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जनरल वी के सिंह और अन्‍ना हजारे की चुनौतियां

जनरल वी के सिंह और अन्‍ना हजारे की चुनौतियां

भारत में लोकतंत्र की इतनी दुर्दशा आज़ादी के बाद कभी नहीं हुई थी. संसदीय लोकतंत्र में राजनीतिक दलों का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है, लेकिन विडंबना यह है कि आज संसदीय लोकतंत्र को चलाने वाले सारे दलों का चरित्र लगभग एक जैसा हो गया है. चाहे कांग्रेस हो या भारतीय जनता पार्टी या अन्य राजनीतिक दल, जिनका प्रतिनिधित्व संसद में है या फिर वे सभी, जो किसी न किसी राज्य में सरकार में हैं, सभी का व्यवहार सरकारी दल जैसा हो गया है. इसीलिए उन सवालों पर जिनका रिश्ता जनता से है, सभी दल एक-दूसरे की मदद कर रहे हैं और आम जनता के हित के खिला़फ खड़े दिखाई दे रहे हैं. जनता से सीधा जुड़ा सवाल भ्रष्टाचार का है.

जब भारत की राजनीति में अन्ना हजारे का उदय हुआ और भ्रष्टाचार के खिला़फ जनता की आवाज़ उठी तो अन्ना हजारे की साख खत्म करने के लिए उनके सलाहकार अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया एवं किरण बेदी पर भ्रष्टाचार के आरोप केंद्र सरकार, कांग्रेस पार्टी और मुख्य विपक्षी दल भाजपा ने लगाए. उन्हें लगा कि कुछ न कुछ हाथ में आएगा और ये लोग डरकर चुप हो जाएंगे, लेकिन हुआ बिल्कुल उल्टा. ये चुप नहीं हुए और इन्होंने कांग्रेस और भाजपा के नेताओं के ऊपर सबूत के साथ भ्रष्टाचार के आरोप लगाए. आरोप लगाने के नतीजे में कांग्रेस और भाजपा एक-दूसरे के खिला़फ खड़े हो गए. अरविंद केजरीवाल ने रॉबर्ट वाड्रा, सलमान खुर्शीद, नितिन गडकरी और रंजन भट्टाचार्य के खिला़फ आरोप लगाए. सुब्रह्मण्यम स्वामी ने सोनिया गांधी और राहुल गांधी के ऊपर आरोप लगाए. छोटी-मोटी आतिशबाज़ियां और हुईं, लेकिन भारत की राजनीति में पहली बार भ्रष्टाचार में सह-अस्तित्व पर से पर्दा उठ गया.

महंगाई, बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य, पानी, ज़मीन, रोटी और भूख जैसे मुद्दे किसी राजनीतिक दल की प्राथमिकता में नहीं हैं. अरविंद केजरीवाल ने भ्रष्टाचार के शांत तालाब में पत्थर क्या मार दिया, कीचड़ के छींटे असामान्य तरीक़े से सबके चेहरे के ऊपर फैले दिखाई देने लगे. सारे खेल में वामपंथी चुप हैं, मायावती चुप हैं, मुलायम सिंह यादव चुप हैं, नीतीश कुमार चुप हैं. मुलायम सिंह, मायावती और नीतीश कुमार की चुप्पी समझ में आती है, लेकिन वामपंथियों की चुप्पी समझ में नहीं आती.

ऐसा लगा, जैसे कांग्रेस और भाजपा मिलकर इस देश को लूटने में ज्वाइंट वेंचर किए हुए हैं. न तुम मेरी कहो, न मैं तुम्हारी कहूं का सिद्धांत दोनों ने अपनाया हुआ है. इसका सबूत दिग्विजय सिंह के इस बयान से मिलता है कि मेरे पास आडवाणी जी के बेटे और बेटियों के भ्रष्टाचार के सबूत हैं, लेकिन मैं व्यक्तिगत हमले नहीं करूंगा. दोनों पक्षों के लोग अपनी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं पर लगे आरोपों की जांच कराने की जगह दूसरे की जांच कराने की बातें कह रहे हैं. जब नितिन गडकरी के ऊपर सरकार ने जांच शुरू की तो पत्रकारों ने पूछा कि रॉबर्ट वाड्रा के ऊपर जांच क्यों नहीं हो रही है, तो आज के सूचना मंत्री ने कहा कि वह अलग तरह का केस है, इसीलिए उसकी जांच नहीं हो रही है और गडकरी का केस अलग तरह का है, इसीलिए उसकी जांच हो रही है. इस अलग तरह को उन्होंने डिफाइन नहीं किया. नरेंद्र मोदी ने कुछ ज़्यादा ही आज़ादी ले ली और कहा कि कांग्रेस के नए बने राज्यमंत्री शशि थरूर की प्रेमिका 50 करोड़ की है. इसके जवाब में दिग्विजय सिंह ने नरेंद्र मोदी की शादी और उनकी पत्नी के गुजरात के एक गांव में शिक्षिका के नाते जीवनयापन करने की बात मीडिया में कही.

