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पत्रकार जिन्होंने लोकतंत्र की हत्या की

पत्रकार जिन्होंने लोकतंत्र की हत्या की

पत्रकारिता की संवैधानिक मान्यता नहीं है, लेकिन हमारे देश के लोग पत्रकारिता से जुड़े लोगों पर संसद, नौकरशाही और न्यायपालिका से जुड़े लोगों से ज़्यादा भरोसा करते हैं. हमारे देश के लोग आज भी अ़खबारों और टेलीविजन की खबरों पर धार्मिक ग्रंथों के शब्दों की तरह विश्वास करते हैं. हमारा धर्म है कि हम लोगों के विश्वास को धोखा न दें और उन्हें हमेशा सच बताएं. पर जब हमारे बीच के लोग लोकतंत्र की अवधारणा के खिला़फ काम करते मिलें तो क्या कहा जाए? हमारे बीच के महत्वपूर्ण लोगों ने आपातकाल में लोकतंत्र के खिला़फ उस समय की सरकार के समर्थन में जमकर वकालत की और देश की जनता को ग़लत जानकारियां दीं. इनमें से ज़्यादातर आज पत्रकारिता के शीर्ष पर हैं और कुछ तो देश की समस्याओं के हल में लगे हैं. हम इस रिपोर्ट के जरिए आपको आपके परिवार के भीतर के पैबंद दिखाना चाहते हैं और निवेदन करना चाहते हैं कि आप उन्हें भी पहचानें, जो आज भी पी आर जर्नलिज्म कर रहे हैं और देश में मौजूद विभिन्न लॉबियों के लिए प्रचार कर रहे हैं, जिनका हित देश के लोगों की जगह विदेशी कंपनियों के हित में है. हम आपको विश्वास दिलाते हैं कि हम सदैव पत्रकारिता के आदर्शों एवं मानदंडों पर अडिग रहने के लिए प्रतिबद्ध हैं.


चौथी दुनिया को कुछ ऐसे दस्ताव़ेज हाथ लगे हैं, जिनसे कई दिग्गज और स्थापित पत्रकारों के चेहरों से नक़ाब उतर गया. इन दस्तावेज़ों से यह साबित होता है इन महान पत्रकारों ने न स़िर्फ पत्रकारिता को लज्जित किया है, बल्कि इन्होंने अपने कारनामों से देश में प्रजातंत्र की हत्या करने वाली ताक़तों को मज़बूत करने का काम किया है. ये दस्तावेज़ बताते हैं कि किस तरह देश के जाने-माने एवं प्रतिष्ठित पत्रकारों ने सरकार की तानाशाही पूर्ण नीतियों को जायज़ ठहराया और उसके बदले पैसे लिए. हम इस अंक में उन पत्रकारों के नाम, उनके अ़खबारों के नाम और सरकार से उन्होंने कितने पैसे लिए, उसका ब्योरा छाप रहे हैं. प्रजातंत्र की नीलामी करने वालों की सूची में ऐसे कई नाम हैं, जो आज पत्रकारिता के शिखर पर हैं और कुछ ऐसे भी हैं, जो अब इस दुनिया में नहीं हैं. लेकिन सरकारी दस्तावेज़ से कुछ नामों को निकाल देना बेईमानी होगी, इसलिए हम सभी जीवित और मृत पत्रकारों के नाम छाप रहे हैं.

इमरजेंसी के दौरान सबसे ज़्यादा दूरदर्शन पर दिखने वाले पत्रकार जी पी भटनागर हैं. वह 21 बार सरकार की नीतियों को सही बताने दूरदर्शन पहुंचे. उन्हें दूरदर्शन की तऱफ से 2100 रुपये मिले. दूसरे नंबर पर इंडियन एक्सप्रेस के सुमेर कॉल का नाम है. वह 20 बार दूरदर्शन पर दिखे.

