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दुष्टतापूर्ण नीति

भारत में तो एक तरह से यह स्थिति आ गई है कि शासन को भारतीय राष्ट्रीय मज़दूर संघ ही चला रहा है. कोई भी काम हो, अगर उसके अधिकारीगण कराना चाहेंगे तो फौरन हो जाएगा, चाहे वह काम क़ानूनन वैध हो अथवा अवैध. कोई मिल, फैक्ट्री या कारखाना कितने ही वर्षों से नुक़सान में चल रहा हो, मज़दूर आवश्यक संख्या से बहुत ज़्यादा हों, यहां तक कि धीरे-धीरे मिल की सारी पूंजी समाप्त हो जाए, पर इन श्रमिक संघों के कान पर जूं नहीं रेंगेगी. पर यदि विवश होकर मालिक लोगों को नुक़सान उठाने में अपने आपको असमर्थ पाकर मिल जबरन बंद करनी पड़ी तो हाहाकर मचेगा कि ग़रीब मज़दूर बेकार हो गए हैं, तकलीफ पा रहे हैं. उनकी असहायावस्था एवं दारुण विपत्ति की कथा इतनी अधिक अतिशयोक्तिपूर्ण भाषा में प्रस्तुत की जाएगी कि साधारणतया लोग दूसरे पक्ष के बारे में विचार करने का अवकाश ही नहीं पाएंगे. मालिकों की स्थिति क्या है, इस विषय पर विचार करना भी ज़रूरी है. मिल अथवा फैक्ट्री के नुक़सान उठाने पर आर्थिक सहायता का कोई स्रोत उनके पास नहीं. अपनी सारी मिल्कियत गिरवी रखने पर अथवा हर तरह की सिक्योरिटी पेश करने के बावजूद सरकार की ओर से उन्हें उधार पैसा मिलना कठिन है, ताकि वे मिल, फैक्ट्री अथवा उस कारखाने को चला सकें. रुपये के इस अभाव की पूर्ति होने पर शायद मिल या कारखाना अथवा फैक्ट्री फिर चल सकती थी. मिल बंद हो गई, मालिक दीवालिए घोषित हो गए. रुपये के अभाव में इसके सिवाय कोई चारा भी नहीं था.

मिल के बंद होते ही रुपये देने में उदासीन वही सरकार किसी श्रमिक संघ के कहने पर बिना सिक्योरिटी के रुपये लगाने को तैयार हो जाएगी. इस तरह से यह कारखाना, फैक्ट्री अथवा मिल बेकारी सहायता योजना के अंतर्गत संघ के हाथ चलाने के लिए दे देगी. ऐसी अनेक घटनाएं हुई हैं और हो भी रही हैं. यद्यपि भारतीय संविधान के अंतर्गत किसी भी व्यक्ति की निजी या व्यक्तिगत संपत्ति बिना उचित मुआवज़ा दिए सरकार नहीं ले सकती. फिर भी अनेक ऐसे लोग हैं, जिनकी व्यक्तिगत अथवा निजी संपत्ति सरकार ने बिना पूरा अथवा अधूरा मुआवज़ा दिए हड़प ली. कारण शायद यह हो कि इन उद्योगों के मालिकों की आवाज़ सत्ताधारियों तक पहुंच नहीं पाती. भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने जब इस कार्यवाही को अवैध घोषित कर दिया तो सरकार ने तत्काल संविधान में ही संशोधन कर दिए. भारतीय संविधान का चतुर्थ संशोधन क़ानून इस हेतु ही बनाया गया, जिससे कि सरकार किसी की भी निजी संपत्ति अगर वह किसी प्रकार का उद्योग है तो बिना किसी कारण, बिना किसी तरह का मुआवज़ा दिए संचालन या नियमन करने के लिए 5 वर्ष तक अपने हाथ में ले सकती है. उद्योग नियमन विधेयक इसीलिए बनाए गए थे. कई अधिनियम भी बने, जिनसे भारतीय नागरिकों से मूलभूत अधिकार वापस ले लिए गए.

