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सीरिया : गृह युद्ध के आसार

सीरिया की समस्या बढ़ती जा रही है. हिंसा और प्रतिहिंसा का दौर थमने का नाम नहीं ले रहा है. अरब लीग के विशेष दूत को़फी अन्नान की शांति योजना भी सफल होती दिखाई नहीं दे रही है. को़फी अन्नान ने कहा है कि सीरिया गृह युद्ध की ओर बढ़ रहा है. अगर सीरिया के संदर्भ में जल्दी ही अंतरराष्ट्रीय सहमति नहीं बनी तो वहां गृह युद्ध छिड़ने में ज़्यादा व़क्तनहीं लगेगा. बशर अल असद विरोधी सीरिया स्वतंत्रता सेना ने संयुक्त राष्ट्र संघ के युद्ध विराम को स्वीकार करने से इंकार कर दिया है. उसका कहना है कि युद्ध विराम के नाम पर उसे कमज़ोर किया जा रहा है, जबकि असद सरकार लगातार उनके समर्थकों पर हमला कर रही है. विपक्ष ने घोषणा की है कि को़फी अन्नान की योजना का समर्थन नहीं कर सकते हैं, बल्कि हथियार लेकर सीरियाई नागरिकों की रक्षा करेंगे. को़फी अन्नान एक नई योजना पर काम कर रहे हैं. इसके अनुसार, एक दल का गठन किया जाएगा, जिसमें सुरक्षा परिषद के स्थाई सदस्यों के साथ-साथ सऊदी अरब, कतर, तुर्की और ईरान को शामिल किया जाएगा. इस दल को सीरिया में सत्ता हस्तांतरण की एक ठोस योजना तैयार करनी होगी. इस योजना के तहत राष्ट्रपति और संसदीय चुनाव के आयोजन तथा नए संविधान की तैयारी का प्रावधान होगा. इस योजना के अनुसार, अगर सीरिया के वर्तमान राष्ट्रपति बशर अल असद इस्ती़फा देते हैं तो उन्हें सीरिया छोड़कर जाने की अनुमति दी जाएगी और उन पर कोई मुक़दमा नहीं चलाया जाएगा अर्थात वह किसी देश में राजनीतिक शरण ले सकते हैं. लेकिन इस योजना की सफलता भी संदिग्ध ही है. कारण स्पष्ट है. किसी भी योजना की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि सरकार और विपक्ष के बीच कितना सामंजस्य हो. क्या विपक्ष वास्तव में जनता के लिए काम कर रहा है या फिर यह भी सत्ता प्राप्त करने का एक साधन मात्र है. दूसरी बात अंतराराष्ट्रीय सहमति की है. अगर विश्व के दो बड़े देश या गुट किसी भी देश की समस्या को स़िर्फ अपने राजनीतिक हितों की पूर्ति के साधन के रूप में उपयोग करना चाहेंगे तो फिर समस्या का समाधान कैसे होगा. ऐसी स्थिति में तो समस्या और जटिल हो जाएगी.

