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साक्षात्‍कारः बड़े ढांचे में लोकतांत्रिक व्‍यवस्‍था का चलना मुश्किल

साक्षात्‍कारः बड़े ढांचे में लोकतांत्रिक व्‍यवस्‍था का चलना मुश्किल

83 वर्षीय सच्चिदानंद सिन्हा एक समाजवादी कार्यकर्ता, चिंतक एवं लेखक हैं. उस दौर में जब समाजवादी विचारधारा महानगरों एवं चर्चाओं तक सीमित रह गई हो, तब सच्चिदानंद बाबू की न स़िर्फ लेखनी, बल्कि उनकी जीवनशैली भी समाजवादी विचारधारा का प्रचार-प्रसार करती नज़र आती है. आपातकाल ख़त्म होने और जनता पार्टी के बिखराव के बाद वह अपने गांव लौट गए. चाहते तो पटना या किसी अन्य शहर में रह सकते थे, लेकिन उन्होंने अपने गांव (मुज़फ्फरपुर के मुशहरी प्रखंड अंतर्गत मणिका) में रहना पसंद किया. वह अकेले, बिना किसी नौकर की सहायता के अपनी ज़िंदगी जी रहे हैं और अभी भी राष्ट्रीय एवं राज्य स्तर पर चल रहे जनांदोलनों में सक्रिय भागीदारी निभा रहे हैं. चौथी दुनिया संवाददाता शशि शेखर  ने उनसे मणिका मुशहरी में विभिन्न मुद्दों पर एक लंबी बातचीत की. पेश हैं मुख्य अंश:-

सोशलिस्ट पार्टी से लेकर आपातकाल का दौर, फिर समाजवादी जन परिषद और अब अपने गांव में. राजनीति और आंदोलन के एक लंबे दौर को कैसे देखते हैं आप?

1977 की बात है, चुनाव होना था. जनता पार्टी का गठन हो रहा था. जार्ज फर्नांडिस सोशलिस्ट पार्टी का विलय जनता पार्टी में कर रहे थे. हम लोगों ने इस बात का समर्थन नहीं किया. हमने कहा कि हम जैसे लोग कहां जाएंगे. तब हमने नए समाजवादी आंदोलन की शुरुआत का निर्णय लिया. कर्नाटक के हमारे साथियों ने समता संगठन के नाम से नए आंदोलन की शुरुआत की. हम लोगों ने यह महसूस किया कि नई तकनीक समस्या का समाधान नहीं है. इसलिए हमने वैकल्पिक अर्थव्यवस्था पर जोर दिया, जो स्वदेशी हो. कर्नाटक में दलित संघर्ष समिति, पश्चिम बंगाल में उत्तर बंग दलित आदिवासी संगठन, जनांदोलन समन्वय समिति का गठन किया गया. फिर 1995 में मुंबई की बैठक में समाजवादी जन परिषद की स्थापना की गई.

तकनीक के इस दौर में आप तकनीक को नकार रहे हैं, आख़िर विकास कैसे होगा?

ऊर्जा क्षेत्र को ही देखिए. चीन के मुक़ाबले भारत में मवेशियों की संख्या ज़्यादा है, फिर भी चीन में गोबर गैस के 70 लाख प्लांट हैं, वहीं भारत में स़िर्फ 7 लाख. हमारे पास स्थानीय संसाधनों की कमी नहीं है. आख़िर इससे विकास क्यों नहीं हो सकता. बिहार में या अन्य जगहों पर भी बड़ी ज़मीन वाले अपने खेत में ख़ुद खेती नहीं करते. बहुत से ज़मीन मालिकों ने खेती करना छोड़ दिया है. आख़िर सरकार ऐसी ज़मीनें चिन्हित करके ग़रीबों में बांट क्यों नहीं देती. हां, इसके बदले ज़मीन मालिकों को मुआवज़ा भी दिया जाना चाहिए. दूसरी ओर विकास के नाम पर ज़मीन अधिग्रहण कर सरकार उद्योगपतियों को बांट देती है. क्या ग़रीबों एवं भूमिहीनों के बीच ज़मीन नहीं बांटी जा सकती है? जापान में फ्यूडल लॉ के तहत 7 एकड़ ज़मीन पर मालिकाना हक़ फिक्स कर दिया गया. देखिए, आज जापान कहां है.

भ्रष्टाचार के ख़िला़फ और लोकपाल के मुद्दे पर पूरे देश में अभी एक आंदोलन चल रहा है. इसे कैसे देखते हैं आप?