यह घटना भारत के इतिहास के सबसे काले कालखंड की है, जब 26 जून, 1975 के दिन इंदिरा गांधी ने देश में इमरजेंसी यानी आपातकाल की घोषणा की थी. संविधान को निलंबित कर दिया गया और सरकार ने जिसे अपना विरोधी समझा, उसे जेल भेज दिया. विपक्ष के नेताओं के साथ-साथ सरकार ने देश के कई जाने-माने पत्रकारों को भी जेल भेज दिया. जिसने भी प्रजातंत्र की गुहार लगाई, संविधान द्वारा दिए गए अधिकारों की बात की, वह सीधा जेल पहुंच गया. देश के सारे अ़खबारों एवं पत्र-पत्रिकाओं पर सेंसरशिप लग गई. दूरदर्शन ने कांग्रेस पार्टी के मुखपत्र की जगह ले ली थी. इमरजेंसी के दौरान दूरदर्शन सरकारी प्रोपगैंडा का सबसे सटीक हथियार बन गया. सरकार की नीतियों को सही और विरोध करने वालों को राष्ट्रद्रोही बताना यही दूरदर्शन का मूलमंत्र था. जो भी कार्यक्रम दिखाए गए, उनमें सरकार द्वारा फैलाए गए झूठ को दिखाया गया. कार्यक्रमों का इस्तेमाल विरोधियों और पत्रकारों को नीचा दिखाने के लिए किया गया. जहां कई पत्रकार सरकारी दमन के खिलाफ लड़ रहे थे, वहीं कुछ ऐसे भी पत्रकार थे, जो अपने स्वार्थ के लिए घुटनों के बल रेंगने लगे. लेकिन सवाल यह है कि वे कौन लोग थे, जो सरकार के लिए काम कर रहे थे. वे कौन पत्रकार थे, जो दूरदर्शन के स्टूडियो में बैठकर देश को गुमराह कर रहे थे, लोगों को झूठी दलीलें दे रहे थे, सरकार की नीतियों को सही और प्रजातंत्र के लिए लड़ने वालों को ग़लत बता रहे थे. समझने वाली बात केवल इतनी है कि इमरजेंसी के  दौरान मीडिया पर सेंसरशिप लागू थी. दूरदर्शन पर स़िर्फ वही दिखाया जाता था, जिससे सरकार की करतूतों को सही ठहराया जा सके. जब पूरे देश में ही सरकार के विरोध पर पाबंदी थी तो भला दूरदर्शन के स्टूडियो में बैठकर विरोध करने की हिम्मत कौन कर सकता था. लेकिन सवाल केवल इतना ही है कि खुद को पत्रकार कहने वाले लोग दूरदर्शन के स्टूडियो में सरकार का महिमामंडन करने आखिर क्यों गए.

पत्रकारिता और प्रजातंत्र एक-दूसरे के पूरक हैं. प्रजातंत्र के बिना सच्ची पत्रकारिता का अस्तित्व नहीं है और स्वतंत्र पत्रकारिता के बिना प्रजातंत्र अधूरा है. आज़ादी की लड़ाई में शामिल स्वतंत्रता सेनानियों ने अ़खबार को हथियार बनाया था.

