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बाघों के लिए बुरी खबर है

इस बार सुंदरवन और पश्चिम बंगाल व उड़ीसा के  नक्सल प्रभावित इलाक़ों को भी इस रिपोर्ट में शामिल किया गया है, जो पिछली बार शामिल नहीं थे. सबसे चिंताजनक बात यह है कि बाघों की जो बढ़ोतरी रिपोर्ट उन इलाक़ों से नहीं आई है, जहां प्रोजेक्ट टाइगर दशकों से चल रहा है.

बाघों की संख्या में बढ़ोतरी हुई ऐसा ढिंढोरा पीट कर सरकार कई सच को छुपा ले गई. सच यह है कि पिछले दस सालों में बाघों के शिकार में कोई कमी नहीं आई है. बाघ राष्ट्रीय पशु है. कुछ लोग बाघों के विनाश के लिए ज़िम्मेदार हैं. देश की सरकार और देश की जनता ने उन्हें मनमानी करने दी. अ़फसोस के साथ यह कहना पड़ता है कि भारत एक ऐसा देश बन चुका है जो अपने राष्ट्रीय पशु को भी बचा नहीं सकता है.

देश में अब बाघों की संख्या 1,706 हो गई है. इस वन्यजीव की संख्या में बीते चार वर्ष में 12 फीसदी का इज़ा़फा हुआ है. ताज़ा गणना के अनुसार, देश में अब 1,571 से 1,875 के बीच बाघ हैं. इसका औसत अनुमानित आंकड़ा 1,706 लिया गया है. 2006 की पिछली गणना में यह संख्या 1,411 थी.  बाघों की संख्या ब़ढने की वजह यह भी है कि इस बार बाघों की गणना में सुंदरवन को भी शामिल किया गया है. यहां पर 70 बाघ पाए गए हैं. राजस्थान में बाघों की संख्या 36 बताई गई है. इस सफलता पर खुश होकर बैठा नहीं जा सकता, क्योंकि जिन वजहों से बाघों की तादाद कम हुई थी, वे सारी वजहें अब भी मौजूद हैं.

उत्तराखंड, महाराष्ट्र, असम, तमिलनाडु और कर्नाटक में बाघों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है. खासकर, महाराष्ट्र और तराई के क्षेत्रों में बाघों की संख्या में ज़बरदस्त इज़ा़फा हुआ है. बिहार, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, उड़ीसा, मिज़ोरम, पश्चिम बंगाल और केरल में बाघों की संख्या स्थिर है. वृद्धि के लिहाज़ से पश्चिमी घाट आगे हैं. वहां पिछली गणना में बाघों की संख्या 412 पाई गई थी जो अब बढ़कर 534 हो गई है, लेकिन मध्य प्रदेश और आंध्र प्रदेश में बाघ कम हो गए हैं. होशंगाबाद, बैतूल, नर्मदा नदी के उत्तरी घाट और कान्हा कीसली में बाघों की संख्या में का़फी गिरावट पाई गई है.

जिन वजहों से बाघों की तादाद कम हुई थी, वे सारी वजहें अब भी मौजूद हैं. मध्य प्रदेश और आंध्र प्रदेश में बाघ कम हो गए हैं. होशंगाबाद, बैतूल, नर्मदा नदी के उत्तरी घाट और कान्हा कीसली में बाघों की संख्या में का़फी गिरावट पाई गई है.

अच्छी खबर यह है कि भारत में बाघों की तादाद बढ़ गई है. बुरी खबर यह है कि देश में इतने बाघों के लिए जंगल नहीं हैं. जब प्रोजेक्ट टाइगर शुरू हुआ था, तब इसके  तहत जितने जंगल थे, अब इसके एक तिहाई बचे हैं. ज़्यादातर जंगल इंसानी ज़रूरत और लालच की भेंट चढ़ गए हैं. अगर बाघों की तादाद के मुक़ाबले जंगल नहीं रहे, तो दूसरी समस्याएं खड़ी हो जाएंगी. बाघ अकेला रहने वाला जीव है. उसे ब़डा इलाक़ा चाहिए, जहां वह किसी दूसरे बाघ को घुसने नहीं देता है. जब प्रोजेक्ट टाइगर शुरू हुआ था तब इसे जंगल सुरक्षित रखने की दलील दी गई थी. खनन मा़फिया और भू-मा़फिया की वजह से आज जंगलों में अतिक्रमण हो रहा है. बाघों का विचरण वाला क्षेत्रफल भी घटा है. अगर हमारे देश में बाघों की संख्या बढ़ती गई, तो भी यह सवाल खड़ा होगा कि इतने बाघों के लिए जंगल कहां से आएंगे.