देश के लोग चकित और चिंतित हैं कि महंगाई, बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य, पानी, ज़मीन, रोटी और भूख जैसे मुद्दे किसी राजनीतिक दल की प्राथमिकता में नहीं हैं. अचानक अरविंद केजरीवाल ने भ्रष्टाचार के शांत तालाब में पत्थर क्या मार दिया, कीचड़ के छींटे असामान्य तरीक़े से सबके चेहरे के ऊपर फैले दिखाई देने लगे. सारे खेल में वामपंथी चुप हैं, मायावती चुप हैं, मुलायम सिंह यादव चुप हैं, नीतीश कुमार चुप हैं. मुलायम सिंह, मायावती और नीतीश कुमार की चुप्पी समझ में आती है, लेकिन वामपंथियों की चुप्पी समझ में नहीं आती. वामपंथियों की समस्या यह है कि वे जनता के ग़ुस्से का साथ देने की जगह मुद्दा किसने उठाया, इसका श्रेय लेने के पचड़े में पड़ जाते हैं. वामपंथी नेताओं का कहना है कि अरविंद केजरीवाल ने रिलायंस के साथ कांग्रेस और भाजपा के जिस रिश्ते का खुलासा अब किया है, उसका खुलासा उन्होंने बहुत पहले ही कर दिया था और इस बारे में प्रधानमंत्री को खत भी लिखे थे.

सवाल यह है कि वामपंथियों की रणनीति में वह कौन सी कमी है कि लोग उनके द्वारा उठाए गए मुद्दों को गंभीरता से नहीं लेते और क्यों उनके द्वारा उठाए गए सवाल आम जनता को एकजुट करने का कारण नहीं बन पाते. आज जब जनता भ्रष्टाचार के सवाल पर ग़ुस्से में दिखाई दे रही है तो वामपंथी जनता से दूर खड़े दिखाई दे रहे हैं. इस बीच अरविंद केजरीवाल और उनके साथियों ने पारंपरिक विरोधी पक्ष के खाली स्थान को सफलतापूर्वक भर दिया है. उन्होंने दिल्ली में कांग्रेस और भाजपा को हटाकर अपने लिए जगह बना ली है. वे दिल्ली की जनता को इस बात का भरोसा दिलाने की कोशिश कर रहे हैं कि कांग्रेस और भाजपा दोनों की चाल एक है, चरित्र एक है और चेहरा एक है. अगर दोनों के बीच कुछ अंतर है, तो वह मुखौटे का है. जिस अरविंद केजरीवाल को सलमान खुर्शीद ने चींटी कहा था और कांग्रेस के नेताओं ने अरविंद केजरीवाल की साख खत्म करने की कोशिश की थी, उसी अरविंद केजरीवाल नामक चींटी ने सलमान खुर्शीद नामक हाथी की सूंड में घुसकर उनकी जान आ़फत में कर दी है. दूसरी तऱफ अरविंद केजरीवाल ने कांग्रेस और भाजपा की साख पर सवालिया निशान खड़े कर दिए. अरविंद केजरीवाल का नाम जिसे कल तक कांग्रेस और भाजपा के लोग मज़ाक़ में लिया करते थे, आज वही लोग अरविंद केजरीवाल का नाम डर से ले रहे हैं. अरविंद केजरीवाल की सफलता पैसे की सफलता नहीं है, अरविंद केजरीवाल की सफलता उन मुद्दों की सफलता है, जिनका रिश्ता आम आदमी के टूटे विश्वास, आम आदमी के दर्द और तकली़फ से है.

जिस अरविंद केजरीवाल को सलमान खुर्शीद ने चींटी कहा था और कांग्रेस के नेताओं ने अरविंद केजरीवाल की साख खत्म करने की कोशिश की थी, उसी अरविंद केजरीवाल नामक चींटी ने सलमान खुर्शीद नामक हाथी की सूंड में घुसकर उनकी जान आ़फत में कर दी है. दूसरी तऱफ अरविंद केजरीवाल ने कांग्रेस और भाजपा की साख पर सवालिया निशान खड़े कर दिए. अरविंद केजरीवाल का नाम जिसे कल तक कांग्रेस और भाजपा के लोग मज़ाक़ में लिया करते थे, आज वही लोग अरविंद केजरीवाल का नाम डर से ले रहे हैं.