चौथी दुनिया को मिले दस्तावेज़ डायरेक्ट्रेट जनरल दूरदर्शन के दस्तावेज़ हैं. इन दस्तावेज़ों से यह पता चलता है कि इमरजेंसी के  दौरान किन-किन पत्रकारों ने सरकार का साथ दिया था. इन दस्तावेज़ों से यह सा़फ होता है कि कैसे पैसे लेकर इमरजेंसी को जायज़ बताया गया था और सरकारी योजनाओं को बेहतर बताने की वकालत पत्रकारों ने की थी. दूरदर्शन के उक्त दस्तावेज़ से सा़फ पता चलता है कि इमरजेंसी के दौरान चलाए गए कार्यक्रमों का मुख्य उद्देश्य सरकारी नीतियों को प्रचारित करना था. मतलब, इमरजेंसी कैसे देश के लिए बेहतर है, किस तरह सरकारी व्यवस्था सुधर गई है, आदि. उक्त दस्ताव़ेज बताते हैं कि इमरजेंसी के दौरान दूरदर्शन की यह ज़िम्मेदारी थी कि टीवी पर दिखाए जाने वाले कार्यक्रम इंदिरा सरकार द्वारा बनाए गए बीस सूत्रीय और पांच सूत्रीय कार्यक्रमों को प्रचारित करे और बढ़ावा दे. इसके लिए दूरदर्शन पत्रकारों को बुलाता था. दूरदर्शन के डायरेक्ट्रेट जनरल के दस्तावेज़ में पत्रकारों के नामों के साथ-साथ उनके अ़खबारों के भी नाम दिए गए हैं. साथ में यह भी दिया गया है कि इन पत्रकारों ने अपनी सेवाओं का कितना ईनाम लिया है.
इमरजेंसी के दौरान सबसे ज़्यादा दूरदर्शन पर दिखने वाले पत्रकार  जी  पी  भटनागर हैं. वह 21 बार सरकार की नीतियों को सही बताने दूरदर्शन पहुंचे. उन्हें दूरदर्शन की तऱफ से 2100 रुपये मिले. दूसरे नंबर पर इंडियन एक्सप्रेस के सुमेर कॉल का नाम है. वह 20 बार दूरदर्शन पर दिखे. उन्हें उनकी सेवाओं के लिए 2000 रुपये मिले. उनके बाद नाम आता है स्टेट्‌समैन अ़खबार के पी शर्मा का, जिन्होंने 11 बार दिल्ली दूरदर्शन पर कांग्रेस का गुणगान किया. उन्हें इसके लिए 1100 रुपये मिले. समाचार अ़खबार के सत्य सुमन ने नौ बार दूरदर्शन पर सरकार का समर्थन किया. उन्हें 900 रुपये मिले. इंडियन एक्सप्रेस के चेतन चड्‌ढा और हिंदुस्तान टाइम्स से जुड़े जी एस भार्गव 8 बार दिल्ली दूरदर्शन पर वक्ता बनकर पहुंचे, दोनों को 800 रुपये मिले. कई पत्रकारों ने 7 बार दूरदर्शन पर अपने ज्ञान का इस्तेमाल इमरजेंसी को जायज़ ठहराने में किया. इनमें टाइम्स ऑफ इंडिया के दिलीप पडगांवकर एवं एस स्वामीनाथन अय्यर, नवभारत टाइम्स के अक्षय कुमार जैन, इंडियन एक्सप्रेस के बलराज मेहता, बिजनेस स्टैंडर्ड के गौतम गुप्ता एवं प्रताप अ़खबार के जी एस चावला शामिल हैं. दो ऐसे भी नाम हैं, जिन्हें दूरदर्शन पर लगातार चलने वाले एक कार्यक्रम के लिए बुक किया गया था. ये दोनों पत्रकार नवभारत टाइम्स के महाबीर अधिकारी और सारिका के कमलेश्वर थे. ये हर पंद्रह दिन पर आने वाले कार्यक्रम में हिस्सा लेते थे. इन्हें कितना पैसा मिला, इसकी जानकारी दूरदर्शन के इन दस्तावेज़ों में नहीं है. 1975 में दूरदर्शन के विभिन्न केंद्रों से प्रसारित होने वाले कार्यक्रमों का ब्योरा है. इसमें समझने वाली बात यह है कि जो पैसा इन पत्रकारों ने लिया, वह आज के संदर्भ में कम ज़रूर नज़र आता है, लेकिन 1975 में इसकी क़ीमत आज की तुलना में बहुत ज़्यादा थी.

पत्रकारिता और प्रजातंत्र एक-दूसरे के पूरक हैं. प्रजातंत्र के बिना सच्ची पत्रकारिता का अस्तित्व नहीं है और स्वतंत्र पत्रकारिता के बिना प्रजातंत्र अधूरा है. आज़ादी की लड़ाई में शामिल स्वतंत्रता सेनानियों ने अ़खबार को हथियार बनाया था. यही वजह है कि भारत में सामाजिक और राजनीतिक दायित्वों का निर्वाह किए बिना पत्रकारिता करना स़िर्फ एक धोखा है. हर क़िस्म के शोषण के खिला़फ आवाज़ उठाना और प्रजातंत्र की रक्षा करना पत्रकारिता का पहला दायित्व है. जब इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी लगाई और प्रजातंत्र का गला घोंटा, तब हर पत्रकार का यह फर्ज़ था कि वह उस तानाशाही के खिला़फ आवाज़ उठाता, लेकिन कुछ लोगों ने इसका उल्टा किया. वे प्रजातंत्र के लिए लड़ने की बजाय कांग्रेस पार्टी की दमनकारी एवं गैर संवैधानिक नीतियों के बचाव में उतर आए और उसके लिए पैसे भी लिए. ज़ाहिर है, इन पत्रकारों ने यह सब अपने स्वार्थ के लिए किया. दूरदर्शन के दस्तावेज़ इस मायने में महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि ये बताते हैं कि वर्तमान में पत्रकारिता में आई गिरावट की जड़ें कहां हैं, भारत में पत्रकारिता कब और कैसे पटरी से उतर गई?

