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आरएसएस का चक्रव्‍यूह

हिंदुस्तान में सदियों से संयुक्त परिवार की प्रथा चली आ रही है. इस व्यवस्था में परिवार का मुखिया जो अक्सर बुज़ुर्ग होता है, उसके ऊपर परिवार को एक रखने और उसे चलाने की ज़िम्मेदारी होती है. आम तौर पर आज भी हिंदुस्तान में ज़्यादातर घरों में पीढ़ी दर पीढ़ी बंटवारा नहीं होता. जबसे पश्चिम का प्रभाव अपने देश पर बढ़ा है, तबसे परिवारों में बंटवारे का चलन बढ़ गया है, पर यह अभी भी अपवाद स्वरूप ही है. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को मानने वाले संघ को इसी तरह से देखते हैं. संघ के लोगों का कहना है कि संघ एक वटवृक्ष है. जबसे संघ बना है, तबसे परिवार एक है, बंटवारा नहीं हुआ है. इसका श्रेय वे अपने परिवार के मुखिया की सूझबूझ को देते हैं. संघ का मुखिया सरसंघ चालक होता है, संघ का चरित्र हिंदुस्तान के सामान्य परिवार का चरित्र है. जैसे सामान्य परिवार में झगड़े होते हैं, वैसे ही संघ परिवार में भी झगड़े होते हैं. संघ परिवार में होने वाले झगड़ों को संघ का मुखिया एक कुशल रणनीति के तहत सुलझाता रहता है. सबको अपने-अपने कामों में व्यस्त कर वह घर को बचाए रखने में अब तक सफल रहा है. सरसंघ चालक ने न केवल सबको उलझाए रखा है, बल्कि बांधे भी रखा है.

भाजपा के अंदर गुटों में भी कई गुट हैं. इनमें पहला गुट है लालकृष्ण आडवाणी का. इसमें भी एक गुट है, जिसमें पहला नंबर आता है डी-5 का. डी-5 का मतलब अनंत कुमार, वैंकेया नायडू, अरुण जेटली, सुषमा स्वराज और आज का सबसे बड़ा नाम नरेंद्र मोदी. दूसरा गुट है संघ से जुड़े कुछ नेताओं का, जिनके ऊपर संघ का वरद्हस्त है, पर इसमें भी कई गुट हैं. जैसे राजस्थान में प्रकाश जी हैं, वह हमेशा वसुंधरा राजे के विरोधी रहे हैं और विरोधी ही रहेंगे. वहां पर गुलाब चंद कटारिया को संघ का समर्थन मिलता रहा है, मिलता रहेगा. लेकिन जब गुलाब चंद कटारिया और वसुंधरा राजे में झगड़ा होगा तो भाजपा के बड़े नेता वसुंधरा राजे का समर्थन करेंगे और संघ के खिला़फ चले जाएंगे. कर्नाटक में येदियुरप्पा हैं, जब येदियुरप्पा और सुषमा स्वराज में झगड़ा हुआ, तब येदियुरप्पा को सत्ता से हटना पड़ा. येदियुरप्पा ने पहले अपने चेले सदानंद गौड़ा को मुख्यमंत्री बनवाया और जब उस चेले के पैर जमने लगे तो उन्होंने उसके खिला़फ मोर्चा खोल दिया और उसकी जगह अपने दूसरे चेले को मुख्यमंत्री बनवा दिया. उनकी रणनीति यही है कि कोई भी आदमी मुख्यमंत्री पद पर टिक न पाए. हालांकि पहले वाला मुख्यमंत्री भी उनका चेला और दूसरा भी उनका चेला है, पर वह किसी को टिकने नहीं देना चाहते और इसका कारण स़िर्फ एक है कि वह अपना वर्चस्व बनाए रखना चाहते हैं.

भाजपा के अंदर गुटों में भी कई गुट हैं. इनमें पहला गुट है लालकृष्ण आडवाणी का. इसमें भी एक गुट है, जिसमें पहला नंबर आता है डी-5 का. डी-5 का मतलब अनंत कुमार, वैंकेया नायडू, अरुण जेटली, सुषमा स्वराज और आज का सबसे बड़ा नाम नरेंद्र मोदी. दूसरा गुट है संघ से जुड़े कुछ नेताओं का, जिनके ऊपर संघ का वरद्हस्त है, पर इसमें भी कई गुट हैं. जैसे राजस्थान में प्रकाश जी हैं, वह हमेशा वसुंधरा राजे के विरोधी रहे हैं और विरोधी ही रहेंगे. वहां पर गुलाब चंद कटारिया को संघ का समर्थन मिलता रहा है, मिलता रहेगा. लेकिन जब गुलाब चंद कटारिया और वसुंधरा राजे में झगड़ा होगा तो भाजपा के बड़े नेता वसुंधरा राजे का समर्थन करेंगे और संघ के खिला़फ चले जाएंगे.

