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संपादकीय विवेक पर सवाल

बात कई साल पुरानी है. प्रकाशन संस्थान, नई दिल्ली से आलोचक देवेंद्र चौबे की किताब समकालीन कहानी का समाजशास्त्र प्रकाशित हुई थी. मैंने कथादेश के संपादक हरि नारायण जी से उक्त किताब पर समीक्षा लिखने की अनुमति मांगी. हरि नारायण जी ने कृपापूर्वक उक्त पुस्तक की समीक्षा लिखने की अनुमति दे दी. मैंने श्रमपूर्वक किताब की समीक्षा लिखकर कथादेश को तय समय सीमा में प्रेषित कर दी. कथादेश के अंक में जब अगले अंक का विज्ञापन छपा तो उसमें यह घोषणा की गई कि मेरी समीक्षा आगामी अंक में प्रकाशित होगी. मुझे संतोष हुआ कि चलो संपादक को समीक्षा पसंद आई. महीने भर की प्रतीक्षा के बाद जब कथादेश का अगला अंक प्रकाशित हुआ तो मैंने हुलस कर पूरी पत्रिका देख डाली, लेकिन उसमें समीक्षा नहीं दिखी. निराशा में मैंने संपादक हरि नारायण को फोन किया तो उन्होंने बताया कि मेरी समीक्षा विध्वंसात्मक (सही शब्द अब याद नहीं है, लेकिन आशय यही था) है, इस वजह से वह उसे प्रकाशित नहीं कर पाएंगे. मैंने उनसे कहा कि आपने तो विज्ञापित कर दिया था, लेकिन बाद में हृदय परिवर्तन कैसे हुआ. उनके पास इसका कोई जवाब नहीं था. मैंने समीक्षा वापस मांग ली, जो मेरे पास डाक से आ गई. मेरी लिखी समीक्षा में कांट-छांट की गई थी, लेकिन पता नहीं क्यों वह प्रकाशित नहीं हुई. मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था. फिर कई साल बीत गए. अभी हाल में मेरी फाइलों में मुझे वह समीक्षा मिल गई तो पूरा वाक़या एक बार फिर से ताज़ा हो गया. मैंने सोचा कि उस वाक़ए और समीक्षा को पाठकों के सामने रखा जाए.

मेरे पास यह समीक्षा लिखे जाने की तारीख़ उपलब्ध नहीं है. ख़ुद के लिखे कई शब्द समझ में नहीं आ रहे हैं. इस वजह से हो सकता है कि मूल समीक्षा से दो-चार शब्द अलग हों, लेकिन मैंने पूरी समीक्षा में कोई बदलाव नहीं किया. यह सब लिखने के पीछे मेरा आशय केवल इतना है कि कैसे हिंदी साहित्य की शीर्ष पत्रिकाओं में शुमार कथादेश में स्वीकृत और विज्ञापित समीक्षा भी नहीं छपती है. मेरा कहना उस व़क्त भी यही था और अब भी यही है कि स्वीकृत और विज्ञापित करने से पहले एक बार रचना को पढ़ तो लेना ही चाहिए.

बहुत पहले इटली के मार्क्सवादी चिंतक अंतोनियो ग्राम्शी ने सबाल्टर्न शब्द समाज के  उत्पीड़ित, दलित, गौण एवं महत्वहीन व्यक्तियों के लिए इस्तेमाल किया था. इसके आधार पर बाद में भारतीय इतिहास का भी अध्ययन किया गया. समाजशास्त्र के लिए न स़िर्फ इतिहास, बल्कि साहित्य भी एक आधार और स्रोत होता है. साहित्य की एक विधा कहानी में सबाल्टर्न समाज के गौण या महत्वहीन व्यक्तियों के आधार पर देवेंद्र चौबे ने समकालीन कहानी का समाजशास्त्र तैयार किया है, परंतु उन्होंने ग्राम्शी के सबाल्टर्न के स्थान पर अमेरिकी समाजशास्त्रियों द्वारा विकसित किए गए मार्जिनल मैन, जिसका अनुवाद लेखक ने सीमांत आदमी किया है, की अवधारणा को भारतीय समाज के संदर्भ में एक बड़े दायरे में समेटने का प्रयास करने का दावा किया है. अमेरिका में रॉबर्ट ई पार्क ने सीमांत आदमी के बारे में स्पष्ट रूप से लिखा है कि सीमांत आदमी मिश्रित ख़ून का आदमी होता है.