आज हालत यह है कि सरकार के साथ-साथ मीडिया की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठ रहे हैं. लोगों में यह धारणा बनती जा रही है कि मीडिया भी दलाल बन गया है. यह धारणा कुछ हद तक ग़लत भी नहीं है. जब देश के बड़े-बड़े संपादकों और पत्रकारों के काले कारनामों का खुलासा होता है तो अ़खबारों में छपी खबरों पर विश्वास करने वालों को सदमा पहुंचता है. बड़े पत्रकार बड़े दलाल बन गए हैं तो छोटे पत्रकार भी पीछे नहीं हैं. पैसे लेकर झूठी खबरें छापने का प्रचलन बढ़ चला है. छोटे-छोटे शहरों में पत्रकार और संवाददाता अवैध वसूली का काम करने लगे हैं. धमकी देने और ब्लैकमेल करने से लेकर अधिकारियों के ट्रांसफर-पोस्टिंग कराने का काम भी पत्रकारों का नया शौक़ बन गया है. चुनाव के दौरान टीवी चैनलों और अ़खबारों का जो चरित्र उभर कर सामने आता है, वह वेश्यावृत्ति से कम नहीं है. पत्रकारिता में दलाली की नींव कहां से पड़ी, यह इन दस्तावेज़ों से पता चलता है. आज भी ऐसे पत्रकार मौजूद हैं, जो सरकार के  काले कारनामों को छिपाने के लिए दलीलें देते हैं, भ्रष्टाचार के खिलाफ उठने वाली आवाज़ों को ही कठघरे में खड़ा करते हैं. यह चिंताजनक स्थिति है. जिस तरह नेताओं और अधिकारियों के भ्रष्टाचार से आज प्रजातंत्र खतरे में पड़ गया है, उसी तरह पत्रकारिता की विश्वसनीयता खत्म होने से प्रजातंत्र का बचना मुश्किल हो जाएगा. प्रजातंत्र को ज़िंदा रखने के लिए सामाजिक सरोकारों के साथ विश्वसनीय पत्रकारिता ही व़क्त की मांग है.

ये दस्ताव़ेज प्रेस कमीशन ऑफ इंडिया के सचिव एम वी देसाई के सवालों के जवाब में डायरेक्ट्रेट जनरल दूरदर्शन द्वारा तैयार किए गए. इनमें यह सा़फ-सा़फ लिखा है कि इमरजेंसी के दौरान दूरदर्शन के कार्यक्रम सरकार की नीतियों को प्रचारित करने और 20 सूत्रीय एवं 5 सूत्रीय कार्यक्रमों को बढ़ावा देने के लिए तैयार किए गए. साथ में यह भी लिखा है कि कुछ कार्यक्रम संविधान में संशोधन के लिए समर्थन जुटाने हेतु तैयार किए गए.

ये सभी दस्तावेज़ अनिल चमड़िया द्वारा संचालित मीडिया स्टडीज ग्रुप द्वारा उपलब्ध कराए गए हैं.

मार्च 1975 से जून 1977 के दौरान दूरदर्शन के विभिन्न केंद्रों पर बुलाए गए पत्रकारों की सूची

अखबार/एजेंसी

नाम

कितनी बार

भुगतान (रुपए मे)

