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गांवों की पुरातन व्यवस्था
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गांधी जी ने दक्षिण अफ्रीका से लौटकर भारत का वर्ष भर दौरा किया. भारत के ग्रामीणों की दुर्दशा देखी. उनके मुंह से वेदनापूर्ण उद्गार निकले, हमारे गांव पैमाल (तुच्छ) हो गए हैं, क्योंकि हम सच्चा अर्थशास्त्र एवं सच्चा समाजशास्त्र जानते नहीं है. बापू का यह कथन बीसवीं सदी के दूसरे दशक के गांवों को जितना लागू था, उससे कहीं अधिक स्वराज्य के 34 बरस बाद आज अपने देश के गांवों को लागू होता है. तो सहज ही सवाल उठता है कि 18वीं और 19वीं सदी के भारत के गांवों की यानी अंग्रेजों के आगमन के पहले भारत के गांवों की क्या स्थिति थी? ग्रामीण भारत की अवस्था के बारे में पिछले सौ सालों में काफी संशोधन हुए हैं और साहित्य प्रकाशित हुआ है. इनके अध्ययन से और बहुत बूढ़े लोगों से बातचीत करने से पता चलता है कि उस समय भारत के गांव काफी हद तक स्व-शासित थे और गांवों का जीवन उन्नत था. हम लोगों में से कई, खासकर कई शिक्षित लोग ऐेसा समझते हैं कि भारत अंग्रेजों के आगमन के पहले अंधकार में था और पश्‍चिमी ज्ञान के कारण प्रकाश की किरण अंग्रेजों के साथ में यहां आई. भारत में राजा या नवाब निरंकुश शासन करते थे, यहां तानाशाही थी और पश्‍चिम के आगमन के कारण यहां उदारमतवाद आया, लोकतंत्र की कल्पना आई और नागरिक अधिकार की बातें चलने लगीं, ऐसा लोग सोचते हैं. यह ख्याल काफी हद तक ग़लत है कि ऐसा कहा जा सकता है. तो फिर भारत की शासन पद्धति क्या थी? पर चूंकि भारत ग्राम प्रधान देश था और आज भी है, इसलिए भारत के गांवों के शासन का स्वरूप क्या था? न केवल 17वीं, 18वीं सदी में, शुरू से ही भारत में शासन की इकाई गांव थे. संस्कृति के केंद्र भी गांव ही थे. भारत के राष्ट्रीय जीवन में नगरों का स्थान गौण था. वेद मंत्रों में गांव के कल्याण की प्रार्थना कई जगह की गई है, लेकिन नगरों के कल्याण के बारे में शायद ही कोई वेद मंत्र हो. वेदों में ग्रामीणी शब्द आया है, जिसका अर्थ सरपंच या गांव का नेता होता है. बुद्धकालीन जातक कथाओं में राज्य की उन्नति का वर्णन करते समय उन्नत गांवों की विशाल संख्या का अनेक स्थानों पर उल्लेख आता है, लेकिन जातक कथाओं में नगरों का कोई उल्लेख नहीं है. मौर्य वंश का इतिहास हो या गुप्त वंश का, सर्वदा भारत के जनजीवन में गांवों का ही प्राधान्य रहा. गांव के सभी निवासी गांव की विधानसभा के यानी ग्रामसभा के सदस्य थे. नालंदा में इन ग्रामसभाओं की या ग्राम-जनपदों की विविध मोहरें मिली हैं, जिन्हें लगाकर ग्रामसभाओं ने नालंदा विद्यापीठ को पत्र भेजे थे. तमिलनाडु के चिंगलपुट ज़िले के उत्तरमेरूर (जिसका नाम अपभ्रंश होकर अब उत्तरमल्लूर हो गया है) गांव के ग्रामसभा के कार्यकलापों का तफसीलवार वर्णन वहां के शिलालेख में मिला है. इस शिलालेख के अनुसार ग्रामसभा अपना काम पांच समितियों द्वारा करती थी. समिति के सब सदस्य नि:शुल्क काम करते थे और उनका कार्यकाल एक बरस का होता था. ग़लत व्यवहार के लिए उन्हें कार्यकाल समाप्त होने के पूर्व भी हटाया जा सकता था. सभी ग्राम निवासियों को शासन का अनुभव हो, इसलिए ग्रामसभा का एक नियम यह था कि एक बार उप-समिति पर नियुक्ति हो जाने के बाद तीन साल तक उसकी नियुक्ति फिर से हो नहीं सकती थी. सरकारी कर्मचारी इन उप-समितियों के सदस्य नहीं हो सकते थे. हर ग्रामसभा अपना संविधान स्वयं ही बनाती थी. उप-समितियों के सदस्य गोटियां डालकर चुने जाते थे. कहीं-कहीं सभी लोगों के नाम अलग-अलग टिकटों पर या विभिन्न रंगों की तूलिकाओं पर लिखे जाते थे और इनमें से एक टिकट या तूलिका को उठाने को किसी मासूम बच्चे को बुलाया जाता था. इसलिए इस पद्धति में दलीय राजनीति या मत प्रचार को कोई स्थान नहीं था. कृषि, बागवानी, ग्राम की सिंचाई का प्रबंध, विवादों का