हुए लुकाशंको ने देश का प्रतीक चिन्ह भी बदल दिया. नए संविधान से लुकाशंको के शासन को क़ानूनी तौर पर तानाशाही की इजाज़त मिल गई. लुकाशंको की आर्थिक नीति अनिश्चित और कथित मार्क्सवादी दृष्टिकोण वाली रही है. यहां के 80 प्रतिशत संसाधन राज्य द्वारा नियंत्रित हैं. रूसी समर्थन की वजह से ही समय पर वेतन और पेंशन का भुगतान हो पा रहा है. मानवाधिकार हनन बड़े पैमाने पर है. विपक्षी दलों के नेता नज़रबंद कर दिए जाते हैं. लुकाशंको की कैबिनेट के ही दो सदस्य रहस्यमय तरीक़े से ग़ायब हो गए. 2006 के चुनाव में लुकाशंको ने विपक्ष के खड़े होने पर प्रतिबंध लगा दिया.

किम जोंग इल

विश्व से अलग-थलग पड़े राष्ट्र उत्तर कोरिया के प्रमुख नेता हैं  किम जोंग इल. वह 1993 में नेशनल डिफेंस कमीशन के चेयरमैन बनने के बाद 1994 में सुप्रीम लीडर बने. किम जोंग इल ने राजनीति में अपनी शुरुआत 1964 में सत्तारूढ़ कोरियन वर्कर्स पार्टी से की. इसके बाद उन्हें पार्टी का विभाग सचिव बना दिया गया. उन्होंने 1960 में आर्थिक तर्क लिखे और मीडिया, लेखकों एवं और कलाकारों को पार्टी की आइडियोलॉजी से अवगत कराया. इल ने प्रचार-प्रसार के लिए हर तरह के मीडिया का ख़ूब इस्तेमाल किया, मसलन फिल्में, कला, किताबें और प्रेस. 1980 में उन्हें पोलित ब्यूरो का सदस्य मनोनीत किया गया और 1991 में वह उत्तर कोरियन सेना में सुप्रीम कमांडर बन गए. 1992 में उन्हें डियर लीडर के बजाय डियर फादर के नाम से पुकारा जाने लगा. इल को हर पांच साल में होने वाले सुप्रीम पीपुल्स असेंबली के चुनाव में खड़े होने की ज़रूरत नहीं है, क्योंकि वह सैन्य निर्वाचन क्षेत्र से सर्वसम्मति से मनोनीत हुए हैं. इल ने विश्व में सबसे बड़ी सेनाओं में से एक सेना का गठन किया है, मगर वह ग़रीबी हटाने में नाकामयाब रहे. आर्थिक अव्यवस्था और खाद्य पदार्थों की कमी के चलते 1990 में क़रीब बीस लाख लोगों की मौत हो गई. इल की सरकार पर अत्याचार, बंधुआ मज़दूरी, जबरन गर्भपात और तक़रीबन 2,00,000 लोगों को बंदी बनाने का आरोप है. उत्तर कोरिया की जनता की मुश्किलें किम जोंग के मरने के बाद ही दूर होंगी, क्योंकि उसके बाद उनका 20 वर्षीय बेटा किम जोंग राजगद्दी पर बैठेगा.

ओमर हसन अहमद अल बशीर

ओमर हसन अहमद अल बशीर सूडान के राष्ट्रपति हैं. वह नेशनल कांग्रेस पार्टी के सदस्य हैं. सेना में ब्रिगेडियर बनने के बाद इन्होंने 1989 में कुछ अफसरों का समूह बनाया और तत्कालीन प्रधानमंत्री सादिक अल म्हदी को खदेड़ कर ख़ुद सत्ता पर अधिकार जमा लिया. इसके बाद सूडान में सेना का राज हो गया. जब यह रक्षा मंत्री थे, तभी देश में शरिया क़ानून लगा. 1991 में अल बशीर ने नेशनल इस्लामिक फ्रंट के नेता हसन अल तौराबी के साथ मिलकर सरकार बनाई और 1993 में ख़ुद को राष्ट्रपति घोषित कर दिया, लेकिन 1999 के अंतिम दिनों में अल बशीर ने संसद को निष्प्रभावी करके आपातकाल लगा दिया, क्योंकि तौराबी संसद को राष्ट्रपति को हटाने का अधिकार देते हुए फिर से देश में प्रधानमंत्री की नियुक्ति कराने की कोशिश कर रहे थे. 2000 में फिर से चुनाव हुए और अल बशीर जीत गए. उनकी नेशनल कांग्रेस पार्टी के लोगों से संसद भर गई. ़फर्ज़ी मतदान की वजह से विपक्ष ने बहिष्कार कर दिया. अल बशीर के राज में कई हिंसक लड़ाइयां हुईं. दरफुर प्रांत में गुरिल्ला वेलफेयर की तर्ज पर जस्टिस एंड इक्वालिटी मूवमेंट हुआ. 2003 में इस प्रांत में तक़रीबन 3 लाख लोगों की हत्या करा दी गई या उन्हें विस्थापित कर दिया गया. सूडान में निजी मीडिया कंपनियां नहीं हैं और जो सरकारी मीडिया है, वह सरकार की नीतियों का ही प्रचार-प्रसार करता है.

