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बीटी बीज यानी किसानों की बर्बादी

संप्रग सरकार की जो प्रतिबद्धता किसान और खेती से जुड़े स्थानीय संसाधनों के प्रति होनी चाहिए, वह विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के प्रति दिखाई दे रही है. इस मानसिकता से उपजे हालात कालांतर में देश की बहुसंख्यक आबादी की आत्मनिर्भरता को परावलंबी बना देने के उपाय हैं. बीते साल फरवरी में जब पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने बीटी बैगन की खेती के ज़मीनी प्रयोगों को बंद करते हुए भरोसा जताया था कि जब तक इनके मानव स्वास्थ्य से जुड़े सुरक्षात्मक पहलुओं की वैज्ञानिक पुष्टि नहीं हो जाती, उत्पादन को मंज़ूरी नहीं दी जाएगी. इस भरोसे से यह उम्मीद जगी थी कि बीटी बीजों के सिलसिले में अब एकतरफा फैसले नहीं लिए जाएंगे. इसके बावजूद गोपनीय ढंग से मक्का के संकर बीजों का प्रयोग बिहार में किया गया. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को जब इस वादाखिलाफी की ख़बर लगी तो उन्होंने सख्त आपत्ति जताते हुए केंद्रीय समिति में राज्य के प्रतिनिधि को शामिल करने की पैरवी भी की. नतीजतन पर्यावरण मंत्रालय ने बिहार में बीटी मक्का के परीक्षण पर रोक लगा दी, लेकिन यहां एक आशंका ज़रूर उठती है कि यह परीक्षण उन प्रदेशों में जारी रहेंगे, जहां कांग्रेस और संप्रग के सहयोगी दलों की सरकारें हैं. गुपचुप जारी इन प्रयोगों से पता चलता है कि मनमोहन सरकार की हालत विदेशी कंपनियों के आगे इतनी दयनीय है कि उसे जनता से किए वादे से मुकरना पड़ रहा है. नीतीश कुमार ने पर्यावरण मंत्रालय की कार्यप्रणाली पर न केवल ऐतराज जताया, बल्कि एक व्यवहारिक पहलू सामने लाते हुए सलाह दी कि आनुवांशिक अभियांत्रिकी की मंज़ूरी समिति में राज्य के प्रतिनिधि को भी शामिल किया जाए. बिहार में बीटी मक्का और धारवाड़ में बीटी बैगन के प्रयोगों से पहले राज्य के किसी प्रतिनिधि को समिति में लेना ज़रूरी नहीं समझा गया. राज्य सरकार को प्रयोग की न सूचना दी गई और न ही ज़रूरी सावधानियां बरती गईं. भारत के कृषि और डेयरी उद्योग पर नियंत्रण करना अमेरिका की प्राथमिकताओं में प्रमुख है. इन बीजों की नाकामी साबित हो जाने के बावजूद इनके प्रयोगों का मक़सद है मोंसेंटो, माहिको बालमार्ट और सिंजेटा जैसी कंपनियों के कृषि बीज और कीटनाशकों के व्यापार को भारत में ज़बरन स्थापित करना. बिहार में मक्का बीजों की पृष्ठभूमि में मोंसेंटो ही थी. इसके पहले धारवाड़ में बीटी बैगन के बीजों के प्रयोग के साथ इसकी व्यवसायिक खेती को प्रोत्साहित करने में माहिको का हाथ था. यहां तो ये प्रयोग कुछ भारतीय वैज्ञानिकों को लालच देकर कृषि विश्वविद्यालय धारवाड़ और तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय कोयंबटूर में चल रहे थे. जीएम बैगन पहली ऐसी सब्जी थी, जो भारत में ही नहीं, दुनिया में पहली मर्तबा प्रयोग में लाई जाती. इसके बाद एक-एक करके कुल 56 फसलें वर्ण संकर बीजों से उगाई जानी थीं. लेकिन बीटी बैगन खेती के देश भर में ज़बरदस्त विरोध के कारण पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने इसके प्रयोग एवं खेती पर प्रतिबंध लगा दिया था. लेकिन राजनेताओं के चेहरे कितने दोमुंहे हैं, यह गुपचुप मक्का बीज प्रयोगों से पता चलता है.