निपटारा, स्वर्ण तौलना और उसकी शुद्धता को प्रमाणित करना इत्यादि भिन्न कामों के लिए विभिन्न समितियां रहती थीं. गुप्तकाल में इन समितियों के कई सदस्य ब्राह्मणों के अलावा अन्य जातियों के भी पाए गए हैं. मराठाकाल में कई ग्राम पंचायतों में ग्राम-अदालतों के निर्णयों पर न्यायाधीशों के हस्ताक्षर हैं, जिनमें से कई ब्राह्मणेतर थे और कुछ हरिजन भी थे. ये ग्रामसभाएं क़र्ज़ लेना, बैंकिंग, शिक्षा, आरोग्य, रास्ते आदि का प्रबंध, मंदिरों की व्यवस्था, अकाल में सबका भरण-पोषण, गांव की सुरक्षा, मनोरंजन एवं सांस्कृतिक क्रियाकलाप, धार्मिक समारोह मनाना, सफाई, केंद्रीय सरकार की कर वसूली आदि कई काम करती थीं. केंद्रीय सरकार इन ग्रामसभाओं की कार्यवाहियों पर सामान्य देखभाल करती थी और अभिक्रम का दायित्व ग्रामसभा का रहता था. ग्रामसभाओं का यह उन्नत शासन अंग्रेजी साम्राज्य के आगमन तक था. प्रसिद्ध इतिहासकार सर चार्ल्स ट्रेवेलियन ने लिखा है, भारत पर अनेक विजेताओं ने बाहर से आकर हमले किए हैं और भारत को जीता है, लेकिन जैसे कुछ घास या बांस ज़मीन में गड़ा रहता है, वैसे ही भारत की ग्रामसभाएं हैं. बर्डवुड ने लिखा है, भारत पर पर्वतों के खुश्की मार्ग से सिथियन, ग्रीक, हूण, अफगान एवं मोगलों के हमले हुए और समुद्री मार्ग से पुर्तगाली, डच एवं फ्रेंच आए और अपना राज्य जमाया, लेकिन भारत की ग्राम-व्यवस्था पर उसका कोई परिणाम नहीं हुआ. सन् 1930 के प्रसिद्ध नोट में भारत के गवर्नर जनरल सर चार्ल्स मेटकाफ ने लिखा है, भारत के गांव छोटे-छोटे गणतंत्र हैं, जिनके भीतर निवासियों को लगने वाली सारी आवश्यकताएं पूर्ण होती थीं. दुनिया की सब चीजें नाशवान हैं, लेकिन भारत का यह ग्राम-समाज स्थायी है. राजवंश आए और गए, एक के बाद एक क्रांतियां हुईं, लेकिन ग्राम-समाज पर उसका कोई असर नहीं हुआ. भारतीयों के स्थायित्व के लिए सबसे बड़ा कारण ये ग्राम-समुदाय हैं, इसलिए मेरी इच्छा है कि इन ग्राम-समुदायों को विचलित न किया जाए और इनमें हस्तक्षेप करने वाली किसी भी शक्ति से मैं घबराता हूं. इसका अर्थ यह नहीं है कि भारत का पुराना गणराज्य या ग्राम- शासन आदर्श था. जात-पांत, ऊंच-नीच, अस्पृश्यता, पुरुषों के साथ महिलाओं की ग़ैर-बराबरी आदि कई दोष उनमें मौजूद थे. इनको हमें हटाना होगा. पश्‍चिम से आई हुई तफसील की बातें हमें आज के ग्रामीण जीवन में लानी होंगी. पुराने गणराज्यों के अस्तित्व का इतना ही अर्थ है कि भारत में स्व-शासन की प्राचीन परंपरा अनादिकाल से रही है और यह यहां के ख़ून में समाई हुई व्यवस्था है. धर्मपाल ने बताया कि 17वीं, 18वीं सदी में अंग्रेजों के आगमन के समय गांव बहुत मज़बूत थे और राजा की अन्यान्य इच्छा के विरुद्ध असहयोग एवं बहिष्कार आदि शस्त्रों का ग्राम- समाज उपयोग कर केंद्रीय सत्ता को झुकाता था और लोगों की इच्छा के सामने झुकने में राजा भी अपनी हेठी नहीं समझता था, बल्कि गौरव अनुभव करता था. धरमपाल ने बनारस के राज्य का 19वीं सदी का एक प्रसंग देकर एवं कई अन्य उदाहरणों से यह बात सप्रमाण सिद्ध की है. लेकिन दस हज़ार किलोमीटर दूर से भारत आए हुए इन अंग्रेज विदेशियों ने सदियों से चलने वाली ग्राम-व्यवस्था को आख़िर तोड़ ही डाला. ज़मीन की व्यवस्था, वन व्यवस्था, न्याय व्यवस्था, कृषि एवं उद्योगों में हस्तक्षेप और अपनी सर्वग्रासी कर नीति के द्वारा समूची ग्राम-व्यवस्था को अंग्रेजी शासकों ने तहस-नहस कर डाला. बदले में इन गांवों पर ज़बरदस्ती कलकत्ता से चलने वाला केंद्रीय शासन थोप दिया गया. उससे ग्रामीणों की प्रतिभा का उपयोग उनके स्व-शासन में होना बंद हो गया, सत्ता का केंद्रीकरण होने से स्वावलंबन टूटा, स्वाश्रयी व्यवस्था खंड-खंड हो गई और सारी ग्रामीण जनता परमुखापेक्षी यानी केंद्रीय शासन की मोहताज हो गई. सारा ग्रामीण भारत सत्वहीन और नपुंसक सा हो गया.

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