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राहुल जी, यह वक्‍त बहुत महत्‍वपूर्ण है

राहुल जी, यह वक्‍त बहुत महत्‍वपूर्ण है

अन्ना हजारे का आंदोलन सारे देश की चेतना को उभार रहा था. गली-गली, मैदान-मैदान, हर जगह आंदोलन हो रहे थे. ऐसे समय में संसद के ऊपर ज़िम्मेदारी थी कि वह कोई हल निकाले, लेकिन संसद अन्ना हजारे के आंदोलन के खिला़फ खड़ी नज़र आई. उस समय यह ज़रूर लग रहा था कि अगर सोनिया गांधी यहां होतीं तो वह शायद कोई हल निकालने में पहल कर पातीं. कर पातीं या न कर पातीं, पता नहीं, लेकिन लोगों को लग रहा था कि एक ऐसा केंद्र था, जो शायद कोई रास्ता निकालने में महत्वपूर्ण रोल निभा पाता, पर सोनिया गांधी अपनी बीमारी की वजह से देश में नहीं थीं. उनका देश में न होना कांग्रेस के लिए थोड़ा संकट पैदा कर गया. ऐसे समय में राहुल गांधी के ऊपर लोगों की निगाहें थीं. राहुल गांधी ने जब संसद में भाषण दिया, कांग्रेस के लोगों ने उनका समर्थन किया. राहुल गांधी के भाषण में कोई रास्ता नहीं था, कोई समाधान नहीं था. वह बस एक भाषण था. उस भाषण में दूरंदेशी भी नहीं थी. उन्होंने जो सवाल खड़े किए, उनसे यह ध्वनि निकली कि राहुल गांधी भ्रष्टाचार से नहीं लड़ना चाहते, क्योंकि यह तर्क कि क्या एक लोकपाल बनने से भ्रष्टाचार ख़त्म हो जाएगा, यह भ्रष्टाचार के पक्ष में खड़ा हुआ तर्क है. उन्हें और रास्ते सुझाने चाहिए थे कि इन-इन से भ्रष्टाचार खत्म होगा, लेकिन वे रास्ते राहुल गांधी ने नहीं सुझाए.

साधारण से साधारण आदमी, जो कांग्रेस से सहानुभूति रखता है, उसे लग रहा था कि इस अवसर का फायदा राहुल गांधी अवश्य उठाएंगे और एक नई तस्वीर देश के सामने आएगी. वह नहीं आ पाई. हम यह नहीं कहते कि राहुल गांधी में समझ नहीं है, पर जब समझ की और जैसी समझ की जहां ज़रूरत होती है, वैसी समझ उस समय वहां दिखाई नहीं देती, तो देश का नेता बनने का सपना पालने वाले व्यक्ति के लिए यह खतरनाक स्थिति है.

दरअसल, देश के लोग यह चाह रहे थे और जो मौक़ा राहुल गांधी ने गंवाया, वह यही ऐतिहासिक मौक़ा था. देश को कांग्रेस पार्टी से एक ऐसे नेतृत्व की उम्मीद थी, जो विचारधारा का आधार लेकर देश से कुछ नई बातें कहे. यह मौक़ा था, जिसमें राहुल गांधी कह सकते थे कि लोकपाल भी बनेगा और भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए दस और उपाय भी किए जाएंगे. किसानों के लिए यह किया जाएगा, मज़दूरों, ग़रीबों और अल्पसंख्यकों के लिए यह किया जाएगा. कुल मिलाकर देश में एक नए कार्यक्रम, एक नई बात कहने का आगाज़ राहुल गांधी कर सकते थे. राहुल गांधी ने यह नहीं किया. हो सकता है कि उनके मन में कुछ करने की ख्वाहिश रही हो, लेकिन उनके सलाहकारों का वैचारिक स्तर वैसा न हो, जो देश चलाने वालों का होना चाहिए. इसीलिए यह अवसर भांपने में राहुल गांधी और उनके सलाहकार चूक गए.