ऐसी ही स्थिति सीरिया में उत्पन्न हो गई है. विपक्ष बशर अल असद को पद से हटाना चाहता है. वह संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रयासों में सहोयग करने को तैयार नहीं है. वह हथियार के दम पर सरकार को झुकाना चाहता है. सरकार के साथ वह बातचीत करना नहीं चाहता है. दूसरी ओर विश्व दो खेमों में विभाजित है. अमेरिका बशर के खिला़फ है तो रूस और चीन उसके पक्ष में खड़ा नज़र आ रहा है. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में जब सीरिया से संबंधित कोई प्रस्ताव आता है, तो रूस और चीन उस पर वीटो कर देते हैं. हाल में जब हुला क़स्बे में 100 से अधिक सीरियाई नागरिकों की हत्या हुई तो इसकी प्रारंभिक जांच के लिए बनाए गए आयोग ने जो रिपोर्ट दी, उसमें कहा गया कि सरकार विरोधी आंदोलनकारियों ने इस घटना को अंजाम दिया है, क्योंकि वहां के लोग सरकार विरोधी कार्रवाइयों में उनका साथ नहीं दे रहे थे. लेकिन संयुक्त राष्ट्र संघ में अमेरिकी प्रतिनिधि सूजन राईस ने प्रारंभिक तौर पर मिली इस रिपोर्ट को तुरंत ही ग़लत बता दिया. यही नहीं हुला हत्याकांड पर संयुक्त राष्ट्र संघ की रिपोर्ट आने से पहले ही जापान और पश्चिम के क़रीब 20 देशों ने अपने राजदूत सीरिया से बुला लिए. इसके बाद रूस ने अमेरिकी नीति की खिंचाई कर डाली. साथ ही अपने राजदूतों को वापस बुलाने वाले देशों को भी कठघरे में खड़ा कर दिया. रूस का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय नियमों के अनुसार, सीरिया और अन्य पश्चिमी देशों के बीच युद्ध नहीं हो रहा है. इन देशों ने सीरिया के खिलाफ किसी युद्ध की घोषणा नहीं की है और सीरिया ने भी इन देशों के खिलाफ युद्ध की घोषणा नहीं की है. ऐसे में राजदूतों को वापस बुलाने का फैसला सही नहीं कहा जा सकता है. रूस के इस सहयोग से बशर अल असद को संबल मिल गया और उन्होंने भी अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, स्विटजरलैंड, स्पेन के राजदूतों तथा बुल्गारिया, बेल्जियम और कनाडा के कार्यवाहक राजदूतों को अपने यहां से निकालने की घोषणा कर दी. रूस सीरिया में सैनिक हस्तक्षेप का विरोधी है. रूसी राष्ट्रपति पुतिन ने कहा है कि वह असद का बचाव नहीं कर रहे हैं, लेकिन असद के इस्ती़फे की मांग का समर्थन भी नहीं कर रहे हैं. उन्होंने दोनों पक्षों से हिंसा का रास्ता छोड़कर बातचीत के लिए मेज़ पर बैठने की अपील की है. उनका कहना है कि सीरिया में किसका शासन होगा या फिर कैसा शासन होगा, इसका फैसला सीरिया की जनता को करने देना चाहिए, किसी और को यह तय करने का अधिकार नहीं है. यह सा़फ है कि उनका इशारा अमेरिका की ओर है, क्योंकि वह बार-बार सीरिया में सैन्य हस्तक्षेप की बात कर रहा है. उसने तो यहां तक कहा कि वह सुरक्षा परिषद की सहमति के बिना भी सीरिया में अपनी सेना भेज सकता है. हालांकि बाद में उसे अपने वक्तव्य में सुधार करना पड़ा.

सीरिया के मुद्दे पर विश्व दो खेमों में विभाजित है. वहां सैनिक कार्रवाई की नहीं जा सकती, क्योंकि सुरक्षा परिषद के दो स्थाई सदस्य चीन और रूस वीटो करने के लिए तैयार बैठे हैं. ऐसे में सीरिया की गहराती समस्या का समाधान एक ही है. दोनों पक्षों के बीच वार्ता हो और शांतिपूर्ण समाधान पर सहमति बने. सीरिया की जनता को यह तय करने का मौका दिया जाना चाहिए कि सरकार किसकी हो. इसका एकमात्र तरीक़ा चुनाव है, लेकिन जब तक बशर अल असद राष्ट्रपति पद पर बने रहेंगे, विपक्ष को निष्पक्ष चुनाव का भरोसा नहीं होगा. हाल में हुए संसदीय चुनाव को विपक्ष नकार चुका है. इसके लिए संयुक्त राष्ट्र संघ को पहल करनी पड़ेगी. यूएन के निरीक्षण में चुनाव हो और रूस तथा अमेरिका इस बात पर सहमत हों. आ़खिरकार हथियारों से इस बात का फैसला तो नहीं किया जा सकता कि जनता क्या चाहती है. जनता का समर्थन तो दोनों को है. ऐसे में चुनाव से ही यह तय होगा कि किसे अधिक समर्थन प्राप्त है. अगर सीरिया के मुद्दे पर इसी तरह की राजनीति चलती रही तो सीरिया को गृह युद्ध की चपेट में आने से कोई नहीं रोक सकता.

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