साधारण बीज में एक ख़ास जीवाणु के जीन को आनुवांशिक अभियांत्रिकी तकनीक से प्रवेश कराकर बीटी बीज तैयार किए जाते हैं. बीज निर्माता कंपनियों की ऐसी दलील है कि कीटाणु इन्हें भोजन नहीं बनाते और इनसे पैदावार अधिक होती है. देश की खाद्य सुरक्षा को प्रोत्साहित एवं सुनिश्चित करने की दृष्टि से जीएम खेती की बड़ी आबादी के चलते भारत को सख्त ज़रूरत है.

दरअसल आनुवांशिक बीजों से खेती को बढ़ावा देने के लिए देश के शासन-प्रशासन को मजबूर होना पड़ रहा है. 2008 में जब परमाणु क़रार का हो-हल्ला संसद और संसद से बाहर चल रहा था, तब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, कृषि मंत्री शरद पवार और पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश की तिगड़ी ने अमेरिका से एक ऐसा समझौता गुपचुप कर लिया था, जिस पर कतई बहस-चर्चा नहीं हुई. इसी समझौते के मद्देनज़र बीटी बैगन को बाज़ार का हिस्सा बनाने के लिए शरद पवार और जयराम रमेश ने देश के कई नगरों में जन सुनवाई के ज़रिए एक मुहिम तक चलाई थी, लेकिन जनता और स्वयंसेवी संगठनों के ज़बरदस्त विरोध के चलते राजनेताओं को इस जिद से तत्काल पीछे हटना पड़ा था.

साधारण बीज में एक ख़ास जीवाणु के जीन को आनुवांशिक अभियांत्रिकी तकनीक से प्रवेश कराकर बीटी बीज तैयार किए जाते हैं. बीज निर्माता कंपनियों की ऐसी दलील है कि कीटाणु इन्हें भोजन नहीं बनाते और इनसे पैदावार अधिक होती है. देश की खाद्य सुरक्षा को प्रोत्साहित एवं सुनिश्चित करने की दृष्टि से जीएम खेती की बड़ी आबादी के चलते भारत को सख्त ज़रूरत है. लेकिन कृषि और स्वास्थ्य से जुड़े भारतीय वैज्ञानिकों का दावा है कि ये बीज आहार की दृष्टि से तो उत्तम हैं ही नहीं, स्थानीय और पारपंरिक फसलों के लिए भी ख़तरनाक हैं. राष्ट्रीय पोषण संस्थान हैदराबाद के प्रसिद्ध जीव विज्ञानी रमेश भट्ट ने पहले ही चेतावनी दी थी कि अगर बीटी बैगन की खेती शुरू होती है तो इसके प्रभाव से बैगन की स्थानीय किस्म मट्टूगुल्ला से प्रभावित होकर लगभग समाप्त हो जाएगी.

इसके बावजूद हमारे देश की सरकार विदेशी कंपनियों के व्यापारिक हित साधने में लगी है. जबकि हम अपने ही देश में बीटी कपास के दुष्परिणाम आज तक भुगत रहे हैं. बीटी कपास के उत्पादन का सिलसिला 2002 में शुरू हुआ था. इस बीज की अब तक खपत लगभग दस हज़ार करोड़ रुपये की हो चुकी है. यदि यही धन किसानों के हाथों में होता तो देश के ढाई लाख किसानों को आत्महत्या नहीं करनी पड़ती. ज़ाहिर है, यह धन विदेशी कंपनियों की तिजोरियों में गया और देश का अन्नदाता कंगाल हो गया. जीन रूपांतरित बीजों के इस्तेमाल में शर्त होती है कि यदि बीज ख़राब निकलते हैं तो प्रयोग करने वाली कंपनी को पर्याप्त मुआवज़ा देना होगा, लेकिन बिहार में इन बीजों से उत्पादित फसल जब कमज़ोर निकली तो कंपनी के प्रयोगकर्ताओं ने मुआवज़ा देने की जबावदेही से पल्ला झाड़ लिया. आख़िर में इस नुक़सान की भरपाई नीतीश कुमार ने राज्य सरकार के खजाने से कराई. यानी बीटी बैगन से होने वाली कमाई पर तो विदेशी कंपनियों का पूरा अधिकार है, लेकिन हानि में कोई भागीदारी नहीं. क्या कंपनियों की इसी चालाकी से किसानों और देश के हित सधेंगे?

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