Chauthi Duniya

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लोक से दूर लेखक

बचपन से सुनता था कि उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद कहा करते थे कि साहित्य समाज का दर्पण होता है. एक और बात सुनता था कि साहित्य राजनीति के पीछे नहीं, बल्कि समाज के आगे चलने वाली मशाल हैं. मैं इसे सुनकर यह सोचता था कि अगर साहित्य मशाल है तो साहित्यकार उस मशाल की लौ को लगातार जलाए रखने का काम करते हैं. भ्रष्टाचार के ख़िला़फ अन्ना हजारे का दिल्ली में ऐतिहासिक अनशन ख़त्म हो गया है. अब तमाम तरीक़े से लोग उस जन उभार और आंदोलन को मिले व्यापक जन समर्थन का आकलन कर रहे हैं. यह वह व़क्त था, जब साहित्य और साहित्यकारों के  सामने यह चुनौती थी कि वे साबित करें कि वे राजनीति के पीछे चलने वाली मशाल नहीं हैं, लेकिन अन्ना के आंदोलन के दौरान कमोबेश साहित्यकारों का जो ठंडा या विरोध का रुख़ रहा, उससे घनघोर निराशा हुई. हंस के संपादक और दलित विमर्श के पुरोधा राजेंद्र यादव को अन्ना के आंदोलन में आ रहे लोग, भीड़ और उनका समर्थन एक उन्माद नज़र आता है. उस भीड़ और उन्माद को दिखाने-छापने के लिए वह मीडिया को कोसते नज़र आते हैं. उनका मानना है कि अन्ना के आंदोलन के पीछे व्यवस्था परिवर्तन का विचार कम और एक समानांतर सत्ता क़ायम करने की आकांक्षा ज़्यादा है. पता नहीं, राजेंद्र यादव को इसमें समानांतर सत्ता कायम करने के संकेत कहां से मिल रहे हैं, जबकि अन्ना हजारे और उनके लोग मंच से कई बार ऐलान कर चुके हैं कि वे चुनाव नहीं लड़ना चाहते हैं.

नामवर सिंह कहते हैं कि अन्ना का आंदोलन समाज को एक नई दिशा दे सकता है, यह सदिच्छा से किया गया आंदोलन है और इसका अच्छा परिणाम होगा. असगर वजाहत को भी लगता है कि अन्ना का आंदोलन एक नया रास्ता खोल रहा है. नामवर और असगर जैसे और कुछ लेखक हो सकते हैं, होंगे भी, लेकिन बड़ी संख्या में जन और लोक की बात करने वाले लेखक जन और लोक की आकांक्षाओं को पकड़ने में नाकाम रहे.

अन्ना हजारे ने तो कई बार अपने साक्षात्कार में इस बात को दोहराया है कि अगर वह चुनाव लड़ते हैं तो उनकी जमानत ज़ब्त हो जाएगी. टीम अन्ना भी हर बार व्यवस्था परिवर्तन की बात करती है. दरअसल यह जो सोच है, उसका आशय यह है कि वे अपने दायरे से बाहर न निकलने की जिद पाले बैठे है. राजेंद्र यादव को दूसरी शिकायत है कि अन्ना हजारे का जो आंदोलन है, वह लक्ष्यविहीन है और जिस भ्रष्टाचार को ख़त्म करने की बात की जा रही है, वह एक अमूर्त मुद्दा है. उनका मानना है कि जिस तरह आज़ादी की लड़ाई में हम अंग्रेजों की सत्ता के ख़िला़फ लड़े थे या फिर जय प्रकाश आंदोलन के  दौरान इंदिरा गांधी के निरंकुश शासन के ख़िला़फ पूरा देश उठ खड़ा हुआ था, वैसा कोई साफ लक्ष्य अन्ना के सामने नहीं है. भ्रष्टाचार के ख़िला़फ जो लड़ाई लड़ी जा रही है, वह अदृश्य है. भ्रष्टाचार व्यापक रूप से समाज और नौकरशाही की रग-रग में व्याप्त है, उसे ख़त्म करना आसान नहीं है.

एक तऱफ तो राजेंद्र यादव कहते हैं कि यह समानांतर सत्ता क़ायम करने की आकांक्षा है तो दूसरी तऱफ उन्हें कोई मूर्त लक्ष्य दिखाई नहीं देता है. राजेंद्र यादव को अन्ना का आंदोलन बड़ा तो लगता है, लेकिन इसके अलावा उन्हें सबसे आधारभूत आंदोलन नक्सलवाद का लगता है. उनका मानना है कि नक्सलवादी आंदोलन सारे सरकारी दमन के बावजूद व्यवस्था परिवर्तन के लिए सैकड़ों लोगों को बलिदान के लिए प्रेरित कर रहा है. यादव जी को नक्सलवादी आंदोलन व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई लगता है, जबकि अन्ना का आंदोलन समानांतर सत्ता क़ायम करने की आकांक्षा. क्या यादव जी यह भूल गए कि भारतीय सत्ता को सशस्त्र विद्रोह से उखाड़ फेंकने के सिद्धांत पर ही नक्सलवाद का जन्म हुआ. लगभग पांच दशकों बाद भी नक्सलवादी उसी सशस्त्र विद्रोह के सिद्धांत के लिए प्रतिबद्ध हैं और उनका अंतिम लक्ष्य दिल्ली की सत्ता पर काबिज़ होना है. जबकि अन्ना का आंदोलन न तो कभी सत्ता परिवर्तन की बात करता है और न हिंसा की.