इसी बीच भारत की राजनीति में एक और तत्व उभरा है. इस तत्व का नाम अन्ना हजारे एवं जनरल वी के सिंह है. अन्ना हजारे एवं जनरल वी के सिंह ने मिलकर यह घोषणा की है कि भारत की सरकार और भारत की संसद में बैठे लोग संविधान के विपरीत काम कर रहे हैं. उन्होंने भारत की सरकार को संविधान के दिशा निर्देशों के खिला़फ काम करने की छूट दे रखी है, इसीलिए इस संसद को भंग कर दिया जाना चाहिए. दोनों के संयुक्त हस्ताक्षर वाले इस बयान का देश में व्यापक स्वागत हुआ है. दोनों ने यह भी घोषणा की है कि वे पूरे देश में साथ-साथ घूमेंगे और इस संसद को भंग कर नए चुनाव कराने के लिए जनता से आंदोलन करने के लिए कहेंगे. इसके पीछे बहुत बड़ा कारण है. संविधान ने लोक कल्याणकारी राज्य मानने वाली सरकार को मान्यता दी है, लेकिन आज सरकार ने संविधान द्वारा कही गई लोक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा से अलग, बाज़ार आधारित अवधारणा वाला सिद्धांत अपना लिया है. लोक कल्याणकारी राज्य को मानने वाली सरकार शिक्षा, स्वास्थ्य, रोटी, रोज़गार, सड़क, अस्पताल एवं स्कूल जैसी चीज़ें मुहैया कराने की ज़िम्मेदारी लेती है, लेकिन लोक कल्याणकारी राज्य की जगह बाज़ार आधारित राज्य को मानने वाली सरकार अपने देश की ग़रीब जनता की कोई ज़िम्मेदारी नहीं लेती.

अन्ना हजारे और जनरल वी के सिंह यह चाहते हैं कि राजनीतिक पार्टियों को अब जनता से कहना चाहिए कि हम तुम्हारे लिए सड़क नहीं बनाएंगे, सड़क निजी कंपनी बनाएगी और अगर तुम्हें उसके ऊपर चलना है तो टोल टैक्स देना होगा. अब पीने के पानी का इंतज़ाम हम नहीं करेंगे, अगर तुम्हें पानी पीना है तो बोतलबंद पानी बनाने वाली कंपनियों से पानी खरीद कर पीना होगा. अब हम स्कूल नहीं खोलेंगे, अगर तुम्हें अपने बच्चे को पढ़ाना है तो तुम्हें बड़ी कंपनियों द्वारा खोले गए स्कूल में बच्चे को भेजना होगा. अब सरकार अस्पताल नहीं खोलेगी, अब जान बचाने के लिए तुम्हें उन अस्पतालों में जाना होगा, जो बड़ी कंपनियों ने खोले हैं. अगर इसके बाद जनता कांग्रेस, भाजपा या उन पार्टियों को वोट देती है, जो इन मसलों पर आज चुप हैं तो उन्हें जो वे कर रहे हैं, उसका मैनडेट मिल जाएगा. और अगर जनता चाहेगी तो उन लोगों को वोट देगी, जो बाज़ार द्वारा संचालित सरकार की जगह लोक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा पर चलना चाहते हैं. अन्ना हजारे और जनरल वी के सिंह चाहते हैं कि संविधान को अगर बदलना है तो जनता से मैनडेट लेकर बदलना चाहिए, चोरी-छिपे और ठगी के तरीक़े से नहीं बदलना चाहिए. इसीलिए उन्होंने इस लोकसभा को भंग कर नई लोकसभा की बात कही है. दुर्भाग्य की बात यह है कि संविधान को चोरी-चोरी बदलने की कोशिश पर न वामपंथी जनता के पास गए, न मुलायम सिंह, न मायावती और न कोई दूसरा राजनीतिक दल. इसलिए हो सकता है, अगर आम जनता को यह चालाकी समझ में आ जाए तो यह देश 30 जनवरी से एक नए जनांदोलन का गवाह बनेगा.