यही हाल नरेंद्र मोदी का है. उन्होंने गुजरात से भाजपा और आरएसएस के सभी पुराने एवं विश्वसनीय लोगों को निष्क्रिय कर दिया या दूसरे शब्दों में कहें, पत्ता सा़फ कर दिया. अब जब नरेंद्र मोदी ने हुंकार भरी तो भाजपा का गुट उनके साथ खड़ा हो गया. नरेंद्र मोदी ने जो किया, उसे संघ के किसी भी सदस्य ने पसंद नहीं किया और न उसका समर्थन किया, पर आंख के सामने दूसरी स्थिति दिखाई दे रही है. संघ के मुखिया और दूसरे वरिष्ठ लोग नरेंद्र मोदी का समर्थन करते दिखाई दे रहे हैं. वे उसी परंपरावादी सिद्धांत पर चल रहे हैं कि वे परिवार के मुखिया हैं और उन्हें सबको एक रखना है. पर क्या वास्तविकता भी यही है या कुछ और है? परिवार के मुखिया का एक मनोविज्ञान होता है. चूंकि परिवार उसके सामने पलता और बढ़ता है, इसलिए उसका स्नेह-संबंध सबके साथ होता है. इसी वजह से जब मुखिया कुछ नहीं भी कर रहा होता है, तो परिवार के लोग भले ही आपस में झगड़ते रहें, लेकिन उसकी तऱफ आशा की नज़र से हमेशा देखते रहते हैं. उसके शक्तिशाली होने का राज़ उसकी इसी कार्यप्रणाली में छिपा होता है. संघ का आधार सामान्य जनता में बहुत घटा है. अब संघ की शाखाओं में युवक और किशोर बहुत कम होते हैं, 50 वर्ष या उससे बड़ी उम्र के लोग जो बुज़ुर्ग की श्रेणी में आ जाते हैं, ज़्यादा संख्या में होते हैं. पहले शाखाएं संघ की विचारधारा मानने वालों की ऊर्जा का केंद्र होती थीं, लेकिन अब शाखाएं अवसाद और बीते हुए साल को याद करने का केंद्र होती हैं. वहां अब बड़े-बुज़ुर्ग आते हैं और अपनी बहुओं और बेटियों की तेरी-मेरी करके चले जाते हैं.

भाजपा ने लालकृष्ण आडवाणी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाकर मुसलमानों और हिंदुओं के धु्रवीकरण की कोशिश की और उसका परिणाम देख लिया. अभी हाल में हुए उत्तर प्रदेश चुनाव का हाल हम सभी ने देखा है. समाजवादी पार्टी को बल मिलने के पीछे एक बड़ा कारण सलमान खुर्शीद और दिग्विजय सिंह का शोर मचाना था कि मुलायम सिंह की सरकार हमारे बिना नहीं बनेगी. साथ ही यह भी कहा कि मायावती और उमा भारती मिलकर अगर सरकार बना लेंगी तो मुसलमानों का बहुत नुक़सान होगा. कांग्रेस को तो मुसलमानों के वोट मिले नहीं, ज़्यादातर वोट समाजवादी पार्टी को मिल गए. मुसलमानों का धु्रवीकरण अगर न हुआ होता तो समाजवादी पार्टी की जीत इतनी आसान नहीं होती. अभी उत्तर प्रदेश में स्थानीय निकाय चुनाव ने इसे फिर साबित किया कि मुसलमानों का धु्रवीकरण नहीं हुआ और भाजपा बड़ी संख्या में जीती. ऐसा ही भय मुसलमान वोटरों के मन में 2014 में होने वाले लोकसभा चुनाव के दौरान पैदा किया जाएगा, ऐसा भाजपा के कुछ लोगों का मानना है, जिसकी वजह से कांग्रेस अपने बलबूते सरकार बना लेगी. अगर ऐसा हुआ तो लोग कहेंगे संघ का प्रयोग फेल हो गया. बड़ा सवाल यह है कि संघ ने ऐसा प्रयोग क्यों किया, क्या संघ नासमझ है?