देवेंद्र चौबे की इस शोधपरक पुस्तक लिखने की योजना एकदम फिल्मी अंदाज़ में बनती है. लेखक किसी गोष्ठी से लौटते समय बस स्टॉप पर बस का इंतज़ार कर रहा होता है. साथ में आलोचक मैनेजर पांडे भी होते हैं. अचानक लेखक के मन में बात आती है और पांडे जी की प्रेरणा से इस पुस्तक की योजना बनती है. इस पुस्तक के शीर्षक में समकालीन शब्द है. यह शब्द बहुत ही गंभीर और विशद विवेचना की अपेक्षा रखता है, परंतु लेखक ने पुस्तक में कहीं भी समकालीनता को परिभाषित करने का कोई प्रयास नहीं किया है. स़िर्फ भूमिका में एक जगह संकेत है कि 1970 के बाद की कहानियों को उन्होंने अपनी सोच का आधार बनाया है. सैद्धांतिक रूप से कहानी खासकर समकालीन हिंदी कहानी की उस केंद्रीय प्रवृत्ति और दृष्टि को पकड़ने की कोशिश अब तक नहीं की गई, जिसकी ज़रूरत थी और जिसके माध्यम से 1970 के बाद की हिंदी कहानी समाज विज्ञान की अन्य विधाओं से जुड़कर अपनी एक स्वतंत्र छवि बनाती है. यहां यह प्रश्न उठता है कि क्या 1970 के पहले की कहानियों में हाशिए के लोग मौजूद नहीं थे या उसके पहले के कहानीकार समकालीन नहीं थे या इस शोध ग्रंथ में कहानी एवं कहानीकारों का चयन किसी अदृश्य आधार पर किया गया है.

इस पुस्तक में लगभग तीन दर्जन से अधिक व्यक्तियों का आभार प्रकट किया गया है, जिससे यह अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि लेखक की जनसंपर्क शास्त्र में कितनी रुचि है. अब अगर हम इस पुस्तक पर बात करें तो पाते हैं कि अति विकसित, विकसित और अविकसित यानी सभी समाज में मुख्य धारा से बाहर और मुख्य धारा के भीतर ऐसे हाशिए का समाज होता है और अर्से से हाशिए के लोग अपने समय के कहानीकारों की कहानियों का विषय भी बनते रहे हैं. भारतीय समाज के संदर्भ में हम पाते हैं कि राजनीतिक, सामाजिक एवं आर्थिक कारणों से एक बड़ा वर्ग हाशिए पर चला जाता है. देवेंद्र चौबे ने अपनी इस पुस्तक में हाशिए पर चले जाने के कारणों की, कहानी में वर्णित पात्रों के आधार पर पड़ताल करने का प्रयास किया है, परंतु अगर समाजशास्त्रीय व्याख्या करनी है तो हमें भारतीय समाज की संरचना और आज़ादी के बाद जो सामाजिक-आर्थिक विकास की प्रक्रिया चली, उसे श्यामाचरण दुबे (प्रसिद्ध समाजशास्त्री) की तरह समझने की ज़रूरत है, लेकिन लेखक ने गहराई में न जाकर शॉर्टकट अपनाया है.