यह संघों का ही प्रभाव है कि प्रत्येक धनाढ्य को आज 70 से 75 प्रतिशत अपनी आय का भाग सरकार को समर्पित कर देना पड़ता है. संभव है कि एक दिन ये तमाम पूंजीपति भी अपना संघ क़ायम कर लें और हड़ताल कर दें कि हम शासन के लिए कर जमा कराने का जो दायित्व वहन कर रहे हैं, अब नहीं करेंगे. न हम कमाएंगे, न हम टैक्स देंगे. आज जबकि संघों का इतना प्रताप है तो इस तरह की स्थिति आ जाए तो कोई आश्चर्य की बात नहीं. ऐसा समय भी शीघ्र ही आने वाला है, जब सब श्रमिक मिलकर यह महसूस करने लगेंगे और व्याकुल होकर कहने लगेंगे कि पूंजीवादी तत्वों से प्रभावित इन संघों के संघर्ष से हमें बचाइए. पूंजीवादियों से भी अधिक हमें पूंजीवादी प्रवृत्ति से भरे हुए अपने संघों से ही अधिक डर है. अमेरिका जैसे विकसित देशों के श्रमिकों की यह उत्पीड़ित आवाज़ दिन-ब-दिन गंभीर रूप धारण कर रही है.

धन की क़ीमत

सामूहिक पूंजीवाद का ज़िक्र काफी हो चुका. वैयक्तिक पूंजी या पूंजीवाद के महत्व का अवलोकन करना भी आवश्यक है. मान लीजिए, आपके पास थोड़ी-बहुत निजी पूंजी है तो यह भी आवश्यक है कि परिस्थिति का विवेचन उस पहलू से भी हो. संपत्ति का कोई निश्चय स्वरूप तो होता नहीं. आपके पास यदि कोई धन है तो सवाल यह है कि वह किस रूप में है? यदि वह मोटरगाड़ी के रूप में है, अन्न भंडार है, सोने के जेवर अथवा जवाहरात हैं या करेंसी नोट हैं? जो धन आपके पास है, उसकी क़ीमत तभी तक है, जब तक कि दुनिया उसे धन मानती है. अन्न भंडार के रूप में जो धन है, उसका सदैव मूल्य बना रहा है, लेकिन मुश्किल यह है कि वह शीघ्र ही नष्ट हो जाता है, टिकाऊ नहीं रहता. इसलिए उसी रूप में तो उसे आप हमेशा रख सकते नहीं, किसी न किसी रूप में उसे परिवर्तित करना ही पड़ेगा. चाहे उसे चांदी के रूप में बदल दीजिए अथवा सोने के रूप में, उसका मूल्य अन्न से कुछ ज़्यादा अरसे तक बना रहता है. अन्य तमाम वस्तुओं को धन के अंतर्गत तभी तक रखा जा सकता है, जबकि उसका कोई दूसरा ग्राहक मौजूद हो. मान लीजिए कि देश के प्रत्येक नागरिक के पास सोना-चांदी आदि फालतू द्रव्य के रूप में हों और अन्न-वस्त्र आदि आवश्यक वस्तुएं प्राप्त करने के लिए सभी व्यक्ति एक साथ अपना सोना-चांदी बेचना चाहते हैं. कोई ख़रीददार नहीं है. उस हालत में उस द्रव्य की हैसियत क्या रहेगी? उसका क्या मूल्य होगा? उसे कोई कौड़ियों में भी नहीं पूछेगा. बात सीधी या हंसने की नहीं है. विश्व में ऐसी स्थिति अनेक देशों में हो चुकी है. एक प्याली चाय के लिए नोट या सेरों धातु देने पर भी उपलब्धि संभव नहीं थी.

तो धन किसको समझें?

