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जनगणना के साथ नज़रिया बदलने की जरुरत

जनगणना के साथ नज़रिया बदलने की जरुरत

  • घुमंतू और विमुक्त जनजातियों की जनसंख्या 6 करोड़
  • 1952 में खत्म हुआ क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट 1871
  • अब तक नहीं हुई जनगणना, न मिली सरकारी सुविधा
  • लेकिन सरकार बेपरवाह, अब भी हैं ये विकास से कोसों दूर
  • नेशनल कमीशन फॉर डिनोटिफाइड एंड नोमाडिक ट्राइब्स का गठन

पच्चीस फीट ऊंची रस्सी पर चलता एक इंसान, सड़क के किनारे करतब दिखाता एक बच्चा. शहर के किनारे तंबू डाले कुछ परिवार. आज यहां, कल कहीं और. बिस्तर के नाम पर ज़मीन, छत आसमान. महीने-दो महीने पर शहर बदल जाता है और शायद ज़िंदगी के रंग भी, लेकिन यह कहानी सैकड़ों सालों से बदस्तूर जारी है. यह कहानी है भारत के उन 6 करोड़ घुमंतू और विमुक्त जनजातियों की, जिन्हें आम बोलचाल की भाषा में यायावर कहते हैं. इनकी बदनसीबी का आलम यह है कि आज़ादी के 63 सालों बाद भी न तो इनकी जनगणना हुई है और न ही इन्हें कोई सरकारी सुविधा मिली. उल्टे पुलिस-प्रशासन की निगाहों में इनकी छवि अपराधियों की बनी हुई है.

लाल‍बहादुर शास्‍त्री यवतमाल के बंजारा अधिवेशन में शामिल हुए थे. दिल्‍ली में हुए बंजारा अधिवेशन में इंदिरा गांधी ने शिरकत की थी. राजीव गांधी सोलापुर में विमुक्‍त एवं घुमंतू जनजाति समुदाय की बैठक में शामिल हुए. इन सभी लोगों ने इस समुदाय की भलाई के लिए घोषणाएं कीं. राजीव गांधी ने केंद्र सरकार की नौकरियों में आरक्षण और शैक्षणिक सुविधा देने का आश्‍वासन दिया था.

अंग्रेजों के जमाने में इन्हें रोजाना थाने में हाज़िरी लगानी पड़ती थी. इनके लिए एक काला क़ानून अंग्रेजों ने बनाया था, जिसका नाम था क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट 1871. आज़ादी के बाद भी दो सालों तक इनकी सुध किसी ने नहीं ली. दो साल बाद इस क़ानून में संशोधन तो हुआ, लेकिन इनकी ज़िंदगी में संशोधन के नाम पर कुछ नहीं हुआ. 1949-50 में अनंतसयाम अयंगर के नेतृत्व में क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट इंक्वायरी कमेटी बनी, जिसने इस एक्ट को ख़त्म करने की स़िफारिश की थी. 1953 में लालबहादुर शास्त्री यवतमाल के बंजारा अधिवेशन में शामिल हुए थे, जहां उन्होंने इस समुदाय के बच्चों को शुल्क मुक्त शिक्षा व स्कॉलरशिप देने की बात कही थी. 1966 में दिल्ली में हुए बंजारा अधिवेशन में इंदिरा गांधी ने भी शिरकत की थी और यह आश्वासन दिया था कि इस समुदाय को अनुसूचित जनजाति की सूची में शामिल किया जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हो सका. फिर 31 मार्च, 1989 को तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी महाराष्ट्र के सोलापुर में विमुक्त एवं घुमंतू जनजाति समुदाय की एक बैठक में शरद पवार के साथ शामिल हुए. इस बैठक में राजीव गांधी ने इस समुदाय को केंद्र सरकार की नौकरियों में आरक्षण और शैक्षणिक सुविधा देने का आश्वासन दिया. हालांकि यह आश्वासन भी कोरा ही साबित हुआ.