दरअसल राजेंद्र यादव भी उसी तरह की भाषा बोल रहे हैं, जिस तरह की भाषा माओवादियों की समर्थक लेखिका अरुंधति राय बोल रही हैं. अरुंधति को भी जन लोकपाल बिल में समानांतर शासन व्यवस्था की उपस्थिति दिखाई देती है. अन्ना के  आंदोलन में पहले भारत माता की तस्वीर लगाने और उसके  बाद गांधी की तस्वीर लगाने और वंदे मातरम गाने पर भी ऐतराज है. ऐतराज तो अन्ना के मंच पर तमाम मनुवादी शक्तियों के इकट्ठा होने पर भी है, लेकिन अन्ना के साथ काम कर रहे स्वामी अग्निवेश और प्रशांत भूषण तो अरुंधति के भी सहयोगी हैं. अरुंधति को इस बात पर आपत्ति थी कि अनशन के बाद अन्ना एक निजी अस्पताल में क्यों गए. इन सब चीजों को अरुंधति एक प्रतीक के तौर पर देखती हैं और उन्हें ये सब चीजें एक ख़तरनाक कॉकटेल की तरह नज़र आती हैं.

पता नहीं, हमारे समाज के बुद्धिजीवी किस दुनिया में जी रहे हैं. अन्ना के समर्थन में उमड़े जनसैलाब में लोग दलितों, अल्पसंख्यकों एवं आदिवासियों को ढूंढने में लगे हैं. बड़े लक्ष्य को लेकर चल रहे अन्ना हज़ारे के आंदोलन में जिस तरह स्वत: स्फूर्त तरीक़े से लोग शामिल हुए, वह आंखें खोल देने वाला है. घरों में संस्कार और आस्था जैसे धार्मिक चैनलों की जगह न्यूज़ चैनल देखे गए, जिन घरों से सुबह-सुबह भक्ति संगीत की आवाज़ आया करती थी, वहां से न्यूज़ चैनलों के रिपोर्टरों की आवाज़ या अन्ना की गर्जना सुनाई देती थी. अन्ना के समर्थन में सड़कों पर निकले लोगों के लिए ट्रैफिक ख़ुद-बख़ुद रुक जाता था और आंदोलनकारियों को रास्ता देता था. ये सब एक ऐसे बदलाव के संकेत थे, जिन्हें पकड़ पाने में राजेंद्र यादव और अरुंधति जैसे लोग नाकाम रहे. अन्ना हजारे के आंदोलन से तत्काल कोई नतीजा नहीं निकला तो क्या हुआ, लेकिन इसके दूरगामी परिणाम होंगे, जिसे समझने में राजेंद्र-अरुंधति जैसे महान लेखक चूक गए. लेखकों के अलावा हिंदी में काम कर रहे लेखक संगठनों की भी कोई बड़ी भूमिका अन्ना के आंदोलन के दौरान देखने को नहीं मिली. अगर किसी लेखक संगठन ने चुपके से कोई प्रेस विज्ञप्ति जारी कर दी हो तो वह ज्ञात नहीं है. यह एक ऐतिहासिक मौक़ा था, जिसमें शामिल होकर हिंदी के मृतप्राय: लेखक संगठन अपने अंदर नई जान फूंक सकते थे, लेकिन विचारधारा के बाड़े से बाहर न निकल पाने की जिद या मूर्खता उन्हें ऐसा करने से रोक रही है. समय को न पहचान पाने वाले इन लेखक संगठनों की निष्क्रियता पर अफसोस होता है. प्रगतिशील लेखक संघ अपने शुरुआती सदस्य प्रेमचंद की बात को भी भुला चुका है. साहित्य समाज का दर्पण तो है, पर आज के साहित्यकार उस दर्पण से मुंह चुराते नज़र आ रहे हैं. जब लेखकों के सामने यह साबित करने की चुनौती थी कि साहित्य राजनीति का पिछलग्गू नहीं है तो वे ख़ामोश रहकर इस चुनौती से मुंह चुरा रहे थे. इस ख़ामोशी से लेखकों और लेखक संगठनों ने एक ऐतिहासिक अवसर गंवा दिया.

ऐसा नहीं है कि हिंदी के सारे साहित्यकार अन्ना के आंदोलन के विरोध में हैं. कई युवा और उत्साही लेखकों के अलावा नामवर सिंह और असगर वजाहत जैसे वरिष्ठ लेखकों को अन्ना का आंदोलन अहम लगता है. नामवर सिंह कहते हैं कि अन्ना का आंदोलन समाज को एक नई दिशा दे सकता है, यह सदिच्छा से किया गया आंदोलन है और इसका अच्छा परिणाम होगा. असगर वजाहत को भी लगता है कि अन्ना का आंदोलन एक नया रास्ता खोल रहा है. नामवर और असगर जैसे और कुछ लेखक हो सकते हैं, होंगे भी, लेकिन बड़ी संख्या में जन और लोक की बात करने वाले लेखक जन और लोक की आकांक्षाओं को पकड़ने में नाकाम रहे.

(लेखक IBN7 से जुड़े हैं)

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