महमूद अहमदीनिज़ाद

पेशे से इंजीनियर और शिक्षक रह चुके महमूद अहमदीनिज़ाद ईरान के छठे राष्ट्रपति हैं. वह एलायंस ऑफ बिल्डर्स ऑफ इस्लामिक ईरान के मुख्य नेता हैं. इस्लामिक रिवोल्यूशन के बाद अहमदीनिज़ाद ऑफिस ऑफ स्ट्रेनथेनिंग यूनिटी से जुड़ गए. मोहम्मद खतामी के राष्ट्रपति बनने पर उन्हें पद से हटा दिया गया. 2003 में तेहरान काउंसिल में मेयर का पद मिला. अब तक बने मेयरों की विचारधारा से बिल्कुल विपरीत एवं सख्त धार्मिक हथकंडे अपना कर वह 2005 में एलायंस ऑफ बिल्डर्स ऑफ इस्लामिक ईरान की मदद से जीते और राष्ट्रपति बने. अहमदीनिज़ाद राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पटल पर विवादास्पद रहे. देश में उनकी भर्त्सना आर्थिक संकीर्णता और मानवाधिकार हनन के लिए की जाती है. 2009 में अहमदीनिज़ाद के दोबारा सत्ता में आने की वजह से घरेलू हिंसा छिड़ गई और लोग उनके ख़िला़फ सड़कों पर उतर आए. यहां इंटरनेट और फोन कॉल्स  की इजाज़त जांच के बाद ही संभव है, जिससे देश के बारे में जनता को सही जानकारी न मिल सके. विरोध करने वाले पत्रकारों को बंदी बनाया जा रहा है. प्रवासी लोगों को इंटेलिजेंस और क्रांतिकारियों की तऱफ से लगातार धमकियां मिल रही हैं. विपक्षी दलों के नेताओं को आतंकित करने के लिए उन पर हमले कराए जाते हैं. देश में ग़रीबी और बेरोज़गारी की समस्या है. तेल और गैस की प्रचुर मात्रा के बावजूद यहां के संसाधनों का सही इस्तेमाल नहीं किया जा है. देश अव्यवस्था का शिकार है.

रॉबर्ट मुगाबे

जिंबाब्वे के वर्तमान राष्ट्रपति रॉबर्ट मुगाबे 1980 से देश का नेतृत्व कर रहे हैं. उन्होंने 1980 से 1987 तक प्रधानमंत्री पद संभाला और 1987 में प्रधानमंत्री पद ख़त्म करके राष्ट्रपति बन गए. वह पहली बार 1960 में जिंबाब्वे अफ्रीकन नेशनल यूनियन पार्टी के नेता के तौर पर उस समय प्रसिद्ध हुए, जब रोडेशिया में गोरे लोगों का अल्पसंख्यक राज चल रहा था और जिसके ख़िला़फ नेशनल यूनियन ने 1964 से 1979 के दौरान छापामार युद्ध छेड़ रखा था. मुगाबे को प्रभावशाली वक्ता, विवादों में घिरा रहने वाला व्यक्ति एवं लोगों को ध्रुवीकृत करने में माहिर राजनीतिज्ञ समझा जाता है. स्वतंत्रता संग्राम के बाद वह अफ्रीकियों के नायक के तौर पर उभर कर सामने आए थे. 1990, 1996 और 2002 में वह फिर से राष्ट्रपति बने. हालांकि उन पर धमकी देकर अपने पक्ष में वोट कराने का आरोप लगा था. 2008 में वह एक बार फिर चुने गए. उपनिवेशवाद का मुखर विरोधी होने के बावजूद मुगाबे की आलोचना हुई. सरकारी अधिकारी खनिज भंडारों से अपनी जेबें भरते रहे, जबकि जिंबाब्वे की अर्थव्यवस्था नियंत्रण से बाहर चली गई. स्थानीय पत्रकारों ने जब मुगाबे पर लगे आरोपों की असलियत पता करने की कोशिश की तो उन पर अत्याचार किए गए.

