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कंपनी बिल-2011 : राजनीतिक दलों का दोहरा रवैया
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कंपनी बिल-2011 : राजनीतिक दलों का दोहरा रवैया

14 दिसंबर, 2011 को लोकसभा में एक घटना घटी. डॉ. वीरप्पा मोइली ने दोपहर के बाद कंपनी बिल-2011 लोकसभा में पेश किया. इस बिल में राजनीतिक दलों को कंपनियों द्वारा दिए जाने वाले धन का प्रावधान है. इस बिल के पेश होने के एक घंटे के अंदर कांग्रेस के प्रवक्ता मनीष तिवारी बोलने के लिए खड़े हुए. उन्होंने कहा कि काला धन प्रमुख तौर पर हमारे चुनाव में मिलने वाले चंदे से जुड़ा हुआ है और इस चुनावी चंदे के स्वरूप में परिवर्तन करके काले धन की समस्या पर बहुत हद तक क़ाबू पाया जा सकता है. यह यूपीए सरकार की दोहरी नीति को उद्घाटित करता है. एक तऱफ सरकार यह कहती है कि चुनाव में चंदा इकट्ठा करने की प्रक्रिया के कारण काले धन का प्रवाह बढ़ता है, तो दूसरी तऱफ कंपनी बिल में ऐसा प्रावधान किया जाता है, जिसके कारण कंपनियां अधिक धन राजनीतिक दलों को दे सकें. इस बिल में यह प्रावधान किया गया है कि अब कोई भी ग़ैर सरकारी कंपनी अपने पिछले तीन वित्तीय वर्ष की कुल औसत बचत का 7.5 फीसदी धन राजनीतिक दल या राजनीतिक गतिविधियों में शामिल किसी व्यक्ति को राजनीतिक उद्देश्य के लिए दे सकती हैं. इससे पहले के कंपनी एक्ट 1956 में यह राशि पांच फीसदी तक सीमित की गई थी. सरकार का तर्क है कि वर्तमान समय में राजनीतिक दलों की संख्या बढ़ रही है जिससे अधिक धन चंदे के रूप में देने की आवश्यकता महसूस होने लगी है. कंपनियां भी अपनी बचत के पांच फीसदी से अधिक धन को चंदे के तौर पर राजनीतिक दलों को देना चाहती हैं. सरकार का यह तर्क कितना उचित है, इसे बताने की ज़रूरत यहां पर नहीं है. एक तऱफ सरकार को ऐसा लगता है कि राजनीतिक दलों को चंदा देने के लिए कंपनियां तैयार बैठी हैं, तो दूसरी तऱफ कंपनियों के सामाजिक उत्तरदायित्व को लेकर उनमें इस बात का संशय है कि कंपनियां अपनी बचत का दो फीसदी हिस्सा भी सामाजिक कार्यों में खर्च नहीं कर पाती हैं. सरकार ने कॉर्पोरेट सोशल रिसपोंस्बलिटी (सीएसआर) के तहत यह तय किया है कि कंपनी अपने नेट प्रॉफिट का दो फीसदी धन सामाजिक कार्यों में खर्च करेगी. इस बिल में जिन सामाजिक कार्यों के बारे में बताया गया है, उनमें भुखमरी और ग़रीबी निवारण, शिक्षा को बढ़ावा देना, लिंग भेद को कम करना तथा महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा देना, एचआईवी तथा मलेरिया जैसी बीमारियों की रोकथाम के लिए काम करना, रोज़गार को बढ़ावा देने वाली व्यवसायिक गुणवत्ता बढ़ाने वाली संस्थाओं का निर्माण करना, पर्यावरणीय समस्याओं को कम करना तथा पर्यावरणीय सुरक्षा को बरक़रार रखना, सामाजिक व्यवसायिक प्रोजेक्ट, प्रधानमंत्री राहत कोष में धन देना या सामाजिक उद्देश्यों से बनाया गया कोई फंड या अनुसूचित जाति-जनजाति, पिछड़े वर्ग, अल्पसंख्यक या महिलाओं के विकास के लिए बनाए गए कोष तथा अन्य गतिविधियां जिनका उल्लेख किया गया हो, को शामिल किया गया है. लेकिन कंपनियां इन कार्यों में अपना धन खर्च करना नहीं चाहती हैं, लेकिन ये कंपनियां राजनीतिक दलों को ज़्यादा से ज़्यादा चंदा देना चाहती हैं. आखिरकार इसका कारण क्या हो सकता है.