दूरदर्शन केंद्र, दिल्ली

टाइम्स ऑफ इंडियाउषा राय2200
टाइम्स ऑफ इंडियादिलीप पडगांवकर7700
टाइम्स ऑफ इंडियाबी एन कुमार1100
टाइम्स ऑफ इंडियादिलीप मुखर्जी6600
टाइम्स ऑफ इंडियायोगेंद्र बली6600
टाइम्स ऑफ इंडियाएस स्वामीनाथन अय्यर7700
टाइम्स ऑफ इंडियागिरिलाल जैन4400
इंडियन एक्सप्रेसशितांशु दास6450
इंडियन एक्सप्रेसचेतन चड्‌ढा8800
इंडियन एक्सप्रेससुरेंद्र सूद6450
इंडियन एक्सप्रेससुमेर कौल202000
हिंदुस्तान टाइम्सराशिद तलीब4600
हिंदुस्तान टाइम्सयतींद्र भटनागर4300
हिंदुस्तान टाइम्सजी एस भार्गव8800
हिंदुस्तान टाइम्सडी आर आहूजा5500
हिंदुस्तान टाइम्सराज गिल2150
हिंदुस्तान टाइम्सजीवन नायर175
समाचारसत्य सुमन9675
फाइनेंसियल एक्सप्रेसकेवल वर्मा3300
स्टेट्‌समैनपी शर्मा111100
मस्ताना जोगीजे पी भटनागर212100
नेशनल हेराल्डनजमुल हसन3225
साप्ताहिक हिंदुस्तानमनोहर श्याम जोशी5500
स्टेट्‌समैनज्ञानेंद्र नारायण4300
पैट्रियॉटआर के मिश्रा1100
हिंदूके के  कत्याल4400
तेजविश्वबंधु गुप्ता1100
समाज कल्याणराकेश जैन6450
सेवाग्रामजी पी जैन2150
नवभारत टाइम्सअक्षय कुमार जैन7700
आईएनएफएइंद्रजीत2200
स्वतंत्र पत्रकारपी के त्रिपाठी5525
स्वतंत्र पत्रकारश्रीमती कमला मनकेकर6600

दूरदर्शन केंद्र, अमृतसर

टाइम्स ऑफ इंडियाडी आर आहूजा3300
इंडियन एक्सप्रेसबलराज मेहता7575
इंडियन एक्सप्रेसएच के दुआ4300
हिंदुस्तान टाइम्सराज गिल4300
प्रेस एशिया इंटरनेशनलदीवान वीरेंद्र नाथ175
सेक्युलर डेमोक्रेसीमोहिंदर सिंह साथी175
प्रतापजी एस  चावला7525
फाइनेंशियल एक्सप्रेसचेतन चड्‌ढा2200
नवभारत टाइम्ससत सोनी1150
हिंदुस्तान टाइम्सप्रोमिला कलहन175
इंडियन प्रेस एजेंसीओ पी सभरवाल5500
दिनमानत्रिलोक दीप2200
ट्रिब्यूनजी आर सेठी2200
हमदर्द दृष्टिब्रिजेंद्र सिंह150
नवन सहितप्यारा सिंह दत्त150
अक्सअमरजीत सिंह150
प्रेरणाएम एस लूथरा150
अरसीप्रीतम सिंह150
विकेंद्रीतप्रभजोत कौर175
त्रिजननिरंजन अवतार175
पंखुरियाअमर ज्योति175
फतेहमनजीत सिंह नारंग150
पहरेदारकरतार सिंह कंवल150
लोकरंगतारा सिंह कोमल150
इलेक्शन अर्काइवशिवलाल4700

दूरदर्शन केंद्र, बांबे

टाइम्स ऑफ इंडियासुकुमार जैन1100
महाराष्ट्र टाइम्सगोविंद तलवालकर2200
महाराष्ट्र टाइम्सवी एन देवधर2200
नवभारत टाइम्सएस बी पाठक2200
धर्मयुगमनमोहन सरल4400
स्वतंत्र पत्रकारके वाजपेयी1100
स्वतंत्र पत्रकारकमलाकर कौशिक2200
नवशक्तिपी आर बेहरे5500
महाराष्ट्र टाइम्सचंद्रकांत तमहने4400
लोकसत्ताटी एस खोजे2200
स्वतंत्र पत्रकारडी बी कार्णिक2200
स्वतंत्र पत्रकारहरीश भनोट1100
ब्लिट्‌जनवल किशोर नौटियाल6600
माधुरीअरविंद कुमार2200
सर्वोदना साधनेबी ए पाटिल1100
स्वतंत्र पत्रकारविश्वनाथ सचदेव4400
फ्री प्रेसराम त्रिकंद1100
स्वतंत्र पत्रकारप्रभाकर रानाडे2200
स्वतंत्र पत्रकारएस आर टीकेकर2200
लोकसत्ताविद्याधर गोखले3300
यशवंत पद्धेस्वतंत्र पत्रकार4400
नवभारत टाइम्समहावीर अधिकारी
(द टाइम्स ऑफ इंडिया समूह) सारिका (द टाइम्स ऑफ इंडिया समूह) कमलेश्वरये दोनों लोग लंबे समय तक चलने वाले धारावाहिक पाक्षिक कार्यक्रम के लिए बुक किए गए.

