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गोपालगढ़ हत्याकांड : लाशें सड़ती रही, लेकिन इंसाफ नहीं मिला – मामले की सच्चाई क्या है

गोपालगढ़ हत्याकांड : लाशें सड़ती रही, लेकिन इंसाफ नहीं मिला – मामले की सच्चाई क्या है

यह भरतपुर का गोपालगढ़ है, जिसकी मस्जिद की दीवार पर गोलियों के निशान हैं. पूरी मस्जिद इस समय छावनी बनी हुई है. पुलिसकर्मी जूता पहने घूम रहे हैं. मस्जिद के मेहराबों और इमाम के नमाज़ पढ़ाने की जगह पर गोलियों के निशान हैं.

गोपालगढ़ के मदरसे में जली हुई हड्डियां अभी तक पड़ी हुई हैं. जिस मस्जिद के पास गोलियां चलाई गईं, उसकी बाहरी दीवारों और अंदर की दीवार पर भी गोलियों के निशान हैं. यूं तो सभी अख़बारों ने विशेषत: उर्दू अख़बारों ने इस कांड पर बहुत कुछ लिखा, लेकिन अफ़सोस की बात यह है कि असल विवाद क्यों हुआ, किस कारण हुआ? उसका आंखों देखा हाल बताने के लिए सही लोग नहीं मिल पाए. इससे भी अधिक अफ़सोस की बात यह है कि अंग्रेज़ी और हिंदी मीडिया ने इस ख़बर को पहले दिन तो कोई महत्व नहीं दिया. दूसरे दिन ख़बर आई तो किसी ने पहले पन्ने पर 6 लाइनें दीं, किसी ने दूसरे पन्ने पर और किसी ने तो इसे प्रकाशित करना ही उचित नहीं समझा. मानों 13 लोगों का मारा जाना कोई विशेष बात नहीं थी और जिन अख़बारों ने ख़बर दी, उन्होंने विवाद के बाद तीन दिनों तक कोई ख़बर दोबारा प्रकाशित ही नहीं की.

यह वही मीडिया है, जो साधारण से साधारण बातों पर कैमरा लेकर पहुंच जाता है. यहां तक कि वे अख़बार, जिन्होंने ख़ुद जाकर मौके का दौरा किया, उन्हें भी सही रिपोर्ट नहीं मिल सकी. इसकी वजह शायद सही लोगों तक पहुंच न होना रही होगी. विवाद के 10 दिनों बाद तक सही रिपोर्ट सामने नहीं आ पाई. पीयूसीएल (पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज़) जो एक एनजीओ है और जिसे 1976 में जय प्रकाश नारायण ने केवल इस उद्देश्य से स्थापित किया था कि एक ऐसा संगठन हो, जो राजनीतिक दृष्टि से आज़ाद हो और विभिन्न राजनीतिक दलों के लोग एक-दूसरे के क़रीब आ सकें और एक प्लेटफॉर्म पर एकत्र होकर सिविल लिबर्टीज़ और मानवाधिकार के लिए काम कर सकें. इस संगठन की रिपोर्ट प्रामाणिक मानी जाती है, क्योंकि इसमें कोई भेदभाव नहीं बरता जाता. इस संगठन ने पहली बार भरतपुर कांड की सही रिपोर्ट पेश की और उसके बाद बाक़ी अख़बारों ने इसकी रिपोर्ट को सामने रखकर अपनी-अपनी रिपोर्टिंग की.

