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भारत यानी डॉ. जैकेल और मिस्टर हाइड
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पाकिस्तान भारत की तरह किस मायने में समान है? इसमें कोई शक नहीं कि वह क्रिकेट में बेहतर है. इंग्लैंड से हुए मुक़ाबले में उसे जीत मिली, जबकि ऑस्ट्रेलिया में भारत का सूपड़ा सा़फ हो गया. जहां तक सुप्रीम कोर्ट का सवाल है तो निश्चित तौर पर वह भी भारत के सुप्रीम कोर्ट की तरह अच्छा है. पाकिस्तान का सुप्रीम कोर्ट वहां के लोकतंत्र का सजग प्रहरी है, वरना पाकिस्तान में लोकतंत्र कभी भी कुचला जा सकता है. भविष्य में भी सुप्रीम कोर्ट ऐसी ही भूमिका निभाएगा, ऐसी आशा है. संवैधानिक रक्षा के लिए वहां का सुप्रीम कोर्ट निर्णायक भूमिका निभा रहा है और क़ानूनी लड़ाई लड़ रहा है. वहीं भारत में सुप्रीम कोर्ट केंद्र सरकार के ग़लत कृत्यों की आलोचना कर रहा है, साथ ही राज्य सरकारों के कामकाज की भी देखरेख कर रहा है.

आज़ादी के बाद के वर्षों में भारत भ्रष्ट होता चला गया. पहले भ्रष्टाचार को एक समस्या माना जाता था, लेकिन अब नहीं. विदेशी भी भारत में भ्रष्टाचार को एक बड़ी समस्या मानते हैं, लेकिन वे फिर भी यहां निवेश करते हैं. प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की वजह से ही 2-जी घोटाला सामने आया.

यह सही बात है कि भारत सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है, जिस पर सभी को गर्व है. इस देश में भी कई विसंगतियां देखने को मिल रही हैं. वैसे मुस्लिम नज़रिए से इसे एक उदारवादी देश माना जाता है. यहां एक निष्पक्ष एवं स्वतंत्र चुनाव आयोग है, जिसकी हरसंभव कोशिश यह रहती है कि चुनावी प्रक्रिया सुचारू रूप से संपन्न हो. वहीं हमारे राजनीतिक दल संसद और उसके बाहर अपनी बातें रखते हैं. यहां का मीडिया भी कमोबेश स्वतंत्र और भयमुक्त है. यह डॉ. जैकेल का इंडिया है. यहां हमने देखा कि आधार योजना को लेकर किस क़दर रस्साकशी हुई, फिर प्रधानमंत्री के हस्तक्षेप के बाद उसका दोस्ताना हल निकाला गया. इसके बाद हमने देखा कि किस तरह प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा प्रधानमंत्री के लिए मीडिया सलाहकार के तौर पर एक व्यक्ति की नियुक्ति हुई और पुराने आदमी को पीएमओ से बाहर का रास्ता दिखाया गया.

दूसरी ओर हाइड के भारत में हमने यह भी देखा कि 2-जी मामले पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को किस तरह हज़म करने की कोशिश की गई. सुंदर चेहरे के पीछे की वास्तविकता कैसी होती है, इसे गहराई से समझने की ज़रूरत है. सत्ता में कुछ भी ग़लत नहीं होता, तभी तो यह खुला रहस्य है कि द्रमुक और अन्नाद्रमुक जब भी केंद्र में किसी गठबंधन सरकार में शामिल होते हैं तो वे हमेशा मलाईदार मंत्रालयों को अपने खाते में लेने के लिए ज़ोर देते हैं. ए राजा क्या कर रहे थे, यह किसी के लिए कोई रहस्य नहीं था. बात यहीं खत्म नहीं होती, सुप्रीम कोर्ट ने जिस तरह टेलीकॉम लाइसेंस के आवंटन में ढिलाई बरतने के लिए पीएमओ को खरी-खोटी सुनाई, साथ ही इसरो प्रमुख और सेना प्रमुख के जन्मतिथि विवाद का हालिया प्रकरण देखने को मिला, उनसे कई सवाल पैदा होते हैं. भ्रष्टाचार के मामले पर किसी भी एक दल को ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता. देश के पांच राज्यों में एक साथ विधानसभा चुनाव हो रहे हैं. इसे कांग्रेस की क़िस्मत कहें या कुछ और कि इनमें से तीन राज्यों में वह सत्ता में नहीं है. यही वजह है कि वहां मौजूदा सरकार के खिला़फ कांग्रेस भ्रष्टाचार का आरोप लगा रही है. भ्रष्टाचार एक बड़ा मुद्दा है, सरकारें इसे नकार नहीं सकतीं. कोई भी सत्ताधारी पार्टी हो, उसे अपनी भ्रष्ट सरकार के खिला़फ मुंह खोलना चाहिए. अ़फसोसजनक बात यह है कि देश में किसी तरह चुनाव जीतना ही बड़ी चीज़ रह गई है. हर चुनाव में हर पार्टियां जाति का कार्ड खेलती हैं. किस उम्मीदवार पर क्या आरोप हैं, इसकी चिंता किसी को नहीं है. पार्टियां विकास को लेकर कितनी गंभीर हैं, यह पूछा जाना ज़रूरी है. चुनाव के समय हर दल में भगदड़ की हालत होती है, भगोड़ों का स्वागत हर पार्टियों में होता है. खासकर टिकट बंटवारे के समय हालत कुछ अलग होती है. इन चुनावों में जमकर काले धन का इस्तेमाल होता है. काले धन का इस्तेमाल करने वाले अक्सर चुनाव आयोग द्वारा पकड़े जाते हैं. किसी भी पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र नहीं है और संभावित मुख्यमंत्री का चुनाव पूरी तरह शीर्ष नेतृत्व के लिए छोड़ दिया जाता है.

आज़ादी के बाद के वर्षों में भारत भ्रष्ट होता चला गया. पहले भ्रष्टाचार को एक समस्या माना जाता था, लेकिन अब नहीं. विदेशी भी भारत में भ्रष्टाचार को एक बड़ी समस्या मानते हैं, लेकिन वे फिर भी यहां निवेश करते हैं. प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की वजह से ही 2-जी घोटाला सामने आया. पिछले दिनों हुआ सत्यम घोटाला भी न्यूयॉर्क स्टॉक एक्सचेंज में उजागर हुआ, न कि इसे उजागर करने के पीछे आंध्र प्रदेश सरकार और कोई केंद्रीय संस्था थी. कुछ लोगों का मानना है कि एफडीआई समस्या है, न कि स्थानीय भ्रष्टाचार. भारत में हुए उदारीकरण और आर्थिक नीतियों से यह भ्रष्टाचार पनपा है. राष्ट्रमंडल घोटाले का पर्दा़फाश अधिकारियों द्वारा ब्रिटेन में किया गया था, जब एक कंपनी वैट की छूट हासिल करने के लिए तिकड़म कर रही थी. इसमें कोई शक नहीं कि 121 टेलीकॉम कंपनियों का लाइसेंस रद्द करने के फैसले ने भारत की छवि अच्छी बनाई है. यहां विदेशी लोग अपना व्यापार कर सकते हैं. साथ ही यह भी साबित हो गया कि पूंजीवादी ताक़तों ने किस तरह इन्हें लाइसेंस दिलाने के लिए पूरी ताक़त झोंक दी थी. ऐसा सुप्रीम कोर्ट का भी कहना है.

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