दूरदर्शन केंद्र, कलकत्ता

टाइम्स ऑफ इंडियाशिवदास बंदोपाध्याय  175
लोक सेवकरमेन दास2150
स्वतंत्र पत्रकारप्रशांत बोस2150
बिजनेस स्टैंडर्डगौतम गुप्ता7525
स्वतंत्र पत्रकाररमेन मजूमदार1100
आनंद बाज़ारतपस गांगुली3300
पैट्रियॉटप्रफुल्ल रॉय चौधरी3225
स्टेट्‌समैनज्योति सान्याल175
अमृत बाज़ारआर एन बनर्जी175
आनंद बाज़ारनिर्मल सिन्हा175
स्वतंत्र पत्रकारसतेंद्र बिश्वास175
नबभारतीज्योतिरम घोष175
बसुंधरासुलेखा घोष175
आनंद बाज़ारनिखिल मुखर्जी1100

दूरदर्शन केंद्र, मद्रास

इंडियन एक्सप्रेसराम मोहन गुप्ता175
हिंदूएस वी कृष्णमूर्ति175
दिनामलाईवी पी सलसरी175
यूएनआईजी रंगनाथन175
दिनामलाईएम एस विश्वनाथन175
दिनामलाईएन पी श्रीरंगम175
बिजनेस स्टैंडर्डटी एस श्रीनिवासन175
इंडस्ट्रियल इकोनॉमिस्टएस विश्वनाथन175
दिनामलाईएम राजाराम175

दूरदर्शन केंद्र, लखनऊ

स्वतंत्र भारतअशोक जी2150
ब्लिट्‌जबिशन कपूर2150
स्वतंत्र भारतचंद्र दयाल दीक्षित2150
स्वतंत्र  पत्रकारज्ञानेंद्र शर्मा5375
क़ौमी आवाज़इशरत अली सिद्दीक़ी1100
नवजीवनके के मिश्रा1100
नेशनल हेराल्डके सक्सेना2150
पायोनियरमेहरू जफर150
समाचारहरपाल सिंह175
आजराजेंद्र सिंह1100
नेशनल हेराल्डसुरेंद्र चतुर्वेदी2150

दूरदर्शन केंद्र, श्रीनगर

टाइम्स ऑफ इंडियाजनक सिंह3225
हिंदुस्तान टाइम्सबृज भारद्वाज5375
इक़बालजी एन ख्याल7700
इकोनॉमिक टाइम्सओ एन कौल6600
़िखदमतएन एल वट्टल6450
यूएनआईबशीर अहमद5375
पीटीआईपी एन जलाली5375
श्रीनगर टाइम्सजी एम सो़फी5375
भट्ट आ़फताबसनाउल्लाह3225
मंदिरपी एन रैना175
हमदर्दमक़बूल हुसैन175
चिनारएम ए बुच175
आईनाशमीम अहमद शमीम2150

6 comments

  • manish

    चौथी दुनिया के संपादक से हमारे विभिन्न इलेक्ट्रानिक व प्रिंट मीडिया
    के पत्रकार भाइयों को ईमान दारी के साथ अपने कर्तव्य को करने की
    कला सीखनी चाहिए | क्योंकि यदि ये बिक जायेंगे तो प्रजा तन्त्र खतरे
    में पड़ जायेगा जो की प्रजातंत्र की आज़ादी को समूल नष्ट करने में
    लगे है | आज हमारा देश रसातल में प्रवेश कर रहा है |भोली भाली जनता सच खबरों से कोसों दूर है ,अभी हाल में हुए बाबा राम देव के
    आंदोलन में जब सुब्रहण्यम स्वामी सच्चाई जनता को काले धन का बताने लगे तो सारे टी. वी . के नियूज चैनल वालों ने उनके भाषणका लाइव टेलीकास्ट ही दिखाना बंद करदिया |उस समय उन दलालोंने वहीं दिखाया जिसके लिए उन्होंने रिश्वत ली होगी |यह देश के प्रजातन्त्र के लिए एक दुर्भाग्यपूर्ण एवं चिंतनीय विषय है |