मानव के लिए जीवनोपयोगी सामग्री अन्न-वस्त्र इत्यादि धन है और चूंकि ये टिक नहीं सकते. अत: इन्हें लेकर सही माने में कोई व्यक्ति धनाढ्य नहीं बन सकता. अब तो स़िर्फ सामाजिक मान्यता की ही बात रहती है. आजकल हम सब सोना-चांदी या करेंसी नोटों को धन मानते हैं और चूंकि सब या बहुसंख्यक सब यही मानते हैं तो वह धन है ही. आपके पास कुछ फालतू धन है. आप उसे सोने-चांदी के रूप में बदल कर रखते हैं या उसका ऐसा उपयोग करते हैं, जिससे आगे आने वाले समय के लिए वह सुरक्षित रहे. ऐसे धन को लागत पूंजी या निवेश पूंजी कहते हैं. अगर आपके पास इस तरह से जमा की हुई या सुरक्षित पूंजी है तो उस पूंजी से जो आय होगी, वह आपकी अनर्जित आय है. समाजवाद में अनर्जित आय को अनुचित माना जाता है. भारत सरकार ने समाजवादी व्यवस्था को मान्यता देते हुए जो आयकर लगा रखे हैं, उनमें अर्जित और अनर्जित आय की दरों में फर्क़ है.

समाजवादी ध्येय की प्राप्ति के लिए भारतीय शासन ने एक नया टैक्स और लगाया है, जिसे संपत्ति कर कहते हैं. कई लोगों का कहना है कि ऐसा टैक्स विश्व के किसी दूसरे देश में नहीं लगाया गया. यह बात सही नहीं है. हालांकि ब्रिटेन, अमेरिका आदि देशों में इस तरह का संपत्ति कर नहीं है, पर हालैंड, स्कैंडेनेविया, जर्मनी आदि देशों में इस तरह का संपत्ति कर कई वर्षों से सफलतापूर्वक चल रहा है. इसके फलस्वरूप सामाजिक-आर्थिक समानता कुछ हद तक हासिल भी हो पाई है. मृत्यु कर विश्व के अनेक देशों में मौजूद है. इसका स्वरूप निश्चय ही सामाजिक व्यवस्था में समान वित्त वितरण का है. अब सवाल यह कि आपकी संपत्ति क्या है, उसका इन करों के लिए मूल्यांकन कैसे हो? जैसा कि मैंने कहा, आपकी संपत्ति तब तक ही संपत्ति है, जब तक लोग उसे धन मानें या उसका उस रूप में उपयोग हो.

अगर आपको अपना संपत्ति टैक्स चुकाने के लिए अपनी साइकिल या टाइपराइटर मशीन बेचनी है और इसी प्रकार देश के समस्त करदाताओं को अपनी-अपनी साइकिल या टाइपराइटर बेचने हैं तो कहिए क्या मूल्य होगा? पांच सौ रुपयों की लागत की चीज को कोई पचास में भी नहीं पूछेगा और कोई खरीददार नहीं मिलेगा. टैक्स चुकाने के लिए रुपयों का होना आवश्यक है. नतीजा होगा, 50 रुपये में या उससे भी कम में उसे आपको बेचना पड़ेगा. ग्रेट ब्रिटेन में बड़े-बड़े लार्डों के, रईसों के विशालकाय मकान, इस्टेट जो करोड़ों की लागत से बने थे, यों ही कौड़ियों के मोल बिके और जब सामाजिक परिस्थिति में समाजवाद का दौर आया तो हालत यह हो गई कि कोई भी व्यक्ति चाहे वह कितना ही धनाढ्य क्यों न हो, एक बड़ी कोठी या मकान रख नहीं सका. उसकी साफ-सफाई, रंगाई-पुताई कराने में या नौकरों के रखरखाव की व्यवस्था में इतना ज़्यादा ख़र्च होने लगा कि बर्दाश्त करना उनके लिए मुश्किल हो गया. भारत में भी यही स्थिति है या होने जा रही है. बड़े-बड़े राजा-महाराजाओं या ठाकुरों की कोठियां, गढ़ या महल सस्ती क़ीमतों में बिके और बिकाऊ हैं, क्योंकि आगे आने वाले समय में संपत्ति कर या मृत्यु कर देते हुए बड़ी-बड़ी हवेलियां रख सकना किसी भी व्यक्ति या परिवार की सामर्थ्य के बाहर की बात होगी.

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