Chauthi Duniya

Now Reading:
निराशा पैदा करने वाला फैसला

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सभी सम्मान करेंगे. आखिर यह भारत के सुप्रीम कोर्ट का फैसला है, लेकिन इस फैसले से उन लोगों को निराशा हुई, जो ईमानदारी में यक़ीन रखते हैं. देश का सुप्रीम कोर्ट यह कहता है कि हमें ईमानदारी और इंटीग्रिटी से कोई मतलब नहीं है तो फिर सवाल खड़ा होता है कि क्या देश ईमानदारी छोड़ दे, क्या इस देश में उन्हीं लोगों की सुनी जाएगी, जो भ्रष्ट या बेईमान हैं? शायद कहीं चूक हुई है और इसलिए सुप्रीम कोर्ट से यह आशा करनी चाहिए कि वह एक बड़ी बेंच बनाकर अपने फैसले की समीक्षा करे. हो सकता है कि हमारी अपेक्षा पूरी न हो, क्योंकि हम आम आदमी हैं और आम आदमी की अपेक्षाएं कभी पूरी नहीं होतीं. व्यवस्था आम आदमी के ख़िला़फ खड़ी होती है और सुप्रीम कोर्ट भी व्यवस्था का ही एक अंग है.

सुप्रीम कोर्ट सुप्रीम कोर्ट है, न्याय का आखिरी स्थान. बहुत सारे लोग होते हैं, जिन्हें न्याय नहीं मिलता और बहुत सारे लोग होते हैं, जिनके साथ अन्याय होता है. जनरल वी के सिंह के मामले में भी शायद ऐसा ही है. उन्हें न्याय नहीं मिला और उनके साथ अन्याय हो गया. वह सरकार के खिला़फ सुप्रीम कोर्ट गए थे और जब सुप्रीम कोर्ट यह कहे कि हमें इससे कोई मतलब नहीं है, हम चाहते हैं कि आप मामले को आपस में शांतिपूर्वक, परस्पर सौहार्द्र के साथ तय कर लें. अगर यह मामला पहले तय हो जाता सौहार्द्रपूर्ण ढंग से, तो पहले ही वी के सिंह इस मसले को हल कर लेते.

सुप्रीम कोर्ट ने कुछ चीज़ों पर ध्यान नहीं दिया. शायद वे ध्यान देने योग्य बातें न हों, लेकिन फिर भी हम सुप्रीम कोर्ट और जनता के सामने कुछ तथ्य रखना चाहते हैं. आर्मी हॉस्पिटल में पैदाइश की तारीख़ लिखी है, क्या उस पैदाइश की तारी़ख का कोई मतलब नहीं है. आर्मी हॉस्पिटल में क्या इतनी बड़ी जालसाज़ी चलती है कि रिकॉर्ड में आदमी पैदा हो और उसके एक साल पहले पैदा होने का रिकॉर्ड दर्ज कर दिया जाए. मुझे नहीं लगता कि ऐसा होगा, लेकिन शायद सुप्रीम कोर्ट का फैसला यह कहता है कि जनरल वी के सिंह की जन्म की तारीख़ जो आर्मी हॉस्पिटल में लिखी है, वह उससे एक साल पहले पैदा हो गए. सुप्रीम कोर्ट ने इस पर ध्यान देना उचित नहीं समझा. सुप्रीम कोर्ट ने अपने ही फैसले को उलट दिया और कहा कि उसे हाईस्कूल के प्रमाणपत्र से कोई मतलब नहीं है और अगर अनजाने में या ग़लती से क़लम से कुछ लिख दिया जाता है तो वही लिखा और वही आखिरी माना जाएगा. इसका नतीजा शायद यह होगा कि देश में बहुत सारे लोग, जो रिटायर होने वाले हैं, वे एफिडेविट देकर कहेंगे कि हमने ग़लती से वह तारी़ख लिख दी थी…दरअसल हमारी जन्मतिथि यह है, इसे ही जन्मतिथि मान लिया जाए.

