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कटनीः सजा ली चिता, अब ज़मीन लेंगे या जान देंगे

कटनीः सजा ली चिता, अब ज़मीन लेंगे या जान देंगे

कटनी के विजय राघवगढ़ एवं बरही तहसीलों के दो गांवों डोकरिया और बुजबुजा के किसानों की दो फसली खेतिहर ज़मीनें वेलस्पन नामक कंपनी के ऊर्जा उत्पादक उद्योग हेतु अधिग्रहीत करने के संबंध में दाखिल सैकड़ों आपत्तियों एवं असहमति को शासन ने दरकिनार कर दिया. सरकार द्वारा जबरन भूमि अधिग्रहण के विरोध में किसानों ने अब आंदोलन और ख़ुद की चिता सजा लेने का काम शुरू कर दिया है. उन्होंने जबरन भूमि अधिग्रहण किए जाने की स्थिति में सपरिवार सामूहिक आत्मदाह की घोषणा कर दी है. दोनों गांवों की सीमा पर स्थित और अधिग्रहण का हिस्सा बन रहे ऐतिहासिक छप्पन सागर क्षेत्र में इन किसानों ने इसके लिए 50 से अधिक चिताएं स्वयं तैयार कर ली हैं और यह संख्या दिनोंदिन बढ़ती जा रही है. इसकी जानकारी ज़िला प्रशासन को भी है, जो वेलस्पन कंपनी द्वारा किसानों को उकसाए जाने संबंधी शिकायत के माध्यम से पहुंचाई गई, लेकिन प्रशासन ने इसे किसी और मौक़े पर संबंधित लोगों के विरुद्ध इस्तेमाल करने की नीयत से दबाकर रख लिया. किसानों का पक्ष और उनकी पीड़ा नज़रअंदाज करने का काम मीडिया का एक बड़ा वर्ग भी कर रहा है. वेलस्पन कंपनी के पेड एवं पीआर समाचारों के सफेद झूठ को अर्से से बिना किसी प्रकार जांचे परखे प्रमुखता से प्रकाशित किया जा रहा है. अब हालत यह है कि दिन-रात बुजबुजा-डुकरिया ग्रामों की चौकसी बढ़ा दी गई है. प्रशासन और पुलिस के अधिकारी ग्रामीणों को समझाने के लिए हर तरह के हथकंडे इस्तेमाल कर रहे हैं. लालच देने के अलावा उन्हें क़ानूनी कार्रवाई का भय दिखाया जा रहा है, धमकाया जा रहा है. एक परिवार की ज़मीन कंपनी द्वारा बहला-फुसला कर हथिया लेने के बाद उस परिवार के एक सदस्य द्वारा आत्महत्या ने किसानों में नए सिरे से जोश भर दिया है. प्रशासन, पुलिस, मीडिया, स्थानीय नेताओं एवं जनप्रतिनिधियों की स्थिति भी सांप-छछूंदर जैसी होने लगी है.

एक-दो आदमी नहीं, बल्कि पचासों परिवार विरोध स्वरूप जीते जी अपनी चिता सजाए बैठे हैं. वजह, जबरन भूमि अधिग्रहण. कटनी जिले में स्थापित हो रही वेलस्पन कंपनी के लिए जबरन भूमि अधिग्रहण के चलते बुजबुजा एवं डोकरिया गांव के किसान अपनी ज़मीन बचाने के लिए ऐसा क़दम उठाने को मजबूर हो गए हैं.

किसानों का पक्ष जानने के लिए सिटीजन्स इनशिएटिव फॉर डेमोक्रेसी एंड डेवलपमेंट से जुड़े कार्यकर्ताओं ने बीते 25 नवंबर को इन गांवों का दौरा किया. दौरे की सूचना पाकर ज़िला कलेक्टर एम सेल्वेंद्रन इतने परेशान हो उठे कि उन्होंने बरही थाने के अधिकारियों के अलावा अपने कई अन्य संपर्क सूत्रों को डोकरिया-बुजबुजा का दौरा करने वालों के नाम-पते जुटाने के निर्देश दे दिए. बरही थाने के थानेदार के नेतृत्व में पुलिस के एक दस्ते ने सादे कपड़ों में हथियार बंद होकर दौरा करने आए दल की खोज-ख़बर की और डोकरिया सरपंच के यहां ग्रामीणों के साथ बातचीत करते समय पूछताछ करनी शुरू कर दी. हालांकि उनका रवैया कैमरों की मौजूदगी के चलते शालीन रहा और उन्होंने ख़ुद को जनता का सहयोगी बताने में कोई कसर नहीं छोड़ी. इससे पूर्व यह दल बुजबुजा और डोकरिया के उस क्षेत्र में पहुंचा, जहां किसानों ने जबरिया भूमि अधिग्रहण के ख़िला़फ सपरिवार सामूहिक आत्मदाह हेतु चिताएं तैयार कर रखी थीं. वहां सैकड़ों महिलाओं, बच्चों एवं बुजुर्गों ने अपनी व्यथा कथा सुनाई. उन्होंने अधिकारियों, जनप्रतिनिधियों एवं कंपनी की ओर से रात दो-दो, तीन-तीन बजे गांव पहुंच कर तरह-तरह के प्रलोभन देने और आतंकित किए जाने की शिकायतें कीं. मीडिया के एक बड़े वर्ग द्वारा अपनी उपेक्षा और कंपनी के पक्ष में एकतरफा झूठे प्रचार के बारे में बताया. उन्होंने कहा कि अगर भूमि अधिग्रहण पर रोक नहीं लगाई गई तो वे सपरिवार सामूहिक आत्मदाह कर लेंगे.

सरकार द्वारा जबरन भूमि अधिग्रहण के विरोध में किसानों ने अब ख़ुद की चिता सजाने का काम शुरू कर दिया है. उन्होंने जबरन भूमि अधिग्रहण किए जाने की स्थिति में सपरिवार सामूहिक आत्मदाह की घोषणा कर दी है. दोनों गांवों की सीमा पर स्थित और अधिग्रहण का हिस्सा बन रहे ऐतिहासिक छप्पन सागर क्षेत्र में इन किसानों ने इसके लिए 50 से अधिक चिताएं स्वयं तैयार कर ली हैं और यह संख्या दिनोंदिन बढ़ती जा रही है.

उल्लेखनीय है कि वेलस्पन कंपनी के उद्योग के संबंध में पर्यावरणीय जन सुनवाई के दौर से ही तथ्यात्मक आपत्तियां और विरोध दर्ज कराए जाते रहे हैं. आज़ादी बचाओ आंदोलन के डॉ. बनवारी लाल शर्मा, मनोज त्यागी, डॉ. कृष्ण स्वरूप आनंदी, क़ानूनविद्‌ प्रशांत भूषण एवं लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी के प्रमुख रघु ठाकुर भी यहां का दौरा कर चुके हैं, लेकिन राज्य सरकार सब कुछ जानते हुए भी चुप है.

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