सवाल रीयल चेंज यानी असल बदलाव का है. संसद के भीतर के लोगों और संसद के बाहर खड़ी जनता के बीच यह लड़ाई है. इससे समाधान नहीं निकलेगा. असल समस्या कुछ और है. यह देश जितना बड़ा है, जितनी बड़ी आबादी है, जितना बड़ा ढांचा है, उसमें लोकतांत्रिक व्यवस्था का सही ढंग से चलना ही मुश्किल है. लोकतंत्र के ढांचे को बहुत छोटी-छोटी इकाइयों में बांटना होगा. पंचायत और ग्रामसभा से भी छोटी इकाई, ताकि ज़्यादा से ज़्यादा लोगों की सहभागिता हो. उसी तरह अर्थतंत्र भी छोटी इकाई में हो. तकनीक और लोकतंत्र के गठबंधन ने अमीर-ग़रीब के बीच की खाई बढ़ाई, साथ ही पर्यावरण को भी नुक़सान पहुंचाया है. ग़ैर बराबरी से लोकतंत्र नहीं चलेगा.

बिहार में विकास की बात काफी जोर-शोर से की जा रही है, सरकार उच्च विकास दर की बात कह रही है, आप क्या मानते हैं?

एक छोटा सा उदाहरण लीजिए, ऊर्जा क्षेत्र का. विकास के लिए ऊर्जा एक अहम मसला है. बिहार में ऊर्जा क्षेत्र की हालत क्या है? सड़कों की हालत देखिए. राज्य सरकार के अंतर्गत आने वाली सड़कों और प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना या केंद्रीय योजनाओं से बनी सड़कों के बीच तुलना कर लीजिए, हक़ीक़त समझ जाएंगे. मेरे घर के ठीक आगे की सड़क और मेन रोड की सड़क को ही देख लीजिए. मेरे घर के पीछे मणिका मन है. इसके विकास की बात मैं पिछले 5 सालों से सुन रहा हूं, अब तक कुछ नहीं हुआ. जो एस्बेस्ट्‌स पूरे विश्व में बैन हो चुका है, उसकी फैक्ट्री खोलने की इजाज़त सरकार ने दे दी. जब हम लोगों ने विरोध किया तो मीडिया ने हमारे विरोध को जगह ही नहीं दी.

सरकारी दावों और हक़ीक़त के बीच जो भी अंतर है, उसके पीछे क्या वजह हैं?

नीतीश कुमार होशियार हैं. वह जानते हैं कि वोट कैसे मिलता है. लालू यादव की अव्यवस्था असहनीय थी. उनके समय में बैकवर्ड बनाम फॉरवर्ड की लड़ाई थी. नीतीश ने ईबीसी/महादलित कैटेगरी बनाकर लालू को शिकस्त दी. वैसे तो लगता है कि नीतीश कुमार के पास भारी बहुमत है, लेकिन 2010 के चुनाव के आंकड़ों पर ग़ौर करें तो यह भ्रम दूर होता है. इस चुनाव में नीतीश कुमार को 31 फीसदी वोट मिले थे यानी 69 फीसदी लोगों ने उनके विरोध में वोट दिया था, लेकिन विरोधी मतों के बिखराव की वजह से नीतीश कुमार इतनी सीटें पा गए. विपक्ष के बिखराव से ही नीतीश कुमार सर्वाइव कर रहे हैं.

क्या राजनीतिक विकल्प के अभाव का असर सरकार, शासन एवं प्रशासन की कार्यशैली पर भी पड़ रहा है? 

विकल्प का अभाव भी है और नीतीश कुमार अरोगेंट भी हैं. कुछ खास चुने हुए लोगों की ही सलाह मानते हैं और उसी के मुताबिक़ काम करते हैं. इसका नुक़सान तो हो ही सकता है. धीरे-धीरे फिर से क्राइम का ग्राफ बढ़ने लगा है. पंचायतों के अंदर लूटखसोट मची हुई है. इंदिरा आवास एवं वृद्धावस्था पेंशन योजना के लिए केंद्र से पैसा आता है, जिसे पंचायत स्तर पर लूट लिया जाता है. गवर्नेंस कहां है. पंचायत का पैसा ठीक से नहीं बंट पाता. फिर कैसा और कहां का गुड गवर्नेंस. मैंने पहले भी कहा और फिर कह रहा हूं, बिहार का विकास भी स्थानीय संसाधनों के सहारे ही संभव है. खाली और जिस ज़मीन पर खेती नहीं हो रही है, उसे ग़रीबों के बीच बांटा जाना चाहिए, लेकिन इसकी जगह बिहार सरकार किसानों की ज़मीन एस्बेस्ट्‌स फैक्ट्री और उद्योगपतियों को दे रही है. इस हिसाब से देखें तो विकल्प के अभाव से नुक़सान तो हो ही सकता है, लेकिन कोई उपाय भी नहीं दिख रहा. विकल्प जब तक नहीं बनेगा, तब तक कुछ नहीं हो सकता.

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