सुप्रीम कोर्ट सुप्रीम कोर्ट है, न्याय का आखिरी स्थान. बहुत सारे लोग होते हैं, जिन्हें न्याय नहीं मिलता और बहुत सारे लोग होते हैं, जिनके साथ अन्याय होता है. जनरल वी के सिंह के मामले में भी शायद ऐसा ही है. उन्हें न्याय नहीं मिला और उनके साथ अन्याय हो गया. वह सरकार के खिला़फ सुप्रीम कोर्ट गए थे और जब सुप्रीम कोर्ट यह कहे कि हमें इससे कोई मतलब नहीं है, हम चाहते हैं कि आप मामले को आपस में शांतिपूर्वक, परस्पर सौहार्द्र के साथ तय कर लें. अगर यह मामला पहले तय हो जाता सौहार्द्रपूर्ण ढंग से, तो पहले ही वी के सिंह इस मसले को हल कर लेते. लेकिन जब सरकार ने उनकी नहीं सुनी, तभी वह सुप्रीम कोर्ट गए और सुप्रीम कोर्ट ने भी यह बता दिया कि अगर आपका भारत सरकार के साथ कोई विवाद है तो आज के बाद हमारे पास मत आइए, क्योंकि हम सरकार के खिला़फ कोई भी बात सुनने के लिए तैयार नहीं हैं. हम आपसे कहेंगे कि आप इत्मीनान से आपस में मसला सुलझाएं. अगर आप नहीं सुलझाएंगे तो फिर आपकी ज़िम्मेदारी.

अब इस बात को क्या कहा जाए. हमें दु:ख प्रकट करने का कोई हक़ तो नहीं है, क्योंकि यह न्याय का फैसला है, लेकिन न्याय के इस फैसले ने निराशा बढ़ाई है और हम अपील के तौर पर सुप्रीम कोर्ट से यह कह सकते हैं कि वह इस मसले को दोबारा सुने, क्योंकि इस फैसले के साथ न केवल सेना, बल्कि आम नागरिकों के बीच जो ईमानदार छवि वाले लोग हैं, उनकी आशाएं जुड़ी थीं, जो टूट गईं. ऐसे में अब लोगों का यह कहना कि हम क्यों ईमानदार रहें, शायद ज़्यादा तर्कपूर्ण लगता है. जनरल वी के सिंह से हमें हमदर्दी है. हमदर्दी इसलिए है कि उन्होंने न्याय की लड़ाई लड़ी और न्याय की लड़ाई लड़ने वाले बहुत सारे लोग हारते हैं. गैलीलियो हारा था, क्योंकि उसने कहा था कि दुनिया गोल है, लेकिन उस समय की अदालत, उस समय के न्यायविदों और उस समय के मनीषियों ने कहा कि यह पागल हो गया है. दुनिया तो चपटी है, क्योंकि आंख जहां तक देखती है, दुनिया कहीं गोल नज़र नहीं आती, चपटी नज़र आती है. सुकरात को ज़हर पीना पड़ा, गांधी को गोली खानी पड़ी और जय प्रकाश नारायण के गुर्दे डॉक्टरों ने इमरजेंसी के दौरान खराब कर दिए. इसका क्या मतलब है?

इसका मतलब यह है कि सच की राह पर चलना मुश्किल होता है. ईमानदारी की राह पर चलना आज के ज़माने में बहुत सही चीज़ नहीं मानी जाएगी, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट भी कहता है कि हमें इंटीग्रिटी से, ईमानदारी से कोई लेना-देना नहीं है, कोई मतलब नहीं है. आप होंगे ईमानदार! इसके बावजूद सच्चाई यह है कि ईमानदार होना चाहिए, हमें सच की राह पर चलना चाहिए, हमें किसी को दु:ख नहीं देना चाहिए और यह भी सच है कि हमें हमेशा न्यायपूर्ण रास्तों पर चलना चाहिए, भले ही कोई कहे कि ईमानदारी से उसे मतलब नहीं है. इसलिए हम जनरल वी के सिंह और उनके जैसे तमाम लोगों से अपेक्षा करेंगे कि वे हमेशा ईमानदारी के रास्ते पर चलें और इस देश में ऐसे लोगों को खड़ा करने में अपनी भूमिका अदा करें. उन लोगों की ऐतिहासिक भूमिका, जो देश में ईमानदारी का शासन, ईमानदारी का राज्य चाहते हैं.