साधारण से साधारण आदमी, जो कांग्रेस से सहानुभूति रखता है, उसे लग रहा था कि इस अवसर का फायदा राहुल गांधी अवश्य उठाएंगे और एक नई तस्वीर देश के सामने आएगी. वह नहीं आ पाई. हम यह नहीं कहते कि राहुल गांधी में समझ नहीं है, पर जब समझ की और जैसी समझ की जहां ज़रूरत होती है, वैसी समझ उस समय वहां दिखाई नहीं देती, तो देश का नेता बनने का सपना पालने वाले व्यक्ति के लिए यह खतरनाक स्थिति है. अगर सही मौक़े पर उसकी अक्ल काम न करे या सही मौक़े पर उसके सलाहकार उसे स्ट्राइक करने की सलाह न दें तो फिर यह मानना चाहिए कि देश को संभालने लायक़ अभी उसका व्यक्तित्व, उसकी समझ और बुद्धिमानी नहीं बनी है. वह अभी उतना परिपक्व नहीं है कि ऐसी स्थितियों का सामना कर सके. मनमोहन सिंह की सरकार उस समय अजीब-अजीब फैसले कर रही थी. कौन वार्ता कर रहा है, वार्ता करने के बाद कौन फैसले ले रहा है, हर क़दम पर मनमोहन सिंह की सरकार ने प्याज भी खाए और जूते भी खाए. यह कहावत कांग्रेस पार्टी और सरकार के लिए बिल्कुल सटीक बैठती है. आपने अन्ना को गिरफ़्तार करके जेल भेज दिया, आपकी इंटेलिजेंस यह नहीं बता पाई कि अन्ना हजारे के पक्ष में किस तरह जनमानस बन गया है. फिर जेल में डालते ही चार-पांच घंटे के बाद आपने उन्हें छोड़ने का फैसला कर लिया. जब अन्ना ने कहा कि वह जेल से नहीं निकलेंगे, तब आपको समझ में नहीं आया कि क्या करना है. जिस रामलीला मैदान को न देने के पीछे आपने सैकड़ों तर्क दिए, वही आपको मिन्नतें करके देना पड़ा और वहां झाड़ू लगवानी पड़ी, मिट्टी डलवानी पड़ी, पानी हटवाना पड़ा, टेंट लगवाना पड़ा, माइक लगवाने पड़े. यह सब करके आपने फिर अन्ना हजारे को मैदान दिया. इसके बाद आपने शर्त रखी कि तीन दिन, सात दिन, दस दिन. बाद में आपको फिर बात से पलटना पड़ा.

जब जन लोकपाल पर पहले बातचीत होती थी, तब कपिल सिब्बल एवं पी चिदंबरम का रुख़ और उसके बाद जो लोग बातचीत में शामिल हुए, उनका रु़ख, दोनों अलग-अलग थे. लेकिन शायद कहीं कपिल सिब्बल और पी चिदंबरम पर्दे के पीछे खेल कर रहे थे. जब अन्ना हजारे की टीम के लोग आंख दिखाते थे और बाहर निकल कर कहते थे कि सरकार हमारे साथ धोखा कर रही है, तब दो घंटे के भीतर ही सरकार यू टर्न ले लेती थी. और तो और, शनिवार को यानी जिस दिन संसद में बहस हो रही थी, नारायण सामी एक बात कह रहे थे, पवन बंसल दूसरी बात कह रहे थे और सलमान खुर्शीद तीसरी बात कह रहे थे. सलमान ख़ुर्शीद ने अन्ना हजारे की टीम को टका सा जवाब दे दिया कि संसद में स़िर्फ बात होगी, कोई प्रस्ताव पेश नहीं होगा. जब टीम अन्ना ने आंखें दिखाईं और कहा कि हमसे धोखा कर रहे हैं, हमसे कहा था कि प्रस्ताव पास करेंगे और उसके पक्ष में मतदान होगा. एक घंटे के भीतर सलमान ख़ुर्शीद को पलटना पड़ा और उन्होंने कहा कि नहीं, प्रस्ताव पेश होगा और मतदान भी होगा. मतदान की स्थिति इसलिए नहीं आई कि सदन ने सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर दिया. जब प्रधानमंत्री ने अन्ना हजारे को पत्र भेजा, जिसे लेकर विलासराव देशमुख गए, वह पत्र कहता है कि संसद ने प्रस्ताव पास किया है, जिसमें अन्ना हजारे की तीनों मांगों के ऊपर संसद में सर्वसम्मति है. अन्ना हजारे ने अनशन तोड़ दिया. इसके बाद कांग्रेस के लोगों ने सवाल उठा दिया कि प्रस्ताव है कहां, प्रस्ताव की भाषा क्या है, कौन सा प्रस्ताव है. यह कैसी भावना है? यहां पर कांग्रेस के भीतर एक मज़बूत नेतृत्व की ज़रूरत लोगों को महसूस हुई, लेकिन राहुल गांधी इस अवसर को चूक गए.

हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि हो सकता है, राहुल गांधी के मन पर उनकी मां की बीमारी का प्रभाव रहा हो. राहुल और प्रियंका या कांग्रेस पार्टी ने, किसी ने भी देश को सोनिया गांधी की बीमारी के बारे में नहीं बताया. सोनिया गांधी देश की और कांग्रेस पार्टी की बड़ी नेता हैं. उन्होंने प्रधानमंत्री पद ठुकरा दिया था. उन्हें अगर कैंसर हुआ है, जिसके बारे में अफवाहें चारों तऱफ चल रही हैं, तो भी देश को बताना चाहिए. बीमारी कोई ऐसी बात नहीं है, जिसे छुपाकर आप देश को धोखे में रखें. आख़िर आपके घर से ही बात निकलती है, आपकी पार्टी से बात निकलती है, आपकी पार्टी के महासचिव प्रेस कांफ्रेंस करते हैं, लेकिन ऐसी प्रेस कांफ्रेंस करते हैं, जो अटकलें लगाने के लिए लोगों को मजबूर करती हैं. हो सकता है, उनकी बीमारी का दबाव राहुल गांधी के दिमाग़ पर रहा हो, लेकिन राहुल गांधी देश में थे. भले ही सप्ताह भर के लिए थे. उनकी मां अमेरिका में अस्पताल में थीं. अगर वह सात दिनों के लिए देश में थे तो उनके सलाहकारों ने उन्हें क्यों नहीं समझाया कि यह ऐसा मौक़ा है, जिसे नहीं चूकना चाहिए.