गोपालगढ़ क़स्बे में क़ब्रिस्तान की एक ज़मीन है. इस ज़मीन पर विवाद चल रहा था. कुछ लोगों को कहना है कि यह ज़मीन उनकी है और इसी को लेकर वे बहुत दिनों से मांग कर रहे थे कि ज़मीन ख़ाली की जाए, लेकिन जब इसके असल क़ाग़ज़ पटवारी और तहसीलदार से निकलवाए गए तो यह साबित हो गया कि विवादित ज़मीन क़ब्रिस्तान है. उसी दिन रात को गोपालगढ़ के इमाम को कुछ लोगों ने उनके घर में घुसकर मारा. उन्होंने रिपोर्ट लिखवानी चाही, लेकिन पुलिस ने रिपोर्ट नहीं लिखी. पुलिस ने कहा कि दोनों पक्षों को बुलाकर ही रिपोर्ट लिखी जा सकेगी. फिर दोनों पक्षों के लोगों को थाने में बुलवाया गया, जिसमें क्षेत्रीय विधायक ज़ाहिदा बेगम और पड़ोसी क़स्बे के भाजपा विधायक भी आए, लेकिन इससे पहले कि इस मसले का हल निकाला जाता, इलाके में हंगामा मच गया. अफ़वाहें फैलने लगीं. इस बीच एक गुट थाने पर चढ़कर आ गया कि हम पर गोलियां चल रही हैं. पुलिस ने एसपी से ज़बरन गोलियां चलाने की अनुमति ली. पुलिस मस्जिद में घुसी और वहां मौजूद तीन लोगों को गोली मारकर बाहर खींचा और पेट्रोल डालकर आग लगा दी. पास में ही एक ईदगाह है, जिसके पास कुआं है, उसमें तीनों लाशें फेंक दीं. कुएं में से वे तीनों लाशें अगले दिन बरामद हुईं. ज़ाहिदा बेगम ने पुलिस स्टेशन के एक छोटे से कमरे में पनाह ली और उन्होंने बड़ी मुश्किल से ख़ुद को बचाया. जमशेद साहब का कहना है कि 6 बजे तक गोलियां चलती रहीं. विधायक ज़ाहिदा बेगम का कहना है कि उन्होंने ख़ुद अपनी आंखों से पुलिस को निहत्थे लोगों पर गोलियां बरसाते देखा है. ज़ाहिदा का कहना है कि यह पुलिस और आरएसएस का प्रायोजित कार्यक्रम था. ज़ाहिदा के मुताबिक़, ज़िलाधिकारी और एसपी निष्पक्ष थे, लेकिन एडिशनल एसपी ओ पी मेघवाल एवं इंस्पेक्टर बृजेश मीणा आदि सांप्रदायिक मानसिकता के थे. जमशेद साहब के अनुसार, 5 लाशों को द़फना दिया गया, चार का मेडिकल हो गया, कुल 6 लाशें दफ़नाने के लिए बचीं, लेकिन जिन लाशों को दफ़नाया नहीं गया, उन पर राजनीति का घिनौना खेल शुरू हो गया. विधायक किरोड़ी लाल मीणा ने लाशों को उस समय तक न दफ़नाने का फैसला किया, जब तक वह मरने वालों के परिवारीजनों को मुआवज़ा न दिलवा दें. यह लालच देकर कि मैं 25 लाख दिलवाऊंगा, मैं 40 लाख दिलवाऊंगा, लाशों पर राजनीति होने लगी. जमशेद साहब से जब हमने यह सवाल किया कि अंग्रेज़ी और हिंदी मीडिया आया या नहीं तो उनका जवाब था कि शुरू में कई दिनों तक उर्दू अख़बारों को छोड़कर किसी दूसरे अख़बार का रिपोर्टर नज़र भी नहीं आया, लेकिन कुछ दिनों बाद थोड़े-बहुत मीडिया के लोग आए. इन सभी परिस्थितियों को मद्देनज़र रखकर एक बात तो कहनी पड़ेगी कि इस विवाद की सही ख़बर देने की ज़हमत न तो प्रिंट मीडिया ने उठाई और न इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने. इंडियन एक्सप्रेस ने 10 दिनों बाद पीयूसीएल की रिपोर्ट पर आधारित अपनी रिपोर्ट पेश कर दी, लेकिन हिंदी अख़बारों ने तो यह ज़हमत भी नहीं उठाई.

क़लम में बहुत ताक़त है. पत्रकार की, संपादक की कलम अगर बहक जाए तो समाज टूट सकता है, अमन-चैन को खतरा पैदा हो सकता है. इसीलिए हम सब पत्रकारों को यह ज़िम्मेदारी समझनी चाहिए. भारत में कई बार इस तरह की घटनाएं हुईं, लेकिन मुस्लिम इतिहास में कोई ऐसी मिसाल नहीं मिलती, जबकि लाशें इतने दिनों तक पड़ी रही हों. समझ में नहीं आता कि सरकार क्यों चुप्पी साधे बैठी है और मुसलमानों की समस्याओं को समझने की कोशिश नहीं कर रही. उसे यह भी ख्याल नहीं कि यह आग उत्तर प्रदेश तक फैल सकती है. जिन पुलिसकर्मियों ने अंधाधुंध गोलियां चलाईं, उन्हें नौकरी से हमेशा के लिए निकाल देना चाहिए, हत्या का मुकदमा लगाकर दफ़ा 302 के तहत जेल में बंद कर देना चाहिए और अदालती फैसले का रंग देखना चाहिए, तभी इंसाफ़ के दोनों पलड़े बराबर दिखाई देंगे.

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