हाउस ऑफ सऊद

अल सऊद कहलाने वाला हाउस ऑफ सऊद सऊदी अरब में सत्तारूढ़ तानाशाह परिवार है. इस परिवार के मुखिया राजा अब्दुल्लाह हैं. यह परिवार मोहम्मद बिन सऊद के वंशज और शे़ख मोहम्मद बिन अब्दुल वहाब की बेटी से बना है. यह परिवार सलाफी इस्लाम की स़िफारिश करता है और सऊदी अरब की एकता में यक़ीन रखता है. इस परिवार का सबसे प्रभावी व्यक्ति राजा अब्दुल्लाह है, जो सऊदी अरब की राजगद्दी पर बैठा है. इस शाही खानदान में गद्दी का हक़ पिता से पुत्र को नहीं, बल्कि राजा अब्दुल अज़ीज़ के बच्चों में भाई से भाई को मिलता है. इस परिवार में क़रीब 7000 सदस्य हैं. सभी प्रकार की राजनीतिक शक्तियां परिवार के क़रीब 200 लोगों को मिली हैं, जो राजा अब्दुल अज़ीज़ के वंशज हैं. यह परिवार पिछले सौ सालों से राज कर रहा है, बिना किसी चुनावी प्रक्रिया के. तानाशाही के चलते यहां विपक्ष का अस्तित्व नहीं हैं. यहां शिक्षा का स्तर काफी ख़राब है. प्रति 7 में से 1 व्यक्ति अशिक्षित है. पिछले कुछ सालों में बेरोजगारी की समस्या 10 फीसदी बढ़ गई है, वह भी तब, जबकि विश्व के 25 प्रतिशत तेल भंडार यहां हैं. तकरीबन 20 बिलियन डॉलर की संपत्तियों पर सत्तारूढ़ परिवार का क़ब्ज़ा है. यहां महिलाओं की स्थिति बदतर है, उन्हें बहुत कम अधिकार दिए गए हैं और काम करने की इजाज़त नहीं है.

एमोमाली रहमान

मध्य एशिया के छोटे से देश तज़ाक़िस्तान को मिली आज़ादी के अगले साल 1992 से शासन कर रहे एमोमाली रहमान ख़ूनी गृह युद्ध की वजह से सत्ता में आए. पूर्व सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य रहमान रूस के एक सत्तारूढ़ गुट के विरोध में इस्लामी गुट का नेतृत्व कर रहे थे. लाखों की संख्या में लोग मारे गए, लेकिन रहमान बच निकले और मध्य एशिया के दूसरे नेताओं की तरह उन्होंने तानाशाही को कट्टरपंथियों की धमकियों से बचने का एकमात्र उपाय माना और लागू किया.

अब्देलअज़ीज़ बूतफ्लिका

73 वर्षीय अब्देलअज़ीज़ 1999 से अल्जीरिया के राष्ट्रपति हैं. 1962 में फ्रांस से आज़ादी दिलाने वाले समाजवादी क्रांतिकारियों की पार्टी से अलग होकर नेशनल लिबरेशन फ्रंट ख़ुद एक पार्टी बन गया. इससे  अब्देलअज़ीज़ लंबे व़क्त से जुड़े थे. 1990 में इस सत्तारूढ़ पार्टी ने इस्लामी कट्‌टरपंथियों से लड़ाई की, जिन्हें सरकार में उचित भागीदारी नहीं दी गई, क्योंकि सेना ने चुनाव का प्रावधान ही ख़त्म कर दिया था. अपने कार्यकाल में  अब्देलअज़ीज़ ने देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए दूसरी पार्टियों के साथ संबंध सुधारने की कोशिश की, लेकिन वह कोशिश व्यर्थ चली गई. देश में बेरोज़गारी की गंभीर समस्या है और युवाओं के लिए अवसर की कमी है.

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