इस पुस्तक में हाशिए के लोगों को दो भागों में रखकर उन्हें कहानी के माध्यम से सामने लाने का प्रयास किया गया है. पहला भाग वैसे लोगों का है, जो मुख्य धारा के अंदर रहते हुए हाशिए की ज़िंदगी जीते हैं. इनमें घरेलू नौकर, स्वरोज़गार में लगे लोग, बेबस स्त्रियां, खेतिहर और दिहाड़ी मज़दूर हैं. मुख्य धारा से बाहर के लोगों में उन्होंने स़िर्फ आदिवासियों को रखा है. बेबस स्त्रियां और समकालीन हिंदी कहानी लिखते हुए लेखक का मानना है कि दरअसल स्त्रियों के साथ सबसे बड़ी त्रासदी उनका स्त्री होना ही है. वेश्याओं और कॉलगर्ल को भी उन्होंने हाशिए का आदमी माना है, जबकि सामान्यतय: कॉलगर्ल किसी मजबूरी के कारण नहीं, बल्कि अपनी महत्वाकांक्षा की वजह से इस व्यवसाय को अपनाती है. सामाजिक संरचना इसके लिए कहां से ज़िम्मेदार है. स्त्रियों की स्थिति में भी का़फी बदलाव आया है और अब वह ज़माना नहीं रहा कि सामंती मानसिकता वाले उच्चवर्गीय परिवार के पुरुष दलित और निम्न वर्ग की स्त्रियों के साथ कुछ भी करना अपना अधिकार समझते हों. ये सब बीते ज़माने की बातें हैं और अब निम्नवर्गीय समाज में इतनी चेतना तो आ ही गई है कि कोई भी व्यक्ति, चाहे वह उसका अन्नदाता या पालनहार ही क्यों न हो, उसकी देह के साथ उसकी मर्ज़ी के बग़ैर खेल नहीं सकता.

इस किताब को पढ़ते हुए मुझे लगा कि लेखक समकालीन कहानी के बारे में स्पष्ट नहीं हैं और जिन कहानीकारों की कहानियों को उन्होंने उद्धृत किया है, उनमें पीढ़ियों के अंतराल और कहानी के विकास का ध्यान बिल्कुल नहीं रखा गया है. इसके अलावा कहानियों के मा़र्फत बात कहने में विस्तार और दोहराव ज़्यादा है. लेखक ने अपनी पसंद के कहानीकारों को स्थान देकर अपना जनसंपर्क शास्त्र मज़बूत किया है. शिव प्रसाद सिंह ने ऐसी कई कहानियां लिखीं, जिनमें भिखारी, मज़दूर आदि का वर्णन है, परंतु देवेंद्र चौबे ने उन्हें छोड़ दिया है. बावजूद इसके इस पुस्तक का स्वागत इसलिए किया जाना चाहिए कि इसने इस विषय पर एक बहस की शुरुआत तो की है और इस विषय पर भी आलोचकों का ध्यान दिलाया. इस पुस्तक का ब्लर्ब राजेंद्र यादव ने लिखा है, जिनके अनुसार, देवेंद्र चौबे ने यहां पहली बार व्यवस्थित रूप से हिंदी कहानी में बार-बार उभर कर आए हाशिए के लोगों का समाजशास्त्रीय अध्ययन प्रस्तुत किया है. राजेंद्र यादव का तो यह भी कहना है कि दलित और साहित्य विमर्श की पृष्ठभूमि जानने के लिए यह पुस्तक निश्चय ही एक वैज्ञानिक आधार ग्रंथ है, परंतु मुझे लगता है कि यादव जी के इस आधार ग्रंथ का आधार बहुत मज़बूत नहीं है. वैसे भी हिंदी में ब्लर्ब लेखन की जो परंपरा है, उसके हिसाब से राजेंद्र यादव ने जो लिखा है, वह झूठ नहीं है.

मेरे पास यह समीक्षा लिखे जाने की तारीख़ उपलब्ध नहीं है. ख़ुद के लिखे कई शब्द समझ में नहीं आ रहे हैं. इस वजह से हो सकता है कि मूल समीक्षा से दो-चार शब्द अलग हों, लेकिन मैंने पूरी समीक्षा में कोई बदलाव नहीं किया. यह सब लिखने के पीछे मेरा आशय केवल इतना है कि कैसे हिंदी साहित्य की शीर्ष पत्रिकाओं में शुमार कथादेश में स्वीकृत और विज्ञापित समीक्षा भी नहीं छपती है. मेरा कहना उस व़क्त भी यही था और अब भी यही है कि स्वीकृत और विज्ञापित करने से पहले एक बार रचना को पढ़ तो लेना ही चाहिए. लेकिन हरि नारायण जी का इसलिए धन्यवाद कि उन्होंने मेरी हाथ से लिखी समीक्षा वापस कर दी. कंप्यूटर के चलन के बाद मेरे पास हस्तलिखित यह एकमात्र रचना है.

(लेखक IBN7 से जुड़े हैं)

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