अन्ना हजारे और जनरल वी के सिंह की अपनी ताक़त और अपनी कमज़ोरियां हैं. अन्ना हजारे के साथ ऐसे लोग कम हैं, जिन्हें सामाजिक आंदोलनों, सामाजिक अंतर्विरोध, ग़रीबों के लिए काम करने की प्राथमिकता और संपूर्ण देश को एक इकाई मानकर शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार एवं न्याय को समझने का अनुभव रहा हो. अन्ना हजारे के साथ ज़्यादातर ऐसे लोग हैं, जो अपने-अपने समय में विभिन्न क्षेत्रों में सिविल सर्विस में रहे हैं. उनमें से शायद ही किसी ने गांधी जी की किसी किताब को पढ़ा होगा. उनमें से किसी ने गांधी जी की हिंद स्वराज नामक किताब को शायद देखा ही नहीं होगा. अन्ना हजारे के सामने चुनौती भी है और परेशानी भी. वह कैसे उन लोगों को सामाजिक आंदोलनों के इतिहास और गांधी के हिंदुस्तान की परिकल्पना के बारे में समझाएंगे, जिन्होंने आज तक कभी जानने की कोशिश ही नहीं की. कार्यकर्ताओं के रूप में भी अन्ना हजारे के पास ऐसे लोग ज़्यादा हैं, जो भारत की समस्याओं को गांधी के चश्मे से देखने में असमर्थ हैं. अगर समाज बदलना है तो अन्ना हजारे के कार्यकर्ताओं को पूंजीवाद, साम्यवाद, गांधीवाद और सर्वोदय का फर्क़ समझ में आना चाहिए. आम जनता की सत्ता में हिस्सेदारी के सिद्धांत में उनकी आस्था होनी चाहिए. ठीक ऐसी ही समस्या जनरल वी के सिंह के साथ है. कमोबेश उनके सामने भी वही चुनौती है, जो अन्ना हजारे के सामने है. उन चुनौतियों के बावजूद अन्ना हजारे और वी के सिंह दो ऐसे चेहरे हैं, जिनकी भाषा और जिनके वायदे पर देश भरोसा कर सकता है, लेकिन किसी कमेटी के नाम पर या इन दोनों के प्रतिनिधि अगर देश को नेतृत्व देने की कोशिश करेंगे तो अगले बीस सालों के लिए जनता का आंदोलन खत्म हो जाएगा और लोगों का हौसला पस्त हो जाएगा. देश अन्ना हजारे और जनरल वी के सिंह से जवाब मांगेगा, उनसे नहीं, जो उनका नाम लेते हैं.

देश के लोकतंत्र के परेशानी भरे समय में हिंदुस्तान का मीडिया भी लेफ्ट, राइट, सेंटर यानी दिशाहीन बहस में जुटा हुआ है. उसकी पूरी कोशिश आंदोलन न होने देने की है और वह लोगों का ध्यान मुद्दों से हटाना चाहता है. कुछ बड़े संपादक बेशर्मी के साथ खुले रूप में सरकार की वकालत करने, भाजपा को बचाने और अरविंद केजरीवाल, अन्ना हजारे एवं जनरल वी के सिंह को तोड़ने की मुहिम में लग गए हैं. उनके सवाल ऐसे होते हैं, जिनके जवाब अगर अन्ना हजारे, जनरल वी के सिंह या अरविंद केजरीवाल देते हैं तो उनका इस्तेमाल उन्हीं के खिला़फ करने की कोशिश की जाती है. ये तीनों सीधे लोग हैं, ये मीडिया के उस वर्ग की मक्कारी को समझ नहीं पाते, जो देश में ईमानदार लोगों की राजनीतिक और सामाजिक हत्या करने की सुपारी लिए हुए है. इस सारी स्थिति में सबसे खतरनाक संकेत कांग्रेस के पी चिदंबरम, राहुल गांधी और भाजपा के नितिन गडकरी ने दिए हैं. उनका मानना है कि उनके ऊपर लगे आरोप सही नहीं हैं, लेकिन सामने वाले के ऊपर लगे आरोप सही हैं. दूसरे यह कि बोलने की आज़ादी का ग़लत इस्तेमाल नहीं होना चाहिए या भारत के लोकतंत्र को नियंत्रित लोकतंत्र में बदलने की साज़िश भाजपा और कांग्रेस मिलकर कर रही हैं या इस देश को पुलिस स्टेट में बदलने की खुफिया साज़िश हो रही है या फिर कांग्रेस और भाजपा मिलकर अन्ना हजारे, जनरल वी के सिंह एवं अरविंद केजरीवाल को कुचलने की योजना बना रही हैं. हिंदुस्तान की जनता की आशाओं और हितों के बारे में अन्ना हजारे, जनरल वी के सिंह एवं अरविंद केजरीवाल को ज़िम्मेदारी इतिहास ने सौंपी है. अगर ये उस ज़िम्मेदारी को संभालने में असफल होते हैं तो फिर देश में विरोध और बदलाव जैसे सपनों को पूरा करने की तार्किक ज़िम्मेदारी नक्सलवादियों के पास चली जाएगी या फिर देश में अराजकता फैल जाएगी.

