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कैसे बचेगी गंगा-जमुनी तहजीब

गंगा की निर्मलता तभी संभव है, जब गंगा को अविरल बहने दिया जाए. यह एक ऐसा तथ्य है, जिसकी अनदेखी नहीं की जा सकती है, लेकिन गंगा की स़फाई के नाम पर पिछले 20 सालों में हज़ारों करोड़ रुपये बहा दिए गए और नतीजे के नाम पर कुछ नहीं मिला. एक ओर स़फाई के नाम पर पैसों की लूटखसोट चलती रही और दूसरी ओर गंगा पर बांध बना-बनाकर उसके प्रवाह को थामने की साजिश होती रही. अवैध खनन, पनबिजली परियोजनाओं, प्रदूषण फैलाते काऱखानों, सीवर एवं अवैध निर्माण की वजह से आज गंगा की अविरलता खतरे में पड़ चुकी है. निगमानंद एवं जी डी अग्रवाल जैसे साधु-संतों द्वारा बार-बार अनशन करने और अपनी जान तक देने के बाद भी सरकार और नीति निर्माता इतनी साधारण बात नहीं समझ सके. गंगा की व्यथा को समझते हुए गंगा सेवा मिशन इन मुद्दों को लगातार उठा रहा है. हाल में दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में गंगा की व्यथा कथा: नष्ट होती संस्कृति एवं प्राकृतिक विरासत विषय पर दो दिनों तक विमर्श चलता रहा. सम्मेलन को संबोधित करते हुए डॉ. कर्ण सिंह ने कहा कि गंगा एक्शन प्लान एक और दो पर का़फी संसाधन खर्च हो गए, पर गंगा की स्थिति क्यों नहीं सुधरी, यह समझने की ज़रूरत है. इस चीज़ का मूल्यांकन होना चाहिए कि गंगा स्वच्छता अभियान पर अभी तक हुआ खर्च कहां गया और उसका गंगा की स्वच्छता में कितना योगदान रहा.

गंगा आज विश्व की सर्वाधिक प्रदूषित नदियों की सूची में पांचवें स्थान पर है. हमें समझना होगा कि प्रकृति संसाधन नहीं है, जिसका निर्बाध रूप से दोहन किया जाए. गंगा जी को जीवंत बनाने के लिए हम संकल्पबद्ध हैं. पिछली डेढ़ सदी में धर्म, संस्कृति एवं गंगा पर निर्मम हमले हुए हैं, अकल्पनीय नुक़सान हुआ है. हमें अपराध बोध भी नहीं है कि हमने गंगा को मरणासन्न स्थिति में पहुंचा दिया है. यह ज़रूरी है कि कम से कम अपराध बोध की भावना उत्पन्न हो, जिससे हम सही दिशा में सोच सकें.

– स्वामी आनंद स्वरूप,  गंगा सेवा मिशन.

ग़ौरतलब है कि गंगा अपने उद्गम स्थल यानी हरिद्वार से लेकर लगभग अपने अंतिम छोर तक प्रदूषण का शिकार हो चुकी है. गंगा के तट पर बसे शहरों से निकली गंदगी सीवर के माध्यम से गंगा में जा रही है, जिसने उसके पानी को पीने तो क्या, नहाने लायक़ भी नहीं छोड़ा है. गंगा पर बने बांधों के सवाल पर इस दो दिवसीय गोलमेज सम्मेलन में यह बात सामने आई कि बांध बनाने से गंगा का प्रवाह प्रभावित होता है. दूसरी ओर जनता बिजली की मांग करती है, फिर भी बड़े पैमाने पर बांध बनाना उचित नहीं है, इसके लिए कोई बीच का रास्ता तलाशना होगा. एक ऐसी समग्र योजना बने, जिससे नदी एवं पर्यावरण की रक्षा हो सके और लोगों की समस्याओं का भी समाधान निकल सके. बड़े बांधों की समीक्षा हो, साथ ही गंगा की स़फाई से अधिक उसकी अविरलता (सतत बहाव) और आर्थिक पहलू पर ध्यान दिया जाए. गंगा एक्शन प्लान में बरती गईं अनियमितताओं की जांच सीएजी द्वारा कराए जाने की मांग भी सामने आई.

प्रख्यात क़ानूनविद्‌ सोली सोराबजी के मुताबिक़, पर्यावरण को नुक़सान पहुंचाने वालों के पोस्टर प्रमुख सार्वजनिक स्थानों पर उन्हीं के खर्च पर लगाए जाएं. सोराबजी का मानना था कि गंगा नदी की दुर्दशा के लिए कॉरपोरेट जगत का असीमित लालच भी ज़िम्मेदार है. उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री बी सी खंडूरी के मुताबिक़, गंगा एक्शन प्लान से ज़्यादा ज़रूरी जन जागृति है, ताकि गंगा भक्त भी मां गंगा को प्रदूषित न करें. हज़रत सलीम चिश्ती फाउंडेशन से जुड़े पीरज़ादा रईस मियां चिश्ती, जो दरगाह हज़रत सलीम चिश्ती के सज्जादानशीं हैं, ने कहा कि गंगा हिंदुस्तान के इतिहास, पवित्रता और आस्था का हिस्सा है. गंगा जल न केवल हिंदुओं के लिए पवित्र है, बल्कि मुसलमानों के लिए भी पाक है, जो इससे वुज़ूह करते हैं. हम गंगा-जमुनी तहज़ीब की बात करते हैं, लेकिन जब गंगा-जमुना ही नहीं रहेंगी तो तहज़ीब कैसे बचेगी?

नाराज़ केवट

गंगा लाखों लोगों के जीवनयापन का साधन भी है. केवटों को गंगा पुत्र कहते हैं. गंगा में नाव चलाकर, मछली पकड़ कर हज़ारों केवट अपना परिवार चलाते हैं, लेकिन केवट भी गंगा स़फाई के नाम पर चल रही मनमानी के शिकार हो रहे हैं. इससे उनके रोज़गार पर भी असर पड़ रहा है. बनारस में बनी कछुआ सेंक्चुरी की वजह से स्थानीय केवटों को नाव चलाने और संरक्षित इलाक़े में जाने से मना किया जाता है, जिससे उनका रोज़गार प्रभावित हो रहा है. नतीजतन, बनारस के उक्त गंगा पुत्र कछुआ सेंक्चुरी का विरोध कर रहे हैं. सवाल यह है कि हज़ारों करोड़ रुपये की सरकारी योजना (गंगा एक्शन प्लान) में इन लोगों के रोज़गार और आर्थिक पहलू का ध्यान क्यों नहीं रखा जाता, आखिर गंगा की स़फाई में इन स्थानीय लोगों को क्यों नहीं शामिल किया जाता?

 

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