कुल अनुमानित संख्या में से 30 फीसदी बाघ 39 संरक्षित क्षेत्रों से बाहर रह रहे हैं, जो बाघ बढ़े हैं वे पिछली बार भी थे, लेकिन उनकी गिनती नहीं की गई थी. इस बार सुंदरवन और पश्चिम बंगाल व उड़ीसा के  नक्सल प्रभावित इलाक़ों को भी इस रिपोर्ट में शामिल किया गया है, जो पिछली बार शामिल नहीं थे. सबसे चिंताजनक बात यह है कि बाघों की जो बढ़ोतरी रिपोर्ट उन इलाक़ों से नहीं आई है, जहां प्रोजेक्ट टाइगर दशकों से चल रहा है.

ऐसे में सवाल उठता है कि अब तक प्रोजेक्ट टाइगर पर साल 2010 तक खर्च हो चुके  892.18 करोड़ रुपये आ़खिर जा कहां रहे हैं? और तो और बाघों का आवास स्थल भी ब़ढने कीबजाय कम होकर 728000 हेक्टेयर  ही रह गया है. यह 2006 में 936000 हेक्टेयर था. राजस्थान के  संदर्भ में भी इस रिपोर्ट में कोई खुश़खबरी नहीं है. यहां की स्थिति कमोबेश वही है जो पिछली गणना के व़क्त थी. बाघों की वृद्धि की खूबसूरत मार्केटिंग तो की गई है, जबकि आंकड़े इतना खुश नहीं करते. किसी समय देश में एक लाख बाघ थे. पिछले पांच वर्षों में इस देश ने सरिस्का (राजस्थान) और बाद में पन्ना (मध्यप्रदेश) की त्रासदियां देखी हैं. दोनों राष्ट्रीय उद्यानों से बाघों का पूरी तरह स़फाया हो गया था. पहले सरिस्का ने देश को हिला कर रख दिया था और इसके बाद पन्ना ने. इसके बाद स्वयं प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने विशेष टास्क फोर्स का आधार रखा.

सन 2008 में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने नेशनल वाइल्ड लाइफ क्राइम प्रिवेंशन ब्यूरो सेल का गठन किया, जिससे बाघ के अवैध शिकार की रोकथाम की जा सके. लेकिन आश्चर्य की बात है कि इसके बावजूद बाघों के शिकार में कोई कमी नहीं आई है, बल्कि बाघों की मौत और शिकार के तरीक़े बदल गए हैं. बाघों की तस्करी भारत में एक पूरी तरह से संगठित मा़िफया करता है. बाघ की तस्करी में मास्टर राजस्थान का संसारचंद और इसका छोटा भाई नारायण अब तक कई बार पुलिस के हाथों पक़डे जा चुके हैं, गुजरात के कटनी में दो बाघों को मारकर उनके अंगों की तस्करी के मामले में गिरफ्तार किया गया, पानीपत का तोताराम उ़र्फ बीरबल बावरिया बाघ तस्करी समूह का नेता है, इसे गिरफ्तार कर लिया गया, महाराष्ट्र के चंद्रपुर में मंगलदास माधवी और भैजी गेडम को गिरफ्तार किया गया. तदोबा-अंधरी बाघ संरक्षण से 6 लोगों की गिरफ्तारी हुई, लेकिन सब छूट गए. इस अवैध व्यापार में शामिल लोग बाघ संरक्षण केंद्र के आसपास के हैं. चिंता की बात यह है कि संरक्षित क्षेत्रों से सटे गांव और यहां के रहने वाले इस तस्करी में शामिल हैं. इन लोगों ने बाघों का शिकार कर मोटी कमाई करने का रास्ता अपना लिया है. इन गांव वालों का इस्तेमाल मा़िफया कर रहे हैं. बाघों के अंगों को चीन भेजा जाता है, जहां इसकी मोटी क़ीमत मिलती है. दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि इस कारण से इस वर्ष बाघ के अंगों की मांग में ज़बरदस्त इज़ाफ़ा हुआ है. एक रिपोर्ट के अनुसार मध्य एशिया और चीन में बाघ के लिंग की क़ीमत 80,000 डॉलर प्रति 10 ग्राम है, बाघ की खाल 10,000 से लेकर 1,00,000 डॉलर तक, बाघ की हड्डियां 9,000 डॉलर प्रति किलो तक बिक जाती हैं. हृदय और अन्य आंतरिक अंगों की क़ीमत भी हज़ारों लाखों में है. इसके बावजूद खरीदारों की कोई कमी नहीं है. सवाल यह है कि ये बाघ कहां से आते हैं.