2 comments

  • editorchauthiduniya

    भ्रष्टाचार को ख़तम करना हे तो उसकी बजह ये मिलीजुली सरकार हैं पहले इसे सही करो. या तो वोट को ट्रान्सफर करने का हक जनता और प्रतियाशी को दो और आम चुनाव में ५०% की अनिवार्यता भी लागू करो. अन्यथा विधानसभा और लोकसभा में बहुमत का नाटक और छोटे छोटे दलों द्वारा समर्थन के नाम पर की जारही ब्लाक्क्मैलिंग ख़तम करो. जैसे कि एक आम चुनाव में ३ लोग खड़े होते हें 1-राम 2-श्याम 3-रहीम और चुनाव में राम को ४ लाख और श्याम को ३ लाख और रहीम को २ लाख वोट मिलते हैं तो हमारा कानून राम को जीता मान लेता हें. यहाँ पर 50% कि अनिवार्यता नहीं हे. ऐसे में यदि 3 नंबर पर आने वाले रहीम अपने मिले २ लाख वोट नंबर २ वाले श्याम को ट्रान्सफर करे तो श्याम के वोट ५लाख और राम से जियादा और ५०% से अधिक होजाते हैं तो यहाँ श्याम को जीता हुआ कियों नहीं माना जाता फिर क्यों संसद और विधान सभा में बहुमत के नाम पर खुली ब्लाक्क्मैलिंग होती हे जिस कारन सरकार में वो लोग शामिल हो जाते हैं जिन्हें 2 या 3 प्रतिशत वोट ही मिले हैं देश के मंत्रालय को जब ये लोग चलाएंगे तो भ्रष्टाचार तो होगा ही मेरे मुक़दमे बापस लेलो ५ सांसद हैं मेरी C.B.I. जाँच बंद करदो मेरे 3 सांसद हैं मुझे ये मंत्रालय देदो की शर्त पर बनने वाली गठबंधन की सरकार से यदि हम भ्रष्टाचार रोकने की उम्मीद करते हैं तो हम नादान हे सभासद से P.M. तक का चुनाव लड़ने की तमन्ना करना और उसके लिए कोशिश करना गुनाह तो नहीं अब इन रास्तो पर भ्रष्टाचार की ही फसल होती हे तो कोई क्या करे एक सांसद या विधायक चुनाव में दो चार करोड़ खर्च करता हे तो उसकी अगली मजिल मंत्री पद होगा और मंत्री बनना हे तो समर्थन में बीस मेम्बर भी चाहिए तो उनके चुनाव का खर्च भी उठाना होगा कुल हो गए चालिस करोड़ इसके बाद का सिलसिला और महँगा होता जाता हे मुख्यमंत्री बनने के लिए जरुरी हे ५ हज़ार करोड़ तो प्रधानमंत्री बनने के लिए जरूरी २० हज़ार करोड़ बनाने ही होंगे सब यही तो कर रहे हे कियों की हम बड़ी रैली और जियादा तामझाम देख कर ही वोट देते हैं चुनाव लड़ने बालो में कब हमने इमानदार को जिताया अडवाणी के मुकाबले राजेशखन्ना जीता वो भी उस जगह से जो हिंदुस्तान के दिल का जिगर हे पहले चुनाव लड़ने के लिए पैसा कमाओ फिर खर्च किये पैसे बसुलो फिर अगला चुनाव लड़ने के लिए पैसा कमाओ इसी कमाने के चक्कर में जियादा कमाई होजाये तो कोन बेबकुफ़ होगा जो छोड़ देगा.सोचो

  • editorchauthiduniya

    बहुत अच्हा लेख था . लेफ्ट पार्टी सबसे बड़ी चोर पार्टी है .उन्होंने बंगाल को ३४ सालो तक लुटा है ,.. आज वहाँ न अच्छा हॉस्पिटल है और ना ही अच्छा रोड और ना ही अच्छा स्कूल. और ये सब पार्टी एक दुसरे से मिली हुई है . उन्होंने बंगाल क लिए कुछ नही किया तो पुरे देश क लिए क्या करेंगे ..

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