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हिट शो के लिए तरसते शो मैन- 4 : संजय लीला भंसाली : कैमरे में कमाल, कहानी से कंगाल

हिट शो के लिए तरसते शो मैन- 4 : संजय लीला भंसाली : कैमरे में कमाल, कहानी से कंगाल

संजय लीला भंसाली. आज के दौर के भारत के सबसे महंगे निर्देशक. सिनेमा में लाइट और कलर की जैसी समझ संजय लीला भंसाली को है, वैसी समझ आज के दौर के किसी दूसरे फिल्मकार को नहीं है. संजय लीला भंसाली अपनी फिल्मों में कैमरे के कमाल से विमल रॉय जैसे फिल्मकार की याद दिलाते हैं. भंसाली की हाल ही में रिलीज़ हुई फिल्म गुज़ारिश कामयाबी हासिल नहीं कर सकी. सांवरिया के बाद भंसाली की एक और फिल्म फ्लॉप. हालांकि इन फिल्मों के फ्लॉप होने के बाद भी भंसाली की फिल्मों का क्रेज बरक़रार है और अभिनेता ही नहीं, दर्शकों को भी उनकी फिल्मों का बेसब्री से इंतज़ार रहता है. भंसाली ने अपने करियर में बहुत ज़्यादा फिल्में डायरेक्ट नहीं की हैं. वह एक फिल्म पूरी होने के बाद अगली फिल्म पर काम करने में यक़ीन रखने वाले फिल्मकारों में से एक हैं. लेकिन इसके बाद भी संभावनाओं से भरपूर यह निर्देशक कभी हिट और कभी फ्लॉप रहा. आ़िखर इसकी वजह क्या है, यह समझना भी ज़रूरी है.

निर्देशक बनने से पहले भंसाली ने निर्देशन की बारीकियां सीखने के लिए विधु विनोद चोपड़ा के साथ बतौर असिस्टेंट डायरेक्टर काम किया. परिंदा और 1942 ए लव स्टोरी में संजय विधु विनोद चोपड़ा के सहायक थे. इसके बाद 1996 में उन्होंने पहली फिल्म डायरेक्ट की-खामोशी द म्यूज़िकल. सलमान खान, मनीषा कोईराला स्टारर इस फिल्म में नाना पाटेकर और सीमा विश्वास ने मनीषा कोईराला के ऐसे माता-पिता का किरदार निभाया, जो बोल और सुन नहीं सकते. फिल्म फ्लॉप रही, लेकिन समीक्षकों ने सराहा और संजय की संवेदनशीलता की तारी़फ की. भंसाली इसके बाद सलमान और ऐश्वर्या को लेकर हम दिल दे चुके सनम लेकर आए. फिल्म हिट रही और समीक्षकों ने भी सराहा. भंसाली ने इसके बाद देवदास बनाई, लेकिन समीक्षकों को नए देवदास में वह दम नज़र नहीं आया. फिल्म अपनी भव्यता को लेकर ज़रूर चर्चाओं में रही. इन फिल्मों ने भंसाली को कामयाब तो बना दिया, लेकिन वह अपनी संपूर्ण क्षमताओं को प्रदर्शित नहीं कर पा रहे थे, जो उनके अंदर विद्यमान थीं.

भंसाली ने लीक से हटते हुए अगली फिल्म बनाई-ब्लैक. 2005 में रिलीज़ इस फिल्म में भंसाली ने अपनी निर्देशकीय क्षमता को पूरी शिद्दत के साथ पेश किया. कहानी, प्रस्तुति, अभिनय एवं कलात्मकता हर तरी़के से फिल्म लाजवाब थी. न स़िर्फ भारत में, बल्कि पूरी दुनिया में इस फिल्म का डंका बजा. फिल्म को टाइम्स मैगजीन ने दुनिया भर में साल की पांच फिल्मों में शुमार किया. फिल्म ऑस्कर की दावेदार थी, पर राजनीति के चलते फिल्म को ऑस्कर में नहीं भेजा गया. लेकिन इस कामयाबी के बाद ही भंसाली अपने ट्रैक से हट गए. ब्लैक के बाद भंसाली ने सांवरिया बनाई, लेकिन काले रंग की तरह नीला रंग दर्शकों को लुभा नहीं पाया. दर्शकों को समझ में नहीं आया कि वे क्या देखने आए हैं. यहां से भंसाली समय और समाज से खुद को जोड़ने में नाकाम साबित हुए.  भंसाली इस पीढ़ी के विरले फिल्मकार हैं. वह ट्रेंड और फॉर्मूला आदि का पालन नहीं करते. उनके सुंदर संसार में सब कुछ सामान्य से अधिक सुंदर और विशाल होता है. पूरे माहौल में भव्यता नज़र आती है. भंसाली के किरदारों का सामाजिक आधार काल्पनिक होता है. उनके आलोचक कह सकते हैं कि भंसाली अपनी फिल्मों की खूबसूरती, भव्यता और मैलोड्रामा की दुनिया को रीयल नहीं होने देते. कई बार यह बात चमत्कृत करती है तो ब्लैक बनती है और कई बार कोई प्रभाव पैदा नहीं हो पाता तो वह सांवरिया बन जाती है. दरअसल, भंसाली की फिल्में का़फी कलात्मक और भव्य होती हैं. फिल्म का सेट शानदार होता है. फ्रेम खूबसूरत पेंटिंग की तरह नज़र आता है. ऐसी मेहनत करने वाले कम ही कलाकार होते हैं. लेकिन भंसाली जितनी मेहनत अपनी फिल्मों को कैमरे से रचने में करते हैं, शायद उतनी मेहनत क़लम से रचते व़क्त नहीं करते. उनकी जितनी भी फिल्में आईं, ज़्यादातर में कहानियां नई नहीं हैं. देवदास शरत चंद्र की कालजयी रचना है तो हम दिल दे चुके सनम वो सात दिन से प्रभावित थी. ब्लैक की कहानी के बारे में कहा गया कि विदेशों में इस पर फिल्में बन चुकी हैं. हालिया रिलीज़ गुज़ारिश की कहानी पर भी एक लेखक ने दावा ठोंक दिया है और आरोप लगाया है कि भंसाली ने उनकी कहानी चुराई. उनकी फिल्मों में कई बातें अच्छी तरह व्यक्त ही नहीं हो पातीं. संजय लीला भंसाली की सृजनात्मकता और सिनेमाई समझ पर सवाल नहीं उठाए जा सकते, लेकिन यह फिल्मकार अगर समय और समाज से जुड़कर कुछ नई कहानियों पर काम करे तो यक़ीनन ब्लैक जैसी फिल्म बार-बार देखने को मिलेगी.

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