  • manish

    कुछ समय पूर्व 2 जी घोटाले में भी कई नामी गिरामी पत्रकारों के नाम आये थे. उनमे से एक सज्‍जन प्रभु चावला जो आज तक चैनल पर सीधी बात करते थे उन्‍हें इंडिया टुडे ने तत्‍काल हटा दिया किंतु दूसरे द्वितीय पंक्ति के चैनल ने सच्‍ची बात करने के लिये रख लिया. दूसरी महिला पत्रकार बरखा दत्‍त को तो चैनल वालों ने हटाया ही नहीं बल्कि उन्‍हें और पावरफुल पोजीशन से नवाज दिया अब वे नीरा राडिया के टेपों के खुलासों, जिनके कारण इन पत्रकारों के नाम उजागर हो गये थे, को एनार्की आफ इनफारमेशन बता रही हैं. क्‍या होगा इस देश के लोकतंत्र का चौथा स्‍तंभ कहे जाने वाली पत्रकारिता का.

  • manish

    इस बात के क्या सबूत हैं कि इन सब पत्रकारों ने टेलीविजन पर इन्दिरा गाँधी के कामों का ही गुणगान किया था? कम से कम कमलेश्वर के बारे में तो मैं कह सकता हूँ कि उन्होंने सारिका का पूरा अंक काले पन्नों से रंगकर वैसा का वैसा बाज़ार में बिक्री के लिए भेजा था क्योंकि वे सरकारी सेंसर से सहमत नहीं थे। चौथी दुनिया के सम्पादकों को मेरी राय है कि वे कुछ भी छापने से पहले एक बार उसकी जाँच कर लिया करें।

  • manish

    चौथी दुनिया ने जो सूची छपी है वो इमरजेंसी में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का राग अलापने वाले नाम चीन पत्रकारों का ब्यौरा है. लेकिन इससे ज्यादा संगीन रिपोर्ट मित्रोखिन अर्कयिव्स२ में दिए गए हैं जिसके अनुसार उस दौर में इमरजेंसी को सही ठहराने और तानाशाही को उचित बताने व लोकतंत्र की हत्या पर इंदिराजी का चारण व भांडों की तरह गुणगान करने का खुलासा किया गया है. ये भी कहा गया है की उस दौर में लगभग आठ नौ हजार लेख सोवियत गुप्तचर संस्था द्वारा अपने ‘प्रभाव’ का इस्तेमाल करके विभिन्न समाचार पत्रों में ‘प्लांट’ कराये गए थे. यद्यपि मित्रोखिन की मृत्यु और भारत सर्कार की उदासीनता व पत्रकारों के उपेक्षापूर्ण रवैय्ये के कारण मित्रोखिन द्वारा सोवियत संघ से लाये गए लाखों दस्तावेजों में भारत सम्बन्धी बहुत से महत्वपूर्ण तथ्य उजागर होने से रह गए. शायद भविष्य में कोई राष्ट्रवादी सर्कार उनकी जानकारी प्राप्त करके देश की जनता को बताना चाहे. या कोई जुलियन अलांदे भारत में भी पैदा हो जाये और ऐसे सभी रहस्यों पर से पर्दा उठाकर ‘ब्लेक शीप’ को सामने लाये.

  • manish

    पड़गांवकरों,विश्वबंधु गुप्ताओं और मनोहरश्याम जोशियों के नामों से कोई हैरानी नहीं हुई. बाकी को भी उम्मीदों पर खरा उतरने के लिए बधाइयां.

  • manish

    इसमे श्री गिरिलाल जैन, विश्वबंधु गुप्ता और विद्याधर गोखले का क्या सहयोग था?

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