अन्ना हजारे के साथ 80 प्रतिशत नौजवान थे. वही नौजवान, जिन्हें राहुल गांधी अपनी कंस्टीट्यूएंसी मानते हैं, जिन्हें सत्ता में हिस्सेदारी या जिनके सपनों को पूरा करने की बात वह करते हैं, जिनके सहारे वह अगला चुनाव जीतने की योजना बना रहे हैं. वह नौजवान तो अन्ना हजारे के साथ खड़ा दिखाई दिया तो राहुल गांधी के साथ कौन सा नौजवान है? राहुल गांधी को एक बात समझनी चाहिए कि देश में नौजवानों के पास आप अपनी बात नहीं पहुंचाएंगे और उनसे उनकी बात नहीं सुनेंगे तो आप धोखा खाएंगे. फिर नौजवान कम से कम आपको अपना नेता नहीं मानेगा. कांग्रेस पार्टी एक संगठित पार्टी की तरह काम करती नहीं दिखाई दे रही है. जितने भी महासचिव हैं, वे सभी अपने नज़दीकी प्रेस वालों के पास उतनी ही कहानियां रोज़ निकाल रहे हैं. कुछ अख़बार छाप रहे हैं, कुछ नहीं छाप रहे हैं. कभी चैनल परस्पर विरोधी बातें दिखा देते हैं. 24 अकबर रोड पर पार्टी का दफ्तर है, जहां महासचिव और संयुक्त महासचिव बैठते हैं और वहीं से भिन्न-भिन्न कहानियां बाहर आती हैं. कांग्रेस को एक मज़बूत नेतृत्व की ज़रूरत है. ऐसे नेतृत्व की, जो सारे लोगों को बांध सके, सारे लोगों को चुनाव में उतार सके. ऐसे नेतृत्व से कांग्रेस का भला नहीं होने वाला, जो लोगों के मन में यह भ्रम पैदा करे कि जहाज डूबने वाला है. मेरे पास कांग्रेस से जुड़ी जो कहानियां आती हैं, उन कहानियों को तो नहीं कहूंगा, लेकिन उनका लब्बोलुबाब बताता हूं.

कांग्रेस के एक बड़े नेता ने मुझसे कहा कि अगर मौजूदा प्रधानमंत्री के नेतृत्व में पार्टी चुनाव में उतरती है तो वह मौजूदा सीटों से 50 फीसदी सीटें कम लाएगी. ज़िम्मेदार शख्स हैं, जिन्होंने ये बातें मुझसे कहीं. कांग्रेस पार्टी के एक दूसरे ज़िम्मेदार शख्स ने कहा कि हो सकता है, आने वाला एक महीना कांग्रेस में बदलाव का महीना हो. उनका इशारा सीधा था कि प्रधानमंत्री बदला जा सकता है. प्रधानमंत्री बदला जाए या न बदला जाए, पर पार्टी को चाहिए कि वह इस तरह की अफवाहों पर रोक लगाए. यह रोक लगाने का काम दो लोग ही कर सकते हैं. सोनिया गांधी, जो इस समय बीमार हैं और राहुल गांधी, जो उस कोर कमेटी के सबसे महत्वपूर्ण सदस्य हैं, जो सोनिया गांधी की अनुपस्थिति में पार्टी को चलाने के लिए ज़िम्मेदार हैं. राहुल गांधी सोनिया गांधी के बेटे भी हैं. उन्हें चाहिए कि वह इन सारी बातों पर लगाम लगाएं. अगर वह लगाम नहीं लगाते हैं तो अपनी क्षमता को लेकर भ्रम पैदा कर रहे हैं. पार्टी संगठन को वह चला सकते हैं या नहीं, इस पर भी सवाल खड़ा होने लगा है. अब जबकि सोनिया गांधी बीमार हैं और शायद अगले कुछ महीनों तक वह शारीरिक और दिमाग़ी रूप से सक्षम नेतृत्व नहीं दे पाएंगी, राहुल गांधी के लिए यह ट्रांजिशनल फेज है. राहुल गांधी अगर इस व़क्त का फायदा नहीं उठाते हैं और अपनी सांगठनिक और दिमाग़ी क्षमता का परिचय नहीं देते हैं तो यह बात नेहरू परिवार या फिरोज़ गांधी के परिवार या इंदिरा गांधी के परिवार के एक ऐसे शख्स के प्रति लोगों में मोहभंग की व्यापक स्थिति बनाएगी, जिसके बारे में अब तक यह तस्वीर गढ़ी जाती रही है कि यह शख्स, यह नौजवान बहुत समझदार है, सांगठनिक क्षमता वाला है, बेबाक है और यह देश का भावी प्रधानमंत्री है.

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