हमें मालूम है और हमने पहले भी कहा था कि व्यवस्था के वे लोग जो बेईमानों का साथ देते हैं, जो अन्याय का साथ देते हैं, वे हमारे खिला़फ भी अब हथियार उठाएंगे. हम उनके हथियार उठाने का इंतज़ार कर रहे हैं और हम गैलीलियो, सुकरात, गांधी और जय प्रकाश नारायण के रास्ते पर चलने के लिए तैयार हैं. उनका जो अंजाम हुआ, वह अंजाम भी हम सहने के लिए तैयार हैं, लेकिन हम ईमानदारी, सत्यता, भरोसा और विश्वास का संबल छोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं. आखिर में फिर सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध है और खासकर मुख्य न्यायाधीश से अनुरोध है कि कृपा करके आप बड़ी बेंच बनाकर अपनी तऱफ से इस फैसले की पुनर्समीक्षा करें और देश को एक सही राह दिखाने के लिए अपनी ऐतिहासिक भूमिका निभाएं.

2 comments

  • editorchauthiduniya

    गुप्ताजी जनरल सिंह के पास घबराहट के सिवा और कोई रास्ता भी तो नहीं था जब माननीय न्यायलय के माननीय न्यायाधीश याचिका वापस लेने को कह रहे हों हमारे महान देश में ”अभिव्यक्ति की आजादी” ही नहीं है ईमानदार व्यक्ति चाहे जितने बड़े पद में क्यों न हों उसकी या तो आवाज दबा दी जाएगी या तो रस्ते से ही हटा दिया जायेगा | अभी मै समाचारपत्र पढ़ रहा था जिसमे केजरीवालजी ने माननीयों की कुछ सच्चाई के बारे में बोला था, देश का दुर्भाग्य तो देखिये किसी पार्टी के किसी सांसद ने उनका समर्थन तो दूर बल्कि सभी ने एकजुट होकर बोला की उन पर देश द्रोह का मामला दर्ज होना चाहिए |
    इसका तात्पर्य यह हुआ कि हम आम लोगों को न्याय की सबसे ऊपरी सीढ़ी अर्थात माननीय उच्चतम न्यायलय से भी न्याय कि आशा छोड़ देनी चाहिए जब सेना के सर्वोच्च अधिकारी को न्याय नहीं मिला तब समाज के सबसे निचले तबके के व्यक्ति को न्याय की आश ही छोंड़ देनी चाहिए |

  • editorchauthiduniya

    अब जब जनरल सिंह ने उन पर पड़े दवाब में घबराकर अपनी याचिका ही वापस लेली है तो पुनर्विचार किस पर होगा? केंद्र सरकार और उनके द्वारा चलाये गए प्रचार अभियान ने संभवतः सर्वोच्च न्यायालय को भी अपने प्रभाव में ले लिया. वर्ना तीन फरवरी को सुनवाई के दौरान ये आभास हुआ था की शायद सर्वोच्च न्यायालय जनरल वी के सिंह के पक्ष से प्रभावित है और उन्हें न्याय अवश्य प्राप्त होगा. लेकिन आपने ठीक लिखा है की फैसला देखकर निराशा हुई. और इस बात की आशा कम ही है की माननीय सर्वोच्च न्यायालय इस पर स्वयं संज्ञान लेकर पुनर्विचार करेंगे.क्योंकि यदि ऐसा करना होता तो पहले ही कर लिया होता. फिर भी आशा करने में क्या हर्ज है?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Input your search keywords and press Enter.