यहीं से सवाल का उत्तर मिलना शुरू होता है. संघ को समझ है कि आज़ाद हिंदुस्तान की अब तक की सबसे बड़ी राजनीतिक घटना बाबरी मस्जिद का ध्वंस थी. बाबरी मस्जिद के ध्वंस के बाद जब चुनाव हुए, तब भी भाजपा 190 का आंकड़ा पार नहीं कर पाई. इसका मतलब है कि संघ यह जानता है कि सबसे फेवरेवल इंसिडेंट के बाद भी चाहे कितना भी सही समय आए, ये 190 से ऊपर नहीं जा सकते. अब भाजपा भले सोचे कि वह 190 का आंकड़ा पार कर सकती है, पर संघ यह पक्के तौर पर जानता है कि भाजपा ऐसा नहीं कर सकती है. अब तो देश में कोई ज्वार भी नहीं है. संघ को यह भी मालूम है कि अगर नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार हो गए तो भाजपा की लोकसभा में संख्या तीन अंकों में भी नहीं आएगी. अगर यह संख्या तीन अंकों में नहीं आई तो सबसे बड़ा क्योस होगा. जब नरसिम्हाराव प्रधानमंत्री थे और लोकसभा चुनाव की घोषणा हुई तो सभी तरह के तीर्थों में उन्होंने जाना शुरू किया. वह बाला जी भी गए, अजमेर शरी़फ भी गए. कांग्रेस पूरी हतप्रभ थी, चुनाव जीतने का संकट उसके सामने था. ऐसे समय सोनिया गांधी रायबरेली से आए लोगों को लड्डू, पूरियां और जलेबी खिला रही थीं. अचानक सोनिया गांधी ने कांग्रेस का सारा नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया और ऐसा लगा कि कांग्रेस का सारा क्योस खत्म हो गया. हालांकि कांग्रेस की सीटें लगभग उतनी ही आईं, जितनी पिछली बार आई थीं.

इसी तरह जब नरेंद्र मोदी तीन अंकों में सीटें नहीं ला पाएंगे तो एक क्योस पैदा होगा, इसकी शुरुआत हो चुकी है. नरेंद्र मोदी ने केंद्रीय नेतृत्व को चैलेंज किया है. इसी तरह वसुंधरा राजे और येदियुरप्पा ने भी केंद्रीय नेतृत्व को चैलेंज किया है. शांता कुमार ने धूमल को चैलेंज किया है. खंडूरी उत्तराखंड में हार गए, लेकिन हारने से पहले उन्होंने केंद्रीय नेतृत्व को चैलेंज किया था. भाजपा में हर जगह क्षेत्रीय क्षत्रप खड़े हो गए हैं. उमा भारती ज़रूर खामोश हैं और लगता है कि वह समझदार हो गई हैं. अगर वह समझदार न होतीं तो अब तक मध्य प्रदेश में बवाल मचाना शुरू कर देतीं. उमा भारती दरअसल संघनिष्ठ हैं. उन्हें इस बात का एहसास हो गया है कि चलते हुए जहाज़ से उड़ने वाली चिड़िया को कोई किनारा नहीं मिलता, उसे फिर जहाज़ पर आना पड़ता है और उमा भारती का जहाज़ संघ है. अगर उन्हें यह एहसास न होता, तो उनका भी नाम आज भाजपा के इन्हीं क्षत्रपों में लिया जाता.

इस स्थिति में जब भाजपा के सांसदों की संख्या 100 से कम रह जाएगी तो सब लोग फिर संघ की तऱफ दौड़ेंगे और उस परिस्थिति में संघ का हाथ ऊपर होगा. लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और नरेंद्र मोदी अगर निबट गए तो संघ का हाथ ऊपर. लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी निबट गए और नरेंद्र मोदी जीत गए तो संघ का हाथ ऊपर. नरेंद्र मोदी अगर प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बन गए तो संघ का हाथ ऊपर. इस सारे गेम ऑफ फिलॉसफी में संघ की हार कहीं नहीं है. इसलिए संघ संभवत: ऐसे ही चलेगा, जैसा चल रहा है. जिसे जैसे लड़ना हो लड़ता रहे, जिसे जैसे कूदना हो कूदता रहे. सुरेश सोनी वही करेंगे, जो अब तक करते रहे हैं यानी क्योस क्रिएट करते रहेंगे. वह प्रभात झा जैसे वेतनभोगी कार्यकर्ता को आगे बढ़ाएंगे, मदन दास देवी, श्याम जाजू जैसे लोगों को आगे बढ़ाएंगे और फिर ये सब इतिहास के गहरे, अंधेरे कोने में खो जाएंगे. आज भाजपा में मदन दास देवी का कोई नाम लेने वाला नहीं है, शायद कल सुरेश सोनी का नाम लेने वाला कोई न हो, पर इस स्थिति का भाजपा और संघ पर कोई असर नहीं पड़ने वाला.

उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह के हटने के बाद हुए हर चुनाव में भाजपा की सीटें घटी हैं, लेकिन नेतृत्व कलराज मिश्र, लाल जी टंडन, विनय कटियार और राजनाथ सिंह के पास ही रहा. उमा भारती को नेतृत्व करने के लिए संघ और भाजपा ने उत्तर प्रदेश भेजा था, पर विधानसभा चुनाव जीतने के बाद भी उन्हें वहां नेता मानने के लिए भाजपा के लोग तैयार नहीं हैं. भाजपा कार्यकर्ताओं का कहना है कि ये चारों वोट नहीं दिला सकते और ये फुंके हुए कारतूस हैं. पिछले विधानसभा चुनाव में संजय जोशी और उमा भारती ने जो मेहनत की थी, उसका फायदा पार्टी को इन चारों की वजह से नहीं मिला, लेकिन अभी मेयर के चुनाव में भाजपा को संजय जोशी और उमा भारती द्वारा किए हुए कामों का फायदा मिला. हालांकि इन चुनावों में इन चार नेताओं ने कोई मेहनत नहीं की, पर संजय जोशी और उमा भारती द्वारा कार्यकर्ताओं में जगाए गए विश्वास ने भाजपा को मेयर के चुनाव में का़फी फायदा पहुंचाया. संजय जोशी और उमा भारती कुशल संगठनकर्ता हैं, लेकिन उनकी किसी को परवाह नहीं है. जिन्हें परवाह होनी चाहिए, वे अपने मज़बूत होने का इंतज़ार कर रहे हैं. भाजपा का क्या होगा, इसकी भी उन्हें परवाह नहीं है. ठीक उसी तरह, जैसे इतिहास में महाराणा उदय सिंह के बारे में दर्ज है कि जब उनके 19 व़फादार सेनापतियों के सिर कट गए तो वह अपने महल में वापस चले गए. लोगों ने उन्हें बुद्धिमान और रणछोड़ कहा. ऐसा ही संघ कर रहा है. देखना दिलचस्प होगा कि आगे इस महासंग्राम में क्या होगा. संघ अपनी चालें चुपचाप चल रहा है. इन सारे घात-प्रतिघातों के बीच नितिन गडकरी के लिए एक संदेश छिपा है कि वह गुजरात में नरेंद्र मोदी के चुनाव से पहले अपना चुनाव करा लें, नहीं तो वह बहुत बड़ी मुसीबत में फंसने वाले हैं. अगर नरेंद्र मोदी गुजरात में चुनाव जीत गए तो लालकृष्ण आडवाणी एवं मुरली मनोहर जोशी अच्छी तरह समझते हैं कि 75 के बाद का आंकड़ा क्या गुल खिलाएगा और तब आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी एवं नरेंद्र मोदी मिल जाएंगे. अगर नरेंद्र मोदी चुनाव हार गए, तब भी ये तीनों मिल जाएंगे. अगर संजय जोशी को वापस पार्टी में ज़िम्मेदारी दी गई, तब भी ये तीनों मिल जाएंगे, क्योंकि इस बार भी संजय जोशी को ज़िम्मेदारी नितिन गडकरी ने दी थी और उन्होंने अपने घनिष्ठ मित्रों से कहा है कि दोबारा भाजपा अध्यक्ष चुने जाने के बाद वह संजय जोशी को फिर महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी सौंपेंगे. इसलिए अगर सचमुच कोई इस समय मुसीबत में है तो वह नितिन गडकरी हैं. उन्हें अगर सचमुच अपनी दुकान चलानी है, क्योंकि भाजपा के वरिष्ठ नेता इसे दुकान चलाना ही कह रहे हैं, तो उन्हें गुजरात चुनाव से पहले अपने अध्यक्ष पद का चुनाव करा लेना चाहिए.

4 comments

  • editorchauthiduniya

    ऐसा लग रहा ही जैसे आप संघ के बारे में दुसरो से ही जानकारी मिली है
    सेकुलर बुद्धिजियों की जमात में शामिल होने के लिए शायद संघ की आलोचना करने की जरूरत पड़ रही है. कृपया संघ को अछे से जाने समझे तब जिम्मेदार टिप्पणी करे.

  • editorchauthiduniya

    इस तरह के लेख पर हंसी आती है सायद संघ से डरा हुआ है

  • editorchauthiduniya

    आपको संघ के बारे में सतही जानकारी भी नहीं है और इस तरह दूर से संघ को यदि देखते रहे तो कभी समझ भी नहीं पाओगे. एक नोसिखिया पत्रकार यदि संघ की आलोचना करे तो समझ में आ सकता है क्योंकि सेकुलर बुद्धिजियों की जमात में शामिल होने के लिए शायद संघ की आलोचना आवश्यक हो,आप कम से कम उम्र से तो परिपक्कव लगते ही हैं और अनुभव आपको कितना है स्वयं आपकी लेखनी बता ही रही है .स्टार न्यूज़ के सनसनी कार्यक्रम को आप और अच्छा चला सकते हैं,ज्वाइन कर लें.

  • editorchauthiduniya

    एक और उदहारण “पैड रिपोर्टिंग” का …. मनीष जइ के कारण में चौथी दुनिया पर आया लेकिन सतोष भाटिया के कारन इसे छोड़ देने का निर्णय लेना पड़ेगा , ऐसा लगता है | कांग्रेस के चमचे हर जगह पर मौजूद है |

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