संसद में क़ानून और न्याय मंत्री सलमान खुर्शीद ने भी कहा था कि भ्रष्टाचार को कम करने में स्टेट फंडिंग ऑफ इलेक्शन की अहम भूमिका हो सकती है. यही नहीं, यूथ कांगे्रेस को संबोधित करते हुए कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने भी भ्रष्टाचार को कम करने के लिए चुनाव में स्टेट फंडिंग की बात की थी, लेकिन इस बिल में सोनिया गांधी की अपील को भी शामिल नहीं किया गया है. कुछ ऐसा ही विरोधाभास भारतीय जनता पार्टी के भीतर भी है.

ज़ाहिर है, राजनीतिक दलों से ये कंपनियां ज़्यादा से ज़्यादा फायदा उठाना चाहती हैं. अगर वे किसी राजनीतिक दल को चंदा देती हैं तो फिर इस बात की उम्मीद ज़रूर रखेंगी कि जितना धन वे चंदे के तौर पर दे रही हैं, उससे अधिक फायदा चुनाव के बाद इन दलों से उठा सकें. कंपनियां कोई सामाजिक काम तो कर नहीं रही हैं. अगर वे व्यवसाय़फायदे के लिए करती हैं तो फिर अपना पैसा उन्हीं क्षेत्रों में खर्च करेंगी, जिनसे उन्हें लाभ हो. अगर कोई कंपनी अपना फायदा बढ़ाने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाती है तो बिना किसी स्वार्थ के वह अपने इस लाभ का एक बड़ा हिस्सा किसी को क्यों देगी, जबकि देना कोई आवश्यक नहीं है. इस तरह के चंदे के लिए उस पर दबाव तो बनाया जा सकता है, लेकिन इसके लिए कोई क़ानून तो है नहीं कि कंपनियों को राजनीतिक काम करने वाले लोगों को या राजनीतिक दलों को चंदा देना मजबूरी है. कंपनियां इन्हीं राजनीतिक दलों को चंदा देकर तरह-तरह के ग़ैर क़ानूनी काम करती हैं. भोपाल गैस त्रासदी को उदाहरण के तौर पर देखा जा सकता है. इसके पी़िडतों को अभी तक इंसा़फ नहीं मिला है. आखिरकार जब यह त्रासदी हुई थी, तो इसके बाद सरकार सोई हुई क्यों रही. इसका एक सबसे बड़ा कारण यही है कि इन कंपनियों से सभी राजनीतिक दलों को का़फी धन चंदे के रूप में प्राप्त होता है. इसी तरह के अन्य कई काम कंपनियां सरकार से कराती हैं, जिनमें नियम-क़ानूनों की धज्जियां उड़ाई जाती हैं. चाहे पर्यावरण के मुद्दे को दरकिनार कर किसी कंपनी को काम करने का ठेका देना हो या फिर दूसरी तरह की सुविधाएं प्राप्त करना.

राजनीतिक दलों से ये कंपनियां ज़्यादा से ज़्यादा फायदा उठाना चाहती हैं. अगर वे किसी राजनीतिक दल को चंदा देती हैं तो फिर इस बात की उम्मीद ज़रूर रखेंगी कि जितना धन वे चंदे के तौर पर दे रही हैं, उससे अधिक फायदा चुनाव के बाद इन दलों से उठा सकें. कंपनियां कोई सामाजिक काम तो कर नहीं रही हैं. अगर वे व्यवसाय़फायदे के लिए करती हैं तो फिर अपना पैसा उन्हीं क्षेत्रों में खर्च करेंगी, जिनसे उन्हें लाभ हो. अगर कोई कंपनी अपना फायदा बढ़ाने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाती है तो बिना किसी स्वार्थ के वह अपने इस लाभ का एक बड़ा हिस्सा किसी को क्यों देगी, जबकि देना कोई आवश्यक नहीं है.