जहां 1999 से 2003 के बीच 122 बाघों की हत्या हुई थी, वहीं नवंबर 2008 से लेकर जनवरी 2009 यानी स़िर्फ तीन महीने में दस बाघों का शिकार हुआ, बाघ की भूमि कहे जाने वाले काजीरंगा, कान्हा और कॉरबेट नेशनल पार्क में बाघ की संख्या शून्य हो गई. इसी तीन महीने में नौ बाघ केवल काजीरंगा में मृत पाए गए. 2009 में पन्ना में केवल एक बाघ बचा था, जो अब नहीं रहा. राजस्थान में सरिस्का के जंगलों में मरे पाए गए बाघ एसटी-1 की मौत स्वभाविक नहीं थी, बल्कि इसे किसी ने ज़हर दिया था. रणथंभौर से लाकर सरिस्का में आबाद किए जाने वालों में एसटी-1 सबसे पहला बाघ था. अलवर ज़िले में घने वनों से 2004 तक बाघों की दहाड़ सुनाई देती थी. सरिस्का बाघ विहीन हो गया है. पुलिस ने काफ़ी मेहनत के बाद एक शिकारी गिरोह का पर्दाफ़ाश किया और कुछ लोगों को गिरफ़्तार किया. मगर इसके बाद फिर से सरिस्का में बाघ बसाने की मांग ज़ोर पकड़ने लगी तो रणथंभौर से एक-एक कर पांच बाघ लाए गए. अब एक बाघ की मौत के बाद वहां चार बाघ रह गए हैं. वन अधिकारियों ने इन बाघों की गर्दनों पर रेडियो कॉलर भी लगाए. मगर अब लगता है कि यह तकनीक कोई काम नहीं आई, क्योंकि वन अधिकारियों को पांच दिन तक इस बाघ का कोई पता नहीं चला. एक और बाघ अभी लापता है. एस टी 4 नाम का यह बाघ पिछले एक हफ़्ते से भी ज़्यादा समय से सरिस्का में कहां है, इसका पता नहीं चल पा रहा है. बाघ को सबसे ज़्यादा खतरा बाघ का अवैध शिकार करने वालो से है, लेकिन सरकार को भी यह जवाब देना होगा कि बाघों को बचाने के नाम पर आवंटित राशि का किस तरह इस्तेमाल हो रहा है. क्यों इन इलाक़ों में भू-मा़फिया और खनन मा़फिया का राज चल रहा है. बाघों की कमी के लिए घटिया सरकारी तंत्र ज़िम्मेदार है, जो लोग बाघों को बचाना चाहते हैं वे चुप हैं. सरकार से यह सवाल करना होगा कि क्यों संरक्षित क्षेत्र कम होते जा रहे हैं. इन्हें खनन मा़िफया के हवाले क्यों किया जा रहा है. क्यों भारत में टाइगर रिजर्व फोरेस्ट में टाइगर इकोलोजिस्ट नहीं हैं. कब तक इस देश में बाघों का संहार होता रहेगा. पर्यावरण और विलुप्त हो रहे प्राणी राजनीति का मुद्दा नहीं हैं और बाघ वोट नहीं दे सकते हैं, आप दे सकते हैं. अगर इस शानदार जीव को बचाना है तो हर भारतीय को आगे आना होगा, उनकी आवाज़ बनना होगा.

2 comments

  • ritika

    आकडे भले ही हिंदुस्तान में बाघों दी संख्या को बड़ा दे लेकिन हकीकत है की बाघों की संख्या घटी है
    यह हकीकत जाननी हो यूपी के दुधवा नॅशनल पार्क के बाघों के गिनती दुबारा करा ली जाए तो अपने आप दूध का ढूध और पाने का पानी हो जायेगा . दुधवा में बाघों की गिनती में खासा हेर फेर किया गया है.

  • ritika

    Hey frnd nice story in chauthiduniya.
    same prblm in maharashtra

    “SAVE TIGER ”
    keep it up

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