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दिल्ली का बाबू : उड़ीसा सरकार की विभेदकारी नीति

दिल्ली का बाबू : उड़ीसा सरकार की विभेदकारी नीति

हाल में हुए हाउसिंग घोटाले में नेताओं और बाबुओं का नाम आना उड़ीसा सरकार के लिए चिंता का कारण बना हुआ है, लेकिन यह तो मात्र एक उदाहरण है, क्योंकि ऐसा अन्य राज्यों में भी हो रहा है. इस समय उड़ीसा के मुख्यमंत्री किसी अन्य कारण से परेशानी में हैं. उड़ीसा सरकार विकलांगों के साथ अच्छा व्यवहार नहीं कर रही है. उड़ीसा लोक सेवा आयोग ने विकलांगों के नौकरी के अधिकार को अस्वीकार करके उनके साथ अन्याय किया है. सूत्रों के अनुसार, उड़ीसा के विकलांगों राज्य सिविल सेवा में अपने लिए आरक्षण की मांग की है. वे सिविल सेवा में तीन फीसदी आरक्षण की मांग कर रहे हैं, जैसा कि केंद्र में दिया जाता है, लेकिन उड़ीसा लोक सेवा आयोग ने तीन फीसदी की मांग नकार दी है. उसका कहना है कि ओपीएससी एक्ट में विकलांगों के लिए तीन फीसदी आरक्षण का प्रावधान नहीं है. ओपीएससी (उड़ीसा लोक सेवा आयोग) के विशेष सचिव एल एन मिश्रा का कहना है कि आयोग इस मांग पर विचार कर रहा है, क्योंकि भारतीय प्रशासनिक सेवा के साथ-साथ हरियाणा, पंजाब, बिहार एवं राजस्थान जैसे राज्यों में विकलांगों के लिए इतना आरक्षण है. अब देखना यह है कि ओपीएससी कब तक इस पर विचार कर पाता है.

लोकायुक्त की पारदर्शिता

लोकायुक्त आजकल काफी चर्चा में हैं. बंगलुरू में जब लोकायुक्त ने एक ही दिन तीन आईएएस अधिकारियों सिदैयाह, एम वी वीरभद्रैया एवं मोहम्मद ए सादिक के घरों पर छापा मारा तो वहां काम कर रहे भ्रष्टाचार विरोधी कार्यकर्ता चकित हो गए. सूत्रों के अनुसार, कर्नाटक की भ्रष्टाचार विरोधी संस्थाएं भी दूसरे राज्यों से अलग नहीं हैं. उन्हें भी पूरी तरह पाक-साफ नहीं कहा जा सकता है. पिछले दस सालों में कर्नाटक लोकायुक्त पुलिस ने करीब 2400 बाबुओं को पकड़ा है, जिसमें केवल पांच आईएएस एवं छह आईपीएस अधिकारी थे. इसीलिए यह कहा जा सकता है कि आखिर इस बार पड़े छापों से कई लोगों को आश्चर्य क्यों हुआ. सूत्रों का कहना है कि लोकायुक्त के अंदर भी पारदर्शिता नहीं है. हालांकि सरकार के सभी अधिकारियों को अपनी संपत्तियों की घोषणा करना आवश्यक है, लेकिन फिर भी लोकायुक्त पुलिस प्रमुख सत्य नारायण राव एवं पुलिस उपमहानिरीक्षक अरुण चक्रवर्ती ने इस आदेश का पालन अभी तक नहीं किया है, लेकिन हाल की यह घटना परिवर्तन की ओर इशारा करती है.

मायावती और बाबू

उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं, राजनीतिक गतिविधियों के चलते वहां अन्य कामों पर ग्रहण लग गया है, लेकिन चुनावी कोलाहल में भी बाबुओं का काम उसी तरह चल रहा है, जैसे पहले चलता था. मुख्यमंत्री मायावती का बाबुओं के साथ पहले जैसा ही रिश्ता है. खासकर उन बाबुओं के साथ, जिन्हें मायावती का आशीर्वाद प्राप्त नहीं है. गत सितंबर में प्रदेश की वरिष्ठ आईएएस अधिकारी प्रोमिला शंकर, जो एनसीआर क्षेत्र में आयुक्त के पद पर काम कर रही थीं, को बहन जी की बात न मानने की वजह से निलंबित होना पड़ा था. सूत्रों का कहना है कि प्रोमिला शंकर ने उत्तर प्रदेश सरकार के उस फैसले को चुनौती दी है, जिसके अनुसार उनका निलंबन बढ़ाया गया है. प्रोमिला का कहना है कि किसी भी अधिकारी को 45 दिनों से अधिक समय तक निलंबित नहीं रखा जा सकता है, अगर इस दौरान उसके खिलाफ कोई अनुशासनिक कार्रवाई नहीं की जाती है. अब देखना यह है कि मायावती क्या जवाब देती हैं.

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