ऐसा नहीं है कि कंपनी बिल-2011 में राजनीतिक दलों को दिए जाने वाले चंदे के प्रावधान के संबंध में केवल यूपीए सरकार का रु़ख ही विरोधाभासी है. भारतीय जनता पार्टी का रु़ख भी उसी तरह का है. दोनों की कथनी और करनी में ज़मीन और आसमान का अंतर दिखाई देता है. सभी राजनीतिक दल एक तऱफ तो चुनाव में चंदे को ग़लत क़रार देते हैं, तो दूसरी तऱफ कॉर्पोरेट फंडिंग ऑफ पॉलिटिकल पार्टी का इस बिल में समर्थन करते नज़र आते हैं. यूपीए सरकार की बात करें तो एक तऱफ तो वह चुनाव में चंदे को राजनीति के लिए खतरनाक मानते हैं तो दूसरी तऱफ कंपनी बिल लाते हैं, जिसमें चंदे की रक़म बढ़ाई जाती है. यूपीए सरकार के वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी की अध्यक्षता में बनाए गए मंत्री समूह (जीओएम) ने स्टेट फंडिंग ऑफ इलेक्शन का समर्थन किया है. उसने भी राजनीतिक चंदे को भ्रष्टाचार का एक प्रमुख स्त्रोत बताया है. इस जीओएम ने क़ानून मंत्रालय को भी इसके लिए कहा था. क़ानून मंत्रालय ने भी स्टेट फंडिंग ऑफ इलेक्शन का समर्थन किया है. संसद में क़ानून और न्याय मंत्री सलमान खुर्शीद ने भी कहा था कि भ्रष्टाचार को कम करने में स्टेट फंडिंग ऑफ इलेक्शन की अहम भूमिका हो सकती है. यही नहीं यूथ कांग्रेस को संबोधित करते हुए कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने भी भ्रष्टाचार को कम करने के लिए चुनाव में स्टेट फंडिंग की बात की थी, लेकिन इस बिल में सोनिया गांधी की इस अपील को भी शामिल नहीं किया गया है. कुछ ऐसा ही विरोधाभास भारतीय जनता पार्टी के भीतर भी है. भाजपा नेता यशवंत सिन्हा के नेतृत्व में संसदीय समिति ने भी कंपनी बिल के इस प्रावधान का कोई विरोध नहीं किया है, बल्कि इसके पक्ष में ही स़िफारिश की है. इस समिति ने जो स़िफारिश की है, उसके आधार पर कहा जा सकता है कि यह कॉर्पोरेट फंडिंग ऑफ पॉलिटिकल पार्टी का समर्थन करता है. इसका समर्थन करने से पहले यशवंत सिन्हा शायद भूल गए थे कि वह उस जीओएम के सदस्य थे, जो इंद्रजीत गुप्ता समिति की स्टेट फंडिंग ऑफ इलेक्शन संबंधी स़िफारिश पर विचार करने के लिए बनाया गया था. इस जीओएम की अध्यक्षता लालकृष्ण आडवाणी कर रहे थे. इंद्रजीत गुप्ता कमेटी ने स्टेट फंडिंग ऑफ इलेक्शन के बारे में अपनी रिपोर्ट 14 जनवरी, 1999 को सरकार को सौंपी थी. इसमें इस बात की भी स़िफारिश की गई थी कि राजीतिक दलों या चुनाव लड़ने वाले लोगों को सरकार धन नक़दी के रूप में न देकर चुनाव में इस्तेमाल होने वाले संसाधनों के रूप में दे. 15 जनवरी, 2011 को इंदौर के प्रेस क्लब में पत्रकारों की एक सभा को संबोधित करते हुए मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने स्टेट फंडिंग ऑफ इलेक्शन के प्रावधान की अपील की थी. इस सभा में भारत के उप राष्ट्रपति हामिद अंसारी भी मौजूद थे. इस तरह से देखा जाए तो राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे का जो प्रावधान इस बिल में किया गया है, उस पर कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी दोनों का विचार विरोधाभासी है. एक तऱफ दोनों दलों के नेता चुनावी चंदे को भ्रष्टाचार और काले धन का साधन मानते हैं, तो दूसरी तऱफ इस बिल के माध्यम से कंपनियों से अधिक चंदा उगाहने का जुगाड़ कर रहे हैं. उनके इस दोहरे रवैये से तो यही कहा जा सकता है कि कंपनी बिल का मक़सद सरकार और व्यवसायिक घराने के बीच के गठबंधन को और अधिक मज़बूत करना है. अगर इन कंपनियों को राजनीतिक दलों को चंदा देना है और राजनीतिक पार्टियों की मजबूरी है कि उन्हें चुनाव लड़ने के लिए धन चाहिए. ऐसे में राजनीतिक दलों को धन के लिए दूसरी व्यवस्था करनी चाहिए. स्टेट फंडिंग ऑफ इलेक्शन को मंज़ूरी देनी चाहिए तथा कंपनियां जो अपने मुना़फे का एक हिस्सा राजनीतिक चंदे के रूप में देना चाहती हैं, उसके लिए एक फंड बनाया जाना चाहिए. इस फंड में जो धन इकट्ठा होगा, उसका इस्तेमाल राजनीतिक दलों या चुनाव में भाग लेने वाले प्रत्याशियों को राज्य की तऱफ से चुनाव में इस्तेमाल होने वाले संसाधनों के रूप में देना चाहिए. इससे राजनीतिक दलों को चंदा भी मिल जाएगा और कंपनियों को इस बात का पता भी नहीं लगेगा कि उसने किस राजनीतिक दल को चंदा दिया, जिससे वह अपने चंदे के बदले किसी राजनीतिक दल से फायदा न उठा सके. अभी यह बिल पास होना बाक़ी है, लेकिन अगर यह इसी तरह पास हो जाता है तो इस बिल को राजनीति और व्यवसाय के गठबंधन के रूप में देखा जा सकता है.

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