राजग के शासनकाल में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी भी महाराष्ट्र के पंढरपुर में विमुक्त एवं घुमंतू जनजातियों के लाखों लोगों की एक रैली में पहुंचे, जहां उन्होंने नेशनल कमीशन फॉर डिनोटिफाइड एंड नोमाडिक ट्राइब्स (विमुक्त एवं घुमंतू जनजातियों के लिए राष्ट्रीय आयोग) बनाने की घोषणा की. यह आयोग बना भी, लेकिन इसके अस्तित्व में आने के बावजूद इस समुदाय का कोई भला हुआ हो, ऐसा नहीं है. यह ख़ुद आयोग की कार्यप्रणाली और उसकी रिपोर्ट पर सरकार के रवैये से ही पता चल जाता है. विमुक्त एवं घुमंतू जनजातियों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति पर इस आयोग ने एक रिपोर्ट तैयार की, जिसमें बताया गया है कि इस समुदाय के लोग देश के अलग-अलग हिस्सों में अस्थायी आश्रय स्थल, तंबू या खाली ज़मीन पर रहते हैं. इनके पास स्थायी पता नहीं है, जिसकी वजह से इन्हें घर के लिए ज़मीन आवंटित करने में भी मुश्किलें आती हैं. इनके पास न तो अपने परिचय का कोई सबूत है और न संपत्ति के स्वामित्व का. नतीजतन, इनका राशनकार्ड भी नहीं बन पाता है और न ही ये बीपीएल कोटे में शामिल हो पाते हैं. जाति प्रमाणपत्र मिलने में भी इन्हें काफी मुश्किल होती है और इस वजह से ये सरकार की किसी भी कल्याणकारी योजना का लाभ नहीं उठा पाते. यह रिपोर्ट सरकार को सौंपी गई, लेकिन इस पर सरकार ने अब तक क्या किया है, इसका कुछ अता-पता नहीं. ख़ुद इस आयोग के पूर्व चेयरमैन ने कहा है कि डेढ़ साल बाद भी इस रिपोर्ट पर सरकार ने कोई ठोस कार्रवाई नहीं की. ज़ाहिर है, इनकी भलाई के लिए जो थोड़े-बहुत प्रयास हुए, घोषणाएं हुई, वे सब काग़ज़ों तक सीमित रह गए.

कुछ संगठन और राजनेता विमुक्त एवं घुमंतू जनजातियों के लोगों की भलाई के लिए एक लंबी लड़ाई भी लड़ रहे हैं. 2011 की जनगणना का प्रथम चरण तो पूरा हो चुका है, लेकिन दूसरे चरण के तहत जातिगत आधार पर जनगणना होनी अभी बाक़ी है. महाराष्ट्र के एक पूर्व सांसद हरिभाऊ राठौड़ इस मुद्दे को सालों से उठा रहे हैं. इस संबंध में उन्होंने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर बहुत सारे सुझाव भी दिए हैं. मसलन, सभी राज्यों से यह कहा जाए कि वे विमुक्त एवं घुमंतू जनजातियों की सूची बनाएं. साथ ही उनकी मांग यह भी है कि ओबीसी को दिए जाने वाले 27 फीसदी आरक्षण में से कम से कम 7 फीसदी आरक्षण विमुक्त एवं घुमंतू जनजातियों के लोगों को दिया जाए. एक फरवरी, 2011 को प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में राठौड़ ने विमुक्त एवं घुमंतू जनजातियों के लिए बजट में अलग से राशि आवंटित करने की मांग की है. साथ ही वह 2011 की जनगणना में अलग से विमुक्त एवं घुमंतू जनजातियों की जनगणना की भी मांग कर रहे हैं. इस संबंध में गृह राज्यमंत्री ने राठौड़ को पत्र लिखकर यह ज़रूर सूचित किया है कि कैबिनेट ने 9 सितंबर, 2010 को हुई बैठक में निर्णय लिया है कि जून 2011 से जातिगत आधार पर जनगणना की जाएगी.

वैसे सुप्रीम कोर्ट ने भी विमुक्त एवं घुमंतू जनजाति समुदाय की अलग से जनगणना के मुद्दे पर सरकार से जवाब मांगा है, क्योंकि सरकार के इस निर्णय से अभी यह साफ नहीं हुआ है कि वास्तव में जनगणना के इस दूसरे चरण में जातिगत आधार के साथ-साथ विमुक्त एवं घुमंतू जनजातियों के 6 करोड़ लोगों की जनगणना भी एक अलग श्रेणी में की जाएगी या नहीं. इसके अलावा यह भी सवाल उठता है कि देश के अलग-अलग हिस्सों में फैले विमुक्त एवं घुमंतू जनजातियों के 6 करोड़ लोगों की जनगणना आख़िर सरकार कैसे कराएगी, क्योंकि अब तक सरकार यह साफ नहीं कर सकी है कि इस तरह की जनगणना की रूपरेखा क्या होगी. बहरहाल, अगर सरकार सचमुच विमुक्त एवं घुमंतू जनजाति समुदाय के 6 करोड़ लोगों की भलाई के लिए चिंतित है और इस बार की जनगणना के दूसरे चरण में उन्हें शामिल करती है तो यह स्वागतयोग्य क़दम माना जाएगा. लेकिन सवाल स़िर्फ जनगणना कराने भर का नहीं है. सवाल उस मानसिकता का भी है, जिसकी वजह से पुलिस हो या आम आदमी, इस समुदाय विशेष को एक अलग नज़रिए से देखता है. ज़रूरत इस नज़रिए में बदलाव लाने की भी है.

राज्यवार विमुक्त एवं घुमंतू जनजातियां
जनजातिराज्य
बहारूपीआंध्र प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश एवं कर्नाटक
बावागुजरात, महाराष्ट्र एवं मध्य प्रदेश
बेलदारमहाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, उड़ीसा एवं बंगाल
भामताआंध्र प्रदेश, गुजरात एवं महाराष्ट्र
भोईकर्नाटक, उड़ीसा एवं महाराष्ट्र
बुदबुदकेआंध्र प्रदेश, गुजरात एवं महाराष्ट्र
चलवाड़ीआंध्र प्रदेश, गुजरात एवं महाराष्ट्र
चितपरधीगुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश एवं कर्नाटक
दवारी गोसावीगुजरात, महाराष्ट्र एवं उत्तर प्रदेश
गदी-लोहारगुजरात, महाराष्ट्र एवं राजस्थान
घंटी-चोरगुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश एवं दिल्ली
गरौड़ीगुजरात, महाराष्ट्र एवं मध्य प्रदेश
घिसाड़ीगुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, राजस्थान एवं दिल्ली
बोल्लागुजरात, महाराष्ट्र,  आंध्र प्रदेश, कर्नाटक एवं त्रिपुरा
गोंधालीगुजरात, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश एवं कर्नाटक
गोपालगुजरात, महाराष्ट्र एवं मध्य प्रदेश
जोगीगुजरात, महाराष्ट्र, हिमाचल प्रदेश एवं तमिलनाडु
कहारमहाराष्ट्र एवं त्रिपुरा
कपाड़ीगुजरात, महाराष्ट्र एवं मध्य प्रदेश
कोल्हाटीमहाराष्ट्र, मध्य प्रदेश एवं कर्नाटक
मसानमहाराष्ट्र, कर्नाटक एवं आंध्र प्रदेश
शिकलगारमहाराष्ट्र, पंजाब, दिल्ली एवं हिमाचल प्रदेश
तिरमालीगुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक एवं आंध्र प्रदेश
वासुदेवगुजरात, महाराष्ट्र एवं मध्य प्रदेश

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